केरल 

 

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नीतियां और कानून

'केरल' अब हुआ 'केरलम': 55 हजार जलाशयों वाले राज्य के नाम में छिपा है पानी से गहरा नाता

केंद्रीय कैबिनेट द्वारा 'केरलम' नाम को मंजूरी देना केवल भाषाई सुधार नहीं, बल्कि इसकी जलीय पहचान की वापसी है। केरल का नया नाम राज्य के पानी और प्रकृति के साथ रिश्‍ते को जीवंत रखता है। एक नज़र 55 हजार जलाशयों वाले केरलम के जल प्रोफाइल पर भी।

Author : अजय मोहन

भारतीय राजनीति और भूगोल के पन्नों में आज एक नया अध्याय जुड़ गया जब केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर राज्य का नाम 'केरल' से बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह केवल एक भाषाई बदलाव नहीं है, बल्कि इस भूमि की उस प्राचीन पहचान की वापसी है जो सदियों से इसके जल, मिट्टी और वनस्पतियों में रची-बसी है। ब्रिटिश राज्य में इस राज्य को केरल कह कर पुकारा गया जो सदियों तक चलता रहा। आज राज्य को अपनी असली पहचान वापस मिली। यह पहचान राज्य के पानी के साथ प्रगाढ़ रिश्‍ते को दर्शाती है। 

कैसे हुआ 'केरलम' का नामकरण 

केरल के नाम परिवर्तन को लेकर केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम इस प्रकार हैं-

केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी: 24 फरवरी 2026 को कैबिनेट की बैठक में 'केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026' को हरी झंडी दी। इस कदम के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

संवैधानिक संशोधन: अनुच्छेद 3 के तहत, संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन किया जाएगा ताकि सभी आधिकारिक रिकॉर्ड में 'केरल' का स्थान 'केरलम' लाया जा सके।

विधानसभा का संकल्प: यह निर्णय जून 2024 में केरल विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित उस प्रस्ताव का सम्मान है, जिसमें राज्य के नाम को मलयालम उच्चारण और विरासत के अनुरूप करने का आग्रह किया गया था।

प्रक्रिया: कैबिनेट की मंजूरी के बाद, अब राष्ट्रपति इस विधेयक को राज्य विधानसभा की राय के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद संसद द्वारा इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।

अंतिम चरण: इस प्रस्ताव पर राष्‍ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद केरल का नया नाम सरकारी दस्तावेजों, कार्यालयों, इमारतों, रेलवे स्टेशन, बैंक, आदि हर जगह बदला जाएगा।  

केरल बना केरलम 

केरल का नारियल से तो केरलम का जल से गहरा रिश्‍ता 

केरल अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है, इस बात से हम सभी वाकिफ हैं। इस राज्य का रिश्‍ता नारियल और जल दोनों के साथ बहुत गहरा है। शब्दों की गहराई में जाने पर ही इस रिश्‍ते की गहराई भी समझ आती है। 

केरल शब्द की व्याख्‍या 

केरल = केरा / चेर+ अलम । इसका मतलब नारियल की भूमि या चेर साम्राज्य की भूमि। यह नाम ब्रिटिश काल में आया और स्वतंत्रता के बाद भी दस्‍तावेजों में यही नाम रहा। आधुनिक भारत के संविधान (अनुसूची 1) में भी यही नाम प्रचलित रहा। 

केरलम शब्द की व्याख्‍या 

अनेक भाषाविदों का मानना है कि 'केरलम' की उत्पत्ति प्राचीन शब्द 'चेर-अलम' से हुई है। 

'चेर' : इसका अर्थ है गाद, कीचड़ या वह गीली मिट्टी जो नदियों और समुद्र के संगम पर बनती है।

'अलम' : इसका अर्थ है क्षेत्र या स्थान।

इस प्रकार, 'केरलम' का अर्थ है "आर्द्रभूमि या दलदली मिट्टी वाली भूमि"। यह उन बैकवाटर्स और लैगून का सटीक वर्णन है जो केरल की जीवनरेखा हैं। 'केरलम' का संबंध सीधे तौर पर यहाँ की जल-पारिस्थितिकी से मिलता है।

वैज्ञानिक संदर्भ: केरल विश्‍वविद्यालय में प्रकाशित शोध पत्र "Coastal wetlands of Kerala: Origin and evolution" स्पष्ट करता है कि इस क्षेत्र का निर्माण समुद्र के पीछे हटने और नदियों द्वारा जमा की गई गाद से हुआ है। यहीं से इसका नाम  'चेर' (कीचड़) को वैज्ञानिक आधार देता है।

चेर साम्राज्य के बारे में

विसडम लाइब्रेरी में प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार चेर साम्राज्य दो प्रमुख काल रहे। प्रारंभिक चेर राजाओं ने तीसरी सदी ईसा पूर्व से लेकर तीसरी सदी ईस्वी तक यहां शासन किया। यह चेर साम्राज्य का सबसे पुराना दौर था, जिसे 'संगम काल' कहा जाता है।

सम्राट अशोक की शिलालेखों (257 ईसा पूर्व) में चेर का उल्लेख 'केरलपुत्र' के रूप में मिलता है। इस दौरान चेर शासकों का नियंत्रण वर्तमान केरल के मध्य और उत्तरी हिस्सों और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों पर था।

चेर साम्राज्य का दूसरा काल 9वीं सदी से 12वीं सदी ईस्वी तक रहा। इसे 'कुलशेखर राजवंश' या 'महोदयपुरम के चेर' भी कहा जाता है। लगभग 800 ईस्वी से 1102 ईस्वी तक। इनका शासन रहा। इस काल में चेर साम्राज्य ने सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से बहुत प्रगति की। इसी दौरान आधुनिक मलयालम भाषा का विकास भी शुरू हुआ।

पहले भी उपयोग में लाया गया ‘केरलम’ नाम  

ऐसा पहली बार नहीं है जब हम इस राज्य को केरलम कह कर पुकार रहे हैं। स्थानीय लोग अक्सर राज्य को केरलम कह कर ही पुकारते हैं। केरल भारत का शीर्ष नारियल उत्पादक राज्य है और यहाँ का "हरित केरलम" जैसे मिशन पहले से ही इसी नाम का उपयोग कर रहे हैं, जो पर्यावरण और कृषि के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पौराणिक और भू-वैज्ञानिक संबंध 

पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने समुद्र से यह भूमि 'प्राप्त' की थी। संस्कृत ग्रंथों में इसे 'के-रलनात्' कहा गया है, जिसका अर्थ है "जल का पीछे हटना"। यह उस भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया की ओर इशारा करता है जिससे पश्चिमी तट का निर्माण हुआ। इसे 'चेर्ना-आलम' (जोड़ी गई भूमि) भी कहा जाता है, जो समुद्र द्वारा छोड़ी गई जमीन का प्रतीक है।

केरलम का वाटर प्रोफाइल 

केरलम एक जल समृद्ध राज्य है, जहां पर समुद्री तटों पर खारे पानी के साथ-साथ घने जंगलों में मीठे पानी का बहुत बड़ा हिस्सा है।  राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2024 में प्रकाशित Water Bodies in Kerala, First Census Report 2023  के अनुसार केरल का वाटर प्रोफाइल इस प्रकार है - 

केरलम के जलाशयों की संख्‍या   

  • राज्य में कुल 55,734 जल निकायों की गणना की गई है, जिनमें से 89.2% (49,725) ग्रामीण क्षेत्रों में और केवल 10.8% (6,009) शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं।

  • कुल जल निकायों में से 91.5% (51,007) तालाब हैं। जल संरक्षण योजनाएं/चेक डैम (6% यानी 3,941) हैं, टैंक (1.5% यानी 848), जलाशय (0.1% यानी 63) और अन्य जलाशय 0.83% हैं। झीलों की संख्या नगण्य है। राज्च में मात्र 4 झीलें हैं।  

  • जल निकायों की संख्‍या के मामले में सबसे ऊपर कोज़ीकोड है जहां राज्य के 11.20%  निकाय हैं यानि कि 6192 निकाय। दूसरे स्थान पर पालक्कड जहा 10.74% (5988) जल निकाय हैं। तीसरे स्थान पर मलाप्पुरम 11%  ( 1,90,777) चौथे स्थान पर कन्नूर 9.53 %   (5314) और पांचवें स्थान पर थ्रिशूर 9.01%  (5023) आता है। 

जल निकायों की क्षेत्रीय विशेषताएं

  • पालक्काड़ में सर्वाधिक 5,795 तालाब हैं, जो राज्य के कुल तालाबों का 11.36% है।

  • एर्नाकुलम में सर्वाधिक 204 टैंक हैं।

  • 4 झीलों में 2 वायनाड में, एक-एक तिरुवनंतपुरम और कोल्लम में हैं।

  • पथनमथिट्टा में सर्वाधिक जलाशय (16) हैं। 

  • जल संरक्षण योजनाओं में सबसे आगे मलप्पुरम जिला है।

  • 90.10% जल निकायों की अधिकतम गहराई 0 से 5 मीटर के बीच है। केवल 0.58% निकाय ही 10 मीटर से अधिक गहरे हैं।

केरलम में जल का उपयोग 

  • वर्तमान में लगभग 83.52%  यानि 46,550 जल निकाय उपयोग में हैं। शेष 16.48% (9,184) सूखने की कगार पर हैं या फिर गाद जमा होने से या, लवणता के कारण उपयोग में नहीं लाये जा रहे हैं। इनमें कुछ जलाशय मरम्मत नहीं हो पाने के कारण भी उपयोग में नहीं हैं। 

  • राज्य के जलाशयों का उपयोग मुख्‍य रूप सिंचाई, घरेलू/पेयजल और भूजल पुनर्भरण (Ground water recharge) के लिए किया जाता है।

  • 'उपयोग में' आने वाले 92% जल निकाय हैं जिनमें लगभग प्रत्येक जल निकाय करीब 100 लोगों तक की जरूरतों को पूरा कर पाते हैं, जबकि 0.13% निकाय हैं जिनमें प्रत्येक निकाय 50,000 से अधिक लोगों की आवश्यकताओं को पूरा कर रहे हैं।

केरलम में निजि एवं सार्वजनिक जल निकाय  

  • राज्य में 70.67% यानि 39,389 जल निकाय निजी स्वामित्व में हैं, जबकि 29.33% यानि 16,345 सार्वजनिक क्षेत्र के अधीन हैं। सार्वजनिक निकायों में पंचायतों का स्वामित्व सबसे अधिक है, जबकि निजी निकायों में अधिकांश जल निकाय व्यक्तिगत रूप से किसानों के स्वामित्व वाले हैं। 

  • केरलम में  59.07% (32,923) जल निकाय मानव निर्मित हैं, जबकि 40.93% (22811) प्राकृतिक जल स्रोत हैं। 

  • भंडारण क्षमता के मामले में, 47.41% निकायों की क्षमता 100 से 1000 घन मीटर के बीच है।

  • जल निकाय गणना के दौरान तालाबों और झीलों जैसे 51,922 निकायों में से 56.67% पूरी तरह भरे हुए थे, जबकि 33.19% तीन-चौथाई स्तर तक भरे पाए गए।

  • मानव निर्मित जल निकायों में से 70.18% की मूल लागत 50,000 रुपये तक रही है, जबकि केवल 6.42% निकायों की लागत 5 लाख रुपये से अधिक रही।

  • पहली जल निकाय गणना के तहत अतिक्रमण का डेटा भी जुटाया गया। कुल गणना किए गए निकायों में से 0.2% (111) पर अतिक्रमण पाया गया। ये अधिकांशत: ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

कुल मिलाकर इस राज्य का नाम अब पानी से गहरे रिश्‍ते को हर प्रकार से दर्शाता है। 'केरलम' केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक जलीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व है। जहाँ 'केरा' हरियाली है, वहीं 'चेर' उपजाऊ गीली मिट्टी है।

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