ट्रीटमेंट प्लांट में वेस्ट वाटर की कई चरणों में सफाई करके उसे दोबारा इस्तेमाल में लाया जाता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
उत्तर प्रदेश सरकार ने उपचारित जल के सुरक्षित पुन: उपयोग की नीति 2026 यानी Policy for the Safe Reuse of Treated Water, 2026 को मंजूरी दे दी है। इसका लक्ष्य 2030 तक उपचारित अपशिष्ट जल (Treated WasteWater) का 50% तक पुन: उपयोग (Reuse) करना है। साथ ही 2035 तक इसे शत-प्रतिशत (100%) तक पहुंचना है। एसटीपी रहित क्षेत्रों में 2030 तक 30% पुन: उपयोग का लक्ष्य रखा गया है, जो 2045 तक बढ़कर 100% हो जाएगा। इस नीति के तहत वेस्ट वाटर का ट्रीटमेंट करके उसका इस्तेमाल पेयजलापूर्ति से इतर कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा।
यह वाटर रीयूज पॉलिसी विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) के सहयोग से तैयार की गई है। इस नीति की खास बात यह है कि इसमें अपशिष्ट जल यानी वेस्ट वाटर को भी एक संसाधन के रूप में देखने का नज़रिया अपनाया गया है। इसका मकसद पीने योग्य मीठे पानी पर दबाव कम करना और कृषि, उद्योग और निर्माण के लिए भूजल दोहन को कम करना है। क्योंकि, राज्य में तेजी से हो रहे शहरीकरण और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण मीठे पानी के संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन भी जल की उपलब्धता के लिए खतरा बन रहा है, जिससे शहर जलभराव के प्रति अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति राज्य में बढ़ते जल संकट से निपटने और जल सुरक्षा को बढ़ावा देने में काफी हद तक कारगर होगी। हालांकि, इसे ठीक ढंग से लागू करने और भ्रष्टाचार व सरकारी तंत्र की लापरवाहियों से दूर रखने जैसी कठिन चुनौतियों का भी सामना करना होगा। साथ ही इस भविष्यवादी (Futuristic) नीति को सफल बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर इसके वित्तपोषण (Local-level Financing) की व्यवस्था और परिचालन (Operations) संबंधी दिक्कतों को भी दूर करने के पुख्ता इंतज़ाम भी सरकार को करने होंगे।
इस परियोजना का उद्देश्य उपचारित जल (ट्रीटेड वाटर) की उपलब्धता, वितरण प्रणालियों, बाजारों और मांग केंद्रों को शामिल करते हुए एक सुदृढ़ ढांचा तैयार करना है। इसमें बाजार का विकास, संस्थागत समन्वय और निगरानी तंत्र की स्थापना भी शामिल हैं। नीतिगत सुधारों, उपयुक्त शुल्क संरचनाओं और उपचार एवं पुन: उपयोग के लिए जवाबदेही तंत्रों के माध्यम से कार्यान्वयन चरणबद्ध तरीके से होगा।प्रो. वेंकटेश दत्ता, विभागाध्यक्ष (पर्यावरण विज्ञान विभाग) बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ
उत्तर प्रदेश सरकार की नई वेस्ट वाटर रीयूज पॉलिसी के पीछे एक नई सोच है। इसमें इस अभिनव दृष्टिकोण को अपनाया गया है कि अपशिष्ट जल या प्रयुक्त जल एक अन्य रूप है और चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को बढ़ावा देने के लिए इसे जल चक्र के एक भाग के रूप में देखा जाना चाहिए। अपशिष्ट जल को दोबारा शुद्ध करके जलापूर्ति में इस्तेमाल करना काफी महंगा पड़ता है। इसके लिए किए जाने वाले सीवेज उपचार में बहुत अधिक धन की आवश्यकता होती है। यह कच्चे पानी के उपचार की तुलना में 2-3 गुना अधिक होता है।
शहर भर में फैले कई मध्यवर्ती पंपिंग स्टेशनों के माध्यम से सीवेज उपचार संयंत्रों को सीवेज प्राप्त होता है और उन्हें चौबीसों घंटे पूरी क्षमता से काम करना पड़ता है। इसलिए इस खर्चीली प्रक्रिया को अपनाने के बजाय इस्तेमाल हो चुके पानी को थोड़े से उपचार (ट्रीटमेंट) के बाद इसे खेती और औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल के लायक बनाना काफी सस्ता पड़ता है। इसलिए नई वेस्ट वाटर रीयूज पॉलिसी में वेस्ट वाटर को खेती और औद्योगिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने का रुख अपनाया गया है। इसमें उपचारित जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जा सकता है, जिसमें मत्स्य पालन भी शामिल है। साथ ही कारखानों और निर्माण गतिविधियों में भी इस पानी का का उपयोग किया जा सकता है। इससे सीमित मीठे पानी पर भार कम हो जाता है।
स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन (एनएमसीजी) द्वारा उपचारित अपशिष्ट जल के सुरक्षित पुन: उपयोग के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया गया है, जो पुन: उपयोग नीति के लिए दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) प्रदान करता है और इसका उद्देश्य उपचारित अपशिष्ट जल के सुरक्षित पुन: उपयोग के लिए उपयुक्त बाजार, प्रौद्योगिकी और आर्थिक मॉडल विकसित करना है।
घरों और उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी (अपशिष्ट जल) को पुन: उपयोग में लाने की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार होती है।
आगरा और प्रयागराज जैसे शहरों ने वेस्ट वाटर रीयूज की ओर रुख करते हुए पहले ही शहर-स्तरीय पुन: उपयोग कार्य योजनाएं (सीएलआरएपी) तैयार करके इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। इन योजनाओं का उद्देश्य शहरी स्थानीय निकायों को पुन: उपयोग के अवसरों की पहचान करने, मांग का आकलन करने और उपचारित अपशिष्ट जल के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को विकसित करने में मार्गदर्शन करना है। ये कार्य योजनाएं सीएसई के तकनीकी सहयोग और स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन (एनएमसीजी) के वित्तीय सहयोग से तैयार की गई हैं।
प्रयागराज में 1,625 करोड़ रुपये की चार प्रस्तावित परियोजनाओं का उद्देश्य प्रतिदिन 126.45 मिलियन लीटर उपचारित जल का पुन: उपयोग संभव बनाना है। वहीं, आगरा में 93 करोड़ रुपये की तीन परियोजनाओं की योजना बनाई गई है, जिनका उद्देश्य प्रतिदिन 28 मिलियन लीटर जल का पुन: उपयोग करना है।
आगरा यमुना नदी में पानी की भारी कमी और प्रदूषण की चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसे देखते हुए प्रशासन ने पानी के पुन: उपयोग की कार्य योजना को आगे बढ़ाते हुए जल चक्रीय अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण अपनाया है। पीआईबी की द्वारा जारी की गई जानकारी के मुताबिक शहर में 286 मिलियन लीटर (एमएलडी) सीवेज उत्पन्न होता है, जिसमें से लगभग 21 प्रतिशत का उपचार नहीं हो पाता है। मौजूदा एसटीपी (सीटीपी) की क्षमता 221 मिलियन लीटर से बढ़कर 398 मिलियन लीटर हो जाएगी। इस योजना में जिन प्रमुख पुन: उपयोग परियोजनाओं की पहचान की गई है, उनमें निम्नलिखित इकाइयां शामिल हैं :
धंदूपुरा एसटीपी से आगरा कैंट, आगरा फोर्ट और ईदगाह रेलवे स्टेशनों तक – 5 एमएलडी
जगनपुर एसटीपी से मेडिकल कॉलेज मेट्रो कॉरिडोर – 2 एमएलडी
बिचपुरी एसटीपी से कीठम झील - 21 एमएलडी
इन परियोजनाओं से कुल मिलाकर 28 एमएलडी (MLD) पुन: उपयोग की क्षमता को लगभग 93 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ कार्यान्वित किया जा सकेगा। इसी तरह प्रयागराज (इलाहाबाद) में भी प्रयागराज में तेजी से हो रहे शहरीकरण और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण बढ़ते जल संकट से निपटने के लिए उपचारित प्रयुक्त जल (टीयूडब्ल्यू) के पुन: उपयोग हेतु एक सुनियोजित कार्ययोजना लागू की जा रही है।
शहर में वर्तमान में 340 एमएलडी की क्षमता वाले 10 सीवेज उपचार संयंत्र कार्यरत हैं, जिनकी क्षमता बढ़ाकर 595 एमएलडी की जाएगी। हालांकि, पुन: उपयोग सीमित ही है, क्योंकि अधिकांश उपचारित जल नदियों में बहा दिया जाता है। इसे देखते हुए जिले में उपचारित जल के इस्तेमाल के लिए कई इकाइयों की पहचान की गई है।
सीएलआरएपी थर्मल पावर, रेलवे, कृषि और शहरी भूनिर्माण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण पुन: उपयोग की संभावनाओं की पहचान करता है। प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं:
नैनी एसटीपी - III से प्रयागराज पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड को – 50 एमएलडी
नैनी प्रथम और द्वितीय एसटीपी से मेजा ऊर्जा निगम प्राइवेट लिमिटेड को – 72 एमएलडी
राजापुर एसटीपी से प्रयागराज जंक्शन - 3.32 एमएलडी
कोडरा एसटीपी से सूबेदारगंज रेलवे स्टेशन - 1.13 एमएलडी
इन परियोजनाओं में कुल मिलाकर 126.45 एमएलडी की पुन:उपयोग क्षमता है। इसे हासिल करने के लिए इनमें तकरीबन 1,625 करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी।
उत्तर प्रदेश सरकार को इस नीति के माध्यम से बढ़ते जल संकट से निपटने के लिए निर्णायक कदम उठाने के लिए सराहना मिलनी चाहिए, जो उपचारित अपशिष्ट जल के संरचित और बड़े पैमाने पर पुन: उपयोग की वकालत करती है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह नीति पारंपरिक ‘उपचार और निपटान’ प्रथाओं से हटकर एक चक्रीय अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है, जहां अपशिष्ट जल को एक मूल्यवान संसाधन के रूप में मान्यता दी जाती है। सीएसई ने नीति के मसौदे को अंतिम रूप देने और महत्वपूर्ण तकनीकी सुझाव प्रदान करने में सहयोग दिया है।सुब्रता चक्रवर्ती, जल कार्यक्रम निदेशक, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई)
तेजी से हो रहे शहरीकरण और भूजल दोहन के कारण बढ़ते भूजल संकट को देखते हुए इसका एक बहुत ही बड़ा बाजार आने वाले समय में देखने को मिल सकता है। इसका लाभ उठाने के लिए वेस्ट वाटर और ग्रे वाटर ट्रीटमेंट के क्षेत्र में तकनीकी विकास और निवेश की व्याप संभावनाएं मौजूद हैं। इस नीति का लक्ष्य से भारत के जल और अपशिष्ट जल उपचार बाजार में संभावित इस उल्लेखनीय वृद्धि का लाभ उठाने का है।
2025-26 के बजट में जल अवसंरचना के लिए आवंटित ₹35,189 करोड़ जैसी सरकारी धनराशि मजबूत नीतिगत समर्थन को दर्शाती है। विश्लेषकों को बाजार में और विस्तार की उम्मीद है। वेस्ट वाटर रीयूज का बाज़ार 2031 तक 5.17 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है़, जबकि 2034 तक इसके बढ़कर 19.4 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद की जा रही है। इसके अगले एक-डेढ़ दशक में भारत का अपशिष्ट जल पुन: उपयोग के क्षेत्र में 2047 तक लगभग 30 अरब अमेरिकी डॉलर का एक विशाल आर्थिक अवसरों की संभावनाएं मौजूद हैं।
उत्तर प्रदेश की यह नीति, जल जीवन मिशन और नमामि गंगा जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों के साथ मिलकर, 2047 तक उपचारित अपशिष्ट जल क्षेत्र में अनुमानित 35 अरब अमेरिकी डॉलर के अवसर पैदा करेगी। इससे 2047 तक एक लाख से अधिक नए रोजगार सृजित हो सकते हैं। विशेष रूप से सीटीपी और संबंधित बुनियादी ढांचे के संचालन और रख-रखाव जैसे कार्यों में बड़े पैमाने पर स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसर मिलने की उम्मीद है।
इसी को देखते हुए उत्तर प्रदेश की वेस्ट वाटर रीयूज पॉलिसी को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए शहर-स्तरीय पुन: उपयोग कार्य योजनाएं (सीएलआरएपी) विकसित की जा रही हैं। इसका उद्देश्य उपचारित जल की उपलब्धता, वितरण प्रणालियों, बाजारों और मांग केंद्रों को शामिल करते हुए एक सुदृढ़ ढांचा तैयार करना है। इसमें बाजार विकास, संस्थागत समन्वय और निगरानी तंत्र भी शामिल हैं। इसके साथ ही इसके लिए नदियों के स्वास्थ्य में सुधार लाने की परियोजनाओं में भी तेजी लाई जाएगी।
ट्रीटमेंट प्लांट में उपचार से पहले कुछ इस तरह मटमैला सा दिखता है वेस्ट वाटर।
वेस्ट वाटर रीयूज पॉलिसी के सफल क्रियान्वयन के लिए नीतिगत सुधारों, आवश्यक बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के विकास और उपचारित पानी के पुन: उपयोग के लिए जवाबदेही तंत्रों की स्थापना की आवश्यकता होगी। इसके माध्यम से ही कार्यान्वयन चरणबद्ध तरीके से किया जा सकेगा। वाटर टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक योजना के क्रियान्वयन का स्वरूप कुछ इस प्रकार रहेगा -
पहला चरण, 2025 से 2030 तक : शुरुआती चरण में उन क्षेत्रों पर केंद्रित होगा जहां सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और संग्रहण बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद है, जिसका लक्ष्य अपशिष्ट जल के 50 प्रतिशत पुन: उपयोग की दर हासिल करना है। पहले चरण में, उपचारित जल का उपयोग शहरी स्थानीय निकायों, निर्माण कार्यों, बागवानी और सिंचाई के लिए किया जाएगा।
दूसरा चरण, 2030 से 2035 तक : दूसरे चरण में कम सुविधा वाले क्षेत्रों में क्षमता का विस्तार करेगा ताकि उपचारित जल का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। दूसरे चरण में, इसका दायरा उद्योगों, कृषि और रेलवे तक बढ़ाया जाएगा
तीसरा चरण 2035 से 2045 तक :अंतिम चरण में उन क्षेत्रों में अपशिष्ट जल बुनियादी ढांचे का विकास किया जाएगा, जहां वर्तमान में उपचार सुविधाओं का अभाव है। इस प्रकार धीरे-धीरे पुन: उपयोग के स्तर को 100 प्रतिशत तक बढ़ाएगा। तीसरे यानी अंतिम चरण में, गैर-पेय उपयोग के लिए घरों में गैर-पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए दोहरी पाइपलाइन प्रणाली लागू की जाएगी।
इस तरह, यह नीति उत्तर प्रदेश में गैर-पेय प्रयोजनों के लिए अपशिष्ट जल के बड़े पैमाने पर पुन: उपयोग हेतु नई प्रौद्योगिकियों, बाजारों, मॉडलों और तंत्रों के द्वार खोलेगी। इस तरह इस नीति के लागू होने पर मीठे पानी के स्रोतों पर निर्भरता भी कम होगी।
वेस्ट वाटर रीयूज के क्षेत्र में व्यापक आर्थिक संभावनाओं को देखते हुए देश के कई राज्य जल पुनर्चक्रण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। गुजरात का लक्ष्य 2030 तक 100% पुनर्चक्रण है, महाराष्ट्र में औद्योगिक उपयोग अनिवार्य है, तमिलनाडु उद्योग और हरित परियोजनाओं के लिए इसे बढ़ावा दे रहा है, हरियाणा में भी इस उद्योग को प्राथमिकता दी जा रही है। इसे देखते हुए उत्तर प्रदेश ने भी अपनी नई नीति के ज़रिये इस दिशा में कदम बढ़ाया है। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर इसके कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं।
वर्तमान में, भारत के केवल लगभग 28% सीवेज का उपचार किया जाता है, जिसमें से केवल 3% का ही पुनर्चक्रण होता है। यह नीतिगत लक्ष्यों और वास्तविक व्यवहार के बीच एक बड़ा अंतर दर्शाता है। विशेषज्ञ नीतिगत विखंडन (केवल 11 राज्यों में पुनर्चक्रण के लिए समर्पित नीतियां हैं), अस्पष्ट मानक, विभिन्न एजेंसियों के बीच खराब समन्वय और स्थानीय सरकारों के लिए वित्तपोषण संबंधी समस्याओं जैसे मुद्दों का हवाला देते हैं। उत्तर प्रदेश की नीति की सफलता इन सामान्य बाधाओं को दूर करने पर निर्भर करेगी।
उत्तर प्रदेश की नीति दूरदर्शी होने के बावजूद, इसके क्रियान्वयन में कई तरह की चुनौतियां हैं। सबसे प्रमुख चुनौती राज्य की उलझी हुई जल प्रबंधन प्रणाली है, जिसमें कई एजेंसियां ज़िम्मेदारी साझा करती हैं। इसके चलते अकसर योजनाओं के कार्यान्वयन और समन्वय में समस्याएं आती हैं। इसके अलावा स्थानीय सरकारों को विशेषकर छोटे शहरों में, ऐसी परियोजनाओं के वित्तपोषण (फाइनेंस) और उपचारित जल के लिए बाज़ार की कमी से जूझना पड़ता है। इसके चलते कई बार इन इलाकों में ऐसी इनोवेटिव परियोजनाएं अव्यवहारिक हो जाती हैं।
इसके अलावा ऐसी परियोजनाओं के लिए आवश्य बुनियादी ढांचे के लिए भारी पूंजी निवेश की भी आवश्यकता होती है। राष्ट्रीय स्तर पर 2047 तक यह खर्च 18-27 अरब अमेरिकी डॉलर तक रहने का अनुमान है, यह एक और बड़ी बाधा है। इसके अलावा वेस्ट वाटर के इस्तेमाल को लेकर लोगों में स्वीकृति की भावना (Acceptance) का अभाव और पुन: उपयोग किए गए जल के लिए मानक गुणवत्ता नियमों का अभाव भी इसके अपनाने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। राज्य की चरणबद्ध योजना को इन परिचालन और वित्तीय कठिनाइयों को दूर करने के लिए मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता और परियोजना प्रबंधन की आवश्यकता होगी, जिनसे अन्य राज्य भी जूझ चुके हैं। यदि उत्तर प्रदेश की नीति चुनौतियों से पार पा लेती है, तो यह देश भर में जल प्रबंधन में निवेश और नवाचार के लिए एक प्रमुख मॉडल बन सकती है। उन्नत और कुशल जल समाधानों की मांग बढ़ने की उम्मीद है, जिससे प्रौद्योगिकी और इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए अवसर पैदा होंगे।
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