चेन्नई की वेलाचेरी झील सिकुड़ती जा रही है, जिससे शहर में जलभराव, बाढ़ और भूजल संकट बढ़ रहा है।

 
नदी और तालाब

क्यों सिकुड़ रही है चेन्नई की वेलाचेरी झील?

वेलाचेरी झील का तेजी से घटता दायरा चेन्नई में बाढ़, जलभराव और भूजल संकट के बढ़ते असंतुलन की ओर इशारा करता है। यह मामला दिखाता है कि कैसे अनियंत्रित शहरीकरण एक पूरे जल-तंत्र को कमजोर कर देता है।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

चेन्नई में बारिश का आना केवल मौसम का बदलाव नहीं होता है। बारिश के आते ही शहर की जीवनशैली ही बदल जाती है। कुछ ही घंटों की तेज़ बारिश में सड़कों पर बाढ़ जैसी स्थि‍ति बन जाती है, बसों की रफ़्तार धीमी पड़ने लगती हैं और मोहल्लों में घरों के बाहर जमे पानी से लोगों का जीवन ठप्प पड़ जाता है। 

कभी झीलें और जलधाराएं इस शहर के जीवन का आधार थीं। वर्ष 1980 तक शहर का 80 प्रतिशत भाग आर्द्रभूमि हुआ करता था। जो आज मात्र 15 प्रतिशत बचा है। बीते 20 वर्षों में 15 से अधिक झीलें, तालाब और टैंक खत्म हो गए। यही वजह है कि बारिश आते ही लोगों को जलभराव का डर सताने लगता है। 

वेलाचेरी झील इसी विडंबना की सबसे सशक्त मिसाल है। GIS विशेषज्ञ दयानंद कृष्णन द्वारा किए गए अध्ययन और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) की सुनवाई में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, वेलाचेरी झील का क्षेत्रफल 265 एकड़ से घटकर 55 एकड़ रह गया है। इसी के साथ इसकी जलधारण क्षमता 19.24 Mcft से घटकर 4.82 Mcft तक पहुंच गई है, जो शहरी बाढ़ जोखिम और भूजल पुनर्भरण दोनों पर गंभीर असर डालती है।

वेलाचेरी झील का सिकुड़ता दायरा

वेलाचेरी झील कभी चेन्नई के दक्षिणी जलग्रहण क्षेत्र की एक प्रमुख प्राकृतिक जल संरचना मानी जाती थी। यह केवल सतही जल का संग्रहण स्थल नहीं थी, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भूजल स्तर बनाए रखने में भी इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, शहरी विस्तार के साथ झीलों का प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित होता है। वेलाचेरी के साथ भी यही हुआ। 

एक स्थानिक विश्लेषण अध्ययन (spatial analysis study) के अनुसार वेलाचेरी झील अपने मूल क्षेत्रफल का केवल 24.78 फ़ीसद ही बचा पाई है। यानी तकनीकी मानचित्रों और उपग्रह आंकड़ों के आधार पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि झील का बड़ा हिस्सा अतिक्रमण और निर्माण की भेंट चढ़ चुका है।

बीते वर्षों में झील के कैचमेंट क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण, आवासीय विस्तार और सड़कों के विकास ने वर्षाजल के स्वाभाविक प्रवाह को बाधित किया है। नतीजतन, पानी झील तक व्यवस्थित रूप से पहुंचने के बजाय रिहायशी इलाकों में भरने लगा।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि समस्या केवल बारिश की मात्रा नहीं, बल्कि पानी के प्राकृतिक रास्तों के बंद हो जाने की है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र के लोगों को हर साल मानसून से पहले स्थिति को बेहतर बनाने का आश्वासन मिलता है, लेकिन झील की सफाई और नालों की डी-सिल्टिंग समय पर नहीं होती। जिससे कि समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है।

वेलाचेरी झील अपने मूल क्षेत्रफल का केवल 24.78 फ़ीसद ही बचा पाई है।

जलभराव का कारण 

शहरी जल विशेषज्ञों का कहना है कि झीलों का सिकुड़ना केवल जल संरक्षण का मुद्दा नहीं है। बल्कि यह बाढ़ प्रबंधन से भी सीधे जुड़ा होता है। झीलें शहर के लिए प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती हैं। जब उनका फैलाव कम होता है, तो अतिरिक्त वर्षाजल को समाहित करने की क्षमता भी घट जाती है।

वेलाचेरी में यही स्थिति दिखाई देती है। अतिक्रमण, तलछट जमाव और आउटलेट चैनलों के बाधित होने से झील की जलधारण क्षमता कम होती गई है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत कम समय के लिए होने वाली तेज़ बारिश भी आसपास के इलाकों में जलभराव का कारण बन जाती है। 

जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, लगभग 2,000 वैध और अवैध अतिक्रमणों ने भी झील के मूल फैलाव को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

चेन्नई की बाढ़ केवल अत्यधिक वर्षा का नतीजा नहीं है, बल्कि यह एक जल-प्रबंधन और शहरी योजना की विफलता (hydrological planning failure) भी है। यानी शहर की योजना बनाते समय यह पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया कि पानी प्राकृतिक रूप से कैसे बहता है, कहां ठहरता है और कैसे जमीन के भीतर जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञ जयश्री वेंकटेशन का कहना है कि शहर की योजना प्रक्रिया ने उसके जल-भूगोल और प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र की अनदेखी की है।

झीलें शहर के लिए प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती हैं। जब उनका फैलाव कम होता है, तो अतिरिक्त वर्षाजल को समाहित करने की क्षमता भी घट जाती है।

झीलों की जल-प्रणाली का ढांचा

वेलाचेरी झील का संकट केवल एक स्थानीय जल निकाय के क्षरण की कहानी नहीं है, बल्कि यह शहरी जल-प्रणाली के टूटने का संकेत भी है। किसी भी झील की कार्यक्षमता तीन मूलभूत घटकों पर निर्भर करती है: इसका कैचमेंट क्षेत्र, प्राकृतिक जल-प्रवाह मार्ग और समय पर डी-सिल्टिंग तथा संरक्षण।
जब शहरी विस्तार इन तीनों में हस्तक्षेप करता है, तो झील की भूमिका केवल जल-संग्रहण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह बाढ़ नियंत्रण और भूजल पुनर्भरण दोनों में कमजोर पड़ जाती है। यही असंतुलन कई शहरों में एक साथ जलभराव और जल-संकट की स्थिति पैदा करता है।

2024 में MDPI के एक शोध में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि बाढ़ की तीव्रता वर्षा, शहरीकरण और भूमि उपयोग परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से बढ़ती है।

चेन्नई की बाढ़: एक शहरी नियोजन संकट

चेन्नई में बाढ़ की समस्या केवल बहुत अधिक बारिश का परिणाम नहीं है, बल्कि यह शहर की जल-नियोजन प्रणाली में गहरे संरचनात्मक दोषों की ओर संकेत करती है। अनेक अध्ययनों और पर्यावरणीय आकलनों में यह स्पष्ट किया गया है कि शहर की स्थलाकृति (Topography), प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र और अनियंत्रित शहरी विस्तार ने मिलकर जल-प्रवाह की प्राकृतिक व्यवस्था को बाधित किया है।

विशेषज्ञों के अनुसार चेन्नई का अधिकांश हिस्सा निम्न-स्तरीय समतल भूभाग पर स्थित है, जिससे वर्षाजल के ठहरने की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। 2012 के एक अध्ययन में स्थलाकृति को बाढ़ जोखिम का प्रमुख कारक बताया गया था। जबकि 2024 में MDPI के एक शोध में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि बाढ़ की तीव्रता वर्षा, शहरीकरण और भूमि उपयोग परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से बढ़ती है।

यही कारण है कि बारिश के पानी का एक बड़ा हिस्सा झीलों और एक्विफ़ायर तक पहुंचने के बजाय सड़कों और रिहायशी इलाकों में ठहर जाता है। परिणामस्वरूप शहर एक ही मौसम चक्र में बाढ़ और भूजल संकट, दोनों का अनुभव करता है।

भूजल पर गहराता दबाव

इस जल-प्रणाली के असंतुलन का सबसे गहरा प्रभाव भूमिगत जल-तंत्र पर पड़ता है। जब झीलों का क्षेत्रफल घटता है या उनके कैचमेंट क्षेत्र पर निर्माण हो जाता है, तो वर्षाजल का प्राकृतिक रिसाव (infiltration) बाधित हो जाता है। इससे भूमिगत एक्विफ़ायर तक पहुंचने वाला पानी कम हो जाता है और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।

चेन्नई नदी बेसिन पर किए गए अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रभावी वर्षाजल पुनर्भरण शहरी जल-सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

लेकिन शहरीकरण के दबाव में यह प्राकृतिक प्रक्रिया लगातार बाधित हो रही है। यही कारण है कि चेन्नई एक विरोधाभासी स्थिति में फंसा हुआ दिखाई देता है। एक तरफ़ मानसून में जलभराव की समस्या होती है तो दूसरी ओर गर्मियों में यहां के लोगों को पानी की कमी की संकट से जूझना पड़ता है।

संसदीय समितियों की रिपोर्ट भी इस बात की ओर संकेत करती हैं कि शहर में जल संकट केवल वर्षा की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह झीलों पर अतिक्रमण, अपर्याप्त जलनिकासी और योजनागत विफलताओं का संयुक्त परिणाम है।

दरअसल, इसी आधार पर कहा जा सकता है कि चेन्नई का जल-जमाव और बाढ़ शहरी जल विरोधाभास का एक नायाब उदाहरण बन जाता है। एक ही शहर एक ही मौसम चक्र में बाढ़ और जल-अभाव, दोनों का अनुभव करता है। बारिश के समय अतिरिक्त पानी शहर को डुबो देता है, लेकिन वही पानी पर्याप्त मात्रा में ज़मीन के भीतर नहीं पहुंच पाता।

परिणामस्वरूप कुछ ही महीनों बाद जल-स्तर नीचे चला जाता है और पानी की निर्भरता टैंकरों और गहरे बोरवेलों पर बढ़ जाती है। यह असंतुलन केवल जल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शहर की जलवायु प्रणाली तक पहुंच जाता है।

साल 2001 से 2022 के बीच चेन्नई के भूमि सतह तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। इसी अवधि में शहरी ताप द्वीप (SUHI) 0.71°C से बढ़कर 1.43°C तक पहुंच गई।

शहर की बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट

जल निकायों और आर्द्रभूमियों के सिकुड़ने का प्रभाव केवल जल-प्रबंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शहर के तापीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। झीलें और हरित क्षेत्र मिलकर शहर के लिए एक हरित-जल संरचना (blue-green system) बनाते हैं। इसका मतलब है ऐसे प्राकृतिक और अर्ध-प्राकृतिक क्षेत्र जो पानी को रोकते हैं, उसे धीरे-धीरे जमीन में सोखते हैं और शहर के तापमान को भी संतुलित रखते हैं।

चेन्नई में किए गए अध्ययनों के अनुसार, 2001 से 2022 के बीच भूमि सतह तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। इसी अवधि में शहरी ताप द्वीप (SUHI) 0.71°C से बढ़कर 1.43°C तक पहुंच गई, जो यह दर्शाती है कि शहर का तापीय संतुलन लगातार बिगड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती भी बन चुकी है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव बुजुर्गों, बच्चों और खुले में काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ता है।
स्पष्ट है कि चेन्नई में जल संकट, बाढ़ और तापमान में होने वाली वृद्धि अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं, बल्कि एक ही शहरी पारिस्थितिकी तंत्र के आपस में जुड़े हुए आयाम हैं।

ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन (Greater Chennai Corporation) ने अपनी blue-green infrastructure परियोजनाओं के रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है कि झीलों के पुनर्जीवन का उद्देश्य केवल जलभराव कम करना नहीं, बल्कि भूजल पुनर्भरण को भी बेहतर बनाना है।

क्या है समाधान

वेलाचेरी झील की कहानी यह स्पष्ट करती है कि शहरी जल संकट का समाधान केवल आपातकालीन जलनिकासी या मानसून-पूर्व तैयारियों तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए शहर को अपने जल-भूगोल के साथ फिर से संवाद स्थापित करना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि झीलों के संरक्षण को केवल सौंदर्यीकरण की परियोजनाओं की तरह नहीं, बल्कि हरित संरचना (blue-green infrastructure) के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। यानी ऐसे शहरी ढांचे और संरचनाएं जो पानी को रोकें, सोखें और धीरे-धीरे बहाने दें। चेन्नई में हाल के झील पुनरोद्धार परियोजनाएं और स्पंज पार्क इसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।

वेलाचेरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में प्राथमिकता तीन स्तरों पर होनी चाहिए: 

  • झील का पुनर्जीवन

  • प्राकृतिक जल-प्रवाह मार्गों की बहाली और 

  • कैचमेंट क्षेत्र की सुरक्षा। 

इसके साथ नियमित डी-सिल्टिंग, अतिक्रमण हटाने और वर्षाजल पुनर्भरण संरचनाओं को मज़बूत करना भी उतना ही आवश्यक है।
एक रिपोर्ट के अनुसार चेन्नई में हाल के झील पुनरोद्धार परियोजनाओं (lake restoration projects) को भी इसी कारण भूजल पुनर्भरण (groundwater recharge) और बाढ़ शमन (flood mitigation) से जोड़ा जा रहा है। ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन (Greater Chennai Corporation) ने अपनी blue-green infrastructure परियोजनाओं के रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है कि झीलों के पुनर्जीवन का उद्देश्य केवल जलभराव कम करना नहीं, बल्कि भूजल पुनर्भरण को भी बेहतर बनाना है।

दरअसल, शहरों को अब “ड्रेनेज” से आगे बढ़कर पानी सोंखने वाली संरचनाओं (sponge city model) की ओर देखना होगा, जहां झीलें, आर्द्रभूमियां, खुले मैदान और हरित क्षेत्र मिलकर बारिश के पानी को अपने भीतर समाहित कर सकें। यह केवल बाढ़ कम करने का उपाय नहीं, बल्कि भूजल पुनर्भरण, तापमान नियंत्रण और जलवायु-लचीलापन की भी रणनीति है।

वेलाचेरी झील केवल एक जल निकाय नहीं है। यह उस शहरी स्मृति का हिस्सा है, जिसे धीरे-धीरे मिटाया गया है। इसे बचाना केवल पर्यावरणीय कदम नहीं, बल्कि उस शहर की जल-संस्कृति और भविष्य को पुनः स्थापित करने की कोशिश है, जो हर मानसून अपने भूले हुए जल-मानचित्र की याद दिलाता है।

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