सिहोर जिले में ग्रामणों द्वारा तालाब खोदे जाने के बावजूद अधिकारी उसे भरने के लिए पानी उपलब्ध नहीं करा रहे, जिसके चलते लोगों को काफी दूर से पानी ढो कर लाना पड़ रहा है।
फोटो : विकी कॉमंस
लोगों द्वारा श्रमदान या सामुदायिक सहयोग से कुएं, तालाब को पुनर्जीवित करने की खबरें तो आपने सुनी होंगी। पर, क्या कभी ऐसा सुना है कि पूरी मेहनत से तालाब खोद कर भी गांव के लोग प्यासे रह जाएं। जी हां, ऐसा ही हैरान कर देने वाला एक मामला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के नजदीकी जिले सीहोर में देखने को मिल रहा है। सरकारी तंत्र की लाल फीताशही के चलते यहां कई गांवों को कोर्ट के आदेश के बावजूद पानी नहीं मिल पा रहा है। कई वर्षों से यहां के लोग भीषण गर्मी में पानी के लिए तरस रहे हैं।
सिहोर के 7 गांवों के लोग जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद अपनी घरेलू जरूरतों से लेकर मवेशियों को पिलाने तक के लिए बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कोर्ट के आदेश की अनसुनी करते हुए प्रशासनिक अधिकारी और जल संसाधन विभाग मनमाना रवैया अपनाते हुए 7 गांवों को पीने का पानी मुहैया नहीं करा रहे हैं।
सीहोर में सालों पहले जब जमोनिया तालाब का निर्माण होना था, तब इलाके के मुंगावली, जमोनिया, दीपड़ा, मुहाली, करंज खेड़ा और मगरखेड़ा सहित 7 गांवों के किसानों ने दिन-रात एक करके पूरे उत्साह के साथ श्रमदान किया था। ग्रामीणों सोच रहे थे कि उनकी इस पहल से इलाके का जल संकट दूर हो जाएगा। जब तालाब भरेगा तो आसपास के सभी गावों को लोगों को उनकी जरूरत भर का पर्याप्त पानी उपलब्ध हो जाएगा। पर, तालाब खोदने के बाद भी सरकारी तंत्र की मनमानी के चलते उनका यह सपना धरा का धरा रह गया। उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश भी इन्हें पानी नहीं दिलवा पा रहा है। गांव को नर्मदा जल परियोजना से भी नहीं जोड़ा गया है। इस कारण तालाब में नर्मदा का पानी भी नहीं पहुंच रहा है। गांव के किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए भी किसी नहर या नलकूप से पानी मुहैया नहीं कराया जा रहा है। ऐसे में इन गावों के किसानों के लिए खेती और पशुपालन कर पाना भी संभव नहीं हो पा रहा है।
ग्रामीण बताते हैं कि साल 2000 तक इन गांवों को पेयजल और और अन्य जरूरतों के लिए बराबर पानी दिया जाता था, लेकिन फिर अचानक बिना किसी ठोस वजह के पानी की सप्लाई को बंद कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि आज इन गांवों का वाटर लेवल पाताल में जा चुका है। अब यहां के हैंडपंप और बोरिंग पूरी तरह सूख चुके हैं इसके बावजूद जमोनिया तालाब का पानी गांवों तक नहीं पहुंचने दिया जा रहा।
सीहोर के मुंगावली, जमोनिया, दीपड़ा, मुहाली, करंज खेड़ा और मगरखेड़ा में कई वर्षों तक पीने का पानी नहीं मिलने पर परेशान ग्रामीणों ने नेताओं और अधिकारियों के चक्कर लगाए। करीब एक दशक तक अधिकारियों से गुहार लगाने और अर्जिया देने के बावजूद उन्हें पानी नहीं मिला। जल संसाधन विभाग, कलेक्टर समेत कई अधिकारियों से गुहार लगाई लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद 2012 में इन लोगों ने जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अदालत में 3 साल तक कानूनी लड़ाई चली। हाईकोर्ट ने 2015 में सीहोर जिला प्रशासन को सख्त आदेश दिया कि 7 गांव के लिए पानी उपलब्ध कराया जाए। इसके बावजूद पानी नहीं मिल रहा है।
गांव के किसान बताते हैं, हाईकोर्ट के आदेश के बाद जिला स्तरीय जल उपयोगिता समिति की बैठक में तत्कालीन कलेक्टर सुदाम खाड़े ने लिखित निर्देश तो जारी किया कि तालाब से 0.46 मिलियन घन मीटर पानी ग्रामीणों के लिए हर हाल में छोड़ा जाए, लेकिन पिछले 11 सालों से यह आदेश सरकारी फाइलों में धूल खा रहा है।
प्रशासन और जल संसाधन विभाग की मनमानी से आक्रोशित गांव के किसानों का कहना है कि अधिकारी जानबूझ कर कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हुए अगर साल में सिर्फ 2 बार भी पानी स्टापडैम के लिए छोड़ दिया जाए तो तालाब भरने के साथ ही पूरे इलाके का वाटर लेवल रिचार्ज हो सकता है और जलसंकट खत्म हो सकता है। लेकिन, प्रशासनिक लालफीताशाही के कारण ऐसा नहीं किया जा रहा है। इसे देखते हुए वह अब इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने का मन बना रहे हैं।
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