कश्मीर में ट्राउट मछली पालन केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उभरती हुई एक पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था है, जिसकी बुनियाद इन पहाड़ी जलधाराओं पर टिकी है।
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
सुबह की ठंडी हवा में कश्मीर घाटी की एक पहाड़ी धारा के किनारे खड़े होकर पानी को बहते देखना एक शांत अनुभव होता है। साफ, पारदर्शी, पत्थरों से टकराता हुआ यही वह पानी है जिस पर यहां की ट्राउट मछलियां और उनसे जुड़ी आजीविकाएं टिकी हैं।
लेकिन इस बहते पानी में अब एक ऐसा बदलाव घुलने लगा है, जो पहली नज़र में दिखाई नहीं देता। कश्मीर में तेजी से बढ़ते ट्राउट पालन के सामने अब जल गुणवत्ता एक बड़ी चिंता बनकर उभर रही है, खासतौर पर खेतों और बागानों में इस्तेमाल हो रहे कीटनाशकों के कारण, जो बहकर इन्हीं जलधाराओं तक पहुंच रहे हैं।
हालांकि यह बदलाव केवल मछलियों तक ही सीमित नहीं है। यह उन पहाड़ी जल स्रोतों, स्थानीय पारिस्थितिकी और उन लोगों के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है, जो सीधे या परोक्ष रूप से इस पानी पर निर्भर हैं।
कश्मीर में ट्राउट मछली पालन केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उभरती हुई एक पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था है, जिसकी बुनियाद इन पहाड़ी जलधाराओं पर टिकी है।
पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र में तेज़ी से विस्तार हुआ है। सरकारी और निजी मिलाकर सैकड़ों ट्राउट फार्म आज इस घाटी में सक्रिय हैं, और उत्पादन में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले एक दशक में ट्राउट उत्पादन में तेज़ वृद्धि हुई है। साल 2015-16 में लगभग 298 टन से बढ़कर यह 2024-25 में 2,650 टन तक पहुंच गया है। इसके साथ ही राजस्व भी 2.76 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.75 करोड़ रुपये तक हो गया है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार यह क्षेत्र न केवल उत्पादन के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है, बल्कि आजीविका के स्तर पर भी इसकी भूमिका उतनी ही ज़रूरी है। दरअसल, क्षेत्र के हजारों लोग सीधे या परोक्ष रूप से इससे जुड़े हैं, चाहे वह हैचरी हो, छोटे फार्म हों, पर्यटन आधारित एंगलिंग हो या स्थानीय बाज़ार।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कश्मीर देश के कुल ट्राउट उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा देता है और इसे भारत में ठंडे पानी की मत्स्यपालन का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
लेकिन इस पूरी व्यवस्था की एक बुनियादी शर्त है, साफ, ठंडा और बहता हुआ पानी। यही वह आधार है, जिस पर यह पूरी अर्थव्यवस्था टिकी है। और यही वह कड़ी है, जहाँ अब सबसे ज़्यादा दबाव दिखने लगा है।
कश्मीर की घाटी में सेब के बागान केवल खेती नहीं, बल्कि एक पूरी अर्थव्यवस्था और उसकी पहचान हैं। दक्षिण कश्मीर के शोपियां, पुलवामा, कुलगाम और अनंतनाग जैसे इलाक़े अपने विशाल सेब बागानों के लिए जाने जाते हैं।
ये क्षेत्र कश्मीर की बागवानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी है। लेकिन इन बागानों के साथ एक और चीज़ लगातार बढ़ी है, वह है कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल।
लेकिन इसका असर यहीं तक नहीं रुकता। बारिश के दौरान खेतों से बहने वाला पानी, जिसे वैज्ञानिक भाषा में रनऑफ कहा जाता है, अपने साथ इन रसायनों का कुछ हिस्सा भी बहा ले जाता है।
दक्षिण कश्मीर में सेब के बागानों की सुरक्षा के लिए हर साल बड़ी मात्रा में कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का इस्तेमाल होता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मार्च से नवंबर के बीच करीब 7,750 मीट्रिक टन कीटनाशक और 3,186 मीट्रिक टन कीटनाशी रसायनों का छिड़काव किया जाता है।
यही बहाव धीरे-धीरे नालों, झरनों और नदियों तक पहुंचता है। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, कृषि क्षेत्रों से निकलने वाला यह नॉन-पॉइंट सोर्स प्रदूषण नदियों और सतही जल में कीटनाशकों का एक प्रमुख स्रोत होता है।
इसके साथ ही, पानी का एक हिस्सा मिट्टी के भीतर रिसता है जिसे लीचिंग कहा जाता है। इसी प्रक्रिया में पानी में घुले कीटनाशक धीरे-धीरे नीचे की परतों तक पहुंचते हैं और अंततः भूजल में मिल सकते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, कृषि क्षेत्रों से निकलने वाला यह नॉन-पॉइंट सोर्स प्रदूषण नदियों और सतही जल में कीटनाशकों का एक प्रमुख स्रोत होता है।
शोध बताते हैं कि वर्षा या सिंचाई का पानी इन रसायनों को मिट्टी के भीतर धकेलता है और वे भूजल तक पहुंच सकते हैं, खासकर तब जब मिट्टी की संरचना और रसायनों की घुलनशीलता इसके अनुकूल हो।
एक शोध के अनुसार मौसम के साथ इसका पैटर्न भी बदलता है। मार्च से मई महीने के बीच, जब कीटनाशकों का छिड़काव सबसे ज्यादा होता है, उसी दौरान जल स्रोतों में इन रसायनों की मौजूदगी भी बढ़ जाती है।
पानी में बदलाव हमेशा सतह पर नहीं दिखता। असली खतरा उसकी रासायनिक संरचना में होने वाले उन परिवर्तनों में छिपा होता है, जो धीरे-धीरे पूरे जलीय जीवन को प्रभावित करने लगते हैं। ट्राउट जैसी संवेदनशील प्रजातियों के लिए यह बदलाव सबसे ज्यादा जोखिम भरा होता है, क्योंकि इन्हें ठंडा, साफ और ऑक्सीजन से भरपूर पानी चाहिए।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि क्लोरपाइरीफॉस जैसे कीटनाशक जल स्रोतों तक आसानी से पहुंच जाते हैं, नदियों, झीलों और यहां तक कि बारिश के पानी में भी इनके अंश मिलते हैं। पानी में घुलने के बाद ये मछलियों के शरीर पर कई स्तरों पर असर डालते हैं:
गलफड़ों और ऊतकों में संरचनात्मक बदलाव
खून और कोशिकाओं पर असर (genotoxic और hematological परिवर्तन)
एंजाइम गतिविधि में कमी, जिससे नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है
अध्ययन के अनुसार तैरने, खाने और प्रतिक्रिया देने के पैटर्न में गड़बड़ी भी होती है
इनका असर तुरंत नहीं दिखता, बल्कि लंबे समय तक कम मात्रा में संपर्क भी मछलियों की वृद्धि, प्रजनन और जीवनकाल पर असर डालता है। कई मामलों में अचानक मृत्यु भी दर्ज की गई है।
ये रसायन छोटे जलीय जीवों के जरिए खाद्य श्रृंखला में आगे बढ़ते हैं और बड़ी मछलियों तक पहुंचते हैं। इस प्रक्रिया, जिसे बायोएक्यूमुलेशन कहा जाता है, से पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है।
स्थानीय स्तर पर मछुआरों और फार्म संचालकों का कहना है कि कुछ इलाकों में ट्राउट की वृद्धि पहले जैसी नहीं रही और असामान्य व्यवहार या अचानक मृत्यु के मामले बढ़े हैं।
पानी में बदलाव हमेशा सतह पर नहीं दिखता। असली खतरा उसकी रासायनिक संरचना में होने वाले उन परिवर्तनों में छिपा होता है, जो धीरे-धीरे पूरे जलीय जीवन को प्रभावित करने लगते हैं।
अब ये बदलाव केवल आंकड़ों में नहीं, ज़मीनी स्तर पर भी साफ दिखाई देने लगे हैं। 2012 में अपना ट्राउट फार्म शुरू करने वाले शोपियां ज़िले के ज़वूरा गांव के शाकिर नज़ीर ने दी हिंदू बिज़नेस लाइन से अपनी बातचीत में बताया कि उन्होंने कई बार अपने तालाबों में सैकड़ों मछलियों को पेट ऊपर करके तैरते हुए देखा है।
उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों में यह घटना चार से पांच बार हो चुकी है, जिससे उन्हें 20 से 22 लाख रुपये तक का नुकसान हुआ। वे बताते हैं “अक्सर किसान बचे हुए कीटनाशक उन जलधाराओं में फेंक देते हैं, जो हमारे तालाबों तक पहुंचती हैं। इससे मछलियां और मछली बीज मर जाते हैं।”
ये बदलाव अब केवल अनुभव तक सीमित नहीं हैं बल्कि शोध भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं। घाटी के जल स्रोतों, खासतौर पर झेलम बेसिन में किए गए अध्ययन में कीटनाशकों के अंश पाए गए हैं।अध्ययन में 60 जल नमूनों की जांच के दौरान कई तरह के रसायन दर्ज किए गए, जिनमें प्रमुख हैं:
डाइफेनोकोनाज़ोल
क्लोरपाइरीफॉस
क्विनालफॉस
अन्य ऑर्गेनोफॉस्फेट और ऑर्गेनोक्लोरीन यौगिक
इन रसायनों की मात्रा कृषि क्षेत्रों के पास स्थित जल स्रोतों में अधिक पाई गई, जो यह संकेत देती है कि बागवानी से जुड़ा रासायनिक बहाव एक प्रमुख स्रोत है।
मार्च से मई के बीच, जब कीटनाशकों का छिड़काव सबसे अधिक होता है, उसी अवधि में जल स्रोतों में इनके अवशेषों की मात्रा भी बढ़ी हुई दर्ज की गई है।
ट्राउट के लार्वा पर किए गए अध्ययनों में भी यही पाया गया है कि बहुत कम मात्रा में भी यह रसायन उनकी तैरने की क्षमता को प्रभावित करता है, जो उनके जीवित रहने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
पानी में बढ़ते रासायनिक दबाव और उसके असर को लेकर नीतिगत स्तर पर जागरूकता नई नहीं है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय-समय पर जल गुणवत्ता की निगरानी करते हैं और मानक तय करते हैं। लेकिन सवाल केवल मानक तय करने का नहीं, बल्कि उन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करने का है।
भारत में कीटनाशकों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशक अधिनियम 1968 लागू है, जिसके तहत रसायनों के निर्माण, बिक्री और उपयोग को रेगुलेट किया जाता है। हाल के वर्षों में सरकार ने कुछ अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों पर प्रतिबंध या चरणबद्ध रोक लगाने की दिशा में कदम भी उठाए हैं।
अक्सर किसान बचे हुए कीटनाशक उन जलधाराओं में फेंक देते हैं, जो हमारे तालाबों तक पहुंचती हैं। इससे मछलियां और मछली बीज मर जाते हैं।शाकिर नज़ीर, ज़वूरा गांव, शोपियां ज़िला, कश्मीर घाटी
इसके साथ ही, FAO और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाएं सुरक्षित और जिम्मेदार कीटनाशक उपयोग (safe pesticide use) और जल स्रोतों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश देती रही हैं।
लेकिन कश्मीर जैसे क्षेत्रों में चुनौती थोड़ी अलग है। यहां बागवानी, खासतौर पर सेब उत्पादन स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार है। सेब की व्यापक स्तर पर खेती के साथ ही कीटनाशकों का इस्तेमाल भी जुड़ा हुआ है। कई बार यह उपयोग अनियंत्रित या आवश्यकता से अधिक हो जाता है, जिससे बारिश या सिंचाई के जरिए रसायन बहकर नदियों और झरनों तक पहुंच जाते हैं।
जम्मू और कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति (JKPCC) की रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि घाटी के कुछ जल स्रोतों में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, जिसमें कृषि अपशिष्ट (agricultural runoff) एक मुख्य कारण माना गया है।
जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती निगरानी (monitoring) और डेटा की कमी है।
जल स्रोतों की नियमित और सूक्ष्म स्तर पर जाँच हर जगह नहीं हो पाती है।
कीटनाशकों के वास्तविक उपयोग और उनके बहाव (runoff) पर सीमित डेटा उपलब्ध है।
छोटे किसानों तक सुरक्षित उपयोग की जानकारी और प्रशिक्षण अभी भी पूरी तरह नहीं पहुंच पाता है।
यानी, नीतियां और दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन (local adaptation) में अभी भी अंतर बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल “कीटनाशक कम करने” तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए एक समग्र जल-आधारित दृष्टिकोण (water-centric approach) की ज़रूरत है।
जल स्रोतों के आसपास बफर ज़ोन (buffer zones) बनाना, जहां रसायनों का उपयोग सीमित हो
किसानों के लिए इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) जैसी वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा देना
जल गुणवत्ता की नियमित और पारदर्शी मॉनिटरिंग
और स्थानीय समुदायों को इस प्रक्रिया में शामिल करना
नीति आयोग की रिपोर्ट भी इस बात पर जोर देती हैं कि जल सुरक्षा केवल सप्लाई बढ़ाने का मुद्दा नहीं है, बल्कि जल की गुणवत्ता को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
कश्मीर के संदर्भ में, यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहां पानी केवल संसाधन नहीं है बल्कि यह एक पूरी अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी और पहचान का आधार है। और जब पानी बदलने लगता है, तो उसके साथ पूरा जीवन-तंत्र बदल जाता है।
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