फ़ोटो - विकिकॉमंस
पेयजल एवं सिंचाई परियोजनाएं ऐसी सरकारी योजनाएं और अवसंरचनाएं हैं जिनका उद्देश्य लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना तथा कृषि के लिए सिंचाई सुविधाओं का विकास करना होता है।
केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर की योजनाएं बनाती है, वित्तीय सहायता प्रदान करती है और तकनीकी दिशा-निर्देश जारी करती है।
राज्य सरकारें परियोजनाओं की योजना, निर्माण, संचालन और रखरखाव का कार्य करती है तथा स्थानीय जरूरतों के अनुसार जलापूर्ति और सिंचाई प्रणालियों को लागू करती हैं।
भारत में जब भी पानी की चर्चा होती है, तो अक्सर दो शब्द साथ-साथ सुनाई देते है, सिंचाई परियोजना और पेयजल परियोजना। यह दोनों अलग होने के साथ ही पानी से जुडी परियोजनाएं है। एक किसान के खेत तक पानी पहुंचाती है, तो दूसरी घरों तक पीने का पानी पहुंचाती है। लेकिन इन परियोजनाओं का अर्थ केवल नहर, पाइपलाइन या बांध तक सीमित नहीं है। इन पर जल प्रबंधन, ग्रामीण विकास, खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ ही करोड़ों लोगों का जीवन निर्भर होता है।
हाल ही में कर्नाटक सरकार ने केंद्र से लंबित सिंचाई और पेयजल परियोजनाओं को शीघ्र मंजूरी देने का अनुरोध किया है। यह घटना केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि देशभर में जल परियोजनाओं के महत्व और चुनौतियों की ओर संकेत करती है। इसी संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि आखिर सिंचाई और पेयजल परियोजनाएं क्या होती है, इनकी आवश्यकता क्यों पड़ती है और इनका क्या प्रभाव पड़ता है?
सिंचाई परियोजना ऐसी योजना होती है जिसके माध्यम से नदियों, बांधों, जलाशयों, तालाबों, भूजल स्रोतों या अन्य जल संसाधनों से कृषि भूमि तक पानी पहुंचाया जाता है ताकि फसलों को आवश्यकता अनुसार सिंचाई मिल सके।
भारत सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) का उद्देश्य खेतों तक पानी की पहुंच बढ़ाना, सिंचाई क्षमता का विस्तार करना तथा जल उपयोग दक्षता में सुधार करना है। योजना का प्रमुख लक्ष्य हर खेत को पानी और फसल को बढ़ाना है। इससे खेती की वर्षा पर निर्भरता से बाहर निकालने का प्रयास किया जाता है।
देश के अनेक क्षेत्रों में आज भी खेती मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में जब बारिश कम होती है तो फसल उत्पादन प्रभावित होता है। सिंचाई परियोजनाएं इस जोखिम को कम करती है।
एक सामान्य सिंचाई परियोजना केवल पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें जल संग्रहण, परिवहन, वितरण और प्रबंधन से संबंधित अनेक संरचनाएं एवं अवसंरचनाएं शामिल होती है। इन संरचनाओं का उद्देश्य जल संसाधनों का अधिकतम और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना, कृषि उत्पादन बढ़ाना तथा जल की उपलब्धता को वर्ष भर बनाए रखना होता है। जो निम्न प्रकार है -
बांध एक ऐसी संरचना है जो नदी या नाले के बहते पानी को रोकती या नियंत्रित करती है। नदियों का पानी सामान्यतः गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर बहता है। जब इस बहते पानी के रास्ते में बांध बनाया जाता है, तो पानी की गति धीमी हो जाती है और वह बांध के पीछे इकट्ठा होकर एक जलाशय या झील का रूप ले लेता है।
प्रकृति में भी कई जगह पानी रुककर झीलें बनाता है। इंसानों ने इन्हीं प्राकृतिक उदाहरणों से प्रेरणा लेकर पानी को संग्रहित और नियंत्रित करने के लिए बांधों का निर्माण किया।
नहर एक मानव निर्मित जलमार्ग है, जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पानी पहुंचाने के लिए बनाया जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, जल परिवहन और जलविद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है।
नहरें नदियों, बांधों या जलाशयों से पानी लेकर खेतों, शहरों और अन्य क्षेत्रों तक पहुंचाती हैं। कुछ नहरों का उपयोग नावों और जहाजों के आवागमन के लिए भी किया जाता है। नहर पानी के बेहतर प्रबंधन और उपयोग के लिए बनाई गई कृत्रिम जलधारा है।
लिफ्ट सिंचाई एक ऐसी सिंचाई प्रणाली है, जिसमें पंपों की मदद से नदी, नहर, तालाब या जलाशय से पानी उठाकर ऊंचे क्षेत्रों के खेतों तक पहुंचाया जाता है। यह प्रणाली उन स्थानों पर उपयोगी होती है जहां पानी का स्रोत खेतों से नीचे स्थित होता है और पानी प्राकृतिक रूप से वहां तक नहीं पहुंच सकता।
पंपों की सहायता से पानी को ऊपर उठाकर खेतों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को लिफ्ट सिंचाई कहते है।
पंपिंग स्टेशन वह स्थान होता है जहां पंपों की सहायता से पानी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जाता है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब पानी को ऊंचे क्षेत्रों तक पहुंचाना हो या प्राकृतिक ढाल (गुरुत्वाकर्षण) के कारण पानी का प्रवाह पर्याप्त न हो।
पंपिंग स्टेशन नदियों, झीलों, बांधों या जलाशयों से पानी लेकर पाइपलाइन के माध्यम से खेतों, शहरों और गांवों तक पहुंचाने में मदद करते है। पानी को दबाव के साथ उठाकर और दूर तक पहुंचाने वाली व्यवस्था को पंपिंग स्टेशन कहा जाता है।
जल वितरण नेटवर्क पाइपों, वाल्वों, पंपों और जल भंडारण संरचनाओं का एक ऐसा तंत्र है, जो स्वच्छ पानी को जल स्रोतों या जल शोधन संयंत्रों से लोगों तक पहुंचाता है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि घरों, खेतों, उद्योगों और अन्य उपयोगकर्ताओं को नियमित रूप से पानी उपलब्ध हो सके।
आजकल जल वितरण नेटवर्क के बेहतर संचालन के लिए आंकड़ों और आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इससे पानी की आपूर्ति की निगरानी, रिसाव की पहचान और जल प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। जल वितरण नेटवर्क वह प्रणाली है जो पानी को स्रोत से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का काम करती है।
ड्रिप सिंचाई में पानी बूंद-बूंद करके सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इससे पानी की बचत होती है और पौधों को आवश्यक मात्रा में ही पानी मिलता है। स्प्रिंकलर सिंचाई में पानी का छिड़काव फव्वारे की तरह किया जाता है, जिससे बड़े क्षेत्र और कई पौधों को एक साथ पानी दिया जा सकता है।
ड्रिप सिंचाई जड़ों तक बूंद-बूंद पानी पहुंचाती है, जबकि स्प्रिंकलर सिंचाई फव्वारे की तरह पूरे खेत में पानी का छिड़काव करती है।भारत में कई बहुउद्देशीय परियोजनाएं सिंचाई के साथ-साथ पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन का कार्य भी करती है।
पेयजल परियोजना अर्थात Drinking Water Project एक ऐसी योजना होती है जिसका उद्देश्य लोगों तक सुरक्षित, पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण पीने का पानी पहुंचाना है।
भारत सरकार के जल जीवन मिशन के अनुसार प्रत्येक ग्रामीण परिवार को पर्याप्त मात्रा और निर्धारित गुणवत्ता वाला पेयजल नियमित रूप से उपलब्ध कराना इस मिशन का प्रमुख लक्ष्य है। इसके लिए पाइप आधारित जलापूर्ति, घरेलू नल कनेक्शन, जल स्रोत संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है।
यदि किसी गांव में नदी, जलाशय या भूजल स्रोत उपलब्ध है, तो वहां से पानी लेकर उसका शोधन किया जाता है और पाइपलाइन के माध्यम से घरों तक पहुंचाया जाता है।
किसी भी पेयजल परियोजना का उद्देश्य लोगों तक सुरक्षित, स्वच्छ और पर्याप्त मात्रा में पेयजल पहुंचाना होता है। इसके लिए जल स्रोत, जल संग्रहण संरचना, जल शोधन संयंत्र, भंडारण टैंक, वितरण नेटवर्क और गुणवत्ता निगरानी प्रणाली जैसी विभिन्न व्यवस्थाएं मिलकर कार्य करती है। ये सभी घटक जल के संग्रहण, शोधन, भंडारण और वितरण की प्रक्रिया को सुचारु बनाते है। किसी भी पेयजल परियोजना की सफलता इन घटकों के प्रभावी संचालन पर निर्भर करती है।
पेयजल परियोजना की शुरुआत उपयुक्त जल स्रोत के चयन से होती है। यह स्रोत नदी, झील, बांध, जलाशय, कुआं, नलकूप या भूजल भंडार हो सकता है। जल स्रोत की उपलब्धता, गुणवत्ता और स्थिरता किसी भी पेयजल परियोजना की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
जल संग्रहण संरचना वह व्यवस्था होती है जिसके माध्यम से नदी, झील, बांध या अन्य जल स्रोतों से पानी एकत्र किया जाता है। यह पानी को सुरक्षित रूप से पेयजल परियोजना की अगली प्रक्रियाओं तक पहुंचाने का कार्य करती है। इसमें इनटेक वेल, पंपिंग स्टेशन और जल ग्रहण संरचनाएं शामिल हो सकती है। यह जल आपूर्ति प्रणाली का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक घटक है।
जल शोधन संयंत्र वह स्थान है जहां गंदे पानी को विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा साफ किया जाता है। यहां पानी में मौजूद गंदगी, जीवाणु, वायरस तथा अन्य हानिकारक तत्वों को हटाया जाता है। शोधन के बाद पानी को सुरक्षित और पेय योग्य बनाया जाता है। यह स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जल शोधन के बाद स्वच्छ पानी को ओवरहेड टैंक या भूमिगत जलाशयों में संग्रहित किया जाता है। ये टैंक जल की निरंतर और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मांग बढ़ने या आपूर्ति में अस्थायी बाधा आने पर भी इनसे पानी उपलब्ध कराया जा सकता है। यह पेयजल वितरण प्रणाली का एक आवश्यक घटक है।
घरेलू नल कनेक्शन पेयजल परियोजना का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। इसके माध्यम से शुद्ध पानी पाइपलाइन नेटवर्क द्वारा सीधे घरों तक पहुंचाया जाता है। इससे लोगों को सुरक्षित और सुविधाजनक पेयजल उपलब्ध होता है तथा पानी लाने में लगने वाले समय और श्रम की बचत होती है। यह हर घर तक स्वच्छ जल पहुंचाने के लक्ष्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जल गुणवत्ता निगरानी प्रणाली के माध्यम से पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच और परीक्षण किया जाता है। इसमें पानी में मौजूद जीवाणुओं, रासायनिक तत्वों तथा अन्य प्रदूषकों का आकलन किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोगों को सुरक्षित, स्वच्छ और मानकों के अनुरूप पेयजल उपलब्ध हो। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सिंचाई और पेयजल परियोजनाओं की आवश्यकता पड़ने के निम्न कारण है -
कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए - भारत की खाद्य सुरक्षा काफी हद तक सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर करती है। सिंचित क्षेत्रों में फसल उत्पादकता आमतौर पर वर्षा आधारित क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए - बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और सूखे की घटनाओं ने जल प्रबंधन को और महत्वपूर्ण बना दिया है। सिंचाई परियोजनाएं किसानों को जलवायु जोखिम से बचाने में मदद करती हैं।
सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए - विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता जलजनित रोगों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ग्रामीण भारत में पेयजल परियोजनाएं सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार का बड़ा माध्यम है।
महिलाओं और बच्चों का श्रम कम करने के लिए - देश के कई हिस्सों में महिलाओं को आज भी पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। घर तक पानी पहुंचने से समय और श्रम दोनों की बचत होती है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए - जब खेतों को पानी मिलता है और गांवों में पेयजल की उपलब्धता बढ़ती है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्रों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सिंचाई और पेयजल परियोजनाओ के प्रभाव को निम्न प्रकार समझा जा सकता है -
खाद्य सुरक्षा में वृद्धि - सिंचाई सुविधाओं से फसल उत्पादन बढ़ता है और किसानों की आय में सुधार होता है।
स्वास्थ्य में सुधार - स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होने से डायरिया, हैजा और अन्य जलजनित रोगों में कमी आती है।
रोजगार के अवसर - बड़ी परियोजनाओं के निर्माण और संचालन से स्थानीय स्तर पर रोजगार उत्पन्न होता है।
ग्रामीण विकास - सड़क, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी अक्सर इन परियोजनाओं के साथ जुड़ा होता है।
भूजल संरक्षण - यदि योजनाएं जल संरक्षण उपायों के साथ लागू की जाएं तो भूजल पुनर्भरण को भी बढ़ावा मिलता है।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं , जितने बड़े लाभ हैं, उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी है।
विस्थापन और पुनर्वास - बड़े बांध और जलाशय बनने पर कई गांवों को स्थानांतरित करना पड़ता है। ऐसे मामलों में पुनर्वास और आजीविका बहाली महत्वपूर्ण मुद्दे बन जाते है।
पर्यावरणीय प्रभाव - नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव, जैव विविधता पर प्रभाव और वन क्षेत्रों का नुकसान अक्सर चर्चा का विषय रहते है।
लागत में वृद्धि - कई परियोजनाएं वर्षों तक अधूरी रहती हैं, जिससे उनकी लागत कई गुना बढ़ जाती है।
रखरखाव की समस्या - कई बार परियोजनाएं बन तो जाती हैं लेकिन उनके संचालन और रखरखाव के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाते।
केवल बड़े बांध या पाइपलाइन बनाना पर्याप्त नहीं होगा। भविष्य की जल परियोजनाओं में जल स्रोत संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जल उपयोग दक्षता, सामुदायिक भागीदारी, स्थानीय जल संरचनाओं का पुनर्जीवन, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल योजनाओ पर ध्यान देना होंगा।
जल जीवन मिशन - 2019 में शुरू की गई यह योजना हर ग्रामीण परिवार तक नल के माध्यम से सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के लिए बनाई गई है। हाल ही में JJM को दिसंबर 2028 तक विस्तार देने के साथ ही दूसरे चरण में केंद्र सरकार ने योजना के ढांचे, दृष्टिकोण और लक्ष्य में भी किए हैं कई महत्वपूर्ण बदलाव। बजट और केंद्र सरकार की हिस्सेदारी भी बढ़ाई गई।
अटल भूजल योजना - भूजल संरक्षण और टिकाऊ जल प्रबंधन पर केंद्रित योजना। अटल भूजल योजना (अटल जल) की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर 25 दिसंबर 2019 को की गई थी। यह योजना आधिकारिक तौर पर 1 अप्रैल 2020 से लागू हुई थी। इस योजना का उद्देश्य, फायदे और वर्तमान स्थिति जानने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम (NRDWP) - ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए शुरू किया गया कार्यक्रम, जिसे बाद में जल जीवन मिशन में समाहित कर दिया गया।
AMRUT मिशन - शहरी क्षेत्रों में जलापूर्ति और सीवरेज सुविधाओं के विकास के लिए। अमृत सरोवर योजना का मुख्य उद्देश्य जल की बर्बादी को रोककर उसका बेहतर तरीके से उपयोग करना है। इस योजना के तहत देश में जल संग्रहण को बढ़ावा देना और भू-जल स्तर को बढ़ाने, किसानों की सिंचाई से सम्बंधित समस्याओं को हल करने, किसान की फसल की पैदावार में बढ़ोतरी करने, मछली पालन को प्रोत्साहित करने के कार्य शामिल हैं, ताकि किसानों की आय बढ़ सके।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना - हर खेत को पानी और पर ड्रॉप मोर क्रॉप के लक्ष्य के साथ संचालित राष्ट्रीय कार्यक्रम।
सरदार सरोवर परियोजना - नर्मदा नदी पर बनी भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजनाओं में से एक। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश को लाभ।
इंदिरा गांधी नहर परियोजना - राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराने वाली महत्वपूर्ण परियोजना।
पोलावरम परियोजना - आंध्र प्रदेश की बहुउद्देशीय सिंचाई और पेयजल परियोजना।
तेहरी बांध परियोजना - सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण परियोजना।
भाखड़ा-नांगल परियोजना - उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजनाओं में से एक।
हिराकुंड बांध परियोजना - महानदी पर निर्मित बहुउद्देशीय परियोजना।
नागरजुन सागर परियोजना - कृष्णा नदी पर स्थित भारत की प्रमुख सिंचाई परियोजना।
तुंगभद्रा परियोजना - कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कृषि क्षेत्रों को सिंचाई सुविधा प्रदान करती है।
काकतीय नहर प्रणाली - तेलंगाना के सिंचित क्षेत्र को बढ़ाने वाली प्रमुख नहर प्रणाली।
पेयजल और सिंचाई परियोजनाएं भारत में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की साझेदारी से लागू की जाती हैं। हालांकि संविधान के अनुसार पेयजल और सिंचाई मुख्यतः राज्य का विषय (State Subject) हैं, इसलिए परियोजनाओं की योजना, डिजाइन और क्रियान्वयन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों की होती है, जबकि केंद्र वित्तीय, तकनीकी और नीतिगत सहायता प्रदान करता है।
परियोजना की आवश्यकता की पहचान - सबसे पहले किसी क्षेत्र में जल की समस्या का अध्ययन किया जाता है। देखा जाता है की पेयजल की कमी, सिंचाई सुविधाओं का अभाव, भूजल स्तर में गिरावट, सूखा प्रभावित क्षेत्र और बढ़ती जनसंख्या की जल मांग कितनी है ? इस आधार पर विभाग प्रारंभिक प्रस्ताव (Concept Note/PFR) तैयार करता है।
सर्वेक्षण और व्यवहार्यता अध्ययन - परियोजना शुरू करने से पहले विस्तृत सर्वे किए जाते हैं। जिसमें जल स्रोत की उपलब्धता, जल गुणवत्ता परीक्षण, भूवैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन, लागत और लाभ विश्लेषण और भूमि की आवश्यकता देखि जाती है।
DPR (Detailed Project Report) तैयार करना - इसके बाद विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनाई जाती है। DPR में परियोजना का उद्देश्य, जल स्रोत, पाइपलाइन नेटवर्क, जलाशय और पंपिंग स्टेशन, सिंचाई कमांड क्षेत्र, अनुमानित लागत, निर्माण अवधि और सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव को शामिल किया जाता है ।
राज्य स्तर पर स्वीकृति - DPR तैयार होने के बाद परियोजना राज्य सरकार के संबंधित विभागों को भेजी जाती है। इसमें पेयजल परियोजनाओं के लिए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHED), जल निगम और ग्रामीण जल आपूर्ति विभाग स्वीकृति देता है । वही सिंचाई परियोजनाओं के लिए जल संसाधन विभाग और सिंचाई विभाग को राज्य सरकार तकनीकी और वित्तीय स्वीकृति देती है।
केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजना- यदि परियोजना बड़ी है या केंद्र से वित्तीय सहायता चाहिए, तो प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाता है। पेयजल परियोजनाओं में अधिकांश ग्रामीण पेयजल योजनाएँ Jal Jeevan Mission के अंतर्गत आती हैं। राज्य अपनी वार्षिक कार्ययोजना (AAP) केंद्र को भेजते हैं और केंद्र उसकी स्वीकृति देता है। सिंचाई परियोजनाओं में बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ Central Water Commission (CWC) को भेजी जाती हैं, जहाँ उनकी तकनीकी और आर्थिक जांच की जाती है।
तकनीकी एवं आर्थिक मूल्यांकन - केंद्रीय जल आयोग (CWC) निम्न बिंदुओं की जांच करता है, जो देखत है की जल उपलब्धता, डिजाइन, लागत, लाभ-लागत अनुपात, पर्यावरणीय प्रभाव, अंतरराज्यीय जल विवाद और कृषि लाभ शामिल होता है । इसके बाद परियोजना को सलाहकार समिति (Advisory Committee) के समक्ष रखा जाता है।
निवेश स्वीकृति - तकनीकी रूप से उपयुक्त पाए जाने पर परियोजना को निवेश स्वीकृति दी जाती है। यह स्वीकृति जल शक्ति मंत्रालय तथा संबंधित केंद्रीय निकायों द्वारा दी जाती है।
वित्तीय व्यवस्था - परियोजना की लागत कई स्रोतों से आती है। जिसमें केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन (JJM), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और अन्य केंद्रीय योजनायें शामिल है । वहीं राज्य सरकार के राज्य बजट और विशेष जल योजनाएँ भी है । इसके अलावा अन्य स्त्रोतों में विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक (ADB), NABARD और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थान भी शामिल होते है ।
टेंडर और निर्माण - इस प्रक्रिया में स्वीकृति के बाद ई-टेंडर जारी होते हैं, ठेकेदार चयनित होते हैं, पाइपलाइन, जलाशय, पंपिंग स्टेशन और उपचार संयंत्र बनाए जाते हैं, सिंचाई नहरों, बांधों और लिफ्ट सिंचाई प्रणालियों का निर्माण होता है।
निगरानी एवं गुणवत्ता नियंत्रण - निर्माण के दौरान राज्य विभाग निरीक्षण करते हैं, केंद्र सरकार प्रगति की समीक्षा करती है, गुणवत्ता परीक्षण किए जाते हैं और ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है। JJM के अंतर्गत ग्राम पंचायतों और Village Water & Sanitation Committees (VWSCs) को भी शामिल किया जाता है।
संचालन एवं रखरखाव - परियोजना पूरी होने के बाद स्थानीय निकाय, ग्राम पंचायत, जल उपयोगकर्ता समितियाँ और सिंचाई विभाग इसके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालते हैं।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें