अनियंत्रित प्रदूषण पर लगाम न लगने के कारण देश की राजधानी दिल्‍ली और आसपास के इलाकों में यमुना नदी की हालत बद से बदतर होती जा रही है।

 

स्रोत : विकी कॉमंस

नदी और तालाब

दिल्‍ली की यमुना में तेज़ी से फैल रहा फीकल कोलीफॉर्म, इसी बैक्‍टीरिया के कारण इंदौर में हुई थी 33 लोगों की मौत

DPCC की मार्च 2026 की रिपोर्ट ने खोली यमुना सफाई के सरकारी दावों की पोल। पल्ला, वज़ीराबाद, आईएसबीटी ब्रिज, आईटीओ ब्रिज, निज़ामुद्दीन ब्रिज, हिंडन कट, ओखला बैराज और असगरपुर में पानी के नमूने लेकर हुई जांच

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

देश की राजधानी दिल्‍ली में नाला बन चुकी यमुना नदी की सफाई के खोखले सरकारी दावों की पोल एक बार फिर खुल गई है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) की मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार बीते माह (मार्च 2026) यमुना नदी में प्रदूषण का स्तर जनवरी-फरवरी की तुलना में बढ़ा है। यमुना के पानी में विशेषकर फीकल कोलीफॉर्म और बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) की मात्रा काफी बढ़ गई है। इसका कारण बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज का सीधे नदी में गिरना है।

क्‍या है BOD और कोलीफॉर्म बढ़ने का मतलब

मार्च की रिपोर्ट में यमुना में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) का उच्च स्तर भी दिखाया गया है, जो पानी में कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने के लिए सूक्ष्मजीवों द्वारा आवश्यक घुलित ऑक्सीजन की मात्रा का एक माप है। बीओडी का ऊंचा स्‍तर पानी में प्रदूषण की भारी मात्रा को दर्शाता है। इससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे कि जलीय जीवों का जिंदा रहना मुश्किल हो जाता है। 

फीकल कोलीफॉर्म का पानी में पाया जाना जल जनित रोगों यानी पानी से फैलने वाली बीमारियों का कारण बनता है, जिसमें सबसे ज्‍यादा दस्‍त, पेचिश, हैजा जैसी पेट और पाचनतंत्र से जुड़े रोग शामिल होते हैं। कई बार इसकी गंभीरता जानलेवा भी साबित होती है, खासकर बच्‍चों को जान का खतरा सबसे ज्‍यादा होता है। फीकल कोलीफॉर्म का आशय ई कोलाई जैसे एक कोशिकीय जीव से है, जो मल में पाया जाने वाला एक प्रकार का अमीबा होता है। इसलिए यह संक्रामक रोगों का कारण बनता है। फीकल कोलीफॉर्म होने का मतलब पानी में में मल-मूत्र का सीधे तौर पर गिरना है। 

8 में से 7 जगहों के नमूनों में आए चिंताजनक नतीजे

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक डीपीसीसी द्वारा दिल्‍ली में यमुना नदी से आठ स्थानों से लिए गए नमूनों के जल गुणवत्ता परीक्षण में प्रदूषण स्तर निर्धारित करने के लिए बीओडी, घुलित ऑक्सीजन, रासायनिक ऑक्सीजन मांग, पीएच और मल कोलीफॉर्म जैसे कई मापदंडों के आधार पर पानी की जांच की जाती है। इन आठ स्थानों में पल्ला, वज़ीराबाद, आईएसबीटी ब्रिज, आईटीओ ब्रिज, निज़ामुद्दीन ब्रिज, हिंडन कट, ओखला बैराज और हरियाणा के किदवाली में असगरपुर शामिल हैं।

मार्च की रिपोर्ट से पता चलता है कि असगरपुर में मल में पाए जाने वाले कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर 400,000 मोस्ट प्रोबेबल नंबर प्रति 100 मिलीलीटर जितना अधिक है, जो सुरक्षित मानी जाने वाली सीमा 2,500 और वांछनीय स्तर (Desirable Level) 500 से कहीं अधिक है। उसी स्थान पर जनवरी में स्तर 350,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर था और फरवरी 2026 में यह स्तर 92,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर था।

आठ स्थानों में से केवल एक स्थान पर जनवरी के मुकाबले सुधार देखा गया है। आईएसबीटी ब्रिज पर मल कोलीफॉर्म का स्तर 160,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर दर्ज किया गया, जबकि फरवरी में यह 110,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर और जनवरी में 220,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर था।

जिन अन्य स्थानों पर जनवरी से फरवरी तक कोलीफॉर्म के स्तर में गिरावट देखी गई थी, वहां मार्च में तेजी से वृद्धि हुई है। पाला में कोलीफॉर्म का स्तर दिसंबर 2025 की तुलना में अपेक्षाकृत कम 3,200 एमपीएन/100 मिलीलीटर दर्ज किया गया, जब मल में पाए जाने वाले कोलीफॉर्म का स्तर 92,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर पर चरम पर था, जो नवंबर 2025 में 24,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर और अक्टूबर 2025 में 8,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर से काफी अधिक था।

मार्च में भी जल कार्बनिक विषाणु (बीओडी) का स्तर चिंताजनक रहा, जो 2 से 60 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच था। जल गुणवत्ता मानकों के अनुसार इसकी अधिकतम सीमा 3 मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। असगरपुर में अब तक का सबसे उच्च बीओडी स्तर 60 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया है। पिछले महीने असगरपुर में बीओडी स्तर 34 मिलीग्राम प्रति लीटर था।

ठोस कचरे, ज़हरीले औद्योगिक रसायनों और अनट्रीटेड सीवेज के कारण दिल्‍ली में यमुना एक गंदे नाले जैसी हो चुकी है। 

सीटीपी और सीईटीपी के आंकड़े अपलोड करना बाकी

डीपीसीसी ने दिल्ली की नालियों के मार्च महीने के आंकड़े अपलोड कर दिए हैं, जबकि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट के विश्लेषण से संबंधित मार्च महीने के आंकड़े अभी अपलोड किए जाने बाकी हैं।

नियमों के मुताबिक इन रिपोर्टों को कम से कम महीने में एक बार अपलोड किया जाना चाहिए, लेकिन जनवरी और फरवरी की रिपोर्टों में हाल ही में हुई देरी के चलते मार्च के आंकड़े अपलोड नहीं हो सके हैं। इस कार्य से जुड़े कार्यकर्ताओं की चिंता का कहना कि नदी में प्रदूषण के स्तर का नियमित आकलन अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर मानसून के बाद की अवधि के दौरान, जब नदी का प्रवाह कम हो जाता है, जिससे प्रदूषण में वृद्धि होती है।

इंदौर, भोपाल में मौतों की जांच के लिए बनी थी हाई लेवल कमेटी

मध्य प्रदेश के इंदौर और भोपाल में प्रदूषित पानी पीने से हुई मौतों के मामलों राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने मामले की जांच के लिए एक 6 सदस्यीय हाई लेवल कमेटी का गठन करने की घोषणा की थी। मीडिया रिपोर्टों में इंदौर में दूषित पानी पीने से 33 लोगों की मौत होने की बात सामने आई थी। हालांकि प्रशासन ने 15 जनवरी तक 18 मौतों की ही पुष्टि की थी। साल के पहले हफ्ते में ही इन दर्दनाक मौतों की खबर ने पूरे देश में खलबली मचा दी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और ईश्वर सिंह (विशेषज्ञ सदस्य) की एनजीटी पीठ ने पर्यावरण कार्यकर्ता कमल कुमार राठी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किया और इस मुद्दे पर राज्य सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की। NGT की  भोपाल स्थित सेंट्रल ज़ोन बेंच ने हाल ही में इस मुद्दे की जांच के लिए छह सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए इस समिति में IIT इंदौर और CPCB के विशेषज्ञों को शामिल किया गया था। समिति के सदस्‍यों में यह लोग शामिल किए गए थे - 

  • आईआईटी (IIT), इंदौर के निदेशक द्वारा नामांकित विशेषज्ञ।

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), भोपाल के प्रतिनिधि।

  • प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, म.प्र. शासन।

  • प्रमुख सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग।

  • जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि।

  • म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधि (नोडल एजेंसी)।

इसके अलावा NGT ने राज्य में शुद्ध पेयजल सुनिश्चित करने के लिए राज्य भर में शुद्ध पेयजल सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत निर्देश भी जारी किए थे। इनमें जल आपूर्ति और गुणवत्ता की निगरानी के लिए एक मजबूत प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) और मोबाइल ऐप का तैयार करने और पेयजल और सीवेज लाइनों की जीआईएस-आधारित मैपिंग जैसे उपाय शामिल थे। इसकी विस्‍तृत जानकारी के लिए आप इस लिंक पर क्लिक करके हमारी खबर को पढ़ सकते हैं-

इंदौर, भोपाल में प्रदूषित पानी से मौतों के मामलों की जांच करेगी एनजीटी की हाई लेवल कमेटी


Delhi's AQI

DPCC की मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्‍ली की हवा की गुणवत्‍ता यानी AQI में थोड़ा सुधार दर्ज़ किया गया है। 

वायु प्रदूषण में थोड़ी राहत AQI 119 तक सुधरा

रिपोर्ट में जहां यमुना के प्रदूषण में बढ़ोतरी की बात कही गई है, वहीं वायु प्रदूषण में थोड़ी राहत की बात सामने आई है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्‍ली की हवा की गुणवत्‍ता में मार्च में सुधार दर्ज़ किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 16 मार्च 2026 को दिल्ली-एनसीआर में AQI 119 (मध्यम) दर्ज किया गया, जो 15 मार्च को 175 था। 20 मार्च को भी AQI 93 (संतोषजनक) रहा। इसे देखते हुए दिल्‍ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्‍ता  द्वारा GRAP-1 की समीक्षा के बाद 16 मार्च को दिल्ली-एनसीआर में GRAP-1 के तहत लागू प्रतिबंध हटा दिए गए। पत्र सूचना कार्यालय PIB की ओर से जारी विज्ञप्ति में बताया गया है कि दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में सुधार होकर 'मध्यम' श्रेणी में आने के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आस-पास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने GRAP स्टेज-I को रद्द कर दिया है।

बता दें कि GRAP-1 यानी ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (Graded Response Action Plan) का पहला चरण है। यह दिल्ली-NCR में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 201-300 (खराब/Poor श्रेणी) होने पर लागू किया जाता है, जिसका उद्देश्य धूल नियंत्रण, कचरा जलाने पर रोक और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करके स्थिति को गंभीर होने से रोकना है। दिल्‍ली में वायु प्रदूषण में कमी लाने के लिए वाहनों पर BS-6 नियम लागू करने, 13,760 ई-बसें चलाने और इलेक्ट्रिक वाहनों की रिचार्जिंग के लिए राजधानी में 32,000 चार्जिंग पॉइंट्स उपलब्‍ध कराने पर जोर दिया जा रहा है।

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