चिनाब को व्‍यास नदी को जोड़ने के लिए हिमाचल प्रदेश में एक नई सुरंग परियोजना शुरू की जा रही है।

 

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नीतियां और कानून

चिनाब और व्‍यास नदी को जोड़ने के लिए बन रही 2,300 करोड़ की सुरंग

भारत सरकार ने करीब 8.7 KM लंबी सुरंग के मेगा प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य का NHPC को दिया जिम्‍मा। हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में दुर्गम पहाड़ों को काटकर बनाई जाएगी सुरंग

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

भारत जैसे विशाल देश में आए दिन कई स्‍थानों पर नदियों में बाढ़, तो कहीं सूखे की समस्‍या का सामना करना पड़ता है। अकसर इस समस्‍या का समाधान नदियों को आपस में जोड़ने से होने की बात कही जाती है। इससे एक नदी में ज्‍यादा पानी होने पर उसे दूसरी नदी में भेजकर बाढ़ को नियंत्रित किए जा सकने की बात कही जाती है। इसी तरह सूखाग्रस्‍त इलाकों में भी पानी भेजने की व्‍यवस्‍था भी इसके माध्‍यम से हो सकती है। इसे देखते हुए सरकार ने हाल के वर्षों में देश की कई नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजनाओं पर काम शुरू किया है। इसी कड़ी में एक नई परियोजना चिनाब और व्‍यास नदी को जोड़ने के लिए शुरू की जा रही है। उत्‍तर भारत की इन दोनों महत्‍वपूर्ण नदियों को करीब 8.7 KM लंबी सुरंग के जरिये जोड़ने की तैयारी है, जिसकी लागत 2,352 करोड़ करोड़ रुपये बैठने का अनुमान है। नदियों को जोड़ने के इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत सुरंग के निर्माण का कार्य नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (National Hydroelectric Power Corporation) यानी NHPC करेगा। सरकार और NHPC ने 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग के निर्माण की घोषणा कर दी है, 19 मीटर ऊंचे बैराज की भी जानकारी दी गई है। सुरंग का व्यास (Diameter) या चौड़ाई (Width) कितनी होगी, इसकी पानी वहन क्षमता (discharge capacity) और प्रतिदिन कितनी मात्रा में पानी स्थानांतरित किया जाएगा, जैसे तकनीकी विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

बिजली उत्‍पादन बढ़ाने में भी मिलेगी मदद

भारत सरकार इसलिए भी इस सुरंग की योजना को तेज़ी से आगे बढ़ाना चाहती है, क्‍योंकि इससे बिजली (जल विद्युत) उत्‍पादन को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इसे देखते हुए केंद्र सरकार की योजना इस  8.7 KM लंबी सुरंग के निर्माण के काम को 1 अगस्त 2026 से शुरू करने की है। सुरंग के निर्माण का काम 31 जुलाई 2029 तक पूरा करने का लक्ष्‍य है। चिनाब नदी के बचे हुए पानी को एक सुरंग के ज़रिये ब्यास नदी के क्षेत्र तक पहुंचाने वाली यह सुरंग हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में चिनाब नदी पर बनाई जाएगी। आगे चलकर इसके पानी से बिजली भी बनाई जाएगी।

हिमालय के दुर्गम इलाके में चुनौती भरा प्रोजेक्‍ट

हिमाचल प्रदेश के ऊंचे और दुर्गम पहाड़ों वाले इलाकों में इस सुरंग का निर्माण किया जाएगा। इसलिए इंजीनियरिंग और निर्माण (कंस्‍ट्रक्‍शन) की दृष्टि से इसे चुनौती भरा प्रोजेक्‍ट माना जा रहा है। काफी इस ऊंचे हिमालयी इलाके की समुद्र तल से ऊंचाई 3,095 मीटर से 6,517 मीटर तक है। लाहौल-स्पीति का इलाका ऊंचे पहाड़ों, बर्फबारी, भूस्खलन और अत्यधिक ठंड के लिए जाना जाता है। यहां निर्माण कार्य का मौसम भी सीमित होता है और कई महीनों तक भारी हिमपात के कारण काम प्रभावित हो सकता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालय अभी भी भूगर्भीय दृष्टि से युवा पर्वतमाला है। यहां की चट्टानें अपेक्षाकृत अस्थिर हैं, इसलिए सुरंग निर्माण के दौरान इंजीनियरिंग और सुरक्षा मानकों पर विशेष ध्यान देना होगा। यही वजह है कि इस परियोजना को देश की कठिनतम जल अवसंरचना परियोजनाओं में गिना जा रहा है।

हिमाचल को मिलेंगे क्या-क्या फायदे?

इस परियोजना से सबसे बड़ा लाभ हिमाचल प्रदेश को अपने जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के रूप में मिल सकता है। राज्य में जलविद्युत उत्पादन की कुल अनुमानित क्षमता लगभग 27,000 मेगावाट मानी जाती है, लेकिन अभी तक इसका केवल करीब 11,000 मेगावाट ही दोहन हो पाया है। चिनाब बेसिन स्वयं हिमाचल की कुल जलविद्युत क्षमता का बड़ा हिस्सा समेटे हुए है। ऐसे में नदी के अतिरिक्त जल का बेहतर प्रबंधन भविष्य में नई जलविद्युत परियोजनाओं के लिए अवसर पैदा कर सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, इस परियोजना से करीब 4,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन की संभावना जताई गई है।

निर्माण के दौरान लाहौल-स्पीति जैसे दुर्गम क्षेत्र में सड़क, पुल, बिजली आपूर्ति, श्रमिक आवास और अन्य सहायक बुनियादी ढांचे का भी विकास होगा। बड़े हाइड्रो और सुरंग परियोजनाओं में स्थानीय लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। इससे परिवहन, होटल, खाद्य आपूर्ति और छोटे कारोबारों को भी फायदा मिल सकता है। इसके अलावा, यह परियोजना हिमाचल के लिए रणनीतिक महत्व भी रखती है। लाहौल घाटी देश के सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। यहां बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के आने से क्षेत्र में कनेक्टिविटी और सरकारी निवेश बढ़ने की संभावना रहती है। पिछले कुछ वर्षों में अटल सुरंग और अन्य सड़क परियोजनाओं ने जिस तरह लाहौल-स्पीति की आर्थिक गतिविधियों को गति दी है, उसी तरह चिनाब-व्यास लिंक परियोजना भी क्षेत्र में दीर्घकालिक आर्थिक विकास का नया आधार बन सकती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि अतिरिक्त पानी को व्यास बेसिन में स्थानांतरित कर प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाता है, तो इससे हिमाचल को भविष्य में जल प्रबंधन और जलविद्युत रॉयल्टी से जुड़े आर्थिक लाभ भी मिल सकते हैं। वर्तमान में राज्य की आय का एक बड़ा हिस्सा जलविद्युत क्षेत्र से आता है और नई परियोजनाएं इस राजस्व को और बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।

चिनाब और व्‍यास नदी को जोड़ने के लिए  8.7 KM लंबी सुरंग का निर्माण नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) यानी करेगा।

क्या है भारत की 'इंटर-बेसिन वाटर ट्रांसफर' रणनीति?

चिनाब-व्यास लिंक परियोजना केवल एक सुरंग नहीं, बल्कि भारत की "इंटर-बेसिन वाटर ट्रांसफर" यानी एक नदी बेसिन से दूसरे बेसिन में पानी पहुंचाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। देश के कई हिस्सों में कहीं बाढ़ और कहीं सूखे की समस्या रहती है। ऐसे में अतिरिक्त पानी वाले क्षेत्रों से जरूरत वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने की अवधारणा पर लंबे समय से काम हो रहा है।

देश में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (National Water Development Agency) द्वारा कई नदी जोड़ो परियोजनाओं पर अध्ययन किया जा चुका है। केन-बेतवा लिंक परियोजना इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। चिनाब-व्यास लिंक इस दिशा में हिमालयी क्षेत्र की एक नई और रणनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है।

पाकिस्तान जाने वाले पानी पर पड़ेगा असर

चिनाब-व्यास लिंक सुरंग परियोजना को केवल एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक जल-रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में हुई सिंधु जल संधि के तहत छह नदियों का पानी दोनों देशों के बीच बांटा गया है। इनमें पूर्वी नदियां रावी, व्यास और सतलज भारत के लिए आरक्षित हैं, जबकि पश्चिमी नदियां सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश प्रवाह पाकिस्तान को मिलता है।

सिंधु नदी प्रणाली से हर वर्ष औसतन करीब 168 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी बहता है। इसमें से लगभग 135 MAF यानी करीब 80 प्रतिशत पानी पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चिनाब) के माध्यम से पाकिस्तान को प्राप्त होता है, जबकि पूर्वी नदियों का लगभग 33 MAF पानी भारत के हिस्से में आता है। अकेले चिनाब नदी का औसत वार्षिक प्रवाह लगभग 26 MAF माना जाता है, जबकि सिंधु नदी का प्रवाह करीब 93 MAF और झेलम का लगभग 23 MAF है।

व्यास नदी का मामला अलग है, क्योंकि यह भारत के हिस्से की पूर्वी नदी है। व्यास का पानी पंजाब में हरिके के पास सतलुज में मिल जाता है और फिर सतलुज के जरिए पाकिस्तान में प्रवेश करता है। हालांकि, सिंधु जल संधि के अनुसार व्यास के पानी का उपयोग करने का पूरा अधिकार भारत के पास है और भारत इसके अधिकांश जल का सिंचाई, पेयजल तथा बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब पश्चिमी नदियों पर अपने वैध अधिकारों का अधिकतम उपयोग करने की दिशा में काम कर रहा है। यदि चिनाब के अतिरिक्त जल का एक हिस्सा सुरंग के माध्यम से व्यास बेसिन में लाया जाता है, तो इससे भारत के जल उपयोग की क्षमता बढ़ेगी और पाकिस्तान जाने वाले पानी की मात्रा में कुछ कमी आ सकती है। हालांकि, इस कमी की वास्तविक मात्रा परियोजना के डिजाइन, पानी के वास्तविक डायवर्जन और संधि के प्रावधानों के अनुपालन पर निर्भर करेगी।

भारत से पाकिस्तान में मुख्य रूप से छह नदियों सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलज का पानी जाता है, लेकिन इनमें से पश्चिमी नदियों का अधिकांश प्रवाह पाकिस्तान की कृषि और जल सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है।

परियोजना में पर्यावरणीय चिंताएं भी कम नहीं

चिनाब-व्यास लिंक सुरंग परियोजना हिमालय के उस क्षेत्र में प्रस्तावित है, जिसे भूवैज्ञानिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। लाहौल-स्पीति और आसपास के इलाके उच्च भूकंपीय जोखिम वाले भूकंप क्षेत्र-IV और V के करीब स्थित हैं। भारतीय हिमालय अभी भी भूगर्भीय रूप से सक्रिय और युवा पर्वतमाला है, इसलिए बड़े पैमाने पर सुरंग निर्माण, ड्रिलिंग और विस्फोट से चट्टानों की स्थिरता प्रभावित होने की आशंका रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुरंग निर्माण के दौरान पहाड़ों में नई दरारें पड़ने, भूस्खलन बढ़ने और प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने का जोखिम रहता है।

पिछले कुछ वर्षों में हिमालय में ऐसी आशंकाएं कई परियोजनाओं में सामने भी आई हैं। उदाहरण के लिए, जोशीमठ भू-धंसाव संकट के दौरान कई विशेषज्ञों ने क्षेत्र में लंबे समय से चल रही सुरंग और जलविद्युत परियोजनाओं के संचयी प्रभावों की जांच की मांग उठाई थी। इसी तरह, चमोली आपदा के बाद बनी सरकारी समितियों ने हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए अधिक सतर्क भू-वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया था।

इस परियोजना में सुरंग से निकलने वाला लाखों घनमीटर मलबा भी एक बड़ी चुनौती होगा। यदि इसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण नहीं किया गया, तो यह मलबा चिनाब या उसकी सहायक धाराओं में पहुंचकर नदी के प्रवाह, जल गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, लाहौल-स्पीति क्षेत्र हिम तेंदुआ, हिमालयी आइबेक्स और कई दुर्लभ उच्च हिमालयी प्रजातियों का आवास भी है। ऐसे में पर्यावरणविदों का मानना है कि परियोजना के लिए केवल एकल पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे चिनाब बेसिन पर इसके संचयी पर्यावरणीय प्रभाव (Cumulative Impact Assessment) का अध्ययन भी जरूरी है, ताकि विकास और पारिस्थितिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके।

हाल के वर्षों में हिमाचल में बढ़ी हैं भूस्खलन की घटनाएं

हिमाचल प्रदेश पहले से ही भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी आपदाओं का सामना कर रहा है। जुलाई 2025 में मंडी जिले में बादल फटने, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन की कई घटनाओं में दर्जनों लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग लापता हो गए। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) के अनुसार, 20 जून से 10 जुलाई 2025 के बीच ही हिमाचल में बारिश, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड से 91 लोगों की मौत हुई थी।

अगस्त 2025 में मंडी, कुल्लू और किन्नौर जिलों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुए, जिससे सैकड़ों सड़कें बंद हो गईं और चंडीगढ़-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग कई बार बाधित हुआ। राज्य में 2025 के मानसून सीजन के दौरान 135 बड़े भूस्खलन, 95 फ्लैश फ्लड और 45 बादल फटने की घटनाएं दर्ज की गईं।

इसी तरह, जनवरी 2023 में जोशीमठ भू-धंसाव संकट ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में बड़े बुनियादी ढांचा और सुरंग परियोजनाओं के संचयी प्रभावों पर बहस छेड़ दी थी। कई भूवैज्ञानिकों का मानना है कि भूगर्भीय रूप से नाजुक पहाड़ों में सुरंग, कटिंग और भारी निर्माण गतिविधियां ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, किसी एक परियोजना और किसी विशेष भूस्खलन के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक होता है।

निष्कर्ष : अवसर भी, चुनौती भी, संतुलन ज़रूरी

चिनाब-व्यास लिंक सुरंग परियोजना भारत की जल, ऊर्जा और रणनीतिक नीति के लिहाज से एक महत्वाकांक्षी कदम है। इससे जहां अतिरिक्त जल के बेहतर उपयोग, जलविद्युत उत्पादन और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास की नई संभावनाएं खुल सकती हैं, वहीं भूगर्भीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में इसके पर्यावरणीय और पारिस्थितिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस परियोजना की वास्तविक सफलता केवल सुरंग के निर्माण में नहीं, बल्कि इस बात में निहित होगी कि भारत विकास, जल सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच कितना संतुलन स्थापित कर पाता है।

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