उत्तर प्रदेश के सुरहा ताल को हाल ही इसकी जैव विविधता और पर्यावरणीय महत्व के चलते भारत के 100वें रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिली है।
स्रोत : X पोस्ट
पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र को बचाने से लेकर बाढ़ नियंत्रण और भूजल रिचार्ज तक में बेहद अहम भूमिका निभाने वाली आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स पर मंडराते संकट के मद्देनज़र देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने देश के सभी वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के आसपास 10 किलोमीटर के इलाके में खनन गतिविधियों पर रोक लगाते हुए इस इलाके को बफर ज़ोन बनाने का निर्देश दिया है। यह निर्देश पहले उत्तराखंड के आसन वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के लिए लागू किया गया था, जिसे अब देशभर के समान संरक्षित क्षेत्रों पर लागू करने को कहा गया है। अदालत का यह रुख आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके आसपास लगातार बढ़ती औद्योगिक और खनन गतिविधियों पर नगाम लगाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व (Wetland Conservation Reserve) ऐसे संरक्षित क्षेत्र होते हैं जिन्हें वन्यजीव और पर्यावरण कानूनों के तहत अधिसूचित किया जाता है। इनमें दलदल, झीलें, बाढ़ मैदान, मैंग्रोव और अन्य जल-आश्रित आवास शामिल होते हैं। इनका उद्देश्य उन पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करना है जो जल संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी हैं। भारत में वेटलैंड्स का संरक्षण वेटलैंड्स (कंजर्वेशन एंड मैनेजमेंट) रूल्स, 2017 के तहत होता है। इसके अलावा, वेटलैंड्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर कन्वेंशन के दायरे में भी आते हैं, जो 1971 में अपनाया गया था।
बफर ज़ोन किसी संरक्षित क्षेत्र के आसपास का वह नियामक दायरा होता है, जहां कुछ गतिविधियों पर रोक या सख्त नियंत्रण लगाया जाता है। इसका उद्देश्य खनन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले शोर, धूल, कंपन और जल-प्रदूषण जैसे प्रभावों को कम करना है। इस मामले में 10 किलोमीटर का दायरा विशेष रूप से खनन गतिविधियों पर रोक से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में भी यही निर्देश लागू होंगे, जब तक कोई विशेषज्ञ समिति यह न पाए कि संबंधित राज्य में ऐसा वेटलैंड रिजर्व मौजूद ही नहीं है। कोर्ट का निर्देश खास तौर पर Wetland Conservation Reserves के आसपास खनन गतिविधियों पर लागू होता है। इसके तहत ऐसे संरक्षित वेटलैंड के 10 किलोमीटर के दायरे में खनन के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन्यजीव अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होगी।
यह स्पष्टता हिमाचल प्रदेश सरकार की एक अर्जी पर सुनवाई के दौरान दी गई। राज्य ने सवाल उठाया था कि क्या ये प्रतिबंध उसके क्षेत्र में भी लागू होंगे, और यह भी तर्क दिया कि वेटलैंड रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की तरह बफर ज़ोन व्यवस्था में अलग प्रकृति के होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तथ्यात्मक सत्यापन का निर्देश दिया और कहा कि नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्थायी समिति या पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय यह जांच करे कि हिमाचल प्रदेश सहित संबंधित क्षेत्रों में वास्तव में वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व मौजूद हैं या नहीं। यदि ऐसे रिजर्व पाए जाते हैं, तो 14 फरवरी 2024 के खनन प्रतिबंध संबंधी निर्देश लागू होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2026 को हिमाचल प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यदि राज्य में Wetland Conservation Reserve मौजूद पाया जाता है, तो उस पर 14 फरवरी 2024 को उत्तराखंड के असन वेटलैंड के मामले में दिया गया 10 किलोमीटर वाला निर्देश लागू होगा। अदालत ने केंद्र सरकार, पर्यावरण मंत्रालय और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति को हिमाचल प्रदेश में ऐसे वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व की मौजूदगी की जांच करने और एक महीने के भीतर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
इस मामले की जड़ उत्तराखंड के असन कंजर्वेशन रिजर्व से जुड़ी है। फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा था कि असन वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के 10 किलोमीटर के दायरे में बिना Standing Committee of the National Board for Wildlife और/या पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अनुमति के खनन नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस निर्देश के पीछे असन के रामसर स्थल होने और उसके पारिस्थितिक महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया था।
अब हिमाचल प्रदेश के मामले ने इस सवाल को व्यापक बना दिया कि क्या असन के लिए बनाया गया यह सुरक्षा सिद्धांत दूसरे Wetland Conservation Reserves पर भी लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिमालयी भू-दृश्य को केवल राज्य की सीमा की एक रेखा के आधार पर अलग-अलग पर्यावरणीय मानकों में नहीं बांटा जा सकता। हालांकि किसी खास क्षेत्र में वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व मौजूद है या नहीं, इसका निर्धारण विशेषज्ञ संस्थाओं को करना होगा।
भारत के वेटलैंड्स से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े
| तथ्य | आंकड़ा | महत्व |
|---|---|---|
| 2.25 हेक्टेयर से बड़े मैप किए गए वेटलैंड्स, 2017 | 2,01,503 | राष्ट्रीय स्तर पर वेटलैंड्स की संख्या का आकलन |
| 2.25 हेक्टेयर से बड़े मैप किए गए वेटलैंड्स, 2021 | 2,31,195 | नए रिमोट-सेंसिंग आकलन में दर्ज संख्या |
| असन कंजर्वेशन रिजर्व का क्षेत्रफल | 444.4 हेक्टेयर | 10 किमी खनन संबंधी न्यायिक व्यवस्था के मामले का प्रमुख वेटलैंड |
| असन को रामसर दर्जा | 2020 | अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि का दर्जा |
| भारत का रामसर कन्वेंशन में शामिल होना | 1982 | अंतरराष्ट्रीय वेटलैंड संरक्षण व्यवस्था में भारत की भागीदारी |
| भारत में रामसर स्थलों की संख्या, अगस्त 2026 | 101 | अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील के जुड़ने के बाद संख्या |
यहां सबसे बड़ी गलतफहमी दूर करना जरूरी है। 10 किलोमीटर का दायरा हर वेटलैंड के आसपास सामान्य निर्माण प्रतिबंध वाला बफर जोन नहीं है। ताजा न्यायिक व्यवस्था का सीधा असर खनन पर है। Wetland Conservation Reserve से 10 किलोमीटर के भीतर खनन गतिविधि को सामान्य अनुमति के आधार पर नहीं चलाया जा सकेगा; उसके लिए संबंधित केंद्रीय पर्यावरण और वन्यजीव प्राधिकारियों की मंजूरी का सवाल उठेगा।
यह फर्क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में बड़ी संख्या में झीलें, तालाब, दलदली क्षेत्र, जलाशय और अन्य आर्द्रभूमियां हैं। इन सभी को एक ही कानूनी श्रेणी में नहीं रखा गया है। रामसर साइट, Wetland under Wetlands Rules, Wetland Conservation Reserve और सामान्य जल निकायों की कानूनी स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
किसी वेटलैंड के चारों ओर 10 किलोमीटर त्रिज्या का पूरा गोलाकार क्षेत्र लगभग 314 वर्ग किलोमीटर के बराबर होता है। वास्तविक भौगोलिक क्षेत्र इससे अलग हो सकता है क्योंकि सीमाएं प्राकृतिक और प्रशासनिक भूगोल के अनुसार तय होती हैं। इसीलिए इस फैसले को यह कहकर प्रस्तुत करना कि "सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी वेटलैंड्स के आसपास 10 किमी निर्माण प्रतिबंध लगा दिया है", तथ्यात्मक रूप से बहुत व्यापक दावा होगा।
असन कंजर्वेशन रिजर्व उत्तराखंड के देहरादून जिले में असन नदी और यमुना नहर के संगम क्षेत्र में स्थित है। इसका क्षेत्रफल करीब 444.4 हेक्टेयर है और इसे जुलाई 2020 में रामसर स्थल का दर्जा मिला था। रामसर के अनुसार यहां लगभग 330 पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं और यह जलपक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास है।
इस क्षेत्र का महत्व केवल पक्षियों तक सीमित नहीं है। वेटलैंड जल प्रवाह को नियंत्रित करने, जलीय जैवविविधता को बनाए रखने और आसपास के पारिस्थितिक तंत्र को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे क्षेत्रों के आसपास खनन होने पर मिट्टी का कटाव, गाद, जलगुणवत्ता में गिरावट, भू-आकृति में बदलाव और जल प्रवाह पर असर जैसे प्रभाव वेटलैंड की पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी व्यापक पारिस्थितिक प्रभाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह रुख अपनाया कि संरक्षण केवल वेटलैंड की अधिसूचित सीमा तक सीमित नहीं रह सकता।
भारत में वेटलैंड्स का दायरा केवल रामसर स्थलों तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखे गए अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, 2.25 हेक्टेयर से बड़े वेटलैंड्स की संख्या 2017 के आंकड़ों में 2,01,503 थी, जबकि 2021 के आंकड़ों में यह संख्या 2,31,195 दर्ज हुई। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को इन आंकड़ों का जमीनी सत्यापन और सीमांकन करने का निर्देश दिया था।
यही कारण है कि वेटलैंड संरक्षण की पहली जरूरत केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि देश में मौजूद वेटलैंड्स की सही पहचान, डिजिटल मैपिंग, सीमांकन और राजस्व रिकॉर्ड में सुरक्षा हो। भारत में रामसर स्थलों की संख्या 2026 में 100 के आंकड़े को पार कर चुकी है। जून 2026 में उत्तर प्रदेश की जय प्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य (सुरहा ताल) को देश का 100वां रामसर स्थल घोषित किया गया था और बीते सप्ताह अगस्त में अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील के जुड़ने के साथ संख्या 101 हुई।
वेटलैंड्स यानी आर्द्रभूमियां भूजल रिचार्ज और बाढ़ नियंत्रण के साथ ही जैवविविधता के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाती हैं।
वेटलैंड्स को अक्सर खाली, दलदली या अनुपयोगी जमीन मान लेने की गलती की जाती है। वास्तव में वे प्राकृतिक जल प्रबंधन तंत्र की तरह काम करते हैं। वे वर्षाजल को रोकते हैं, बाढ़ के प्रभाव को कम कर सकते हैं, भूजल पुनर्भरण में मदद करते हैं, तलछट और कुछ प्रदूषकों को रोकते हैं तथा मछलियों, उभयचरों, जलीय पौधों और पक्षियों के लिए आवास उपलब्ध कराते हैं।
खनन जैसी गतिविधियां वेटलैंड के आसपास केवल जमीन की खुदाई तक सीमित प्रभाव नहीं डालतीं। इससे जल निकासी का प्राकृतिक ढांचा बदल सकता है, मिट्टी और गाद का प्रवाह बढ़ सकता है तथा भूजल और सतही जल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। कई मामलों में इन प्रभावों का असर वेटलैंड की वास्तविक सीमा से काफी दूर तक पहुंच सकता है।
इसीलिए 10 किलोमीटर के दायरे में खनन पर अतिरिक्त निगरानी का विचार precautionary principle से जुड़ा है। खतरा पूरी तरह सामने आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय संभावित नुकसान को पहले ही रोकने की कोशिश की जाती है।
भारत में वेटलैंड्स की सुरक्षा के लिए Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017 महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा हैं। इन नियमों के तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में State Wetland Authorities की भूमिका तय की गई है। वेटलैंड की पहचान, सीमांकन और उसके पारिस्थितिक चरित्र को बनाए रखने के लिए प्रबंधन व्यवस्था तैयार की जाती है। मंत्रालय की गाइडलाइंस में यह भी माना गया है कि वेटलैंड की सुरक्षा केवल उसके जल क्षेत्र तक सीमित नहीं हो सकती और उसके 'zone of influence' में विकास गतिविधियों को भी नियंत्रित करना पड़ सकता है।
लेकिन 2017 के नियमों में वेटलैंड्स के आसपास सभी मामलों के लिए एक समान 10 किलोमीटर वैधानिक बफर निर्धारित नहीं है। यही वह जगह है जहां सुप्रीम कोर्ट का ताजा हस्तक्षेप महत्वपूर्ण हो जाता है। अदालत ने एक विशेष श्रेणी के संरक्षित वेटलैंड्स के मामले में खनन पर अतिरिक्त न्यायिक सुरक्षा का रास्ता बनाया है।
इस आदेश का सबसे बड़ा प्रभाव यह हो सकता है कि वेटलैंड संरक्षण को केवल "जल क्षेत्र बचाने" के नजरिए से देखने के बजाय पूरे आसपास के लैंडस्केप से जोड़कर देखा जाए। यदि किसी वेटलैंड की जलविज्ञान व्यवस्था आसपास के भूभाग से जुड़ी है तो उसके आसपास होने वाली गतिविधियां भी संरक्षण के दायरे में आनी चाहिए।
दूसरा प्रभाव खनन परियोजनाओं की पर्यावरणीय जांच को मजबूत करने का हो सकता है। खासकर पहाड़ी और नदी घाटी वाले इलाकों में खनन से भू-क्षरण, गाद और जलप्रवाह में बदलाव जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। ऐसे क्षेत्रों में वेटलैंड स्वयं एक संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र होने के साथ-साथ नीचे की ओर स्थित नदियों और जल स्रोतों को भी प्रभावित करता है।
तीसरा लाभ प्रवासी पक्षियों और अन्य जलीय जीवों के आवासों को मिल सकता है। भारत के कई वेटलैंड मध्य एशियाई और अन्य प्रवासी पक्षियों के लिए पड़ाव हैं। आसपास का अत्यधिक शोर, भारी मशीनरी, भू-दृश्य में बदलाव और जल गुणवत्ता में गिरावट इन प्रजातियों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कर सकती हैं।
चौथा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू जल सुरक्षा का है। शहरों और गांवों के आसपास मौजूद वेटलैंड बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी को रोकने और धीरे-धीरे उसे प्राकृतिक जल प्रणाली में पहुंचाने में मदद कर सकते हैं। इनके आसपास अनियंत्रित खनन या भू-उपयोग परिवर्तन से यह प्राकृतिक क्षमता कमजोर पड़ सकती है।
फैसले का असर तभी दिखाई देगा जब सरकारें पहले यह स्पष्ट करें कि कौन-कौन से क्षेत्र Wetland Conservation Reserve की श्रेणी में आते हैं। इसके लिए सटीक डिजिटल मैप, जमीन पर सत्यापन और स्पष्ट सीमांकन जरूरी है।
यह चुनौती छोटी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट खुद राज्यों को वेटलैंड्स की ground truthing और boundary demarcation में तेजी लाने के निर्देश दे चुका है। 2025 में अदालत ने राज्यों से दो महीने के भीतर यह प्रक्रिया तेज करने को कहा था। इसका मतलब है कि संरक्षण व्यवस्था की बुनियादी जरूरत यानी "वेटलैंड आखिर है कहां?" का सवाल अभी भी कई जगह पूरी तरह हल नहीं हुआ है।
दूसरी चुनौती राज्यों की प्रशासनिक क्षमता है। वेटलैंड संरक्षण केवल वन विभाग का काम नहीं है। इसमें राजस्व, खनन, सिंचाई, नगर निकाय, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पंचायत और स्थानीय प्रशासन जैसे कई विभाग जुड़े होते हैं। एक विभाग की अनुमति दूसरे विभाग के संरक्षण आदेश को कमजोर कर दे तो कानून का उद्देश्य विफल हो सकता है।
तीसरी चुनौती स्थानीय आबादी और आजीविका से जुड़ी है। वेटलैंड्स के आसपास कृषि, मत्स्य पालन, पशुपालन और दूसरे पारंपरिक काम होते हैं। इसलिए संरक्षण का अर्थ स्थानीय लोगों के हर उपयोग पर रोक लगाना नहीं होना चाहिए। वैज्ञानिक आधार पर यह तय करना जरूरी होगा कि कौन-सी गतिविधि वास्तव में वेटलैंड को नुकसान पहुंचाती है और कौन-सी पारंपरिक गतिविधि टिकाऊ तरीके से जारी रह सकती है।
चौथी चुनौती निगरानी की है। केवल यह आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा कि 10 किलोमीटर में खनन के लिए अनुमति जरूरी है। अवैध खनन, छोटे पत्थर क्रशर, मिट्टी की खुदाई और भू-उपयोग परिवर्तन की निगरानी के लिए नियमित उपग्रह निगरानी, जमीनी निरीक्षण और सार्वजनिक शिकायत तंत्र जरूरी होगा।
भारत में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समय-समय पर कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। इन फैसलों ने नदियों, झीलों, जंगलों, आर्द्रभूमियों, पहाड़ों और जैवविविधता की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण कानूनी आधार तैयार किया है। लेकिन अनुभव यह भी बताता है कि किसी फैसले की वास्तविक ताकत उसके कागज पर लिखे निर्देशों में नहीं, बल्कि जमीन पर उसके पालन में होती है।
वेटलैंड्स के मामले में यह चुनौती और बड़ी है। जिस जलाशय को रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया, जिसकी सीमा तय नहीं हुई या जिसके आसपास के अतिक्रमण पर कार्रवाई नहीं हुई, उसके लिए अदालत का संरक्षण भी अधूरा रह सकता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार ground truthing, digital mapping और boundary demarcation पर जोर देना महत्वपूर्ण है।
यहां जनजागरूकता की भी बड़ी भूमिका है। स्थानीय लोगों को यह समझना होगा कि वेटलैंड केवल पानी भरी जमीन नहीं है। वह बाढ़ से सुरक्षा, भूजल, जैवविविधता और स्थानीय आजीविका से जुड़ी प्राकृतिक संपत्ति है। यदि किसी तालाब या झील में कूड़ा डालना, उसे पाटना या उसके आसपास अवैध निर्माण करना सामान्य सामाजिक व्यवहार बना रहेगा तो केवल सरकारी निगरानी से संरक्षण संभव नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख यह संदेश देता है कि वेटलैंड संरक्षण को उसकी सीमारेखा के भीतर कैद करके नहीं देखा जा सकता। किसी Wetland Conservation Reserve के आसपास होने वाली खनन गतिविधि उसके जल, मिट्टी, जैवविविधता और पूरे पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित कर सकती है। इसलिए सावधानी के सिद्धांत पर आधारित यह न्यायिक हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है।
लेकिन भारत में पर्यावरण संरक्षण का इतिहास यह भी बताता है कि अदालत और एनजीटी के अच्छे फैसले अपने आप पर्यावरण नहीं बचा सकते। कई बार आदेश के बाद भी सीमांकन में देरी होती है, अतिक्रमण बने रहते हैं, अवैध खनन चलता रहता है और संबंधित विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं। इसलिए असली चुनौती अब फैसले के बाद शुरू होती है।
जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें हर संबंधित वेटलैंड की वैज्ञानिक पहचान, डिजिटल मैपिंग, स्पष्ट सीमांकन और नियमित निगरानी सुनिश्चित करें। साथ ही स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रक्रिया का भाग बनाया जाए। अदालत का फैसला दिशा दिखा सकता है, लेकिन उस दिशा में आगे बढ़ने का काम सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर करना होगा। तभी 10 किलोमीटर की यह सुरक्षा रेखा कागज से निकलकर वेटलैंड की वास्तविक जमीन तक पहुंच पाएगी।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें