ऊपरी हिमालय में हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को लेकर बदलता सरकारी रुख एक बड़े नीति बदलाव का संकेत दे रहा है।

 

चित्र: https://www.alamy.com

नीतियां और कानून

नदी, पहाड़ और विकास: ऊपरी गंगा में बदलती जलविद्युत नीति के मायने

ऊपरी गंगा घाटी में नए बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर केंद्र का रुख बदलता दिख रहा है। क्या यह हिमालय को “ऊर्जा स्रोत” से “संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र” के रूप में देखने की नई शुरुआत है?

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

भागीरथी के किनारे बसे उत्तरकाशी के कई गांवों में 2013 की बाढ़ की पहाड़ों के टूटने की आवाज़, अचानक उफनती नदी और सुरंग निर्माण से कांपते घर की स्मृतियां अभी भी ताज़ा हैं। लेकिन अब इन यादों के बीच एक बड़ा नीतिगत संकेत दिखाई पड़ रहा है। 

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह अलकनंदा और भागीरथी घाटियों वाले ऊपरी गंगा बेसिन में किस भी तरह के नए हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के पक्ष में नहीं है।

यह बयान केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि हिमालय को देखने के तरीके में बदलाव का संकेत है। जहां नदी अब सिर्फ बिजली उत्पादन की इकाई नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में सामने आ रही है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल वही सात परियोजनाएं आगे बढ़ेंगी जो या तो पूरी हो चुकी हैं या निर्माण के अंतिम चरण में हैं।

2013 की आपदा और हाइडल बहस की पृष्ठभूमि

ऊपरी गंगा घाटी में हाइडल प्रोजेक्ट्स पर बहस नई नहीं है। इसकी जड़ें 2013 की केदारनाथ आपदा तक जाती हैं। उस विनाशकारी बाढ़ में न केवल हजारों लोगों की जान गई थी, बल्कि इससे यह भी साफ़ हुआ था कि हिमालय में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां आपदा के असर को कई गुना बढ़ा सकती हैं।

दरअसल, यह मामला केवल एक आपदा के बाद की तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं था। सुप्रीम कोर्ट में यह बहस पिछले एक दशक से अधिक समय से चल रही है कि क्या हिमालयी नदियों पर बनने वाली जलविद्युत परियोजनाओं के सामूहिक प्रभावों का कभी समग्र आकलन किया गया है।

2013 की आपदा के बाद अदालत ने विशेषज्ञ समितियों और सरकारी एजेंसियों से यह जांचने को कहा था कि क्या उत्तराखंड में हाइडल परियोजनाओं ने आपदा के प्रभाव को बढ़ाने में भूमिका निभाई।

सुप्रीम कोर्ट, समिति रिपोर्ट और संचयी प्रभाव की बहस

इसी क्रम में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित रवि चोपड़ा समिति ने 24 प्रस्तावित परियोजनाओं का अध्ययन किया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में 23 परियोजनाओं को पारिस्थितिक दृष्टि से गंभीर जोखिम पैदा करने वाला माना था और कहा था कि अलकनंदा-भागीरथी घाटी की संवेदनशीलता को देखते हुए यहां निर्माण गतिविधियों पर बेहद सावधानी बरतने की जरूरत है।

इसी दौरान भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की रिपोर्ट ने भी चेतावनी दी थी कि जलविद्युत परियोजनाओं को “हरित ऊर्जा” का विकल्प मानकर ऊपरी गंगा बेसिन में बांधों के निर्माण से नदी की पारिस्थितिक निरंतरता, जलीय जैव विविधता और अविरल प्रवाह को प्रभावित कर सकती है। 

इन रिपोर्टों ने पहली बार क्यूम्युलेटिव इम्पैक्ट यानी कई परियोजनाओं के संयुक्त प्रभावों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।

“विशेष व्यवहार” की मांग क्यों?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्र ने कहा कि गंगा नदी तंत्र अन्य नदी प्रणालियों से अलग है और उसे “विशेष उपचार” की आवश्यकता है। सरकार ने माना कि अलकनंदा और भागीरथी बेसिन की भूगर्भीय और पारिस्थितिक अखंडता बनाए रखना जरूरी है क्योंकि यही गंगा की मुख्य जलधाराएं हैं।

जब नदी के
प्रवाह को सुरंगों में मोड़ा जाता है, बांधों से नियंत्रित किया जाता है या उसके किनारों को विस्फोटों से काटा जाता है, तो असर केवल नदी तक सीमित नहीं रहता। पूरे पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका प्रभाव पड़ता है।

गंगा की “विशेष नदी” की नीति और विरोधाभास

गंगा को लेकर यह संवेदनशीलता केवल पर्यावरणीय नहीं है। भारतीय नीति और सार्वजनिक विमर्श में भी गंगा को लंबे समय से एक “विशेष नदी” के रूप में देखा जाता रहा है।
साल 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था और इसके बाद “अविरल” और “निर्मल” गंगा की अवधारणाएं नदी संरक्षण की बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं।

लेकिन व्यवहार में यह अक्सर एक विरोधाभास जैसा दिखाई देता रहा। एक तरफ गंगा को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवनरेखा कहा गया, दूसरी तरफ उसकी ऊपरी धाराओं में सुरंग आधारित परियोजनाओं, बांधों और बड़े निर्माण कार्यों का विस्तार जारी रहा।

इसी विरोधाभास के बीच 2012 में केंद्र सरकार ने उत्तरकाशी जिले के बड़े हिस्से को भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित किया था। इसका उद्देश्य गंगोत्री से उत्तरकाशी तक के हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों और पारिस्थितिक दबाव को सीमित करना था।

हालांकि समय के साथ स्थानीय समुदायों और पर्यावरण समूहों ने यह सवाल भी उठाया कि क्या इस तरह के क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं को लेकर तय सीमाओं का वास्तव में पालन हो रहा है।

लंबे समय तक नदियों को लेकर होने वाली चर्चाओं में कितनी बिजली बनेगी, कितना सिंचाई क्षेत्र बढ़ेगा, कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा होगी जैसी उपयोग से जुड़ी बातें ही केंद्र में रही हैं।

विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि जब नदी के प्रवाह को सुरंगों में मोड़ा जाता है, बांधों से नियंत्रित किया जाता है या उसके किनारों को विस्फोटों से काटा जाता है, तो असर केवल नदी तक सीमित नहीं रहता। पूरे पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका प्रभाव पड़ता है।

लंबे समय तक नदियों को लेकर होने वाली चर्चाओं में कितनी बिजली बनेगी, कितना सिंचाई क्षेत्र बढ़ेगा, कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा होगी जैसी उपयोग से जुड़ी बातें ही केंद्र में रही हैं।

नीति अपडेट की स्पष्टता

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा दिया गया यह रुख हाल के एक हलफनामे के संदर्भ में सामने आया है। जिसमें ऊपरी गंगा बेसिन, विशेषकर अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में नए बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट्स को लेकर नीति-स्थिति स्पष्ट की गई है। 

यह मामला उस विचाराधीन सुनवाई से जुड़ा है जिसमें हिमालयी क्षेत्रों में हाइडल परियोजनाओं के cumulative environmental impact और नदी पारिस्थितिकी पर उनके दीर्घकालिक असर की समीक्षा की जा रही है।

इस हलफनामे में केंद्र ने यह संकेत दिया है कि वह अब ऊपरी गंगा बेसिन को एक “विशेष पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र” के रूप में देखता है, जहां नई बड़ी परियोजनाओं के बजाय केवल पहले से स्वीकृत या निर्माण के अंतिम चरण में पहुंच चुकी परियोजनाओं को ही आगे बढ़ाने की अनुमति दी जाएगी।

यह स्थिति उसी व्यापक कानूनी और पर्यावरणीय बहस का हिस्सा है जो 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद सुप्रीम कोर्ट में लगातार विकसित होती रही है। जहां अदालत ने समय-समय पर विशेषज्ञ समितियों से यह आकलन करने को कहा कि क्या हिमालयी जलविद्युत परियोजनाओं ने आपदा जोखिम और नदी तंत्र की अस्थिरता को बढ़ाने में कोई भूमिका निभाई थी।

हिमालयी नदियों पर बनने वाले बांध केवल पानी के प्रवाह को नहीं रोकते, वे तलछट के प्राकृतिक बहाव को भी प्रभावित करते हैं। यही तलछट मैदानी क्षेत्रों की कृषि भूमि, नदी तटों और डेल्टा प्रणालियों को लंबे समय तक पोषण देती है।

हरित ऊर्जा बनाम हिमालयी जोखिम

भारत लंबे समय से जलविद्युत को स्वच्छ ऊर्जा मानता रहा है। कोयले की तुलना में यह कम कार्बन उत्सर्जन करती है, इसलिए इसे जलवायु समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। लेकिन हिमालय में अनुभव अलग कहानी बताते हैं।

2021 में ऋषिगंगा और धौलीगंगा क्षेत्र में आई आपदा ने दिखाया कि ग्लेशियर, चट्टान और नदी के बीच का संतुलन कितना नाजुक है। 

अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) और इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की रिपोर्टों ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने, चरम वर्षा घटनाओं और ग्लेशियल झीलों के बढ़ते जोखिम को लेकर गंभीर चेतावनियां दी हैं।

इसी के साथ कई भारतीय अध्ययनों ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या पहाड़ों के भीतर बड़े पैमाने पर हो रही सुरंग खुदाई और विस्फोट आधारित निर्माण गतिविधियों के दीर्घकालिक प्रभावों को पर्याप्त रूप से समझा गया है। 

वाडिया इंस्टीट्यूट, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और अन्य स्वतंत्र शोधों में उत्तराखंड के कई इलाकों में सुरंग आधारित परियोजनाओं के आसपास जलस्रोतों के कमजोर पड़ने, ढलानों में अस्थिरता बढ़ने और भू-स्खलन जोखिम गहराने की ओर संकेत किया गया है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हिमालयी नदियों पर बनने वाले बांध केवल पानी के प्रवाह को नहीं रोकते, वे तलछट के प्राकृतिक बहाव को भी प्रभावित करते हैं। यही तलछट मैदानी क्षेत्रों की कृषि भूमि, नदी तटों और डेल्टा प्रणालियों को लंबे समय तक पोषण देती है। जब नदियों की यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है, तो उसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता बल्कि नीचे के पूरे नदी तंत्र पर दिखाई देता है।

यही वजह है कि अब “क्लीन एनर्जी” की बहस में केवल कार्बन उत्सर्जन पर्याप्त मानदंड नहीं रह गया है। किसी परियोजना का पारिस्थितिक पदचिह्न, आपदा जोखिम और स्थानीय समुदायों पर प्रभाव भी उतना ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

नदी का प्रवाह, सुरंगें और “डी-वॉटरड स्ट्रेच”

इन परियोजनाओं में नदी के बड़े हिस्से को सुरंगों में मोड़ दिया जाता है, जिससे कई किलोमीटर तक नदी का प्राकृतिक प्रवाह कम हो जाता है। इसे “डी-वॉटरड स्ट्रेच” कहा जाता है। 

हिमालयी नदियों में यह स्थिति केवल एक तकनीकी शब्द तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा अनुभव स्थानीय भूगोल और जीवन में दिखाई देता है। अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में कई स्थानों पर लोगों का कहना रहा है कि सुरंग आधारित जलविद्युत परियोजनाओं के बाद नदी का प्राकृतिक प्रवाह कई किलोमीटर तक बेहद कम हो गया है।

उदाहरण के लिए विष्णुप्रयाग क्षेत्र में अलकनंदा पर बनी परियोजना को लेकर स्थानीय समुदाय और पर्यावरण समूह लंबे समय से विरोध में रहे हैं। उन्होंने यह चिंता जताई है कि नदी के बड़े हिस्से को सुरंग में मोड़ दिए जाने के बाद डाउनस्ट्रीम में जल प्रवाह का स्वरूप बदल गया है। 

ऐसा ही कुछ 2021 की चमोली आपदा के बाद तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना के मामले में भी हुआ। इस आपदा के बाद यह सवाल तेज हो गया कि क्या बड़े पैमाने पर सुरंग निर्माण और मलबा विस्फोट ने भू-स्थिरता और नदी प्रणाली पर दबाव बढ़ाया है।

भागीरथी घाटी में मनेरी भाली परियोजना भी ऐसा ही उदाहरण है। इसको लेकर भी समय-समय पर यह चर्चा उठती रही है कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह और मौसमी जलचर जीवन पर इसका असर पड़ा है। स्थानीय स्तर पर यह अनुभव केवल पर्यावरणीय बहस नहीं है, बल्कि पानी की उपलब्धता, कृषि और दैनिक जीवन से जुड़ा एक प्रत्यक्ष परिवर्तन है।

इन हिस्सों में जलीय जीवन, स्थानीय मत्स्य प्रजातियां और नदी पर निर्भर आजीविकाएं गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं, क्योंकि प्रवाह की निरंतरता ही इन पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला होती है।

केंद्र ने अपने हलफनामे में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखने की आवश्यकता का भी उल्लेख किया है। लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल “ई-फ्लो” तय कर देना पर्याप्त नहीं होता।

विष्णुप्रयाग क्षेत्र में अलकनंदा पर बनी परियोजना को लेकर स्थानीय समुदाय और पर्यावरण समूहों ने यह चिंता जताई है कि नदी के बड़े हिस्से को सुरंग में मोड़ दिए जाने के बाद डाउनस्ट्रीम में जल प्रवाह का स्वरूप बदल गया है।

स्थानीय समुदायों की चिंताएं आखिरकार सुनी जा रही हैं?

उत्तराखंड में वर्षों से स्थानीय समुदाय, पर्यावरणविद और कई सामाजिक संगठन लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि क्या हिमालय की वहन क्षमता को नजरअंदाज किया जा रहा है।

भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन को लेकर भी हाल के महीनों में चिंता जताई गई थी। कई पूर्व राजनेताओं और नागरिक समूहों ने सड़क चौड़ीकरण और बड़े निर्माण कार्यों पर पुनर्विचार की मांग की थी।

स्थानीय लोगों की चिंताएं केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सीधे जीवन, पानी और सुरक्षा से जुड़ी हुई हैं।

हिमालयी घाटियों में यह चिंता केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों और विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्टों में भी इसकी पुष्टि मिलती है।

उत्तराखंड में वर्षों से स्थानीय समुदाय, पर्यावरणविद और कई सामाजिक संगठन लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि क्या हिमालय की वहन क्षमता को नजरअंदाज किया जा रहा है।

स्थानीय समुदायों की चिंताएं और पारिस्थितिक असर

साल 2012 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा अलकनंदा और भागीरथी बेसिन पर किए गए Cumulative Impact Assessment में यह स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि इन नदियों पर प्रस्तावित और निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाएं जैव विविधता, जलीय जीवन और नदी की पारिस्थितिक निरंतरता पर “गंभीर और अपरिवर्तनीय प्रभाव” डाल सकती हैं। 

इस अध्ययन में यह भी कहा गया था कि कई परियोजनाओं का संचयी प्रभाव (cumulative impact) अलग-अलग परियोजनाओं से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है, क्योंकि यह नदी प्रणाली की प्राकृतिक प्रवाह क्षमता को धीरे-धीरे खंडित करता है।

इसी तरह, साल 2013 के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित रवि चोपड़ा समिति की रिपोर्ट में भी यही कहा गया था कि उत्तराखंड में कई निर्माणाधीन और प्रस्तावित हाइडल परियोजनाएं 2013 की आपदा के प्रभावों को बढ़ाने में एक कारक हो सकती हैं। समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि हिमालयी क्षेत्रों में केवल परियोजना-स्तरीय नहीं, बल्कि पूरे बेसिन स्तर पर पर्यावरणीय आकलन किया जाना चाहिए।

इन निष्कर्षों ने इस बहस को और मजबूत किया कि हिमालयी नदियों को केवल अलग-अलग परियोजनाओं की श्रृंखला के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि एक जुड़ी हुई पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में समझना जरूरी है।

स्थानीय स्तर पर भी यह अनुभव लगातार सामने आता रहा है कि बड़े निर्माण कार्यों और सुरंग आधारित परियोजनाओं के बाद जलस्रोतों का व्यवहार बदलता है, भूस्खलन की घटनाएं बढ़ती हैं। साथ ही, नदी के किनारे बसे गांवों में जल संकट गहराता है। यही कारण है कि कई बार स्थानीय विरोध केवल विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि विकास के स्वरूप के पुनर्विचार की मांग के रूप में सामने आता है।

साल 2013 के बाद
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित रवि चोपड़ा समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि उत्तराखंड में कई निर्माणाधीन और प्रस्तावित हाइडल परियोजनाएं 2013 की आपदा के प्रभावों को बढ़ाने में एक कारक हो सकती हैं।

फिर ऊर्जा की जरूरतें कैसे पूरी होंगी?

यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग वास्तविक है। जीवाश्म ईंधनों से दूरी बनाना भी जरूरी है। ऐसे में यदि बड़े हाइडल प्रोजेक्ट्स पर रोक लगती है, तो विकल्प क्या होंगे?

ऊर्जा संक्रमण और भविष्य का विकल्प

ऊर्जा विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि भविष्य छोटे सौर ग्रिड, रूफटॉप सोलर, ऊर्जा दक्षता और स्थानीय स्तर पर कम प्रभाव वाली प्रणालियों जैसी विकेंद्रीकृत ऊर्जा प्रणालियों में हो सकता है।

भारत की ऊर्जा बहस में जलविद्युत आज भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन राष्ट्रीय ऊर्जा संरचना में इसकी हिस्सेदारी अब धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता में बड़े जलविद्युत परियोजनाओं की हिस्सेदारी लगभग 10 फ़ीसद के आसपास है। जबकि नवीकरणीय ऊर्जा का कुल हिस्सा लगातार बढ़कर आधे से अधिक संरचना तक पहुंच चुका है, जिसमें सौर ऊर्जा सबसे तेजी से बढ़ने वाला स्रोत बनकर उभरा है।

पिछले कुछ सालों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अभूतपूर्व गति से विस्तार हुआ है। अकेले साल 2025 में ही भारत ने लगभग 37.9 गीगावाट सौर क्षमता विकसित की है, जो अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि मानी जा रही है। इस विस्तार में उपयोगिता-स्तरीय परियोजनाओं के साथ-साथ रूफटॉप सोलर और विकेन्द्रीकृत ऊर्जा प्रणालियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इसी दौरान यह भी देखा गया है कि भारत की कुल बिजली मांग में वृद्धि के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है, जिससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता धीरे-धीरे घटने लगी है।

इस व्यापक बदलाव के बीच हिमालयी क्षेत्रों में जलविद्युत परियोजनाओं का सवाल और अधिक जटिल हो जाता है। क्योंकि एक ओर भारत को अपनी बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करना है। वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट होता जा रहा है कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां दीर्घकालिक जोखिम पैदा कर सकती हैं।

अकेले साल 2025 में
ही भारत ने लगभग 37.9 गीगावाट सौर क्षमता विकसित की है, जो अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि मानी जा रही है।

ऊपरी गंगा पर नीति बदलाव: एक संकेत या शुरुआत?

ऊपरी गंगा को लेकर केंद्र का हालिया रुख इस सवाल को फिर से सामने लाता है कि क्या हिमालयी नदियों पर विकास का मौजूदा मॉडल अपनी पारिस्थितिक सीमा तक पहुंच चुका है।

यह रुख केवल एक क्षेत्रीय निर्णय नहीं है, बल्कि यह संकेत देता है कि हिमालयी नदियों पर विकास की पारंपरिक समझ अब पुनर्विचार के दौर में है।

इसी जगह से हिमालयी विकास मॉडल को नए सिरे से देखने की जरूरत शुरू होती है। जहां नदी केवल संसाधन नहीं, बल्कि एक जीवित प्रणाली मानी जाए, जिसके भीतर विकास की सीमाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हों जितनी उसकी संभावनाएं।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह भारत की जलविद्युत नीति में स्थायी परिवर्तन है। क्योंकि केंद्र ने सात मौजूदा परियोजनाओं को जारी रखने की अनुमति देने की बात भी कही है।

फिर भी, यह पहली बार है जब हिमालयी क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं को लेकर केंद्र सरकार ने ऐसा कोई रुख़ अपनाया है।

कुछ नदियों का अपने प्राकृतिक प्रवाह में बने रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही प्रवाह नीचे के मैदानों की जल सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन की आधारशिला बनता है।

सवाल अब यह नहीं है कि नदी पर विकास होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत हिमालय के लिए बेसिन-स्तरीय विकास ढांचा अपनाने को तैयार है?

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