गांव के आसपास बने एनीकट, छोटे बांध और वर्षाजल संचयन ढांचों ने न केवल भूजल स्तर में सुधार किया है, बल्कि खेती, पशुपालन और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी असर डाला है।

 

चित्र: दी वायर

नदी और तालाब

राजस्थान के दीपावास गांव ने एनीकट से बदल दी पानी की कहानी, बंजर जमीनों पर हरियाली

दीपावास में कुछ साल पहले तक गर्मियों में कई कुएं सूख जाते थे और खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर थी। बाद में गांव में छोटे स्तर पर जल संरक्षण ढांचे बनाने का काम शुरू हुआ।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

कभी गर्मियों में जहां दीपावास के खेत सूखे रह जाते थे और किसान आसमान की तरफ देखकर बारिश का इंतजार करते थे, वहीं आज उसी गांव में बरसाती पानी को रोकने वाली छोटी-छोटी संरचनाओं ने भूजल, खेती और नदी, तीनों की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है।

दीपावास से जुड़ी दी वायर की ग्राउंड रिपोर्ट और स्थानीय जल संरक्षण कार्यकर्ताओं के अनुसार गांव के आसपास बने एनीकट, छोटे बांध और वर्षाजल संचयन ढांचों ने न केवल भूजल स्तर में सुधार किया है, बल्कि खेती, पशुपालन और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी असर डाला है।

रिपोर्ट में स्थानीय ग्रामीणों ने बताया है कि कुछ साल पहले तक गर्मियों में कई कुएं सूख जाते थे और खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर थी। बाद में गांव में छोटे स्तर पर जल संरक्षण ढांचे बनाने का काम शुरू हुआ।

यह बदलाव केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। यह दिखाता है कि स्थानीय समुदाय, पारंपरिक जल संरचनाएं और वैज्ञानिक जल प्रबंधन साथ आएं तो सूखे क्षेत्रों में भी पानी रोका जा सकता है।

दीपावास गांव सीकर जिले के नीमकाथाना क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला के करीब स्थित है। यह इलाका अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्र में आता है, जहां औसत वर्षा सीमित और अनिश्चित रहती है। यहां की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि बारिश का पानी तेज ढाल के साथ बहकर निकल जाता है, जिससे भूजल रिचार्ज लंबे समय तक चुनौती बना रहा।

जहां बारिश का पानी बह जाता था

अरावली क्षेत्र के कई हिस्सों की तरह दीपावास और उसके आसपास के इलाके भी लंबे समय से जल संकट से जूझते रहे हैं। कम वर्षा, गिरता भूजल स्तर और बरसाती पानी का तेजी से बहकर निकल जाना यहां की बड़ी समस्या थी।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की 2022 की Dynamic Ground Water Resources Assessment Report के अनुसार राज्य के अधिकांश ब्लॉकों में भूजल दोहन रिचार्ज से अधिक दर्ज किया गया।

राजस्थान में देश की बड़ी आबादी और खेती का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद सतही और भूजल संसाधन बेहद सीमित हैं। ऐसे में बारिश की बूंद-बूंद को रोकना यहां जीवन और आजीविका दोनों के लिए जरूरी बन जाता है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि जल संरक्षण प्रयासों में गांव के लोगों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही। कई जगहों पर समुदाय ने जलधाराओं, एनीकटों और आसपास के क्षेत्रों की निगरानी और संरक्षण में भूमिका निभाई।

एनीकटों ने बदला पानी का रास्ता

स्थानीय लोगों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पिछले लगभग आधे दशक में गांव और आसपास के जलग्रहण क्षेत्र में कई छोटे एनीकट, चेक डैम और वर्षाजल संरक्षण ढांचे बनाए गए। इन संरचनाओं का उद्देश्य बरसाती पानी को रोकना, मिट्टी में रिसाव बढ़ाना और भूजल पुनर्भरण को मजबूत करना था।

ग्रामीणों के मुताबिक शुरुआत में यह प्रयास छोटे स्तर पर हुआ, लेकिन समय के साथ इसके प्रभाव दिखाई देने लगे। जिन मौसमी जलधाराओं से पहले बारिश का पानी तेजी से बहकर निकल जाता था, वहां अब पानी अधिक समय तक रुकने लगा।

एनीकट छोटे अवरोधक बांध होते हैं, जिन्हें बरसाती जलधाराओं पर बनाया जाता है ताकि बहते पानी की गति धीमी हो सके। इससे पानी कुछ समय तक रुकता है, मिट्टी में रिसता है और भूजल रिचार्ज बढ़ता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की NAQUIM रिपोर्ट के अनुसार अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में ऐसे छोटे जल संचयन ढांचे जलस्तर स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

ग्रामीणों और जल संरक्षण कार्यकर्ताओं के मुताबिक एनीकट बनने के बाद कई कुओं और हैंडपंपों में पानी अधिक समय तक टिकने लगा। हालांकि हर क्षेत्र में समान सुधार नहीं दिखा, लेकिन कई इलाकों में मौसमी जल उपलब्धता बेहतर हुई है। 

राजस्थान में विभिन्न जल संरक्षण परियोजनाओं के तहत बने एनीकटों और चेक डैमों से कई इलाकों में कुओं का जलस्तर सुधरा है। ऐसे सुधारों का उल्लेख विभिन्न सरकारी आकलनों और जल संरक्षण अध्ययनों में भी किया गया है।

दीपावास के आसपास बहने वाली गिरजन नदी भी अब स्थानीय लोगों के लिए केवल मौसमी जलधारा नहीं रह गई है। क्षेत्रीय अध्ययन यह भी संकेत देते हैं कि नदी-आधारित जलग्रहण प्रणालियाँ भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभाती हैं। 

पर्यावरण समूह ‘पीपल फॉर अरावलीज़’ की संस्थापक नीलम अहलूवालिया के अनुसार लगभग 40 गांव और करीब 60,000 लोग इस नदी और उससे जुड़े भूजल रिचार्ज तंत्र पर निर्भर हैं। संगठन लंबे समय से अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और जलग्रहण क्षेत्रों पर पड़ रहे दबाव को लेकर आवाज उठाता रहा है।

दी वायर की रिपोर्ट के अनुसार गिरजन नदी क्षेत्र में ब्लैक-विंग्ड स्टिल्ट, स्पॉट-बिल्ड डक और कॉम्ब डक जैसे पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। साफ पानी में जलीय वनस्पतियां भी देखी गईं, जो इस क्षेत्र की बदलती नदीतटीय पारिस्थितिकी (riparian ecology) का संकेत मानी जा रही हैं। विशेषज्ञ इसे नदीतटीय पारिस्थितिकी के पुनर्जीवन का शुरुआती संकेत मानते हैं।

गिरजन नदी क्षेत्र में ब्लैक-विंग्ड स्टिल्ट, स्पॉट-बिल्ड डक और कॉम्ब डक जैसे पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई है।

पानी लौटा तो खेती भी बदली

विशेषज्ञों के अनुसार भूजल रिचार्ज का असर आमतौर पर समय के साथ दिखाई देता है और इसमें कई वर्ष लग सकते हैं।

गांव वालों का कहना है कि जल संरक्षण के असर तुरंत दिखाई नहीं दिए। शुरुआती वर्षों में बदलाव सीमित थे, लेकिन कुछ वर्षों बाद भूजल स्तर, मिट्टी की नमी और सिंचाई उपलब्धता में बदलाव साफ दिखने लगा।

भूजल स्तर बढ़ने का असर सीधे खेती पर दिखाई देने लगा। जिन खेतों में पहले सीमित फसल होती थी, वहां अब रबी फसलें भी बोई जाने लगीं। स्थानीय किसानों का कहना है कि पहले एक फसल निकालना मुश्किल होता था, अब कुछ खेतों में दूसरी फसल भी संभव हो रही है।

किसानों के अनुसार जहां पहले केवल सीमित खरीफ खेती संभव थी, वहीं अब कुछ इलाकों में गेहूं, सरसों और चारे की फसलें भी उगाई जाने लगी हैं। इससे ग्रामीण आय, पशु चारे की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा पर सकारात्मक असर पड़ा है।

कुछ इलाकों में एनीकटों के आसपास मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहने लगी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार राजस्थान के कुछ जल संरक्षण क्षेत्रों में मानसून के बाद भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया।

खेती के साथ पशुपालन को भी फायदा हुआ। गांवों में तालाबों और छोटे जलाशयों में पानी टिकने से पशुओं के लिए पानी की उपलब्धता बेहतर हुई। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक असर पड़ा।

नीमकाथाना क्षेत्र में महिलाओं ने जल स्रोतों और अरावली संरक्षण को लेकर लंबे समय से विरोध प्रदर्शन किए हैं। इसमें 18 गांवों की महिलाएं गिरजन नदी और आसपास के जल स्रोतों को प्रभावित करने वाले खनन गतिविधियों के खिलाफ लगातार आंदोलन चला रही हैं।

ग्रामीण जल संकट का सबसे बड़ा बोझ अक्सर महिलाओं पर पड़ता है। पानी नजदीक उपलब्ध होने से कई परिवारों में पानी लाने की दूरी और समय दोनों कम हुए हैं। स्थानीय महिलाओं का कहना है कि गर्मियों में पानी जुटाने का दबाव अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

अगर पहाड़ नहीं रहेंगे तो नदी भी नहीं बचेगी।
कैलाश मीणा, स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता

केवल पानी नहीं, पारिस्थितिकी भी बदली

यह बदलाव केवल पानी तक सीमित नहीं रहा। पानी लौटने के साथ स्थानीय पारिस्थितिकी में भी बदलाव दिखाई देने लगे। स्थानीय स्तर पर वनस्पतियों की वापसी, पक्षियों की आवाजाही और मिट्टी की नमी में सुधार जैसे संकेत सामने आए हैं। कुछ क्षेत्रों में मौसमी हरियाली और मिट्टी की नमी लंबे समय तक बने रहने की भी बात स्थानीय लोग बताते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि नदी, पहाड़ और भूजल रिचार्ज आपस में जुड़े हुए तंत्र हैं। अरावली की पहाड़ियां वर्षाजल को रोकने, मिट्टी में रिसाव बढ़ाने और नीचे की तरफ़ बहने वाली जलधाराओं को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

जल संरक्षण के सकारात्मक असर के साथ-साथ अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों को लेकर चिंता भी बढ़ी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पहाड़ और जलग्रहण क्षेत्र प्रभावित हुए, तो वर्षों में बना जल संतुलन कमजोर पड़ सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि अरावली की प्राकृतिक जलधारण क्षमता प्रभावित हुई, तो रिचार्ज आधारित सुधार भी लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगे। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता कैलाश मीणा के अनुसार, “अगर पहाड़ नहीं रहेंगे तो नदी भी नहीं बचेगी।”

CGWB आधारित आकलनों
के अनुसार 2023 में राजस्थान में लगभग 11.54 BCM भूजल रिचार्ज हुआ, जबकि करीब 16.74 BCM भूजल का दोहन दर्ज किया गया, जो राज्य में बढ़ते जल दबाव को दिखाता है।

राजस्थान के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मॉडल?

राजस्थान में जल संकट केवल कम बारिश का नतीजा नहीं है। समस्या यह भी है कि जो बारिश होती है, उसका बड़ा हिस्सा संरक्षित नहीं हो पाता।

CGWB आधारित आकलनों के अनुसार 2023 में राजस्थान में लगभग 11.54 BCM भूजल रिचार्ज हुआ, जबकि करीब 16.74 BCM भूजल का दोहन दर्ज किया गया, जो राज्य में बढ़ते जल दबाव को दिखाता है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड की “सीकर जिले में जलभृत मानचित्रण और भूजल प्रबंधन” रिपोर्ट में भी जिले में भूजल पर बढ़ते दबाव, भूमिगत जल संरचना की स्थिति और वर्षाजल संरक्षण आधारित भूजल पुनर्भरण की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार बड़े बांधों के साथ-साथ एनीकट, जोहड़, तालाब और छोटे रिचार्ज ढांचे सूखे क्षेत्रों में अधिक प्रभावी स्थानीय समाधान साबित हो सकते हैं।

केंद्रीय भूजल बोर्ड का डायनेमिक भूजल आकलन लंबे समय से राजस्थान के कई हिस्सों में गिरते भूजल स्तर को लेकर चेतावनी देता रहा है। राज्य के अनेक ब्लॉक अति-दोहन की श्रेणी में आते हैं, जहां भूजल के दोहन का दर उसके रिचार्ज दर से अधिक है।

दीपावास दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे हस्तक्षेप भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में राजस्थान जैसे क्षेत्रों में बारिश अधिक अनिश्चित होती जा रही है और कम दिनों में अधिक तीव्रता के साथ दर्ज की जा रही है। 

ऐसे में वर्षाजल को स्थानीय स्तर पर रोकने वाली संरचनाएं तेज बहाव को नियंत्रित करने और भूजल रिचार्ज बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

स्थानीय संरक्षण से मिली नई दिशा

दीपावास यह याद दिलाता है कि पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज, खेती और स्थानीय पारिस्थितिकी की बुनियाद है।

जब गांव अपने जल स्रोतों, पहाड़ियों और जलग्रहण क्षेत्रों को बचाते हैं, तो वे केवल खेतों के लिए पानी नहीं बचाते, बल्कि पशुधन, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों की जल सुरक्षा को भी मजबूत करते हैं।

यह उदाहरण दिखाता है कि जल संकट का समाधान केवल बड़े बांधों या विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे लेकिन लगातार प्रयासों में भी छिपा हो सकता है। एनीकट, जोहड़, तालाब और वर्षाजल संचयन जैसी संरचनाएं तब अधिक प्रभावी बनती हैं, जब उनके साथ सामुदायिक भागीदारी और जलग्रहण संरक्षण भी जुड़ा हो।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि केवल जल संरचनाएं बना देना पर्याप्त नहीं है। यदि अरावली के पहाड़, प्राकृतिक जलधाराएं और रिचार्ज जोन खनन या अवैज्ञानिक विकास से प्रभावित होते रहे, तो वर्षों में बना जल संतुलन फिर कमजोर पड़ सकता है।

दीपावास यह दिखाता है कि पानी बचाने की लड़ाई केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि समुदाय, पारिस्थितिकी और भविष्य को बचाने की लड़ाई भी है।

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