उत्तराखंड सरकार ने भागीरथी नदी पर बनने वाली 600 मेगावाट की लोहारिनाग-पाला जलविद्युत परियोजना को पूरी तरह रद्द करने का ऐलान किया है। 2006 में शुरू की गई इस परियोजना का काम 2010 में पर्यावरणीय विरोधों के बाद रोक दिया गया था। तब तक इसका करीब 60% काम पूरा गया था, जिसमें करीब 650 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। अब उत्तराखंड सरकार ने इस हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को पूरी तरह से बंद करने का ऐलान किया है।
राज्य सरकार के इस फैसले के बाद अब 2,000 करोड़ रुपये की ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजना के तहत पहाड़ के भीतर बनाई गई करीब 14 किलोमीटर लंबी सुरंग को बंद किया जाएगा। इस सुरंग को भरने में करीब 52 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। पुलिस की सुरक्षा में सुरंगों से पानी और मलबा निकालकर उन्हें मिट्टी और मलबे से स्थायी रूप से बंद किया जा रहा है।
परियोजना के तहत बनाई गई सुरंग को भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के वैज्ञानिकों की देखरेख में सुरक्षित ढंग से बंद करने का काम किया जा रहा है। इसके तहत सबसे पहले मशीनों के जरिए सुरंगों के अंदर जमा पानी और गाद (मलबा) को बाहर निकाला जा रहा है। इसके साथ ही सुरंग के साफ किए जा चुके हिस्सों को बंद करने की कवायद भी शुरू हो गई है। जल विद्युत निगम ने परियोजना की टनल को नदी से रेत के कट्टे भरकर बंद करने का कार्य शुरू कर दिया है। कुछ ही दिनों में मिट्टी और मलबे से इन 14 किमी लंबी सुरंगों को पूरी तरह पाट दिया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि भविष्य में कभी भी इन सुरंगों का इस्तेमाल नदी का रुख मोड़ने के लिए न हो सके।
इस फैसले की वजह पर्यावरण संरक्षण और गंगा की ‘अविरलता’ बचाना और जन-विरोध को बताया जा रहा है। परियोजना शुरू होते ही स्थानीय लोग, पर्यावरणविद् और धार्मिक समूह इसका विरोध करने लगे। उनका कहना था कि हिमालय जैसी कमजोर भूसंरचना वाले क्षेत्र में इतनी बड़ी सुरंगें खोदने से न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि भागीरथी और गंगा नदी का प्राकृतिक अविरल (uninterrupted) प्रवाह बाधित होगा।
इससे नदी का प्रवाह ‘सुरंगों में कैद’ होकर उसका प्राकृतिक मार्ग बदल सकता है और नदी के निचले हिस्सों में पानी की कमी तथा पारिस्थितिकीय नुकसान हो सकते हैं। इसके साथ ही पर्यावरणविद् प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) के 111 दिन के उपवास का भी हवाला दिया जा रहा है। उन्होंने परियोजना को स्थायी रूप से बंद करने की मांग की थी। उनके आन्दोलन और व्यापक जन तथा पर्यावरण समूहों के दबाव के बाद ही 2010 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने इसे लेकर एक उच्च-स्तरीय मंत्रियों के समूह (GoM) का गठन किया था। इस समूह की सिफ़ारिश पर ही उस समय परियोजना के काम को रोकने का निर्णय लिया गया था। तकरीबन 15 साल से बंद पड़ी इस परियोजना को अब इस पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। देश में संभवत: ऐसा पहली बार हो रहा है जब किसी प्रोजेक्ट पर इतनी बड़ी रकम खर्च किए जाने के बाद उसे न केवल बंद किया जा रहा है, बल्कि बने-बनाए ढांचे को खत्म करने के लिए भी एक बड़ी रकम खर्च की जा रही है।
सरकार के इस फैसले को लेकर भी उत्तरकाशी में स्थानीय लोगों में अलग-अलग तरह की राय देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे देर से लिया गया सही फैसला और पर्यावरण हितैषी और एक साहसिक कदम मान रहे हैं। दूसरी ओर, एक वर्ग ऐसा भी है, जो इसे विकास कार्य पर ब्रेक के रूप में देख रहा है। यह लोग परियोजना को बंद किए जाने के निर्णय को आर्थिक अवसरों और बिजली उत्पादन क्षमता को खो देने वाला फैसला बता रहे हैं, क्योंकि इससे प्रदेश में ऊर्जा, रोजगार और आर्थिक विकास की संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं। इनका कहना है कि लोहारीनाग पाला जल विद्युत परियोजना को कभी क्षेत्र के विकास का सपना माना गया था, आज वही परियोजना हमेशा के लिए इतिहास बनने जा रही है। लोगों का कहना है कि अगर यह जल विद्युत परियोजना पर्यावरण की दृष्टि से ठीक नहीं थी, तो टनल बननी ही नहीं चाहिए थी। लेकिन, जब इस पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करके 60% कार्य हो चुका था तो इसको बंद नहीं किया जाना चाहिए।
लोगों का कहना है कि परियोजना का विरोध करने वाले पर्यावरणविद उस समय कहां थे, जब इस प्रोजेक्ट का सर्वे का कार्य चल रहा था? एक बार सुरंग खोदने के बाद क्या पहाड़ पहले जैसी स्थिति में आ जाएगा, भले ही सुरंग को मलबे से भर दिया जाए? क्या कई वर्षों तक हुए काम का पर्यावरणीय और पारिस्थितिक असर पूरी तरह से खत्म हो जाएगा?
उत्तरकाशी जिले के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य का कहना है कि जल विद्युत निगम और फॉरेस्ट विभाग को परियोजना सुरंग बंद करने का जिम्मा सौंपा गया है, जिसमें जल विद्युत निगम ने कार्य शुरू कर दिया है और फॉरेस्ट विभाग वनीकरण के कार्य को लेकर डीपीआर तैयार कर रहा है और डीपीआर भारत सरकार को स्वीकृति के लिए भेजी जाएगी उसके बाद फॉरेस्ट विभाग परियोजना के स्थान पर पेड़-पौधे लगाकर सघन वनीकरण का का शुरू करेगा। इस तरह परियोजना स्थल को उसके पुराने स्वरूप में लौटाने का प्रयास किया जाएगा।
भूवैज्ञानिकों के मुताबिक धरती के इतिहास की दृष्टि से देखा जाए, तो हिमालय की पहाड़ियां युवा हैं। इसकी टेक्टॉनिक प्लेटें अब भी सरक रही हैं। इसके चलते हिमालय में ज़्यादातर पहाडि़यां अभी अनगठित, दरारों युक्त और अस्थिर संरचनाओं वाली हैं। इसलिए यहां किसी भी बड़े इंजीनियरिंग कार्य से पहले पर्याप्त भूगर्भीय अध्ययन करना और परियोजना के कामकाज में काफी सावधानी बरतना जरूरी है। हिमालय की संवेदनशील घाटी में बहती नदियां (Unsplash) और हिमालय की भूमि और वनों की प्रकृति काफ़ी संवेदनशील और नाज़ुक है। पहाड़ों पर व्यापक कटाव और ढलान में होने वाले बदलावों से बड़े पैमाने पर भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं।
पिछले वर्षों में विकास की होड़ में उपयुक्त जियोलॉजिकल सर्वे और पर्यावरणीय अध्ययन के बिना ही सड़कें और सुरंगें बनाई गई हैं, जिससे पहाड़ों की स्थिरता खतरे में पड़ी है। लोहारिनाग-पाला जलविद्युत परियोजना भी ऐसे ही लापरवाही भरे रवैये का एक उदाहरण है। इसी तरह उत्तराखंड में चारधाम सड़क योजना के तहत प्रस्तावित 10 मीटर चौड़ी सड़कें बनाने से 50,000 से अधिक पेड़ काटे जाने और पहाड़ों को तोड़ने व ढ़लानों को पाटने से पहाड़ों का ढांचा और प्राकृतिक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिसका परिणाम भूस्खलन की घटनाओं में अभूतपूर्व बढ़ोतरी के रूप में देखने को मिल रहा है।
लोहारीनाग-पाला परियोजना को बंद किए जाने का मामला जहां सरकारी योजनाओं में पर्यावरणीय पहलुओं की अनदेखी और परियोजना के प्रभावों का पर्याप्त अध्ययन के बिना काम शुरू किए जाने के लापरवाही भरे रवैये को उजागर करता है। साथ ही इससे यह बात भी समझी जा सकती है कि भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों के निर्णय केवल आर्थिक लाभ और ऊर्जा उत्पादन जैसी चीजों के आधार पर एक पक्षीय ढंग से नहीं लिए जाने चाहिए, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, नदी-नालों की अविरलता, स्थानीय समुदाय की चिंताओं और पारिस्थितिकीय जोखिमों पर भी ध्यान दिया जाना ज़रूरी है, वरना सारे किए-कराए पर एक झटके में पानी फिर सकता है। और जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी हो सकती है। इस परियोजना का रद्द होना और इसके अवशेषों को मिटाने के फैसले को वित्तीय और पर्यावरणीय, दोनों ही दृष्टिकोणों से देखते हुए सबक लेना चाहिए। ताकि, भविष्य में पर्यावरणीय और आर्थिक क्षति के ऐसे मामले दोहराए न जाएं।