गंगा बेसिन के 63 शहरों में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत शहरी नदी प्रबंधन योजना (URMP) का विस्तार किया जाएगा।
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दो चरणों में होगा यूआरएमपी का विस्तार। सबसे ज़्यादा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार में बढ़ेगा योजना का दायरा
देश की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में गिनी जाने वाली और लोगों की आस्था से जुड़ी गंगा को साफ करने के काम में तेजी लाने के लिए केंद्र सरकार ने एक अहम फैसला लिया है। इसके तहत अब राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के तहत चलने वाली शहरी नदी प्रबंधन योजना (URMP) का विस्तार देशभर में गंगा बेसिन वाले 63 शहरों में किया जाएगा। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा 24 जून को जारी सूचना के मुताबिक यह विस्तार चरणबद्ध तरीके से दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में 27 शहरों, दूसरे चरण में 33 अतिरिक्त शहरों को यूआरएमपी के दायरे में लाया जाएगा।
इससे देश में गंगा बेसिन वाले शहरों की संख्या में 60 शहर और जुड़ जाएंगे और पहले से शामिल तीन शहरों अयोध्या, कानपुर और छत्रपति शंभाजी नगर (औरंगाबाद) समेत गंगा बेसिन वाले शहरों की कुल संख्या 63 हो जाएगी। इस परियोजना के अंतर्गत गंगा बेसिन राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड के शहर शामिल किए जा रहे हैं। ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत समर्थित यह पहल गंगा नदी की सेहत को शहरी नियोजन के साथ एकीकृत करने के समन्वित प्रयासों में से एक है।
नदी-केंद्रित शहरी नियोजन की दिशा में एक बड़ा पड़ाव पार करते हुए, NMCG ने राष्ट्रीय शहरी मामलों के संस्थान (NIUA) के सहयोग से 13 शहरों के लिए URMP पूरी कर ली हैं।
यह पहल दिसंबर 2019 में कानपुर में आयोजित राष्ट्रीय गंगा परिषद की बैठक में व्यक्त किए गए विजन पर आधारित है, जिसमें शहर-केंद्रित विकास से हटकर नदी-केंद्रित विजन को अपनाने पर जोर दिया गया था। इसमें नदियों को शहरी नियोजन और नागरिक जीवन के केंद्र में रखने की बात शामिल है।
शहरी नदी प्रबंधन योजना (यूआरएमपी) का ढांचा मूल रूप से तीन प्रमुख स्तंभों - पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से शहरी इलाकों में नदी प्रबंधन पर आधारित है। इसके व्यापक 10 सूत्री एजेंडा में निम्नलिखित बातें शामिल हैं -
बाढ़ के मैदानों का विनियमन
प्रदूषण नियंत्रण
आर्द्रभूमि और जल निकायों का पुनरुद्धार
नदी तट सुरक्षा प्रणालियों का संवर्धन
उपचारित जल का पुन: उपयोग
पर्यावरण के प्रति संवेदनशील नदी तट विकास
गुणवत्तापूर्ण जल प्रवाह सुनिश्चित करना
नदी संसाधनों का आर्थिक उपयोग
सतत नागरिक सहभागिता
नदी से जुड़े सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन
यह पहल उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के शहरों में किए जा रहे उन प्रयासों पर भी प्रकाश डालती है, जहां पारिस्थितिक बहाली, प्रदूषण नियंत्रण, बाढ़ से निपटने की क्षमता, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण, पर्यावरण-पर्यटन और नागरिक भागीदारी के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतियां विकसित की जा रही हैं।
इस पहल का उद्देश्य शहरी लचीलेपन को मजबूत करना, नदी पारिस्थितिकी में सुधार करना, अपशिष्ट जल और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ाना और नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत नदी पुनर्जीवन की परिकल्पना के अनुरूप सतत विकास को बढ़ावा देना है। गंगा के मुख्य मार्ग पर स्थित सभी 97 शहरों को शामिल करने की दीर्घकालिक परिकल्पना के साथ, यह पहल नदी बेसिन में नदी-संवेदनशील शहरी नियोजन के लिए एक राष्ट्रीय स्तर पर सुसंगत लेकिन स्थानीय स्तर पर अनुकूलनीय ढांचा स्थापित करना चाहती है।
यह पहल एनआईयूए द्वारा एनएमसीजी के सहयोग से अयोध्या, कानपुर और छत्रपति संभाजी नगर जैसे शहरों में चलाए गए सफल पायलट प्रोजेक्टों पर आधारित है। इन पायलट प्रोजेक्टों ने यह प्रदर्शित किया कि एक ही मॉडल को सभी पर लागू करने के बजाय, शहरी नदी प्रबंधन योजनाओं (यूआरएमपी) को स्थानीय सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और आर्थिक संदर्भों के अनुरूप कैसे ढाला जा सकता है। इसमें शहरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित समय-सीमा के भीतर योजना के उपायों, नियामक सुधारों, बुनियादी ढांचे के विकास और समुदाय-नेतृत्व वाली पहलों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए योजना के उपायों को लागू करें, जिससे गंगा नदी की साफ-सफाई शहरी विकास का एक अभिन्न अंग बन जाए।
पायलट प्रोजेक्ट वाले तीनों शहरों के परिणामों को देखते हुए विश्व बैंक के सहयोग से अब कार्यक्रम को अब चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया जा रहा है। पहले चरण के तहत उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के 27 शहरों के लिए शहरी नदी प्रबंधन योजनाओं (यूआरएमपी) विकसित की जा रही हैं। इनमें ऊपरी गंगा बेसिन में गंगोत्री और ऋषिकेश से लेकर पूर्वी क्षेत्र के निचले गंगा बेसिन वाले हावड़ा, आसनसोल और दुर्गापुर जैसे शहर शामिल हैं।
उत्तराखंड में हल्द्वानी-काठगोदाम, रामनगर, ऋषिकेश, उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, शाहजहांपुर, बिजनौर, प्रयागराज, मिर्जापुर, बिहार में छपरा, बक्सर और गया सहित कई शहरों के लिए शहरी नदी प्रबंधन योजनाएं (यूआरएमपी) पूरी हो चुकी हैं। इसके अलावा 12 शहरों की योजनाओं को मार्च 2027 (वित्तीय वर्ष 2026-27) तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार में यूआरएमपी के तहत कई शहर नदियों के स्वास्थ्य और जलवायु अनुकूलन में सुधार के लिए प्रकृति-आधारित समाधानों जैसे निर्मित आर्द्रभूमि, नदी तट बहाली, स्पंज परिदृश्य, जैव-स्वेल, पारिस्थितिक नाली पुनर्जीवन और भूजल पुनर्भरण प्रणालियों का भी उपयोग किया जा रहा है। इससे गंगा में प्रदूषण नियंत्रण, नीली-हरित अवसंरचना, बाढ़ प्रबंधन, जैव विविधता औ पर्यावरण के संरक्षण से लेकर पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में मदद मिल रही है। यह दर्शाता है कि नदी के प्रति संवेदनशील योजना किस प्रकार शहरों को पारिस्थितिक गतिशीलता मजबूत करने, शहरी बुनियादी ढांचे में सुधार करने और समुदायों को नदियों से पुनः जोड़ने में मदद कर सकती है।
गंगा बेसिन के तहत आने वाले भारत के प्रमुख राज्य, जहां URMP का विस्तार किया जाएगा।
उत्तराखंड में, हल्द्वानी-काठगोदाम, रामनगर और ऋषिकेश के लिए यूआरएमपी शहरों और नदियों के बीच पारिस्थितिक संबंधों को बहाल करने के साथ-साथ पर्यावरण अनुकूल पर्यटन (Eco-friendly Tourism) और जनभागीदारी को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं। हल्द्वानी-काठगोदाम का उद्देश्य नदी तट सुरक्षा उपायों और बाढ़ प्रबंधन के माध्यम से शहर को गौला नदी से पुनः जोड़ना है।
रामनगर की योजना कोसी नदी को जैव विविधता-उन्मुख नदी तटों, पक्षी पार्कों, निगरानी टावरों और सतत आजीविका का समर्थन करने वाले पारिस्थितिक सार्वजनिक स्थानों के माध्यम से कॉर्बेट इको-टूरिज्म कॉरिडोर के हिस्से के रूप में स्थापित करती है। इसी प्रकार ऋषिकेश में, योजना आर्द्रभूमि बहाली, सीवरेज उन्नयन और मल-मूत्र प्रबंधन के माध्यम से सहायक नदियों, आर्द्रभूमियों और संबंधित नदी प्रणालियों के पुनरुद्धार पर केंद्रित है, जो यह दर्शाती है कि हिमालयी शहरों में आध्यात्मिकता, पर्यावरण बहाली और शहरी गतिशीलता कैसे एक साथ मौजूद हो सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में शहरी नदी प्रबंधन योजनाएं (यूआरएमपी) बाढ़ से निपटने की क्षमता, प्रदूषण कम करने, सांस्कृतिक नदी तट के पुनरुद्धार और सामुदायिक भागीदारी पर विशेष ध्यान केंद्रित करती हैं। गोरखपुर की योजना शहरी बाढ़ से निपटने के लिए स्पंज पार्क, बायोस्वेल, आर्द्रभूमि और पारिस्थितिक नदी तट का उपयोग करते हुए नीली-हरी अवसंरचनाओं (Blue-green infrastructure) को विकसित करने दृष्टिकोण अपनाती है। शाहजहांपुर की रणनीति पर्यावरण के अनुकूल घाटों, जल गुणवत्ता निगरानी, अपशिष्ट जल उपचार और "मेरी नदी, मेरा शहर" जैसे जन अभियानों के माध्यम से गर्रा और खन्नौट नदियों के पुनरुद्धार पर जोर देती है ताकि नागरिकों को नदी संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके।
बिजनौर में, यूआरएमपी हैदरपुर आर्द्रभूमि और व्यापक गंगा पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी जिला-स्तरीय पारिस्थितिक नियोजन दृष्टिकोण अपनाती है, जो जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण-पर्यटन और आर्द्रभूमि के पुनरुद्धार पर केंद्रित है। प्रयागराज की यूआरएमपी शहर की नदियों को "प्रकृति की जीवंत विरासत के गलियारों" के रूप में परिकल्पित करती है, जो संगम और उससे जुड़े सांस्कृतिक परिदृश्यों के आसपास पारिस्थितिक बहाली, पर्यटन, बाढ़ से निपटने की क्षमता और विरासत-संवेदनशील नदी तट विकास को एकीकृत करती है।
बिहार में, बक्सर, छपरा और गया के लिए शहरी विकास परियोजनाएं (यूआरएमपी) एकीकृत नीली-हरी योजना के माध्यम से नदियों, संस्कृति और शहरी लचीलेपन के बीच संबंधों को मजबूत करने पर केंद्रित हैं। बक्सर की योजना में जैव विविधता क्षेत्रों, पर्यावरण पार्कों, पारगम्य घाट अवसंरचना और जैव उपचार तथा निर्मित आर्द्रभूमि के माध्यम से नहरों के पुनरुद्धार के साथ गंगा के किनारे एक पर्यावरण-संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से जीवंत नदी तट का प्रस्ताव है।
छपरा की यूआरएमपी बाढ़ के मैदानों के ज़ोनिंग, तेल नदी गलियारे के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन, अपशिष्ट जल उपचार और शहर के नीले-हरे नेटवर्क के हिस्से के रूप में तालाबों और आर्द्रभूमि के पुनरुद्धार को प्राथमिकता देकर बार-बार आने वाली बाढ़ और नदी के बदलते स्वरूप की समस्या का समाधान करती है। गया में, योजना भूजल पुनर्भरण, बाढ़ के मैदानों के पुनर्स्थापन, प्रदूषित नालियों के पादप उपचार और जीआईएस-आधारित जल निकाय निगरानी के माध्यम से फाल्गु नदी की जल-पारिस्थितिकी को बहाल करने पर केंद्रित है।
| शहर | नदी | राज्य | URMP के तहत प्रमुख उपाय |
|---|---|---|---|
| हरिद्वार | गंगा | उत्तराखंड | बाढ़ मैदानों का संरक्षण, घाटों का पर्यावरण-अनुकूल विकास, उपचारित जल का पुनः उपयोग |
| ऋषिकेश | गंगा | उत्तराखंड | नदी तट प्रबंधन, आर्द्रभूमि संरक्षण, सीवेज और प्रदूषण नियंत्रण |
| कानपुर | गंगा | उत्तर प्रदेश | औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण, उपचारित जल का पुनः उपयोग, नदी तट पुनर्विकास |
| प्रयागराज | गंगा | उत्तर प्रदेश | बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन, संगम क्षेत्र का संरक्षण, नागरिक सहभागिता |
| वाराणसी | गंगा | उत्तर प्रदेश | पर्यावरण-संवेदनशील रिवरफ्रंट विकास, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण, जल गुणवत्ता सुधार |
| अयोध्या | सरयू (गंगा बेसिन) | उत्तर प्रदेश | पायलट URMP के तहत समग्र नदी प्रबंधन, नदी से जुड़े सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण |
| पटना | गंगा | बिहार | शहरी बाढ़ प्रबंधन, आर्द्रभूमि पुनर्जीवन, नदी तट संरक्षण |
| भागलपुर | गंगा | बिहार | डॉल्फिन आवास संरक्षण, जल गुणवत्ता सुधार, बाढ़ मैदान प्रबंधन |
| मुंगेर | गंगा | बिहार | नदी तट सुरक्षा, उपचारित जल का पुनः उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण |
पीआईबी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि कानपुर शहरी नदी प्रबंधन परियोजना (यूआरएमपी) की सिफारिशों को अमल में लाने के अग्रणी उदाहरणों में से एक बनकर उभरा है।
यहां प्रमुख पहलों में से एक केंद्रीय आयुध डिपो (सीओडी) नाले के पुनरुद्धार पर केंद्रित है, जिसे योजना प्रक्रिया के दौरान एक महत्वपूर्ण शहरी जलमार्ग के रूप में पहचाना गया है। इस नाले को एक जीर्ण शहरी जलधारा से उपयुक्त पुनर्स्थापन उपायों के माध्यम से पारिस्थितिक रूप से कार्यात्मक गलियारे में बदलने के लिए एक विस्तृत परियोजना रूपरेखा विकसित की जा रही है, जिससे पर्यावरणीय गुणवत्ता में सुधार होगा और शहरी समुदायों तथा प्राकृतिक जल प्रणालियों के बीच संबंध मजबूत होगा।
इसके अलावा कानपुर में लेक असेसमेंट एंड मॉनिटरिंग एनालिसिस सिस्टम तकनीक का उपयोग करके शहरी जल निकायों का पुनरुद्धार शामिल है। इस पहल का उद्देश्य शहर की झीलों का नए सिरे से मूल्यांकन, इनके जल का उपचार और प्रबंधन पद्धतियों को अपना कर झीलों की पारिस्थितिक कार्यप्रणाली को बहाल करना है। इससे पर्यावरणीय लाभों के साथ ही इन झीलों को एक बेहतर सार्वजनिक स्थान (Public space) बनाने, शहर के सुंदरीकरण और बाढ़ एवं जल संकट जैसी जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने जैसे लाभ मिल सकते हैं।
विश्व बैंक साझेदारी के तहत एनएमसीजी प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन अनुदान (पीबीआईजी) वाली योजना के रूप में उभर रही है। इससे शहरी स्थानीय निकायों को यूआरएमपी के माध्यम से पहचानी गई प्राथमिकता वाली परियोजनाओं को लागू करने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है। इस प्रकार एनएमसीजी विभिन्न शहरी योजनाओं के तहत चुनिंदा प्रमुख परियोजनाओं के जमीनी स्तर पर लागू करने में सहयोग देने के लिए काम कर रहा है। इसके जरिये तटीय इलाकों में बफर ज़ोन का विकास, मल, कीचड़ और अपशिष्ट प्रबंधन (एफएसएसएम) योजनाओं को मजबूती देना, जल निकायों और आर्द्रभूमि का जीर्णोद्धार, पर्यावरण के अनुकूल नदी तट विकास और नदी प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीक वाले उपायों को अपनाना शामिल है। इन प्रयासों से गंगा किनारे बसे शहरों में नदी को स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
भविष्य में यूआरएमपी का विस्तार गंगा बेसिन से आगे बढ़ाकर देश भर की अन्य नदी प्रणालियों तक किए जाने की संभावना है। इस विस्तार का लक्ष्य सभी नदियों के लिए एक नदी-संवेदनशील शहरी नियोजन (River-sensitive urban planning) को एक राष्ट्रीय मॉडल तैयार करना है, जिससे देश भर के नदियों वाले शहर सतत विकास के लिए एकीकृत, बेसिन-आधारित दृष्टिकोण अपना सकें।
इस तरह यूआरएमपी नदियों को शहरी नियोजन के केंद्र में रखकर, यह पहल लचीले, टिकाऊ और भविष्य के लिए तैयार शहरों के निर्माण की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम है। साथ ही यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्व वाली नदियों की रक्षा भी सुनिश्चित करती है।
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