गंगा की सहायक नदी घाघरा बरसात के मौसम में जल स्तर बढ़ने पर काफी विकराल रूप ले लेती है। इसकी तेज धाराएं मिट्टी का तेज कटाव करती हैं।
फोटो - विकी कॉमंस
घाघरा नदी नदी भारत-नेपाल सीमा पर स्थित बहराइज जिले के किसानों के लिए जीवनरेखा जैसी है। पर, मानसूनी बारिश से नदी के जलस्तर में वृद्धि होने पर यह उनके लिए एक अभिशाप बन जाती है। बाढ़ का पानी हर साल सैकड़ों किसानों की खेती बर्बाद कर देता है और बाढ़ के पानी के तेज बहाव से होने वाला मिट्टी का कटाव कई खेतों को बहा ले जाता है। इन किसानों के लिए एक अच्छी खबर है। उनकी दशकों से चली आ रही यह समस्या अब खत्म होती दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश सरकार का सिंचाई विभाग एक नई उन्नत तकनीक से घाघरा नदी के कटाव को रोकने के इंतज़ामों में जुटा है।
सिंचाई विभाग ने जियोट्यूब (Geotube) तकनीक के जरिये घाघरा के कटाव को रोकने का कारगर कदम उठाया है, जो स्थानीय किसानों के लिए एक रक्षा कवच की तरह काम कर रहा है। पिछले साल प्रायोगिक स्तर पर शुरू किए गए इस कदम की सफलता को देखते हुए अब इसे व्यापक स्तर पर अपनाने की तैयारी है।
पिछले साल सरकार ने बहराइच की महसी तहसील में घघरा में बाढ़ आने से पहले एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में नदी के किनारों पर मिट्टी का कटाव रोकने के लिए जियोट्यूब को लगवाया गया था। 50-50 मीटर की लंबाई वाले इन विशाल ट्यूबों को नदी तट पर लाइन से लगाने से कई गांवों के लोगों को बाढ़ और पानी के तेज बहाव से होने वाले कटाव से राहत मिली थी। क्योंकि इससे कटान काफी हद तक थम गई थी।
इस बार भी जियोट्यूब की बदौलत कटान काफी हद तक नियंत्रत दिखाई दे रही है। इसलिए सरकार अब व्यापक स्तर पर जियोट्यूब तकनीक का इस्तेमाल करके घाघरा के कटाव को रोकने की तैयारी में है। सिंचाई विभाग प्रशासन द्वारा पिछले साल लगाया गया यह विशेष जियोट्यूब इस बार किसानों और ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रहा है. महसी क्षेत्र के टिकुरी गांव में पिछली बार बाढ़ आने से पहले ही नदी के किनारे पर जियोट्यूब को लगवाया गया। इसमें 50-50 मीटर की लंबाई वाले विशाल ट्यूबों को नदी के किनारे-किनारे लाइन से लगाकर पानी के तेज बहाव को मिट्टी काटने से रोका गया। इसके लगने से कटान काफी हद तक थम गई। जियो ट्यूब के न कटने वाले और न सड़ने वाले मजबूत धागों को नदी की तेज लहरें और पानी का भारी दबाव भी काट नहीं पाता है। इस तरह यह कटान रोकने का एक लंबा और टिकाऊ समाधान साबित हो रहा है।
जियोट्यूब तकनीक में नदी के किनारों पर ज़्यादा कटाव वाले स्थानों पर रबर के मजबूत और विशाल ट्यूब लगा दिए जाते हैं। उच्च क्षमता वाले जियो टेक्सटाइल (Geotextile) कपड़े की बड़ी ट्यूबों में रेत भरकर नदी किनारे स्थापित किया जाता है। यह पानी की गति कम करती है, ढाल को स्थिर बनाती है, जिससे पानी इन ट्यूबों टकरा कर लौट जाता है।
इस तरह यह तकनीक मिट्टी के कटान को रोक देती है। बाढ़ग्रस्त तथा रेतीली नदियों में इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। ये ट्यूबें तेज बहाव वाले पानी के वेग के प्रहार को सोख (एबजार्ब) कर लेती हैं। इससे पानी की रफ्तार कुछ धीमी होती है और वह नदी के तट को काटने या नुकसान पहुंचाए बिना इन ट्यूबों से टकरा कर वापस चला जाता है। इस तरह जियोट्यूब तकनीक मिट्टी के कटाव को रोक देती है।
इसमें पानी के भारी दबाव को झेलने के लिए और कई साल तक चलने के लिए विशेष प्रकार से बनाए गए न कटने वाले और न सड़ने वाले रबर और विशेष धागों से बनाए गए जियो ट्यूब का इस्तेमाल किया जाता है। इस वजह से यह बाढ़ और कटाव से निपटने का एक सस्ता और कारगर समाधान प्रदान करता है।
बहराइच जिले की महसी तहसील के कई गांव घाघरा नदी के किनारे बसे हुए हैं। इन गांवों में हर साल बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने पर बाढ़ का पानी जमकर कहर बरपाता है। उफनाती घाघरा नदी से होने वाला मिट्टी का भारी कटान अपने प्रचंड वेग से खेतों के अलावा कई बार कच्चे और पक्के मकानों को भी बहा ले जाता है।
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी और बहराइच जिले में बहती घाघरा (सरयू) नदी में इस साल अच्छी बारिश के चलते भरपूर पानी नज़र आ रहा है।
जियोट्यूब तकनीक को हर जगह सबसे सस्ता विकल्प नहीं कहा जा सकता। नदियों से होने वाले कटान को रोकने के लिए आमतौर पर नदी से ही पत्थर और बोल्डर निकाल कर किनारों पर एक सुरक्षा दीवार बनाने का उपाय किया जाता है। यह ज़्यादा महंगा नहीं बैठता, क्योंकि पत्थर नदियों से ही मिल जाते हैं। लेकिन, जिन नदियों में बड़े पैमाने पर बोल्डर उपलब्ध नहीं हैं या उन्हें दूर से लाना पड़ता है, वहां जियोट्यूब तकनीक का इस्तेमाल एक किफायती विकल्प साबित होता है। इसकी शुरुआती लागत तो अधिक होती है, पर यह अपने लंबे जीवन चक्र (Life Cycle) के कारण लागत के लिहाज से काफी किफायती साबित होती है। इसके निम्नलिखित कारण हैं -
भारत सरकार के टेक्नोटेक्स (Technotex) कार्यक्रम के तहत प्रकाशित Bangladesh Water Development Board (BWDB) के एक अध्ययन में बांग्लादेश के बड़े नदी प्रबंधन कार्यों का हवाला देते हुए बताया गया है कि सीमेंट-कंक्रीट ब्लॉक और बड़े बोल्डर आधारित पारंपरिक सुरक्षा कार्यों की तुलना में जियोबैग/जियोट्यूब तकनीक 40 से 60 प्रतिशत तक लागत घटा सकती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इसमें स्थानीय रेत का उपयोग होता है, भारी पत्थरों की ढुलाई कम होती है और निर्माण भी अपेक्षाकृत तेजी से पूरा हो जाता है।
घाघरा जैसी नदियों के किनारे अक्सर बड़े आकार के पत्थर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में उन्हें राजस्थान, मध्य प्रदेश या अन्य राज्यों से लाना पड़ता है, जिससे परियोजना की लागत काफी बढ़ जाती है। जियोट्यूब में स्थानीय रेत या नदी तल की सामग्री का उपयोग होने से परिवहन खर्च काफी घट जाता है।
जियोट्यूब लगाने के लिए किसी तरह के भारी भरकम कंक्रीट के ढांचे तैयार नहीं करने पड़ते। इसलिए बाढ़ के बाद सीमित समय में भी नदी किनारे सुरक्षा कार्य तेजी से पूरे किए जा सकते हैं। इससे श्रम लागत और मशीनरी का खर्च भी काफी कम होता है।
इसका रख-रखाव भी आसान और कम खर्चीला होता है। क्योंकि अगर किसी हिस्से में क्षति होती है तो पूरे ढांचे को तोड़ने की बजाय केवल प्रभावित भाग की मरम्मत या बदलाव किया जा सकता है। इससे दीर्घकालिक रखरखाव लागत भी कम रहती है।
इस तकनीक में जियोट्यूब की स्थापना और उसे सहारा देने के लिए स्थानीय सामग्री का उपयोग किया जाता है। इसलिए भारी मात्रा में पत्थर खनन की आवश्यकता नहीं होती। इससे निर्माण का कार्बन फुटप्रिंट भी घटता है और नदी के प्राकृतिक स्वरूप पर अपेक्षाकृत कम असर पड़ता है। हालांकि किसी भी परियोजना में इसका प्रदर्शन डिजाइन और स्थल की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
दुनिया में यदि किसी देश ने बड़े पैमाने पर नदी कटान रोकने के लिए जियोटेक्सटाइल आधारित तकनीकों का सबसे व्यापक उपयोग किया है, तो वह बांग्लादेश है। Asian Development Bank (ADB) के Flood and Riverbank Erosion Risk Management Investment Program के तहत वहां गंगा (पद्मा), ब्रह्मपुत्र (जमुना) और मेघना जैसी अत्यधिक गतिशील नदियों के कटान को रोकने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। इस कटान के कारण वहां हर वर्ष हजारों हेक्टेयर भूमि नदी में समा जाती है और बड़ी आबादी विस्थापित होती है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए 1990 के दशक के उत्तरार्ध से बांग्लादेश जल विकास बोर्ड (BWDB) ने पारंपरिक पत्थर आधारित तटबंधों के साथ-साथ जियोट्यूब और जियोबैग तकनीक को अपनाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह तकनीक कई प्रमुख नदी तट संरक्षण परियोजनाओं का हिस्सा बन गई। इस तकनीक ने निर्माण कार्य को तेज, अपेक्षाकृत किफायती और बड़े डेल्टा क्षेत्रों के लिए अधिक व्यावहारिक बनाया है। आज बांग्लादेश के अनुभव को भारत सहित कई देशों में नदी कटान नियंत्रण की एक प्रभावी मिसाल के रूप में देखा जाता है।
घाघरा नदी पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, उद्योग, मत्स्य पालन के साथ ही कतरनिया घाट अभ्यारण्य के पारिस्थिति तंत्र के लिए भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
छोटे जियोटेक्सटाइल बैगों में रेत भरकर नदी किनारे कई परतों में लगाए जाते हैं। यदि किसी हिस्से में नुकसान होता है तो केवल उसी भाग की मरम्मत की जा सकती है। बिहार, असम और बांग्लादेश में इसका व्यापक उपयोग हुआ है।
नदी किनारे बड़े पत्थरों की परत बिछाई जाती है जिससे तेज धारा सीधे मिट्टी पर असर नहीं डाल पाती। यह पारंपरिक और अत्यंत प्रभावी तकनीक है, लेकिन जहां पत्थर दूर से लाने पड़ते हैं वहां इसकी लागत काफी बढ़ जाती है।
लोहे की जालीदार टोकरी (Gabion) में पत्थर भरकर दीवार बनाई जाती है। यह पानी के दबाव को सहन करते हुए मिट्टी को बहने से रोकती है। पुलों, नदी किनारों और पहाड़ी क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग होता है।
नदी के भीतर किनारे से लंबवत संरचनाएं बनाई जाती हैं, जो नदी की मुख्य धारा को किनारे से दूर मोड़ देती हैं। इससे कटान कम होता है। स्पर पत्थर, जियोबैग या कंक्रीट से बनाए जा सकते हैं।
कंक्रीट से बने कांटेदार ढांचे नदी में लगाए जाते हैं। ये पानी की रफ्तार कम करते हैं और इनके आसपास धीरे-धीरे गाद जमने लगती है, जिससे नया तट विकसित होने में मदद मिलती है।
नदी किनारे मैंग्रोव, वेटिवर (खस) घास, बांस, विलो (Willow) जैसी गहरी जड़ वाली वनस्पतियां लगाई जाती हैं। उनकी जड़ें मिट्टी को बांधकर कटान कम करती हैं। यह कम लागत और पर्यावरण अनुकूल तकनीक मानी जाती है। प्राकृतिक वनस्पतियों की मजबूत जड़ें मिट्टी को बांधकर नदी किनारों को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए कई देशों में कटान रोकने के लिए इंजीनियरिंग संरचनाओं के साथ जैविक उपाय भी अपनाए जाते हैं। समुद्री और ज्वारीय क्षेत्रों में मैंग्रोव सबसे प्रभावी प्राकृतिक सुरक्षा कवच माने जाते हैं। उनकी सघन जड़ें लहरों और जलधारा की ऊर्जा को कम करती हैं, तलछट (सिल्ट) को रोकती हैं और तटों के कटाव को धीमा करती हैं।
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