पीने के पानी में फ्लोराइड का दंश झेलती यूपी के सोनभद्र की वृद्ध महिला 

 

फोटो - नीतू सिंह 

प्रदूषण और जलगुणवत्ता

देश के 370 जिलों के भूजल में फ्लोराइड का खतरा, देखें पूरी सूची, जानें फ्लोरोसिस के लक्षण

भूजल में फ्लोराइड कहां से आता है, इसकी मात्रा अधिक होने से क्या होता है और देश के किन-किन जिलों के भूजल में फ्लोराइड पाया गया, यह सारी जानकारी इस लेख में प्राप्‍त करें और साथ ही पढ़ें फ्लोरोसिस के लक्षण ताकि समय रहते बचाव किया जा सके।

Author : सयाली पराते

फ्लोराइड पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एक खनिज है। यह फ्लोरीन तत्व का यौगिक रूप है, जो चट्टानों, मिट्टी, भूजल और कुछ खाद्य पदार्थों में स्वाभाविक रूप से मौजूद रहता है। सामान्य मात्रा में फ्लोराइड दांतों और हड्डियों के विकास के लिए उपयोगी माना जाता है, लेकिन यदि इसकी मात्रा लंबे समय तक अधिक हो जाए तो यह मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

सरल शब्दों में कहा जाए तो फ्लोराइड एक ऐसा प्राकृतिक खनिज है, जो कम मात्रा में लाभकारी और अधिक मात्रा में हानिकारक होता है।

भारत में फ्लोराइड प्रदूषण मुख्यतः भूजल से जुड़ी समस्या है। देश के अनेक राज्यों में लोग वर्षों से ऐसे भूजल का उपयोग कर रहे है जिसमें फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है।

परिणामस्वरूप लाखों लोग डेंटल फ्लोरोसिस (Dental Fluorosis) और स्केलेटल फ्लोरोसिस (Skeletal Fluorosis) जैसी बीमारियों से प्रभावित हुए है।फ्लोरीन तत्व का ऋणात्मक आयन (F⁻), जो प्राकृतिक या कृत्रिम स्रोतों से पानी, मिट्टी और भोजन में पाया जाता है। 

सोनभद्र के बच्चों में फ्लोरोस‍िस 

फ्लोराइड कहाँ पाया जाता है?

फ्लोराइड  प्राकृतिक और मानवजनित दोनों स्रोतों से पर्यावरण में पहुंच सकता है।

प्राकृतिक स्रोत - भारत में अधिकांश फ्लोराइड भूजल में प्राकृतिक रूप से घुलकर आता है। मुख्य प्राकृतिक स्रोत ग्रेनाइट एवं ज्वालामुखीय चट्टानें, फ्लोराइट,  एपेटाइट, क्रायोलाइट, भूजल में चट्टानों का घुलना है। जब वर्षा का पानी चट्टानों से होकर भूजल तक पहुंचता है, तब उनमें मौजूद फ्लोराइड पानी में घुल जाता है।

मानवजनित स्रोत - कुछ औद्योगिक गतिविधियां भी फ्लोराइड प्रदूषण बढ़ाती है। इसके मुख्य स्रोत एल्युमिनियम उद्योग, उर्वरक उद्योग, ईंट भट्टे, कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र, कुछ रासायनिक उद्योग है। हालांकि भारत में अधिकांश फ्लोराइड प्रदूषण प्राकृतिक कारणों से ही होता है।

पीने के पानी में फ्लोराइड कैसे आता है?

जब भूजल लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त चट्टानों के संपर्क में रहता है, तब उसमें फ्लोराइड घुल जाता है। इसकी मात्रा बढ़ने के प्रमुख कारणों में भूजल का अत्यधिक दोहन, कम वर्षा, सूखा, गहरे बोरवेल, भूगर्भीय संरचना शामिल है। इसी कारण राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और अन्य कई राज्यों के कुछ क्षेत्रों में फ्लोराइड की समस्या अधिक देखी जाती है।

पीने के पानी में फ्लोराइड की सुरक्षित सीमा क्या है ? 

भारत में पेयजल गुणवत्ता के मानक भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित किए जाते है। इनके अनुसार -

  • वांछनीय सीमा (Desirable Limit): 1.0 mg/L

  • वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध न होने पर अधिकतम अनुमेय सीमा (Permissible Limit) 1.5 mg/L

यदि फ्लोराइड की मात्रा लंबे समय तक 1.5 mg/L से अधिक रहती है, तो फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। 

शरीर में फ्लोराइड की भूमिका क्या है ?

उचित मात्रा में फ्लोराइड लाभदायक भी होता है। इसके प्रमुख लाभ दांतों के इनेमल को मजबूत बनाता है। दांतों में कीड़े लगने की संभावना कम करता है। हड्डियों के खनिजीकरण में सहायता करता है। लेकिन आवश्यकता से अधिक मात्रा शरीर के लिए विषैली सिद्ध हो सकती है।

अधिक फ्लोराइड क्यों खतरनाक है?

अत्यधिक फ्लोराइड शरीर में धीरे-धीरे जमा होने लगता है। यह मुख्य रूप से हड्डियों, दांतों, जोड़ों को प्रभावित करता है। लंबे समय तक अधिक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से फ्लोरोसिस नामक बीमारी विकसित होती है।

सोनभद्र में पानी में फ्लोराइड का कहर

फ्लोरोसिस (Fluorosis) क्या है?

फ्लोराइड की अधिक मात्रा के लंबे समय तक सेवन से होने वाली बीमारी को फ्लोरोसिस कहा जाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अनुसार फ्लोरोसिस एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जिसका समय पर निदान और रोकथाम आवश्यक है। फ्लोरोसिस मुख्यतः तीन प्रकार की होती है।

  • डेंटल फ्लोरोसिस यह बच्चों में अधिक दिखाई देती है। इसके मुख्य लक्षण दांतों पर सफेद धब्बे, पीले या भूरे निशान, दांतों की चमक कम होना, दांत कमजोर होना है।

  • स्केलेटल फ्लोरोसिस यह हड्डियों और जोड़ों को प्रभावित करती है। मुख्य लक्षण कमर दर्द,  जोड़ों में दर्द, गर्दन अकड़ना, चलने-फिरने में कठिनाई, गंभीर स्थिति में विकलांगता है ।

  • गैर-कंकालीय फ्लोरोसिस कुछ मामलों में यह शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित करती है। संभावित प्रभाव मांसपेशियों में दर्द, थकान, पाचन संबंधी समस्याएं, कमजोरी होती है।

भारत में फ्लोराइड की स्थिति

भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा 22 मार्च 2021 को संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, Central Ground Water Board (CGWB) की देशव्यापी भूजल गुणवत्ता निगरानी में कई राज्यों के अलग-अलग जिलों में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, आयरन और भारी धातुओं का स्तर Bureau of Indian Standards (BIS) द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक पाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, फ्लोराइड की अधिकता 23 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 370 जिलों के कुछ हिस्सों में दर्ज की गई। राज्यवार आंकड़ों में मध्य प्रदेश में फ्लोराइड प्रभावित 43 जिले, राजस्थान में फ्लोराइड और आयरन से प्रभावित 33-33 जिले, तथा कर्नाटक में फ्लोराइड प्रभावित 30 जिले प्रमुख है।

भारत में भूजल के फ्लोराइड से आंशिक रूप से प्रभावित जिलों की राज्यवार संख्या

(तालिका का स्रोत पीआईबी है) - 

क्र. सं.राज्य/केंद्र शासित प्रदेशफ्लोराइड (1.5 मि.ग्रा./लीटर से अधिक) प्रभावित जिले
1आंध्र प्रदेश12
2तेलंगाना10
3असम9
4बिहार13
5छत्तीसगढ़19
6दिल्ली7
7गुजरात22
8हरियाणा21
9जम्मू एवं कश्मीर2
10झारखंड12
11कर्नाटक30
12केरल5
13मध्य प्रदेश43
14महाराष्ट्र17
15मणिपुर1
16मेघालय1
17नागालैंड1
18ओडिशा26
19पंजाब19
20राजस्थान33
21तमिलनाडु25
22उत्तर प्रदेश34
23पश्चिम बंगाल8
कुल23 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 370 जिलों के कुछ भाग फ्लोराइड (1.5 मि.ग्रा./लीटर से अधिक) से प्रभावित हैं।

सरकार ने स्पष्ट किया कि भूजल प्रबंधन राज्यों का विषय है, जबकि केंद्र सरकार Jal Jeevan Mission के तहत गुणवत्ता-प्रभावित बस्तियों को प्राथमिकता देते हुए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने, सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (CWPPs) स्थापित करने तथा सुरक्षित जलभृतों (Aquifers) के उपयोग हेतु राज्यों को तकनीकी सहायता प्रदान कर रही है।

देश भर में किए गए फ्लोराइड परीक्षणों के आधार पर 370 जिलों की सूची तैयार की गई, जहां आंशिक रूप से फ्लोराइड पाया गया। यानी कि जरूरी नहीं है कि इन जिलों के सभी इलाकों में फ्लोराइड हो। अब आप उन जिलों की सूची देख सकते हैं हां के कुछ इलाकों में भूजल में फ्लोराइड पाया गया।

इस सूची का स्रोत लोकसभा की वेबसाइट है।

क्रम सं.राज्य/केंद्र शासित प्रदेशफ्लोराइड (1.5 मिलीग्राम/लीटर से ऊपर)
1आंध्र प्रदेशविशाखापट्टनम, पश्चिम-गोदावरी, कृष्णा, गुंटूर, प्रकासम, नेल्लोर, चित्तूर, कडप्पा, कुरनूल, अनंतपुर, श्रीकाकुलम, विजयनगरम
2तेलंगानाआदिलाबाद, करीमनगर, खम्मम, वारंगल, महबूबनगर, मेडक, नलगोंडा, रंगारेड्डी, निज़ामाबाद, हैदराबाद
3असमगोलपारा, कामरूप, कार्बी आंगलोंग, नौगांव, गोलाघाट, करीमगंज, बंगियागांव, सिबसागर, जोरहाट
4बिहारछत्रपति संभाजीनगर, बांका, भागलपुर, गया, जमुई, कैमूर (भभुआ), मुंगेर, नवादा, रोहतास, जहानाबद, लखीसराय, शेखपुरा, नालंदा
5छत्तीसगढ़बस्तर, बालोद, बलरामपुर, बेमेतरा, बीजापुर, दुर्ग, कांकेर, कोंडागांव, कोरबा, कोरिया, रायगढ़, सूरजपुर, सरगुजा, जशपुर, धमतरी, महासमुंद, राजनांदगांव, बिलासपुर, रायपुर
6दिल्लीपूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली, उत्तर पश्चिमी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, दक्षिण पश्चिमी दिल्ली, उत्तरी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली
7गुजरातअहमदाबाद, अमरेली, आनंद, बनासकांठा, भरूच, भावनगर, दाहोद, गांधीनगर, जामनगर, जूनागढ़, कच्छ, मेहसाणा, पंचमहल, पाटन, पोरबंदर, राजकोट, साबरकांठा, सुरेंद्रनगर, वडोदरा, खेड़ा, नवसारी, सूरत
8हरयाणाअम्बाली, भिवानी, फतेहाबाद, फ़रीदाबाद, गुड़गांव, हिसार, झज्जर, जिंद, कैथल, करनाल, कुरूक्षेत्र, महेंद्रगढ़, पंचकुला, पलवल,पानीपत, रेवाडी, रोहतक, सिरसा, सोनीपत, यमुनानगर, मेवात
9जम्मू और कश्मीरजम्मू, कठुआ
10झारखंडबोकारो, धनबाद, गढ़वा, गिरिडीह, गोड्डा, गुमला, कोडरमा, पाकुड़, पलामू, रांची, , साहेबगंज, खूंटी
11कर्नाटकबागलकोट, बेंगलुरु- ग्रामीण, बेंगलुरु- शहरी, बेलगाम, बेल्लारी, बीदर, बीजापुर, चिकबल्लापुर, चामराजनगर, चिकमगलूर, चित्रदुर्ग, दावणगेरे, धारवाड़, दक्षिण कन्नड़, गडग, ​​गुलबर्गा, हसन, हावेरी, कोलार, कोप्पल, मांड्या, मैसूर, रायचूर, रामनगर, शिमोगा, तुमकुर, यादगीर, उत्तर कन्नड़, उडुपी, कोडागु
12केरलपलक्कड़, अलाप्पुझा, इडुक्की, एर्नाकुलम, तिरुवनंतपुरम
13मध्य प्रदेशअलीराजपुर, बालाघाट, बड़वानी, बैतूल, भिंड, भोपाल, छतरपुर, छिंदवाड़ा, दतिया, देवास, धार, डिंडोरी, गुना, ग्वालियर, हरदा, जबलपुर, झाबुआ, खरगोन, मंडला, मंदसौर, मुरैना, नरसिंहपुर, नीमच, पन्ना, रायसेन, राजगढ़, रतलाम, सागर, सतना, सीहोर, सिवनी, शहडोल, शाजापुर, श्योपुर, सीधी, शिवपुरी, सिंगरौली, उज्‍जैन, विदिशा, अनुपपुर, इंदौर, खंडवा, टीकमगढ़
14महाराष्ट्रअहमदनगर, बीड, चंद्रपुर, भंडारा, धुले, गढ़चिरौली, गोंदिया, जालना, नागपुर, नांदेड़, रत्नागिरी, सांगली, सतारा, सिंधुदुर्ग, सोलापुर, वर्धा, यवतमाल
15मणिपुरथौबल
16मेघालयरी भोई
17नगालैंडदीमापुर
18ओडिशाअंगुल, बालासोर, भद्रक, बारगढ़, बोलांगीर, बौध, कटक, देवगढ़ ढेंकनाल, जाजपुर, कंधमाल, क्योंझर, खुर्दा, मयूरभंज, नयागढ़, नुआपाड़ा, गंजाम, जगतसिंहपुर, कालाहांडी, कोरापुट, पुरी, रायगड़ा, संबलपुर, सोनपुर, सुंदरगढ़, गजपति
20पंजाबअमृतसर, बरनाला, भटिंडा, फाजिल्का, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फिरोजपुर, गुरदासपुर, जालंधर, लुधियाना, मनसा, मोगा, मुक्तसर, पठानकोट, पटियाला, रोपड़, संगरूर, एसएएस नगर (मोहाली), तरन-तारन
22राजस्थानअजमेर, अलवर, बांसवाड़ा, बाड़मेर, भरतपुर, बारां, भीलवाड़ा, बीकानेर, बूंदी, चित्तौड़गढ़, चूरू, दौसा, धौलपुर, डूंगरपुर, गंगानगर, हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर, जालौर, झालावाड़ झुंझुनू, जोधपुर, करौली, कोटा, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, राजसमंद, सिरोही, सीकर, सवाई माधोपुर, टोंक, उदयपुर
24तमिलनाडुकोयंबटूर, धर्मपुरी, डिंडीगुल, इरोड, करूर, कांचीपुरम, कृष्णागिरी, नमक्कल, मदुरै, पुद्दुकोटाई, रामनाथनपुरम, सलेम, शिवगंगई, थेनी, तिरुवन्नामलाई, तिरुचिरापल्ली, तिरुनेलवेली, तिरुपुर वेल्लोर, कुड्डालोर, पेरम्बलुर, तंजावुर, तिरुवरूर, तूतीकोरिन, विरुधुनगर
26उत्तर प्रदेशआगरा, अलीगढ, इलाहबाद, औरैया, बांदा, बुलन्दशहर, एटा, इटावा, फर्रुखाबाद, फ़तेहपुर, फ़िरोज़ाबाद, जी बी नगर, ग़ाज़ियाबाद, हाथरस, जौनपुर, कन्नौज, कानपुर नगर, कासगंज (काशीराम नगर), ललितपुर, महोबा, मैनपुरी, मथुरा, मऊनाथ भंजन, प्रतापगढ़, राय बरेली, शाजहाँपुर, सोनभद्र, सुल्तानपुर, वाराणसी और उन्नाव, चंदौली, गोंडा, हरदोई, सीतापुर
27पश्चिम बंगालबांकुरा, बीरभूम, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, पुरुलिया, उत्तरदिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना, नादिया

 फ्लोराइड की जांच कैसे की जाती है?

यदि किसी क्षेत्र के पेयजल में फ्लोराइड की आशंका हो, तो उसकी प्रयोगशाला में जांच कराई जाती है। मुख्य जांच विधियाँ -

  • Ion Selective Electrode Method - यह सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली वैज्ञानिक तकनीक है।

  • SPADNS Method - जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है।

  • Field Test Kit - ग्रामीण क्षेत्रों में प्रारंभिक जांच के लिए सरकार द्वारा फील्ड टेस्ट किट उपलब्ध कराई जाती है।

फ्लोराइड से होने वाली बीमारियाँ क्या है ? 

अत्यधिक फ्लोराइड शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करता है।

  • Dental Fluorosis इससे सबसे पहले दांत प्रभावित होते है। इसके लक्षणों में दांतों पर सफेद धब्बे, पीले या भूरे रंग के निशान, दांतों की चमक कम होना शामिल है।

  • Skeletal Fluorosis यह लंबे समय तक अधिक फ्लोराइड वाला पानी पीने से हड्डियां प्रभावित होती हैं। इसके लक्षणों में जोड़ों में दर्द, गर्दन अकड़ना, कमर दर्द, चलने में कठिनाई, गंभीर मामलों में विकलांगता शामिल है।

  • Non-Skeletal Fluorosis के कुछ रोगियों में मांसपेशियों में दर्द, पेट संबंधी समस्याएं, कमजोरी, थकान जैसे लक्षण भी देखे जाते हैं।

  • बच्चों में फ्लोराइड का प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है क्योंकि उनके दांत और हड्डियां विकसित हो रही होती हैं। संभावित प्रभाव स्थायी दांतों पर धब्बे, दांत कमजोर होना, हड्डियों का असामान्य विकास, वृद्धि पर प्रभाव, इसी कारण WHO और भारत सरकार बच्चों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने पर विशेष जोर देती है।

फ्लोराइड से बचाव कैसे करें?

यदि किसी क्षेत्र में फ्लोराइड अधिक है तो निम्न उपाय अपनाए जा सकते है-

  • सुरक्षित पेयजल का उपयोग - जहाँ संभव हो, कम फ्लोराइड वाले स्रोत से पानी लें।

  • वर्षा जल संचयन - Rainwater Harvesting पर निर्भरता कम करता है।

  • संतुलित आहार - कैल्शियम, विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट युक्त भोजन फ्लोराइड के दुष्प्रभाव कम करने में सहायक माना जाता है।

  • नियमित जल परीक्षण - समय-समय पर पानी की जांच कराना आवश्यक है।

पानी से फ्लोराइड कैसे हटाया जाता है?

इसे Defluoridation कहा जाता है। भारत में कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

नलगोंडा तकनीक (Nalgonda Technique) - यह भारत में विकसित सबसे प्रसिद्ध तकनीक है। इसे नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) ने विकसित किया। इसमें फिटकरी, चूना, ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग करके फ्लोराइड हटाया जाता है। इसमें कम लागत, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त, सामुदायिक जल योजनाओं में उपयोगी होता है। 

Activated Alumina - इस तकनीक में विशेष फिल्टर मीडिया फ्लोराइड को अवशोषित कर लेता है।

Reverse Osmosis (RO) - आज घरों और संस्थानों में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली तकनीक है । इससे फ्लोराइड हटाता है और अन्य घुलित लवण भी कम करता है। ये महंगा होता है और पानी की बर्बादी अधिक होती है।

Bone Char Method कुछ देशों में उपयोग होती है,  लेकिन भारत में सीमित है।

सरकार द्वारा किए जा रहे प्रमुख प्रयास क्या है ?

भारत सरकार ने फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए है।

जल जीवन मिशन वर्ष 2019 में शुरू किए गए इस मिशन का उद्देश्य है, हर ग्रामीण परिवार को काम करने के लिए घरेलू नल कनेक्शन (Functional Household Tap Connection - FHTC) उपलब्ध कराना है। मिशन के अंतर्गत फ्लोराइड एवं आर्सेनिक प्रभावित गांवों को प्राथमिकता दी गई है। 

इसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षित पेयजल, गुणवत्ता प्रभावित गांवों को प्राथमिकता, नियमित जल गुणवत्ता जांच, ग्राम स्तर पर Water Testing Laboratories शामिल है

Atal Bhujal Yojana भूजल संरक्षण को बढ़ावा देकर फ्लोराइड जैसी समस्याओं को कम करने का प्रयास है । National Water Quality Sub-Mission फ्लोराइड एवं आर्सेनिक प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने हेतु शुरू किया गया विशेष कार्यक्रम है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) नियमित रूप से भूजल गुणवत्ता, फ्लोराइड स्तर, जल गुणवत्ता मानचित्र जारी करता है।

राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (NPPCF) के तहत क्या-क्या सेवाएं दी जाती है?

फ्लोरोसिस की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (National Programme for Prevention and Control of Fluorosis - NPPCF) लागू किया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि समय रहते इसकी पहचान, रोकथाम और प्रभावित लोगों के पुनर्वास तक व्यापक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।

कार्यक्रम के तहत सबसे पहले समुदाय स्तर पर फ्लोरोसिस की निगरानी की जाती है, ताकि प्रभावित गांवों, ब्लॉकों और क्षेत्रों की पहचान की जा सके। इसके साथ ही डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण देकर उनकी क्षमता बढ़ाई जाती है। जिला अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों में फ्लोरोसिस की जांच के लिए आवश्यक नैदानिक सुविधाएं विकसित की जाती हैं, जिससे बीमारी की समय पर पुष्टि हो सके।

रिपोर्ट के अनुसार सरकार फ्लोरोसिस से प्रभावित मरीजों को उपचार, आवश्यक होने पर सर्जरी तथा पुनर्वास की सुविधाएं भी उपलब्ध कराने पर जोर देती है। इसके अलावा लोगों को सुरक्षित पेयजल, संतुलित पोषण और फ्लोराइड के दुष्प्रभावों से बचाव के बारे में जागरूक करने के लिए स्वास्थ्य शिक्षा अभियान चलाए जाते हैं।

कार्यक्रम के अंतर्गत गांव, ब्लॉक और क्लस्टर स्तर पर फ्लोरोसिस की सामुदायिक पहचान की जाती है। साथ ही यह आकलन किया जाता है कि किसी क्षेत्र में रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन, जांच, सर्जरी और पुनर्वास जैसी सुविधाएं पर्याप्त हैं या नहीं। जहां सुविधाओं की कमी होती है, वहां आवश्यक वित्तीय और भौतिक संसाधन उपलब्ध कराकर इन कमियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक मरीज की व्यक्तिगत जांच कर उसका उपचार सुनिश्चित किया जाता है। समुदाय में फ्लोरोसिस की स्थिति के आधार पर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप किए जाते हैं तथा सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियों के माध्यम से लोगों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया जाता है। स्वास्थ्य कर्मियों के नियमित प्रशिक्षण के जरिए कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी विशेष बल दिया जाता है।

फ्लोराइड और सतत विकास

फ्लोराइड नियंत्रण केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है बल्कि जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास लक्ष्य (SDG-6 - Clean Water and Sanitation) से भी जुड़ा हुआ है। फ्लोराइड नियंत्रण कई वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों से जुड़ा हुआ है।

  • SDG 3 - अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण

  • SDG 6 - स्वच्छ जल और स्वच्छता

  • SDG 11 - सतत समुदाय

  • SDG 13 - जलवायु कार्रवाई

सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत में फ्लोराइड नियंत्रण की प्रमुख चुनौतियाँ क्या है ?

फ्लोराइड की समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल प्रबंधन, पर्यावरण, ग्रामीण विकास और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से भी जुड़ी हुई है। सरकार द्वारा कई योजनाएं संचालित होने के बावजूद कई क्षेत्रों में यह समस्या बनी हुई है।

  • भूजल पर अत्यधिक निर्भरता  - भारत के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल का प्रमुख स्रोत भूजल है। शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में लंबे समय तक भूजल के अत्यधिक दोहन से फ्लोराइड की सांद्रता बढ़ सकती है।

  • जागरूकता की कमी - कई लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीते रहते हैं, लेकिन उन्हें यह पता नहीं होता कि जोड़ों का दर्द, दांतों पर धब्बे या हड्डियों की समस्या फ्लोरोसिस के कारण भी हो सकती है।

  • नियमित जल परीक्षण का अभाव - ग्रामीण क्षेत्रों में सभी जल स्रोतों की समय-समय पर जांच नहीं हो पाती, जिससे प्रभावित स्रोतों की पहचान में देरी होती है।

  • आर्थिक चुनौतियाँ - RO प्लांट, सामुदायिक डिफ्लोरिडेशन यूनिट और पाइप जलापूर्ति जैसी व्यवस्थाओं की स्थापना एवं रखरखाव पर पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता होती है।

  •  जलवायु परिवर्तन - सूखा, कम वर्षा और भूजल स्तर में गिरावट जैसे कारक फ्लोराइड की समस्या को और गंभीर बना सकते हैं।

फ्लोराइड नियंत्रण के लिए भविष्य की रणनीति क्या है ?

विशेषज्ञों के अनुसार फ्लोराइड समस्या का समाधान केवल उपचार से नहीं, बल्कि सुरक्षित जल प्रबंधन से संभव है।

  • प्रत्येक पेयजल स्रोत की नियमित गुणवत्ता जांच।

  • वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को बढ़ावा। 

  • भूजल के अत्यधिक दोहन पर नियंत्रण।

  • सतही जल स्रोतों का अधिक उपयोग।

  • फ्लोराइड प्रभावित गांवों को प्राथमिकता के आधार पर नल से जल उपलब्ध कराना।

  • सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्रों की स्थापना।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं जल गुणवत्ता संबंधी जागरूकता अभियान।

  • विद्यालय स्तर पर सुरक्षित पेयजल और फ्लोरोसिस के बारे में शिक्षा।

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