लाखों लीटर की क्षमता वाली पानी की टंकियों के धराशाई हो जाने से एक बड़े इलाके की जलापूर्ति व्यवस्था चरमरा जाती है।
स्रोत : विकी कॉमंस
देश के लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने में जल जीवन मिशन योजना अहम भूमिका निभा रही है। इस योजना की बदौलत देश में जलापूर्ति के नेटवर्क के विस्तार में तेजी आई है, इसमें पानी के नाम पर हो रहा भ्रष्टाचार के खुले खेल का सिलसिला भी जारी है। योजना के तहत आए दिन ऐसे सामने आ रहे हैं, जो पानी की टंकियों के साथ ही इस व्यापयक योजना पर जनता के भरोसे को भी ढहा रहे हैं। बीते हफ्ते (6 मार्च) मध्य प्रदेश के हरदा जिले के मोहनपुर ग्राम पंचायत क्षेत्र में जल जीवन मिशन के तहत बनाई गई एक नई पानी की टंकी परीक्षण के दौरान ही धंस गई। इससे पहले जल संकट से जूझते उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के महोबा जिले के जैतपुर ब्लॉक के नागरदांग गांव में जल जीवन मिशन के तहत नवनिर्मित ओवरहेड टैंक में पानी भरते ही बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं, जिससे भारी मात्रा में पानी रिसने के बाद टंकी को बंद करना पड़ा। इससे भी भयंकर घटन गुजरात के सूरत जिले में 20 मार्च को हुई, जहां नौ लाख लीटर की क्षमता वाला ओवरहेड वाटर टैंक परीक्षाण के दौरान ही धराशाई हो गया था। इससे पहले महाराष्ट्र के नागपुर में एक औद्योगिक संयंत्र में 10 लाख लीटर क्षमता की पानी की टंकी फटने से छह मजदूरों की मौत हो गई। इसकी जांच में सुरक्षा मानकों की अनदेखी सामने आई। एक के बाद एक हो रही ऐसी घटनाएं भ्रष्टाचार के एक पैटर्न को दिखाती हैं, जो देश की जल सुरक्षा को खोखला कर रहा है।
मोहनपुर की घटना के बारे में एक रिपोर्ट में बताया गया कि टंकी में पानी भरते ही उसका ढांचा एक तरफ झुकने लगा और दीवारों में दरारें पड़ गईं। प्रारंभिक जांच में पता चला कि टंकी की नींव ठीक से नहीं बनाई गई और दीवारें भी पर्याप्त मजबूत नहीं थीं, जिसके कारण संरचना भार सहन नहीं कर सकी। इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन ने टंकी के उपयोग पर रोक लगा दी और निर्माण एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगा है। इसके चलते टंकी से जुड़े लगभग 80 घरों को मिलने वाली जल आपूर्ति योजना भी फिलहाल प्रभावित हो गई है।
महोबा की घटना के बारे में मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार जल जीवन मिशन के तहत 2025 में इस जलाशय का निर्माण शुरू हुआ था, पर उसके बाद से निर्माण ठप हो गया। हाल ही में, जल आपूर्ति की बिगड़ती स्थिति और सड़कों की खराब हालत को लेकर जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और चरखारी विधायक वृजबशन राजपूत के बीच हुई तीखी बहस के बाद, हाल के दिनों में काम में फिर से तेज़ी आई, पर परीक्षण में ही टंकी में बड़ी दरार पड़ गई।
इसी तरह की खबर 20 जनवरी 2026 को गुजरात के सूरत जिले के ताड़केश्वर गांव में बनी एक विशाल ओवरहेड पानी की टंकी के ट्रायल में ही ढह जाने की आई। टंकी में उसकी क्षमता के मुताबिक लगभग 9 लाख लीटर पानी भरने के बाद टंकी ढह गई और आसपास के इलाके में पानी फैल गया। इस हादसे में कुछ मजदूर घायल भी हुए। इस घटना में भी न केवल 21 करोड़ रुपये की लागत का आर्थिक नुकसान हुआ, बल्कि इससे 14 से अधिक गांवों को पेयजल मिलने की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया। इस तरह टंकियों के ढहने की यह घटनाएं सिर्फ एक निर्माण दुर्घटना नहीं, बल्कि इनसे सरकारी जल परियोजनाओं में गुणवत्ता, निगरानी और भ्रष्टाचार से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
गुजरात के सूरत जिले के ताड़केश्वर गांव में बनी एक विशाल ओवरहेड पानी की टंकी के ट्रायल में ही ढह जाने से करीब 15 गांवों में पेयजल की आपूर्ति की उम्मीदें भी धराशाई हो गईं।
| क्रम संख्या | घटना | स्थान | तारीख / वर्ष | क्या कार्रवाई हुई |
|---|---|---|---|---|
| 1 | ट्रायल के दौरान 9 लाख लीटर क्षमता की ओवरहेड टंकी ढही | ताड़केश्वर, सूरत (गुजरात) | 2026 | जल आपूर्ति बोर्ड के अधिकारियों को निलंबित किया गया, विशेषज्ञ जांच समिति गठित |
| 2 | औद्योगिक संयंत्र में पानी की टंकी फटने से मजदूरों की मौत | नागपुर (महाराष्ट्र) | 2024 | सुरक्षा ऑडिट शुरू, कंपनी के खिलाफ जांच |
| 3 | निर्माणाधीन ओवरहेड टैंक ढह गया | बेलगावी (कर्नाटक) | 2023 | ठेकेदार पर केस दर्ज, इंजीनियरों की जांच |
| 4 | जलापूर्ति परियोजना की बड़ी टंकी गिरने से आसपास नुकसान | कोच्चि, केरल | 2023 | नगर निगम ने तकनीकी जांच और मरम्मत कार्य शुरू किया |
| 5 | निर्माणाधीन पानी की टंकी अचानक ढही | छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) | 2022 | परियोजना रोककर तकनीकी जांच कराई गई |
| 6 | टेस्टिंग के दौरान टंकी का ढांचा टूट गया | भागलपुर (बिहार) | 2021 | ग्रामीण जलापूर्ति विभाग ने ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया |
| 7 | ओवरहेड टैंक गिरने से कई घर क्षतिग्रस्त | अजमेर (राजस्थान) | 2020 | राज्य सरकार ने विभागीय जांच बैठाई |
| 8 | जलापूर्ति टंकी का एक हिस्सा गिरा | कानपुर देहात (उत्तर प्रदेश) | 2019 | निर्माण एजेंसी पर लापरवाही का मामला दर्ज |
| 9 | पानी की टंकी भरते समय दीवार टूट गई | वडोदरा (गुजरात) | 2018 | तकनीकी जांच और पुनर्निर्माण का आदेश |
| 10 | ग्रामीण जल योजना की टंकी ढहने से परियोजना ठप | करीमनगर (तेलंगाना) | 2017 | इंजीनियरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई |
जल जीवन मिशन की आड़ में हो रहे भ्रष्टाचार की इन शर्मनाक घटनाओं के बाद कुछ अधिकारियों को निलंबित करने के अलावा ठेकेदारों व निर्माता कंपनी और प्रोजेक्ट से जुड़े इंजीनियरों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया। लेकिन भारत में अक्सर जांच कुछ अधिकारियों के निलंबन तक सीमित रह जाती है। जांच में यह भी सामने आया कि टंकी के निर्माण में मानकों से काफी कम गुणवत्ता वाली निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। यदि एक टंकी अपनी पहली टेस्टिंग ही नहीं झेल पाती, तो यह सिर्फ इंजीनियरिंग की गलती नहीं बल्कि पूरे नियामक और निगरानी तंत्र की विफलता को उजागर करता है। ऐसे मामलों में कम से कम चार स्तरों पर जिम्मेदारी तय किए जाने की आवश्यकता है :
डिजाइन तैयार करने वाली एजेंसी
निर्माण करने वाला ठेकेदार
निगरानी करने वाला प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट
और सरकारी विभाग
जल आपूर्ति परियोजनाएं भारत में सबसे बड़े सार्वजनिक निवेश क्षेत्रों में से एक हैं। ग्रामीण जल जीवन मिशन, शहरी जल आपूर्ति योजनाएं और राज्य स्तरीय योजनाओं के तहत हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। लेकिन, इन परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के कई छिपे दरवाजे मौजूद रहते हैं। भारत में कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एक बड़ी समस्या यह है कि वे कागजों पर पूरी तरह मानकों के अनुसार दिखती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी गुणवत्ता कमजोर होती है। टेंडर दस्तावेजों में उच्च गुणवत्ता की सामग्री का उल्लेख होता है, लेकिन वास्तविक निर्माण में कम लागत वाली सामग्री इस्तेमाल हो जाती है। इस अंतर को पकड़ने के लिए जो निरीक्षण प्रणाली बनाई गई है, वह अक्सर प्रभावी ढंग से काम नहीं करती। इस सबके चलते अंतत: योजना धराशाई हो जाती है, जिसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं :
1. टेंडर प्रक्रिया में मिलीभगत
अक्सर एक ही समूह की कंपनियां अलग-अलग नाम से बोली लगाती हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाती है।
2. निर्माण सामग्री में कटौती
सीमेंट, स्टील और कंक्रीट की मात्रा घटाकर लागत कम की जाती है और बची रकम को निजी लाभ में बदल दिया जाता है।
3. निगरानी में ढिलाई
कई बार इंजीनियरों की साइट विजिट सिर्फ कागजों में दर्ज होती है। वास्तविक निरीक्षण नहीं होता।
4. राजनीतिक दबाव
कई परियोजनाओं का उद्घाटन जल्दी करने के दबाव में निर्माण कार्य जल्दबाज़ी में किया जाता है। निर्माण प्रक्रिया के निर्धारित मानकों और गुणवत्ता जांच को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
हर घटना को सिर्फ भ्रष्टाचार से जोड़ना भी पूरी तस्वीर नहीं है। कई मामलों में तकनीकी कारण भी सामने आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पानी की टंकियों के गिरने के मुख्य तकनीकी कारण होते हैं:
डिजाइन में त्रुटि
कमजोर नींव
घटिया कंक्रीट गुणवत्ता
स्टील रिइन्फोर्समेंट की कमी
परीक्षण प्रक्रिया का गलत तरीके से किया जाना
ओवरहेड टैंक पर लगातार हाइड्रोस्टैटिक दबाव पड़ता है। यदि संरचना का डिजाइन और निर्माण मानकों के अनुसार न हो, तो थोड़ी सी भी अतिरिक्त लोडिंग उसे गिरा सकती है।
जल जीवन मिशन के तहत बनाई गई पानी की टंकियों का इस तरह से ढह जाने की घटनाएंआर्थिक नुकसान के साथ ही सिस्टम के खोखलेपन को भी उजागर करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरचनाओं—जैसे ओवरहेड टैंक, पाइपलाइन नेटवर्क और पंपिंग स्टेशन—की गुणवत्ता सुधारने और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए नीतिगत तथा तकनीकी दोनों स्तरों पर सुधार जरूरी हैं। इसके लिए निम्नलिखित उपाय प्रभावी माने जाते हैं:
स्वतंत्र गुणवत्ता ऑडिट : अक्सर निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच उसी एजेंसी या विभाग के भीतर होती है जो परियोजना को लागू कर रहा होता है। इससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि जल संरचनाओं के निर्माण के दौरान और उसके बाद तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) से स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट अनिवार्य किया जाए। यह ऑडिट सामग्री की गुणवत्ता, डिजाइन मानकों और निर्माण प्रक्रिया की जांच करेगा। इससे शुरुआती चरण में ही खामियां पकड़ में आ सकती हैं और ढांचे के कमजोर होने से पहले सुधार संभव हो सकेगा।
रियल-टाइम निगरानी : आधुनिक तकनीक का उपयोग करके बड़े जल ढांचों की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, टंकियों और अन्य संरचनाओं में सेंसर आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए जा सकते हैं जो संरचना में झुकाव, कंपन, दबाव या दरारों जैसी असामान्य स्थितियों का संकेत तुरंत दे सकें। ऐसी रियल-टाइम निगरानी से संभावित खतरे का पता समय रहते चल सकता है और मरम्मत या रोकथाम के कदम तुरंत उठाए जा सकते हैं।
पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया : कई मामलों में निर्माण की गुणवत्ता इसलिए भी प्रभावित होती है क्योंकि ठेके देने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ई-टेंडरिंग प्रणाली, खुली प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराने से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि परियोजना से जुड़े दस्तावेज, लागत और प्रगति की जानकारी सार्वजनिक पोर्टलों पर उपलब्ध हो, तो मीडिया और नागरिक समाज भी निगरानी कर सकते हैं, जिससे भ्रष्टाचार की संभावना घटती है।
सामुदायिक निगरानी : जल परियोजनाओं का लाभ सीधे स्थानीय समुदाय को मिलता है, इसलिए उन्हें निगरानी की प्रक्रिया में शामिल करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। गांवों या कस्बों में स्थानीय जल समितियां या उपयोगकर्ता समूह बनाए जा सकते हैं, जो निर्माण कार्य की प्रगति और गुणवत्ता पर नजर रखें। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ती है बल्कि यदि कहीं निर्माण में खामी हो रही हो तो स्थानीय लोग शुरुआती चरण में ही इसकी सूचना प्रशासन को दे सकते हैं। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि समुदाय की भागीदारी से परियोजनाओं की जवाबदेही और टिकाऊपन दोनों बढ़ते हैं।
इस तरह हम देखते हैं कि पानी की टंकियों का इस तरह एक के बाद एक ढहना सिर्फ एक इंजीनियरिंग दुर्घटना नहीं है। यह उस भरोसे के ढहने की कहानी भी है जो ग्रामीण लोग सरकारी योजनाओं से जोड़ते हैं। जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी बुनियादी ढांचा परीक्षण तक नहीं झेल पाता, तो सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं रहता, बल्कि वह सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है। भारत में जल संकट पहले से ही एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में यदि जल संरचनाएं ही सुरक्षित नहीं होंगी, तो “हर घर जल” जैसे सपनों को पूरा करना और भी कठिन हो जाएगा।
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