वैश्विक जल संकट के बीच MOF और AWG जैसी तकनीकों को पूरक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।

 

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

रिसर्च

हवा से पानी: क्या एटमॉस्फेरिक वाटर हार्वेस्टिंग भारत के जल संकट का समाधान बन सकती है?

वैश्विक जल संकट के बीच MOF और AWG जैसी तकनीकों को पूरक समाधान के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन ऊर्जा, लागत और स्थानीय जलवायु इनकी व्यवहारिकता तय करेंगे।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और भूजल के लगातार दोहन ने वैश्विक जल संकट को गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र और WHO की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 तक लगभग 2.2 अरब लोग सुरक्षित पेयजल तक नियमित पहुंच से वंचित रहेंगे। 

भारत में भी स्थिति जटिल है। सूखाग्रस्त और आंशिक रूप से सूखाग्रस्त इलाके मानसून पर निर्भर हैं, और असमान वर्षा, घटता भूजल स्तर और बढ़ती आबादी जल सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं। 

ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोत सूख रहे हैं और शहरी इलाकों में टैंकर-आधारित आपूर्ति यह संकट स्पष्ट रूप से दिखाती है। ऐसे परिदृश्य में पारंपरिक उपाय, बांध, नलकूप या पाइपलाइन आदि अधूरी हैं। दरअसल समाधान अधिक दोहन में नहीं, बल्कि स्रोत विविधीकरण और संरक्षण-आधारित प्रबंधन में है।

हवा से जल संग्रह: विज्ञान और व्यवहारिकता

वर्ष 2017 में नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित एक शोध में प्रोफेसर ओमर एम. याघी और उनके सहयोगियों ने MOF-801 आधारित प्रणाली से शुष्क परिस्थितियों में भी सूर्य ऊर्जा के सहारे वातावरण से पानी संग्रह की व्यवहारिकता प्रदर्शित की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रणाली को कंटेनर आकार की इकाई में विकसित किया गया है, जो सौर ऊष्मा जैसे सीमित ऊर्जा स्रोत से संचालित हो सकती है। इसे विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए संभावित समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया है जहां पारंपरिक जल स्रोत या तो अनुपलब्ध हैं या जलवायु परिवर्तन के कारण अस्थिर हो रहे हैं।

हालांकि, इसकी लागत, बड़े पैमाने पर उपयोग और लंबे समय तक के व्यवहारिक उपयोग को लेकर अभी और जांच और मूल्यांकन की ज़रूरत है।

इस तकनीक का आधार तथाकथित रेटिक्युलर केमिस्ट्री (reticular chemistry) है। एक ऐसी रासायनिक पद्धति जिसमें अणुओं को पूर्वनिर्धारित ढंग से जोड़कर अधिक छेद वाले (porous) ढांचे तैयार किए जाते हैं। इन ढांचों को MOF (Metal - Organic Framework) कहा जाता है। 

MOF ऐसी क्रिस्टलीय सामग्री है जिसमें धातु आयन और कार्बनिक लिंकर मिलकर जालीदार संरचना बनाते हैं। इस जाली में सूक्ष्म स्तर पर असंख्य छिद्र होते हैं, जो स्पंज की तरह हवा से जलवाष्प को सोख सकते हैं

कैसे काम करती है यह प्रक्रिया

यह प्रक्रिया सामान्यतः दो चरणों में काम करती है। पहले चरण में MOF सामग्री वातावरण से नमी को अवशोषित करती है। दूसरे चरण में हल्की ऊष्मा, जैसे सौर ऊर्जा आदि देने पर यह अवशोषित जलवाष्प मुक्त होती है। इस मुक्त जलवाष्प को संघनित कर तरल पानी के रूप में इकट्ठा किया जाता है। 

हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि वातावरण से जल-संग्रह (atmospheric water harvesting) की अवधारणा नई नहीं है। बाज़ार में पहले से मौजूद कई एटमॉस्फेरिक वाटर जेनरेटर (AWG) बिजली आधारित संघनन तकनीक पर काम करते हैं, लेकिन वे अक्सर ऊर्जा-गहन और महंगे साबित होते हैं। 

MOF आधारित प्रणाली का दावा यह है कि यह कम ऊर्जा में, अपेक्षाकृत कम आर्द्रता की स्थिति में भी काम कर सकती है, जिससे शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता बढ़ सकती है।

बाज़ार में पहले से मौजूद कई एटमॉस्फेरिक वाटर जेनरेटर (AWG) बिजली आधारित संघनन तकनीक पर काम करते हैं, लेकिन वे अक्सर ऊर्जा-गहन और महंगे साबित होते हैं। 

यही वह बिंदु है जहां यह तकनीक केवल एक प्रयोगशाला नवाचार नहीं, बल्कि जल सुरक्षा के संभावित वैकल्पिक मॉडल के रूप में चर्चा में आती है। लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव, लागत, रखरखाव और बड़े पैमाने पर उपयोग की व्यवहारिकता का आकलन अभी भी ज़रूरी है।

भारत में AWG: संभावनाएं और व्यवहारिक चुनौतियां

यह तकनीक भारत जैसे विविध जलवायु वाले देश में एक संभावित वैकल्पिक स्रोत के रूप में उभर रही है। लेकिन शोध और व्यावहारिक प्रयोग दोनों से संकेत मिलता है कि इसकी व्यवहारिकता देश के अलग-अलग हिस्सों और मौसमी परिस्थितियों पर आधारित होगी।

कई भारतीय स्टार्ट-अप और शोध समूह पहले से ही हवा से पानी निकालने वाली तकनीकों पर काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु की एक कंपनी ने नवीकरणीय (रिन्यूएबल) ऊर्जा-आधारित AWG विकसित की है। यह सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों के साथ काम करती है, जिससे भूजल या बारिश पर निर्भरता कम हो सकती है। 

यह खासकर उन इलाकों में उपयोगी हो सकता है जहां भूजल गंभीर रूप से निचले स्तर पर पहुंच चुका है या आपूर्ति अस्थिर है।

शोध और व्यावहारिक प्रयोग दोनों से संकेत मिलता है कि इसकी व्यवहारिकता
देश के अलग-अलग हिस्सों और मौसमी परिस्थितियों पर आधारित होगी।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की वर्ष 2023 की डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज ऑफ इंडिया रिपोर्ट के अनुसार देश के लगभग एक-चौथाई आकलित ब्लॉक अत्यधिक दोहन, गंभीर या अर्ध-गंभीर श्रेणी में हैं, जहां भूजल दोहन उसकी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से अधिक हो चुका है। 

उदाहरण के लिए, राजस्थान के शुष्क जिलों और बुंदेलखंड क्षेत्र में जल उपलब्धता लंबे समय से चुनौती बनी हुई है, जबकि बेंगलुरु और चेन्नई जैसे तेजी से बढ़ते महानगरों में भी अत्यधिक जल निकासी और सीमित पुनर्भरण के कारण जलस्तर पर दबाव बढ़ा है। 

ऐसे इलाकों में वैकल्पिक और विकेंद्रीकृत जल स्रोतों की आवश्यकता अधिक महसूस की जा रही है।

अधिकांश AWG प्रणालियां संघनन आधारित होती हैं और इनमें प्रति लीटर पानी उत्पादन के लिए पर्याप्त ऊर्जा की ज़रूरत होती है, विशेषकर कम नमी वाले क्षेत्रों में।

AWG तकनीक: अलग-अलग जलवायु में क्षमता और चुनौतियां

इसी कारण विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में इनकी दक्षता में उल्लेखनीय अंतर देखा जाता है। कुछ मॉडलों को मध्यम से उच्च आर्द्रता वाले माहौल में बेहतर कार्य करने के लिए डिजाइन किया गया है, और इनकी दक्षता सूखे रेगिस्तानी इलाकों की तुलना में समुद्री तट या उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक होती है। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कुछ हिस्सों में छोटे पैमाने पर AWG और एटमोस्फेरिक वाटर हार्वेस्टिंग मॉडल के उपयोग देखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान के सांभर में सौर AWG मशीनों से पानी निकालने के कार्यक्रम जैसे प्रयास स्थानीय रूप से किए जा रहे हैं।

ज़मीनी वास्तविकता

जहां हवा से पानी निकालने की तकनीक एक आकर्षक समाधान के रूप में उभर रही है, वहीं इसकी व्यावहारिकता और बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन को लेकर वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग दोनों स्तर पर कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आती हैं।

  • ऊर्जा-गहन प्रकृति: अधिकांश AWG प्रणालियां संघनन आधारित होती हैं और इनमें प्रति लीटर पानी उत्पादन के लिए पर्याप्त ऊर्जा की ज़रूरत होती है, विशेषकर कम नमी वाले क्षेत्रों में।

  • आर्द्रता पर निर्भरता: उपकरण की कार्यक्षमता स्थानीय तापमान और नमी पर निर्भर करती है, शुष्क क्षेत्रों में पानी उत्पादन सीमित हो सकता है।

  • लागत और रख-रखाव: उपकरण, फिल्ट्रेशन सिस्टम और ऊर्जा लागत इसे बड़े पैमाने पर लागू करने में महंगा बना सकते हैं, विशेषकर ग्रामीण या कम-आय वाले क्षेत्रों में।

  • सीमित पैमाना: यह तकनीक सामुदायिक या संस्थागत स्तर पर अधिक व्यावहारिक है; बड़े शहरों की पूरी जल आपूर्ति का विकल्प अभी नहीं बन सकती।

  • जल गुणवत्ता निगरानी: संघनन से प्राप्त पानी को पीने योग्य बनाने के लिए फिल्टरिंग, खनिज संतुलन और माइक्रोबियल परीक्षण आवश्यक है।

भारत के विविध जलवायु क्षेत्रों में AWG की व्यवहारिकता

भारत की भौगोलिक और जलवायु विविधता को देखते हुए AWG या AWH की व्यवहारिकता एक जैसी नहीं हो सकती है।

तटीय और उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्र

(केरल, तटीय तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल)

  • औसत सापेक्ष आर्द्रता प्रायः 60-85 फ़ीसद के बीच, जिससे संघनन आधारित AWG की दक्षता बेहतर।

  • 0.3-0.5 kWh प्रति लीटर की ऊर्जा आवश्यकता के अनुमान के आधार पर, सौर-संचालित मॉडल अपेक्षाकृत व्यवहार्य।

  • छोटे संस्थागत ढांचे (स्कूल, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र) में विकेन्द्रीकृत मॉडल लागू किए जा सकते हैं।

  • राज्य जल नीति में इसे “पूरक स्रोत” के रूप में शामिल किया जा सकता है, न कि प्राथमिक पेयजल विकल्प के रूप में।

  • चक्रवात-प्रवण क्षेत्रों में आपदा-प्रबंधन रणनीति के हिस्से के रूप में संभावित उपयोग।

नीतिगत संकेत:

  • पायलट प्रोजेक्ट्स को स्थानीय जल गुणवत्ता और लागत-प्रभावशीलता के स्वतंत्र मूल्यांकन से जोड़ा जाए।

  • नवीकरणीय ऊर्जा आधारित AWG पर विशेष प्रोत्साहन।

शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र

(राजस्थान, गुजरात के शुष्क हिस्से, बुंदेलखंड)

  • औसत आर्द्रता 20-40 फ़ीसद के बीच; पारंपरिक संघनन तकनीक की दक्षता सीमित।

  • उच्च ऊर्जा खपत के कारण प्रति लीटर लागत ग्रामीण जल योजनाओं से अधिक हो सकती है।

  • भूजल दोहन वाले क्षेत्रों में इसे “अंतिम विकल्प” या “आपातकालीन समाधान” के रूप में देखा जा सकता है।

नीतिगत संकेत:

  • बड़े पैमाने पर निवेश से पहले तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता अध्ययन अनिवार्य।

  • पारंपरिक वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण उपायों को प्राथमिकता।

  • AWG को जल संकट-ग्रस्त संस्थागत परिसरों (जैसे दूरस्थ स्कूल/स्वास्थ्य उपकेंद्र) तक सीमित रखना।

पहाड़ी और मध्यम आर्द्रता वाले क्षेत्र

(हिमाचल, उत्तराखण्ड, पूर्वोत्तर राज्य)

  • कम तापमान संघनन प्रक्रिया को ऊर्जा-कुशल बना सकता है।

  • कई क्षेत्रों में प्राकृतिक स्रोत उपलब्ध, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण झरनों का मौसमी सूखना बढ़ रहा है।

  • सीमित पैमाने पर सामुदायिक बैकअप प्रणाली के रूप में उपयोग संभव।

  • दुर्गम बस्तियों में पाइप्ड जल आपूर्ति के पूरक विकल्प के रूप में परीक्षण योग्य।

नीतिगत संकेत:

  • स्प्रिंग-शेड प्रबंधन कार्यक्रमों के साथ एकीकृत मूल्यांकन।

  • उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ऑफ-ग्रिड सौर आधारित माइक्रो-मॉडल का परीक्षण।

भूजल दोहन वाले क्षेत्रों में AWG को “अंतिम विकल्प” या “आपातकालीन समाधान” के रूप में देखा जा सकता है।

भारत में वैज्ञानिक और औद्योगिक स्तर के प्रयास

  • दी एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट (TERI) ने मैथ्री एक्वाटेक के साथ मिलकर ‘मेघदूत’ नाम के AWG पर काम किया है, जिसका उद्देश्य खासकर दूरस्थ और जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए हवा की नमी से पेयजल उपलब्ध कराना है।

  • बेंगलुरु स्थित उरावू लैब्स (Uravu Labs) ने नवीकरणीय ऊर्जा आधारित AWG मॉडल विकसित किया है, जो भूजल पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से काम कर रहा है।

  • साइंस डायरेक्ट नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन भारत के विभिन्न जल-जोखिम वाले शहरों में AWG प्रणालियों की व्यवहारिक क्षमता (viability) का आकलन कर चुके हैं।

  • कर्नाटक के Bapuji Institute of Engineering and Technology (BIET) के छात्रों ने सौर ऊर्जा आधारित प्रोटोटाइप विकसित किया है, जो हर दिन सीमित मात्रा में जल उत्पादन करने में सक्षम है।

नीति और जल प्रबंधन के लिए संकेत

  • जलवायु अनुकूलन में नई तकनीकों की भूमिका: बदलते तापमान और अनियमित वर्षा के दौर में AWG जैसी तकनीकों को जलवायु अनुकूलन रणनीतियों में पूरक स्रोत के रूप में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है।

  • आपदा के समय विकेंद्रीकृत समाधान: बाढ़, सूखा या चक्रवात के दौरान केंद्रीकृत जल आपूर्ति बाधित होने पर छोटे-पैमाने की सामुदायिक AWG इकाइयां स्थानीय जल सुरक्षा को मजबूत कर सकती हैं।

  • भूजल संकट के बीच वैकल्पिक स्रोत: कई क्षेत्र अति-दोहन वाली श्रेणी में पहुंच चुके हैं, जिससे वैकल्पिक और पूरक जल स्रोतों की आवश्यकता बढ़ती है।

  • समग्र दृष्टिकोण की जरूरत: AWG को चमत्कारी समाधान नहीं, बल्कि वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जल संरक्षण जैसे प्रयासों के साथ एकीकृत रणनीति के हिस्से के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक होगा।

हवा से पानी निकालने की तकनीकें बताती हैं कि जल संकट के समाधान अब केवल ज़मीन या नदियों तक सीमित नहीं हैं। फिर भी, यह तकनीक ऊर्जा, लागत और व्यवहारिक सीमाओं से मुक्त नहीं है। इसलिए इसे चमत्कारी उपाय नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में एक पूरक विकल्प के रूप में देखना अधिक यथार्थवादी होगा।

भारत जैसे देश में, जहां जल असमानता और भूजल पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, वैज्ञानिक नवाचार तभी सार्थक होंगे जब वे स्थानीय जल प्रबंधन, संरक्षण और नीतिगत सुधारों से जुड़े हों। असली सवाल यह है कि हम पानी के नए स्रोत खोजने के साथ-साथ अपने जल संसाधनों के प्रति जिम्मेदार दृष्टिकोण कैसे विकसित करते हैं।

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

SCROLL FOR NEXT