डंबूर आयलैंड 

 

फोटो - ढलाई जिला प्रशासन त्रिपुरा सरकार 

नदी और तालाब

डंबूर झील में डूब गई जमीनें, अब मछली पर निर्भर किसानों की जिंदगी

एक समय में राइमा-साइमा घाटी के बीच उपजाऊ जमीन हुआ करती थी, जो अब डंबूर झील में डूब गई है। जो आदिवासी परिवार विस्थापित हुए उनका जीवन धान के खेतों से शुरू हुआ लेकिन अब वो सब एक सपना है, आजीविका के लिए ये किसान अब केवल मछलियों पर निर्भर हैं।

Author : थॉमस मैल्सम

राइमा! आज तुम
गुमोती बनकर बहती हो,
कभी तो तुम
बोलोंग-कोरोमोती की बेटी कहलाती थीं।

तुम्हारे हर नाम में
हमारी कहानी बसी है,
इस धरती की हर आहट
हमने तुमसे ही रची है।

जैसे-जैसे पानी चढ़ता है,
हमारा बीता समय डूबता जाता है।

एथ्नो-नेशनलिस्ट (जातीय-राष्ट्रवादी) लेखक और कवि बिकास कुमार देबबर्मा की इस कविता की पंक्तियां गोमती नदी बेसिन पर बांध बनने के बाद पानी में डूब गई राइमा-साइमा घाटी में ज़मीन और लोगों के जीवन, दोनों में आए अलगाव की कहानी बयान करती हैं। अपनी इस कविता के माध्यम से बिकास बता रहे हैं कि कैसे डंबूर झील ने न केवल आदिवासी समुदायों को उनकी जगह से विस्थापित होने पर मजबूर किया है, बल्कि इतिहास, स्मृति और जगह की अवधारणा को भी तहस-नहस कर दिया। नतीजतन, इस जगह का रूप-स्वरूप कुछ ऐसा हो गया, जहां सब कुछ बिखरा हुआ, अलग-थलग और पराया सा लगने लगा है। उनकी कविता में भी अलगाव की इस गहरी भावना की झलक मिलती है। कविता की पंक्तियां उन लोगों की कहानी कह रही है जिन्होंने कभी यहां की धरती में बीज बोए थे लेकिन अब झील की अशांत जलधाराओं में जाल फेंकने पर मजबूर हो गए हैं। यहां के किसान मछुआरे बन गए हैं, और उनके खेत अब केवल उनकी यादों में ही बचे रह गए हैं।

डंबूर लेक आयलैंड, त्रिपुरा  

जलमग्न खेतों पर बना स्वर्ग

त्रिपुरा के बीचो-बीच फैली डंबूर झील करीब 41 वर्ग किलोमीटर में फैली है। इसका नीला पानी सूरज की रोशनी में चमकता रहता है। इस इलाके में करीब 48 छोटे-छोटे हरे-भरे द्वीप भी हैं, जो इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। इस पर नावें सरपट दौड़ती हैं, प्रवासी पक्षी इसके किनारों पर आराम करते हैं, और पर्यटक इन खूबसूरत नजारों का लुत्फ उठाते हैं। यह झील त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 120 किलोमीटर दूर गंडा ट्विसा उपमंडल में स्थित है। 

लेकिन इस मनमोहक दृश्य के पीछे एक दूसरी कहानी छिपी है। दरअसल डंबूर एक प्राकृतिक झील नहीं है। इसका निर्माण राइमा-साइमा घाटी की ज़मीन पर किया गया है। यह घाटी बेहद उपजाऊ हुआ करती थी और इसे त्रिपुरा का ‘अनाज भंडार’ कहा जाता था। साल 1974 में गोमती नदी पर बांध बनाने के लिए गुमती जलविद्युत परियोजना शुरू की गई थी और त्रिपुरा के भारत में विलय के बाद इसे आधुनिकीकरण की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा गया। नीति-निर्माताओं का दावा था कि इस परियोजना से 15 मेगावाट बिजली बनेगी। लेकिन हुआ इसका उलटा और पूरी घाटी पानी में डूब गई। नतीजतन, पीढ़ियों से इस उपजाऊ ज़मीन पर निर्भर हजारों आदिवासी परिवार उजड़ गए। 

डंबूर लेक आयलैंड 

ज़मीन के बड़े हिस्से के पानी में डूबने के बाद उस भूभाग के कुछ टुकड़े पानी के ऊपर दिखाई देने लगे। पर्यटन विभाग ने जल्दी ही इन द्वीपों का नाम पर्यटक स्थलों की सूची में शामिल कर दिया, और कृषि विभाग ने उनके किनारों पर नारियल के छोटे-छोटे पौधे लगा दिए। कुछ ही सालों में इन द्वीपों की एक नई पहचान बन गई। जो नदी घाटी कभी समृद्ध थी, वह अब “नारकेल कुंज” यानी नारियल द्वीप के नाम से जानी जाने लगी, और आज यह त्रिपुरा के मशहूर पर्यटन वाली जगहों में से एक हो चुकी है।

राइमा-साइमा घाटी में जीवन

डंबूर झील बनने से पहले राइमा-साइमा घाटी बहुत समृद्ध थी। यहां रियांग (ब्रू), चकमा और त्रिपुरी जैसे जनजातीय समुदाय रहते थे, जिनका जीवन नदियों, जंगलों और उपजाऊ खेतों से जुड़ा था।

वे धान की खेती करते थे और साथ ही झूम खेती भी। झूम खेती में कुछ समय बाद ज़मीन को परती छोड़ दिया जाता है, ताकि वह फिर से उपजाऊ हो सके। घाटी में चावल, सब्ज़ियां और फल भरपूर मात्रा में पैदा होते थे। इससे न केवल यहां रहने वाले परिवारों का गुज़ारा होता था, बल्कि आसपास के इलाकों तक सामान का लेन-देन भी होता था।

डंबूर झील, त्रिपुरा  

घाटी से उनका रिश्ता सिर्फ़ ज़मीन तक सीमित नहीं था। उनके पूर्वजों के गीत, कहानियां और गारिया व हैंगराई जैसे त्योहार बुवाई और कटाई के मौसम से जुड़े हुए थे। 71 साल की कैरु याद करते हुए बताती हैं: “गोमती नदी तब झील नहीं थी, बल्कि हमारी जीवनरेखा थी। कई परिवार बांस के बेड़ों पर घी, तिल और जूट लादकर नतूनबाजार, मेलाघर और अमरपुर के दूर-दराज के बाजारों तक ले जाते थे। इन यात्राओं में महीनों लग जाते थे। रवाना होने से पहले वे लोग तीर्थमुख में स्थानीय देवी की पूजा करते थे ताकि उनकी यात्रा सुरक्षित हो।” ये यादें एक ऐसी जगह की कहानी कहती हैं, जिसने लोगों के तन और मन दोनों को सहारा दिया। यह वह जगह थी, जहां संस्कृति, रोज़गार और सम्मान सब कुछ उसी मिट्टी में बसता था।

जिस दिन खेत गायब हो गए

1974 में गोमती नदी पर बांध बनने के बाद सब कुछ बदल गया। त्रिपुरा के भारत में विलय के बाद आधुनिकीकरण के सपने के साथ शुरू हुई गुमटी जलविद्युत परियोजना को उस समय “आधुनिक भारत का मंदिर” कहा गया। 1976 में शुरू हुई इस परियोजना से 15 मेगावाट बिजली और पानी बचाने का वादा तो किया गया था लेकिन बिजली कभी ठीक से मिल नहीं पाई। त्रिपुरा को आज भी उतनी बिजली नहीं मिलती, जितनी उम्मीद थी। इसके उलट, लोगों के घर उजड़ गए, उनकी ज़मीन उनसे छूट गई और नुकसान ही नुकसान हुआ।

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार कुल 2,558 परिवार विस्थापित हुए थे, लेकिन कबिता जमातिया जैसे कार्यकर्ताओं का कहना है कि असली संख्या इससे कहीं ज़्यादा थी। वे बताती हैं कि करीब 8,000 से 10,000 परिवार, यानी लगभग 70,000 लोग विस्थापित हुए थे जिनमें ज़्यादातर आदिवासी समुदाय के थे। लोगों के मन में अपनी ज़मीन और मिट्टी से उजाड़े जाने की यादें आज भी ताजा हैं। घरों को तोड़ने और लोगों को हटाने के लिए पुलिस बल और हाथियों का इस्तेमाल किया गया था। पंचनराम याद करते हुए कहते हैं, “जब बांध का काम शुरू हुआ, तब सरकार के लोग हाथी और पुलिस लेकर आए थे। हमारे घर गिराने के लिए हाथियों का इस्तेमाल किया गया, और पुलिस पहरा दे रही थी ताकि कोई विरोध न कर सके। हम अपनी आंखों के सामने अपने घरों को मिट्टी में मिलते देखते रहे और कुछ नहीं कर सके।”

कबिता जमातिया ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग को लिखे अपने पत्र में यह दर्ज किया है कि “नदी पर बांध बनने के बाद पानी का स्तर बढ़ता गया और धीरे-धीरे राइमा और साइमा घाटी का पूरा इलाका, जिसमें बोरोक गांव भी थे, डूब गया। यहां रहने वाले लोगों को अपने-अपने घर छोड़ने पड़े। जो लोग जाने को तैयार नहीं थे, उन्हें हटाने के लिए सरकार ने पुलिस, सीआरपीएफ और हाथियों तक का इस्तेमाल किया। कई गांव जलाए गए, लोगों को ज़बरदस्ती उठाया गया और उन पर तरह-तरह के ज़ुल्म किए गए।” 

राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली कोकबोरोक फ़िल्म यारवंग (रूट) ने बाद में इन घटनाओं को बड़े पर्दे पर दिखाया, लेकिन जिन लोगों ने यह सब झेला, उनके लिए यह नुकसान किसी फ़िल्म से कहीं ज़्यादा गहरा था। 

कई परिवारों के पास केवल पारंपरिक ज़मीन के अधिकार थे। त्रिपुरा भूमि राजस्व और भूमि सुधार अधिनियम, 1960 के लागू होने के बाद जब सारी भूमि राज्य के अधीन आ गई, तो उन्हें मुआवजे और राहत से वंचित कर दिया गया। कई बस्तियां उजड़ गईं। कुछ लोग ऊपर पहाड़ी इलाक़ों में चले गए, तो कुछ राज्य की सीमा पार करके असम, मिज़ोरम या बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी इलाकों तक पहुंच गए। रियांग (ब्रू) समुदाय को बार-बार विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा।

किसान से मछुआरा बनने तक का सफ़र: खेतों के डूबने के बाद का जीवन

जब राइमा-साइमा घाटी जलमग्न हो गई, तो पीढ़ियों से धान, तिल, केले और कटहल की खेती करने वाले परिवार अचानक बेसहारा हो गए। खेतों के साथ-साथ खेती भी लुप्त हो गई। मछली पकड़ने का काम पहले कभी-कभार शौक़ से या खाने के लिए किया जाता था। लेकिन अब वही लोगों की रोज़ी-रोटी का एकमात्र स्रोत बन गया। हल की जगह जाल ने ले लिए, खेत जोतने वाले बैलों की जगह नावें आ गईं, और वही पानी, जिसने उनके खेत डुबो दिए थे, अब जीने का सहारा बन गया। 

डंबूर झील, त्रिपुरा  

67 साल के कंचनमोई चकमा की उम्र उस समय बहुत कम थी, जब उनके परिवार को वहां से हटाया गया। वह बताते हैं, “हमें जाने के लिए कहा गया और कोई विकल्प भी नहीं दिया गया। पहले हम घाटी में धान उगाते थे, फिर ऊपर के इलाकों में जाकर हमने झूम खेती करने की कोशिश की। लेकिन जल्द ही हमें झील पर वापस लौट जाना पड़ा। रोज़गार के नाम पर अब हमारे पास मछली पकड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।” आज भी वे हर सुबह डंबूर के पानी में उतरते हैं लेकिन उनके जाल में कुछ ख़ास नहीं फंसता। वे दुखी होते हुए कहते हैं, “पहले बहुत मछलियां थीं। अब बहुत मेहनत के बाद भी थोड़ा बहुत ही हाथ में आ पाता है।” 

सरकार ने एक समय में जलाशय में कतला, रोहू, तिलापिया, मृगल और झींगे जैसी प्रजातियों का प्रजनन कराया था, जिससे डंबूर त्रिपुरा का सबसे बड़ा अंदरूनी मछली पकड़ने वाला इलाका बन गया। शुरुआत में राज्य की सहकारी समितियां जाल, लाइसेंस और नावें देती थीं। लेकिन धीरे-धीरे बाहर के व्यापारियों का दखल बढ़ने लगा। मछलियों की संख्या में इतनी ज़्यादा कमी आने लगी कि ज़रूरत पूरी करना भी असंभव हो गया। अब हाल यह है कि लाइसेंस के लिए करीब 10,000 रुपये देने पड़ते हैं, और सरकार की तय कीमतों के कारण कमाई बहुत ज़्यादा नहीं हो पाती है। चाहे जितनी मेहनत कर लो, मुनाफ़े के नाम पर प्रति किलो 4 से 20 रुपये तक ही बच पाता है। 

दूसरी पीढ़ी के नाविक सुरेश कहते हैं, “हम मछुआरे बन गए क्योंकि अब हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। इस झील के बनने से पहले तक हमने लकड़ी की नाव देखी भी नहीं थी। हमारे दादा-परदादा केवल बांस के बेड़े ही बनाया करते थे। डम्बूर झील ने हमारी ज़िंदगी ही बदल दी। हमारे पुरखे और पिता सब किसान थे, लेकिन अब मछली पकड़ना ही हमारी एकमात्र विरासत बन गई है।” 

डंबूर झील 

महिलाओं के लिए यह बदलाव और भी मुश्किल था। उन्होंने सिर्फ़ खेत ही नहीं खोए, बल्कि अपने खाने की सुरक्षा भी खो दी। इशिका चकमा बताती हैं कि अब महिलाएं जाल की मरम्मत का काम करती हैं, मछली सुखाती हैं या पर्यटकों के लिए खाना बनाती हैं। 

वह कहती हैं, “पहले हमारा जीवन, ज़मीन और जंगल से जुड़ा था। अब पानी से जुड़ गया है। लेकिन काम पहले से कहीं ज़्यादा कठिन और अनिश्चित हो गया है।”

मछली पकड़ना और मत्स्य पालन: एक अस्थिर जीवन रेखा

लोग भले ही खेती की जगह मछली पकड़ने का काम करने लगे हों, लेकिन रोज़ी-रोटी का यह विकल्प स्थिर और स्थायी नहीं है। पानी का स्तर बदलता रहता है, मौसम का असर पड़ता है और मछलियों के विकास के चक्र में भी गड़बड़ी होती है। नतीजतन कभी मछली मिलती है तो कभी नहीं।

अध्ययन बताते हैं कि गुमती जलाशय में पहले कतला, रोहू, मृगल, सिल्वर कार्प, तिलापिया, कालबसु और झींगे जैसी कई तरह की मछलियां पर्याप्त मात्रा में मिलती थीं। लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा मछली पकड़ने और उनके प्रजनन में आई कमी के कारण अब जाल में ज़्यादा मछली नहीं फंसती। मछुआरों का कहना है कि व्यवस्था में बराबरी नहीं बरती गई है। कंचनमोई कहते हैं, “सरकार हम से लाइसेंस के पैसे तो लेती है, लेकिन मछली की कीमत इतनी कम तय करती है कि हमारी लागत ही मुश्किल से निकलती है। फायदा बिचौलियों को होता है, हमें नहीं।”

डंबूर झील, त्रिपुरा  

पर्यटन: घूमने आने वालों के लिए एक झील लेकिन विस्थापितों के लिए नहीं। आजकल यहां पर्यटन भी बढ़ रहा है। नौका विहार, सुंदर द्वीपों के नजारे और सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। कुछ स्थानीय लोगों के लिए यही कमाई का माध्यम बन गया है। कोई पर्यटकों को नाव से ले जाता है, कोई उनके लिए खाना बनाता है, तो कोई छोटे-छोटे स्टॉल चलाता है। लेकिन पर्यटन का यह धंधा भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता और अनिश्चितता बनी रहती है। विस्थापितों में से ज़्यादातर परिवार न तो रिसोर्ट बनाने में पैसा निवेश कर सकते हैं और न ही किसी तरह का कोई बड़ा व्यापार ही करने लायक़ उनके पास पैसा है। नतीजतन, वे अपनी नावें भी ख़ुद ही बनाते हैं, उसे बनाने वाले सामानों के लिए कर्ज़ लेते हैं जबकि मुनाफ़ा और कमाई बाहर से आए लोगों के हिस्से चली जाती है।

गुमती जलविद्युत परियोजना का पुनरुद्धार

डंबूर बांध का निर्माण 15 मेगावाट बिजली उत्पादन के उद्देश्य से किया गया था। लगभग पांच दशक बीत जाने के बाद भी यह बांध अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है। गाद जमाव, अनियमित बारिश और तकनीकी खराबी के कारण त्रिपुरा को आज भी गैस और केंद्रीय ग्रिड आपूर्ति पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है।

लेकिन, इस परियोजना को बंद करने के बजाय इसके पुनरुद्धार की योजनाएं जारी हैं। त्रिपुरा राज्य विद्युत निगम लिमिटेड ने एनएचपीसी से परियोजना की पूरी क्षमता बहाल करने के लिए एक रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। विस्थापन और उम्मीद से कम प्रदर्शन के इतिहास के बावजूद, इसे नवीकरणीय, विश्वसनीय और लागत प्रभावी बिजली स्रोत के रूप में पेश किया जा रहा है।


दरअसल, ज़मीन के बदले ज़मीन के मुआवज़े वाले वादे कभी पूरे नहीं किए गए। परिवारों को बेदखल करने के लिए पुलिस और हाथियों को भेजा गया। 8,000 से 10,000 परिवार - जिनमें ज़्यादातर आदिवासी जनजातियां थीं - पहाड़ी इलाकों, असम, मिज़ोरम और यहां तक कि बांग्लादेश तक बिखर गए। आधिकारिक आंकड़ों में केवल 2,558 विस्थापित परिवारों का ही ज़िक्र है। इशिका एक विस्थापित किसान की पोती हैं और छात्रा भी। वे पूछती हैं, “यह कैसा विकास है, जिसमें हमारे नुकसान को ही नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है?” 

डंबूर झील, त्रिपुरा  

बहती-तैरती यादें

आज डंबूर को हर पीढ़ी अलग तरह से याद करती है। बुज़ुर्गों के लिए यह मवेशियों, फलों के बागों और ज़मीन से जुड़ी रीति-रिवाजों वाली एक समृद्ध घाटी है। वहीं नई पीढ़ी को यहां बस पानी ही दिखता है, उनकी यादों का संबंध भी उनके अपने अनुभव से नहीं है, बल्कि वे यादें भी सुनी-सुनाई कहानियों से बनी हैं।

इशिका कहती हैं, “हमने खेत कभी नहीं देखे, अपनी दादी से केवल उसके बारे में सुना है। वे बताती हैं कि कभी यहां बहुत साफ़ और हरे पानी वाली नदी बहा करती थी। अब हमारे सामने केवल एक झील है।” 

पर्यटकों को आकर्षित करने वाले इस चमकते पानी के भीतर बिखरे हुए इतिहास और असुरक्षित रोज़ी-रोटी की कहानी छुपी हुई है। डंबूर सिर्फ़ घूमने की जगह नहीं है, बल्कि बदली हुई ज़िंदगी की एक टीस है, जहां लोगों की रोज़ी-रोटी कभी मछलियों पर तो कभी मौसम के साथ आने-जाने वाले पर्यटकों पर टिकी है, और सरकार के वादे अब भी पूरे नहीं हुए हैं।

डंबूर झील, त्रिपुरा  

बांधों पर फिर से सोच, विकास पर भी नई नज़र

डंबूर की कहानी कोई अलग नहीं है। पूरे भारत में बांधों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा गया, लेकिन कई बार वे अपने वादे पूरे नहीं कर पाए। बिजली उतनी नहीं बनती, उल्टा उपजाऊ घाटियां पानी में डूब जाती हैं, खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ती है और समुदाय के समुदाय उजड़ जाते हैं।

त्रिपुरा में डंबूर एक प्रतीक और चेतावनी दोनों के रूप में खड़ी है। यह बताती है कि न्याय की अनदेखी करने वाला विकास केवल असमानताओं को ही बढ़ाता है। यह दिखाता है कि लाइसेंस, तय कीमतें और सरकारी नियंत्रण जैसे उपाय कई बार हालात सुधारने के बजाय लोगों की मुश्किलें और बढ़ा देते हैं। यह भी याद दिलाता है कि मछली पकड़ना, जो पहले एक विकल्प था, अब मजबूरी बन गया है। और पर्यटन, भले ही कुछ लोगों के लिए कमाई का ज़रिया हो, लेकिन जिन लोगों ने सबसे ज़्यादा नुकसान झेला है, उनके लिए यह एक टिकाऊ सहारा नहीं बन पाता।

डंबूर झील, त्रिपुरा  

आज के समय में, जब मौसम का भरोसा नहीं रहा, कभी ज़्यादा बारिश होती है तो कभी सूखा पड़ जाता है, ऐसे में पुराने बांधों को फिर से ठीक करने के काम को क्या वास्तव में स्थायी विकास की श्रेणी में रखा जा सकता है? या फिर यह वही पुरानी कहानी दोहरा रहा है, जहां सबसे कमज़ोर लोगों को ही सबसे ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ती है?

डंबूर के पानी में ये सभी सवाल गूंज रहे हैं। ये सवाल हमें न केवल पनबिजली पर, बल्कि विकास के वास्तविक अर्थ पर भी दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं। 

जब तक विस्थापित समुदायों की आवाज़ को निर्णय लेने की प्रक्रिया के केंद्र में नहीं रखा जाता, तब तक डंबूर बिजली उत्पादन की कहानी से ज़्यादा बिजली के दोहन की कहानी बनकर रह जाएगा।

नोट- यह कहानी इंडिया वाटर फेलोशिप 2025 के तहत अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसका अनुवाद डॉ. कुमारी रोहिणी ने किया है।

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