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नीतियां और कानून

अरावली के बाद अब चंबल: राजस्थान सरकार ने घटाया घड़ियाल अभयारण्य क्षेत्र, डॉल्फिन पर भी खतरा?

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य की 732 हेक्टेयर को डी-नोटिफाइड कर क्रोकोडइल सेंचुरी से बाहर करने का फैसला बढ़ा सकता है लुप्‍तप्राय जीवों के अस्तित्‍व का संकट

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

अरावली के जंगल और पहाड़ों को लेकर उठा विवाद अभी ठंडा नहीं पड़ने पाया है कि राजस्थान में पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर एक और तगड़ी चोट की ख़बर सामने आ गई है। इस बार मामला चंबल नदी और उसमें रहने वाले घड़ियालों से जुड़ा है। राजस्‍थान सरकार के एक फ़ैसले ने इन लुप्‍तप्राय जीवों के अस्तित्‍व को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। इस रिपोर्ट में हम देखेंगे कि चंबल नदी की पारिस्थितिकी, दुर्लभ जलीय जीवों की रक्षा और क्षेत्र की जैव विविधता पर इस फैसले के संभावित दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं।

राजस्थान सरकार ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य की सीमाओं में बदलाव करते हुए कोटा बैराज तक का 732 हेक्टेयर क्षेत्र अब चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य से मुक्त कर दिया है। एक अधिसूचना जारी कर अभयारण्य के एक बड़े इलाक़े में 1983 से लागू प्रतिबंधों को हटा दिया गया है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि अभी तक घड़ियाल सेंचुरी के तहत आने वाले इस क्षेत्र में निर्माण कार्य हो सकेंगे। 

3 जनवरी 2025 को जारी राजस्‍थान सरकार की सरकार की अधिसूचना ने कोटा से सटे राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य का नक्शा ही बदल दिया है। चंबल के इस इलाके को घड़ियाल, डॉल्फिन और दुर्लभ जलीय जीवों के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था, जिसके चलते यहां इनकी अच्‍छी खासी आबादी थी। नए सरकारी आदेश के बाद अब इसका एक बड़ा इलाक़ा उनके हाथों से निकलने जा रहा है। 

अधिसूचना के अनुसार चंबल घड़ियाल अभ्‍यारण्य क्षेत्र अब जवाहर सागर बांध से हैंगिंग ब्रिज तक होगा, जो पहले कोटा बैराज तक फैला हुआ था। गैर-अधिसूचित किए गए क्षेत्र में हैंगिंग ब्रिज से लेकर कोटा बैराज तक का वन क्षेत्र, नदी तटवर्ती क्षेत्र और निर्जन भूमि शामिल है। नई अधिसूचना के बाद 206 खसरों पर लगा प्रतिबंध अब हट जाएगा, जिसके बाद किशोरपुरा का 208.56 हेक्टेयर, शिवपुरा का 320.33 हेक्टेयर, सकतपुरा का 186.36 हेक्टेयर, रामपुरा का 0.7, गुमानपुरा का 3.93 और नयागांव का 12.12 हेक्टेयर एरिया सेंचुरी से बाहर हो जाएगा।

घड़ियाल और मगरमच्छ पानी और ज़मीन पर रहने वाले दुनिया के सबसे पुराने सरीसृप हैं। आज दोनों ही का अस्तित्‍व संकट में है।

पर्यावरणविद और विपक्ष विरोध में 

सरकार के इस फैसले को लेकर प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि इसका सीधा सा मतलब यह है कि अब इससे अस्तित्‍व का संकट झेल रहे लुप्‍तप्राय घड़ियालों का ठिकाना अब और भी सिकुड़ जाएगा। पर्यावरण विशेषज्ञ और पीपल्स ग्रीन पार्टी के अध्‍यक्ष डॉ. सुधांशु ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत करते हुए कहा '’राजस्‍थान सरकार का यह फैसला न केवल मनमाना और बेतुका है, बल्कि यह पर्यावरण के प्रति उसकी असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है। सरकार चंबल राष्‍ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य के एक बड़े हिस्‍से को उससे अलग करके वहां विकास के नाम पर अपनी मर्ज़ी की गतिविधियां करना चाहती है। यह घड़ियालों को उनके प्राकृतिक आवास से खदेड़ कर अपने लोगों को खुश और लाभान्वित करने वाला कदम है, जो स्‍पष्‍ट तौर पर वोटों की राजनीति से प्रेरित लगता है। सियासी फ़ायदे के लिए लुप्‍तप्राय घड़ियालों, प्रकृति और चंबल नदी के पूरे पारिस्थितिक तंत्र से इस तरह का खिलवाड़ अस्‍वीकार्य है।'’ 

गैर सरकारी संगठन जल ‘बिरादरी’ ने भी इसका विरोध करते हुए दावा किया कि इससे चंबल में और अधिक प्रदूषण होगा और जलीय जीवन को नुकसान पहुंचेगा। पर्यावरणविद इसे सीधा-सीधा संरक्षण की आत्मा पर कैंची बता रहे हैं। विपक्ष भी राजस्‍थान सरकार के इस फैसले को इसे एक खतरनाक मिसाल बताते हुए इसपर अपनी आपत्ति जाता रहा है। उसका कहना है आज 8 हेक्टेयर को डी-नोटिफाइड किया गया है, कल 80 हेक्टेयर को किया जा सकता है। एक बार दरवाजा खुला, तो विकास के नाम पर घड़ियाल अभयारण्य सिकुड़ता ही चला जाएगा।

क्‍या है सरकार का तर्क?

सरकार का तर्क है कि यह फैसला राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सिफारिश पर और वन्यजीव अधिनियम की धारा 26-क (3) के तहत लिया गया है। वह इसे तकनीकी और प्रशासनिक सुधार करार देकर दावा कर रही है और इससे घड़ियालों के मुख्य आवास पर कोई असर नहीं पड़ेगा। 

अधिकारियों ने बताया कि अभ्‍यारण्य क्षेत्र की संशोधित सीमा की अधिसूचना का उद्देश्य विशिष्ट राजस्व क्षेत्रों को छोड़कर राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के संरक्षित क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना है, जिससे बेहतर प्रशासनिक स्पष्टता और संरक्षण प्रबंधन सुनिश्चित हो सके।

नदियों में अवैध खनन और शिकार के चलते घड़ियाल और मगरमच्‍छ जैसे जीव अब चिडि़याघरो में ही देखने को मिलते हैं। दिल्‍ली ज़ू में आराम फ़रमाते घड़ियाल।

लोक-लुभावन फैसले से मकान मालिक और व्‍यापारी खुश

इस लोक-लुभावन फैसले के पीछे राजस्‍थान सरकार के साथ ही केंद्र सरकार की भी बराबर की भूमिका है, क्‍योंकि जंगल और राष्‍ट्रीय अभ्‍यारण्‍य को लेकर कोई भी फैसला केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है। केंद्र सरकार के तहत आने वाले नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ (एनबीडब्लूएल) की ओर से डी-नोटिफिकेशन की मंज़ूरी की सारी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद आखिर में राजस्थान सरकार ने भी इस क्षेत्र को घड़ियाल सेंचुरी से मुक्त करने का फैसला लिया है। राज्‍य सरकार की ओर से भेजे गए डी-नोटीफिकेशन के प्रस्‍ताव को 23 दिसंबर 2025 को राज्यपाल ने अपनी मंजूरी दे दी। इसके बाद राजस्‍थान सरकार ने इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई। 

सरकार की आरे से अधिसूचना ज़ारी किए जाने के बाद नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ (एनबीडब्लूएल) से हैंगिंग ब्रिज से लेकर कोटा बैराज तक के इलाका डी-नोटिफाई हो गया है। सरकार के इस फैसले को पर्यावरण और चंबल नदी के पारिस्थितिक तंत्र और घड़ियालों के अस्तित्‍व के लिए जहां ख़तरे की घंटी माना जा रहा है, वहीं गैर-अधिसूचित (डी-नोटिफाइड) क्षेत्र के मकान मालिकों और व्यापारियों ने इसका स्वागत किया है। 

इसकी वजह यह है कि अब इस क्षेत्र में करीब लोगों को करीब 40 हजार घरों के पट्टे जारी हो सकेंगे साथ ही इस क्षेत्र में पड़ने वाली अन्‍य ज़मीनों पर निर्माण कार्य करने पर लगे प्रतिबंध भी हट जाएंगे। जिससे, लोग अब इन ज़मीनों पर मकान, दुकान या व्‍यावसायिक इमारतें बन सकेंगे। 

घड़ियाल सेंचुरी की सीमा में रह रहे दो लाख से ज्यादा लोगों की मांग थी कि इस इलाक़े को सेंचुरी से बाहर किया जाए, ताकि उन्‍हें घरों से पट्टे जारी हो सकें और निर्माण कार्य पर लगे प्रतिबंध भी हट जाएं। लोगों की इस मांग को पूरा करने के लिए काफ़ी समय से राजनीतिक प्रयास भी हो रहे थे, जिन्‍हें सरकार की नई अधिसूचना से सफलता मिल गई है। कोटा व्यापार महासंघ के अध्यक्ष क्रांति जैन ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे एक लाख से अधिक निवासियों को राहत मिलेगी और औद्योगिक विकास के अवसर प्राप्त होंगे। खुशी है कि बड़ी आबादी वाला यह क्षेत्र भी विकास के मामले में कोटा के बाकी हिस्सों के साथ कदमताल कर सकेगा।

बरसात के मौसम में नदियों का पानी बढ़ने पर कभी-कभी घड़ियाल या उनके बच्‍चे रिहायशी इलाकों में आ जाते हैं, तब वन विभाग इन्‍हें पकड़ कर वापस नदी में छोड़ता है।

1983 में बना था चंबल घड़ियाल अभयारण्‍य

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्‍य की स्‍थापना 1983 में अधिसूचना जारी करके किया गया था राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं से गुजरती चंबल नदी में रहने वाले लुप्‍तप्राय घड़ियालों और कई अन्‍य प्रजाति के जलीय व स्‍थलीय जीवों को सुरखित आवास प्रदान करने के लिए यह सेंचुरी बनाई गई थी। 

चंबल नदी के घड़ियालों को विलुप्त होने से बचाने के लिए जवाहर सागर बांध से लेकर कोटा बैराज तक के इलाके को घड़ियाल अभ्यारण्य के रूप में सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था। घड़ियालों का संरक्षण करने के लिए वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत नदी के किनारे से एक किलोमीटर तक के इलाके को आबादी प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया गया था। 

इससे गुमानपुरा से लेकर सकतपुरा, शिवपुरा, नयागांव और किशोरपुरा इलाके के तमाम हिस्से अभ्यारण्य की सीमा में आ गए थे। अब करीब 40 साल बाद कोटा जिले के किशनपुरा, बस्ती लाडपुरा समेत 11 खसरों की लगभग 732 हेक्टेयर से जमीन को अभयारण्य से बाहर कर दिया गया है। 

ऐतिहासिक संदर्भ की बात करें, तो विलुप्‍त हो रहे घड़ियाल, मगरमच्‍छ, गंगा डॉल्फिन, डोडुंग समेत कई तरह के जलीय जीवों को बचाने के लिए 1970-80 के दशक में देशभर में नदियों से जुड़ी संरक्षण परियोजनाओं के तहत रूप में कंजरवेशन प्रोजेक्ट शुरू किए गए। इसमें चंबल और सोन नदी घड़ियालों के संरक्षण के प्रमुख केंद्र माने बने। 

समय के साथ इन अभ्यारण्‍यों में घड़ियालों की संख्या में उतार-चढ़ाव देखने को मिले। इसके बावजूद सोन और चंबल अभ्‍यारण्‍य दुनिया में घड़ियालों के सबसे बड़े आवास के रूप में दुनिया भर में पहचान बना सके। हालांकि संरक्षण के प्रयासों के बावजूद चंबल और सोन नदी पर अवैध रेत खनन, नदी किनारे खेती, मछली पकड़ने और जलीय जीवों के अवैध शिकार जैसी मानव गतिविधियों  ने घड़ियालों के प्राकृतिक आवास, प्रजनन और नेस्टिंग स्थलों को लगातार प्रभावित किया है। इन सबके बावज़ूद ये अभ्‍यारण्‍य घडि़यालों के अस्तित्‍व को बचाने में कामयाब रहे। 

चंबल नदी और घड़ियालों का इकोलॉजिकल महत्व

चंबल नदी, भारत की सबसे कम प्रदूषित नदियों में से एक मानी जाती है। इसी नदी के किनारे फैली नेशनल चंबल क्रोकोडाइल सेंचुरी को विशेष रूप से क्रिटिकली एंडेंजरड घड़ियाल (Gavialis gangeticus), गंगा डॉल्फिन और अन्य दुर्लभ जलीय प्रजातियों की रक्षा के लिए बनाया गया था। 

यह संरक्षित क्षेत्र तीनों राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है और विश्व में जीवित घड़ियालों की सबसे बड़ी आबादी का घर माना जाता है। घड़ियाल मछलियों के शिकार में माहिर होते हैं और नदी के पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बनाए रखने में एक केंद्रीय प्रजाति (की-स्टोन) की भूमिका निभाते हैं। चूंकि घड़ियाल (Gavialis gangeticus) मुख्य रूप से मछलियों पर निर्भर रहते हैं और कमजोर, बीमार या अधिक संख्या में मौजूद मछलियों को खाकर मछलियों की आबादी को संतुलित रखते हैं। इससे नदी में जैव विविधता भी बनी रहती है। घड़ियाल साफ़, गहरे और सतत बहाव वाली नदियों में ही जीवित रह पाते हैं, इसलिए उनकी मौजूदगी यह बताती है कि नदी का पानी अपेक्षाकृत स्वच्छ और प्रदूषण से कम प्रभावित है।

 वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, जहां घड़ियालों की आबादी स्थिर या बढ़ रही है, वहां नदी की पारिस्थितिक सेहत बेहतर पाई गई है। इसके अलावा, घड़ियालों के अंडे देने के लिए जरूरी रेतीले तट नदी के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखने में मदद करते हैं, जो कई अन्य जलीय और अर्ध-जलीय प्रजातियों के लिए भी जरूरी होते हैं। इस तरह घड़ियाल केवल एक संकटग्रस्त प्रजाति नहीं, बल्कि पूरे नदी तंत्र के संरक्षक और संकेतक जीव हैं। नदी में घड़ियालों के होने का मतलब है कि उसका पारिस्थितिक तंत्र सेहतमंद स्थिति में है।

चंबल नदी के अलावा सोन नदी में भी घड़ियालों का ठिकाना है। मध्‍य प्रदेश के उमरिया ज़िले में सोन नदी के तट पर धूप सेंकता घड़ियाल का बच्‍चा।

घड़ियालों के अस्तित्‍व पर गहराता संकट 

घड़ियाल पहले दक्षिण एशिया के बड़े नदी प्रणालियों में फैले हुए थे, लेकिन अब वे अपने इतिहास के 94% क्षेत्र से गायब हो चुके हैं, और केवल कुछ चुनिंदा नदियों जैसे गंगा और चंबल में बचे हैं। इनके वैज्ञानिक मूल्य और पारिस्थितिक भूमिका को देखते हुए, इनकी स्थिति अत्यंत संवेदनशील की श्रेणी में आ गई है। घड़ियालों के अस्तित्‍व के लिए प्रमुख खतरे इस प्रकार हैं -

आवास खत्म होना 

घड़ियाल नदी के रेतीले और खुले किनारों पर अंडे देते हैं, लेकिन नदियों में बड़े पैमाने पर होने वाला रेत खनन इन प्राकृतिक नेस्टिंग साइट्स को सीधे नष्ट कर देता है। बांधों और बैराजों के निर्माण से नदी का प्राकृतिक बहाव बाधित होता है, जिससे तलछट (sediment) का जमाव और कटाव असंतुलित हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि कई इलाकों में या तो रेत पूरी तरह बह जाती है या अत्यधिक जम जाती है, दोनों ही स्थितियां घड़ियालों के प्रजनन के लिए घातक हैं, क्‍योंकि यह उनके सुरक्षित प्रजनन क्षेत्रों को सीमित कर देता है।

नदियों से अत्‍यधिक जल दोहन 

कृषि सिंचाई, औद्योगिक जल दोहन और शहरी जरूरतों के लिए नदियों से अत्यधिक पानी निकाले जाने से नदी का प्राकृतिक प्रवाह कमजोर पड़ जाता है और कई हिस्सों में नदी मौसमी या खंडित धारा में बदलने लगती है। पानी की मात्रा घटने से नदी का तापमान बढ़ता है और घुलित ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है, जो मछलियों और घड़ियाल दोनों के लिए नुकसानदेह है। कम प्रवाह के कारण नदी में प्रदूषकों का घनत्व बढ़ जाता है, जिससे पानी और अधिक विषैला बन जाता है। इसके अलावा, जलस्तर घटने से घड़ियालों के पारंपरिक नेस्टिंग तट सूख जाते हैं या मानव गतिविधियों के करीब आ जाते हैं, जिससे अंडों और नवजात घड़ियालों के जीवित रहने की संभावना और कम हो जाती है।

न‍दियों का बढ़ता प्रदूषण 

कृषि क्षेत्रों से बहकर आने वाली रासायनिक खाद और कीटनाशक, साथ ही शहरों और कस्बों का अनट्रीटेड सीवेज व औद्योगिक अपशिष्ट सीधे नदियों में मिलकर जल गुणवत्ता को गंभीर रूप से गिराते हैं। इससे पानी में भारी धातुओं, नाइट्रेट और फॉस्फेट जैसे तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है, जो जलीय जीवन के लिए विषाक्त साबित होते हैं। ऐसे प्रदूषित वातावरण में घड़ियालों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है और वे त्वचा संक्रमण, श्वसन संबंधी समस्याओं तथा प्रजनन विकारों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। शोध बताते हैं कि खराब जल गुणवत्ता अंडों के सफल रूप से विकसित होने और बच्चों के जीवित रहने की दर को भी कम करती है। साफ, ठंडे और सतत बहाव वाली नदियों पर निर्भर घड़ियाल इस तरह के रासायनिक और जैविक प्रदूषण के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं, इसलिए प्रदूषण बढ़ना उनके दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है।

मछली पकड़ना एवं जाल : घड़ियाल पूरी तरह मछलीभक्षी होते हैं, इसलिए वे अक्सर मछली पकड़ने के लिए लगाए गए नायलॉन और सिंथेटिक जालों में फंस जाते हैं। एक बार जाल में उलझने पर वे सांस नहीं ले पाते और डूबने से उनकी मृत्यु हो जाती है, जिसे संरक्षण भाषा में incidental killing कहा जाता है। इसके अलावा, अत्यधिक मछली पकड़ने से घड़ियालों के लिए भोजन की उपलब्धता भी कम होती जाती है। इस तरह मछली पकड़ने की अनियंत्रित गतिविधियां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से घड़ियालों के अस्तित्व पर संकट बढ़ाती हैं।

ज़मीन पर धूप सेंक कर आराम फ़रमाता घड़ियाल।

घड़ियाल को बचाने के WWF-India के प्रयास

घड़ियाल पानी और ज़मीन दोनों पर ही रहने वाले जल-स्‍थल चर जीव हैं। यह धरती पर मौज़ूद सबसे पुराने सरिसृप वर्ग के प्राणी माने जाते हैं। ये गहरी और तेज़ बहने वाली नदियों को पसंद करते हैं, हालांकि वयस्क घड़ियालों को नदियों की शांत जल धाराओं (झील) और नदी के मोड़ों और संगमों पर स्थित गहरे गड्ढों (कुंडों) के अपेक्षाकृत कम वेग वाले जलीय वातावरण में भी देखा जाता है। छोटे जानवर मुख्य धारा से दूर, सुरक्षित बैकवाटर में आराम करके ऊर्जा बचाते हैं, खासकर मानसून (जुलाई-सितंबर) के दौरान। रेत और चट्टानी टीले धूप सेंकने के लिए पसंदीदा स्थान हैं और ये जानवर अपने स्थान के प्रति काफी निष्ठा दिखाते हैं।

ऐतिहासिक रूप से, घड़ियाल भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भूटान और नेपाल के दक्षिणी भाग की नदी प्रणालियों में पाए जाते थे। आज वे केवल भारत और नेपाल के जलक्षेत्रों में ही जीवित हैं। बची हुई आबादी गंगा नदी प्रणाली की सहायक नदियों में पाई जाती है, जिनमें गिरवा (उत्तर प्रदेश), सोन (मध्य प्रदेश), रामगंगा (उत्तराखंड), गंडक (बिहार), चंबल (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान) और महानदी (ओडिशा) शामिल हैं। 

संयुक्‍त राष्‍ट्र की संस्‍था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया (WWF-India) भी घड़ियालों के संरक्षण में सहयोग कर रहा है। वह 2007 से भारत में घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम में सक्रिय रूप से शामिल है। वन विभाग के सहयोग से इसने हस्तिनापुर वन्यजीव अभ्यारण्य में घड़ियाल पुनर्वास कार्यक्रम शुरू किया। जनवरी 2009 से उत्तर प्रदेश केकुकरैल पुनर्वास केंद्र (लखनऊ) में पाले गए 250 घड़ियालों को गंगा नदी में उनके प्राकृतिक माहौल में जीने के लिए छोड़ा गया है। 

जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय के सहयोग से, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया ने एक स्वतंत्र घड़ियाल के जलमग्न व्यवहार और आसपास के आवास को समझने के लिए घड़ियाल बायोलॉगिंग विज्ञान पर एक अध्ययन शुरू किया है। साथ ही गंगा नदी में जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने हेतु स्थानीय समुदायों के साथ समन्वय में कार्य करता है। इसमें शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम तथा ग्राम पंचायत बैठकें (गंगा संरक्षण पंचायत) शामिल हैं, ताकि ऊपरी गंगा बेसिन के विभिन्न हितधारकों के बीच जल और संबंधित संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और विकास को समझा और समन्वित किया जा सके।

अरावली के बाद अब चंबल पर लंबी लड़ाई की ज़रूरत

इस तरह हम देखते हैं कि मौज़ूदा हालात में चंबल के अभ्यारण्य क्षेत्र से भूमि हटाना और उसको संरक्षण से मुक्त करना घड़ियालों की जीवित आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। घड़ियालों के संरक्षण के लिए लंबे समय से चली आ रही ऐसी योजनाएं इस उद्देश्य को काफ़ी हद तक पूरा कर ही हैं, पर इनके प्राकृतिक आवासों को इस तरह से संरक्षण से बाहर किए जाने से ये प्रयास पूरी क्षमता से नहीं चल पाएंगे। 

दरअसल, चंबल नदी और उसके संरक्षित क्षेत्रों को लेकर यह मामला केवल भूमि उपयोग का विवाद नहीं है, बल्कि संरक्षण बनाम विकास के बीच का संघर्ष है। इसलिए अब नीति नियंताओं और निर्णयकर्ताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि संरक्षण की सीमाएं सिर्फ कागज़ों में सिमट कर न रह जाएं और घड़ियालों के संरक्षित क्षेत्र केवल नक्शों और फाइलों में ही त न रहें। विकास को बढ़ावा देने के नाम पर अगर अभ्यारण्य की ज़मीनों को इसी तरह मुक्त किया जाता रहा, तो घड़ियाल जैसी दुर्लभ प्रजातियों और चंबल के पारिस्थितिक तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

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