केन नदी

 
नदी और तालाब

भारत की 30 रिवर-लिंकिंग परियोजनाओं की सूची - केन-बेतवा से गंडक-गंगा तक

भारत की राष्ट्रीय नदी जोड़ परियोजना के तहत 30 नदी लिंक प्रस्तावित हैं, जिनमें केन-बेतवा, गंडक-गंगा, कोसी-घाघरा और गोदावरी-कृष्णा जैसे प्रमुख लिंक शामिल है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य जल-अधिकता वाले नदी बेसिनों से जल-कमी वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाकर क्षेत्रीय जल असंतुलन को कम करना है।

Author : सयाली पराते

देश में पानी की उपलब्धता अलग-अलग नदी बेसिनों में असमान है। इसी असमानता को कम करने के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना सहित नदियों को जोड़ने की व्यापक योजना बनाई गई, जिसका उद्देश्य जल अधिकता वाले क्षेत्रों से जल-कमी वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाना है। केन-बेतवा परियोजना इसी राष्ट्रीय नदी जोड़ कार्यक्रम की पहली कार्यान्वयनाधीन प्रमुख परियोजना है।

मानसून के दौरान देश के कई हिस्सों में नदियां उफान पर होती हैं और बाढ़ से गांव, खेत और शहर प्रभावित होते हैं, वहीं कुछ महीने बाद उन्हीं क्षेत्रों में पानी की कमी और सूखे की स्थिति दिखाई देती है।

कब और कैसे की गई नदी जोड़ने की परिकल्पना  

देश के अलग-अलग नदी बेसिनों में पानी की उपलब्धता भी समान नहीं है। इसी भौगोलिक और मौसमी असमानता को कम करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय नदी जोड़ परियोजना (Inter-linking of Rivers Programme) की परिकल्पना की गयी थी।


1972  में तत्कालीन Central Water and Power Commission ने  National Water Grid पर एक नोट तैयार किया था और उसी वर्ष तत्कालीन सिंचाई मंत्री डॉ. के. एल. राव ने गंगा को कावेरी से जोड़ने की अवधारणा के साथ National Water Grid का प्रस्ताव रखा। इसके बाद 1977 में कैप्टन दिनशॉ जे. दस्तूर ने Garland Canal की अवधारणा प्रस्तुत की। 

हालांकि, अगस्त 1980 में तत्कालीन सिंचाई मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग ने National Perspective Plan तैयार किया, जिसमें जल अधिकता वाले नदी बेसिनों से जल कमी वाले बेसिनों तक पानी के अंतर बेसिन स्थानांतरण की परिकल्पना की गई। 

इसी योजना के तहत बाद में 30 नदी जोड़ परियोजनाओं की पहचान हुई और इनके अध्ययन के लिए 1982 में NWDA की स्थापना की गई।  इस योजना के तहत जिन नदी घाटियों में उपलब्ध पानी को अधिशेष माना जाता है, वहां से पानी को उन बेसिनों तक पहुंचाया जाए जहां पानी की कमी है। इसके जरिए सिंचाई, पेयजल उपलब्धता, बाढ़ और सूखे से निपटने तथा क्षेत्रीय जल सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।

30 नदी जोड़ परियोजनाए

देश की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan-NPP) के तहत कुल 30 नदी जोड़ परियोजनाओं की पहचान की गई है। इनमें 14 लिंक हिमालयी घटक और 16 लिंक प्रायद्वीपीय घटक के तहत हैं। इन परियोजनाओं पर तकनीकी अध्ययन और रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (National Water Development Agency-NWDA) के पास है। 

राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण की स्थापना 1982 में की गई थी। इसका काम नदी बेसिनों के जल संतुलन, सर्वेक्षण, जल उपलब्धता और संभावित नदी जोड़ परियोजनाओं की व्यवहार्यता का अध्ययन करना है। बाद में इसके दायरे में हिमालयी घटक और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का काम भी शामिल किया गया। 

यह टेबल National Water Development Agency की एनुअल रिपोर्ट से ली गयी है।

क्रमांकघटकनदी जोड़ लिंक
1हिमालयी घटकमानस–संकौश–तीस्ता–गंगा (Manas–Sankosh–Teesta–Ganga)
2हिमालयी घटककोसी–घाघरा (Kosi–Ghaghara)
3हिमालयी घटकगंडक–गंगा (Gandak–Ganga)
4हिमालयी घटकघाघरा–यमुना (Ghaghara–Yamuna)
5हिमालयी घटकशारदा–यमुना (Sarda–Yamuna)
6हिमालयी घटकयमुना–राजस्थान (Yamuna–Rajasthan)
7हिमालयी घटकराजस्थान–साबरमती (Rajasthan–Sabarmati)
8हिमालयी घटकचूनार–सोन बैराज (Chunar–Sone Barrage)
9हिमालयी घटकसोन बांध–दक्षिणी गंगा सहायक नदियां (Sone Dam–Southern Tributaries of Ganga)
10हिमालयी घटकगंगा (फरक्का)–दामोदर–सुवर्णरेखा (Ganga–Farakka–Damodar–Subernarekha)
11हिमालयी घटकसुवर्णरेखा–महानदी (Subernarekha–Mahanadi)
12हिमालयी घटककोसी–मेची (Kosi–Mechi)
13हिमालयी घटकफरक्का–सुंदरबन (Farakka–Sunderbans)
14हिमालयी घटकजोगीघोपा–तीस्ता–फरक्का (Jogighopa–Teesta–Farakka)
15प्रायद्वीपीय घटकमहानदी (मणिभद्रा)–गोदावरी (डौलेश्वरम)
16प्रायद्वीपीय घटकगोदावरी (पोलावरम)–कृष्णा (विजयवाड़ा)
17प्रायद्वीपीय घटकगोदावरी (इंचमपल्ली)–कृष्णा (पुलिचिंतला)
18प्रायद्वीपीय घटकगोदावरी (इंचमपल्ली)–कृष्णा (नागार्जुनसागर)
19प्रायद्वीपीय घटककृष्णा (नागार्जुनसागर)–पेन्नार (सोमशिला)
20प्रायद्वीपीय घटककृष्णा (श्रीशैलम)–पेन्नार
21प्रायद्वीपीय घटककृष्णा (अलमट्टी)–पेन्नार
22प्रायद्वीपीय घटकपेन्नार (सोमशिला)–कावेरी (ग्रैंड एनीकट)
23प्रायद्वीपीय घटककावेरी (कट्टलाई)–वैगई–गुंडार
24प्रायद्वीपीय घटकपारबती–कालीसिंध–चंबल
25प्रायद्वीपीय घटकदमनगंगा–पिंजाल
26प्रायद्वीपीय घटकपार–तापी–नर्मदा
27प्रायद्वीपीय घटककेन–बेतवा
28प्रायद्वीपीय घटकपंबा–अचनकोविल–वैयापार
29प्रायद्वीपीय घटकनेत्रावती–हेमावती
30प्रायद्वीपीय घटकबेडती–वरदा

नदी जोड़ने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

देश में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। कुछ क्षेत्रों में कम अवधि में बहुत अधिक बारिश होती है, जबकि दूसरे हिस्सों में वर्षा कम या अनिश्चित रहती है। इसके अलावा मानसून की वर्षा कुछ ही महीनों में केंद्रित होती है।

ऐसे में नदी जोड़ कार्यक्रम के समर्थकों का तर्क है कि अतिरिक्त जल को बिना उपयोग समुद्र में जाने देने के बजाय उसका उपयोग जल संकट वाले क्षेत्रों में किया जा सकता है।

राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण के अनुसार, नदी जोड़ कार्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न बेसिनों और राज्यों के बीच उपलब्ध जल का अधिक समान वितरण करना है। सरकारी आकलन में इस कार्यक्रम से अतिरिक्त सिंचाई, पेयजल, सूखा शमन और कुछ क्षेत्रों में बाढ़ के प्रभाव को कम करने जैसे संभावित लाभ बताए गए हैं। 

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किसी नदी को अधिशेष और दूसरी को जल-अभाव वाली नदी मानने का आधार क्या है। किसी नदी में एक वर्ष अधिक पानी होना यह सुनिश्चित नहीं करता कि भविष्य में भी वहां उतना ही पानी उपलब्ध रहेगा।

केन-बेतवा, नदी जोड़ कार्यक्रम की पहली बड़ी परियोजना

राष्ट्रीय नदी जोड़ कार्यक्रम में केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) सबसे महत्वपूर्ण परियोजना बनकर सामने आई है। यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र से जुड़ी है, जहां पानी की कमी और सूखे की समस्या लंबे समय से बनी हुई है।

एक रिपोर्ट के अनुसार केन-बेतवा परियोजना राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के तहत कार्यान्वयन के चरण में पहुंचने वाली पहली और वर्तमान में एकमात्र प्राथमिक लिंक परियोजना है। इसकी अनुमानित लागत 44,605 करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र सरकार की सहायता 39,317 करोड़ रुपये है। परियोजना के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण (KBLPA) को संस्थागत व्यवस्था के रूप में बनाया गया है। 

परियोजना का उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ाना तथा क्षेत्र की जल सुरक्षा को मजबूत करना है।

दिसंबर 2024 में परियोजना के मुख्य घटक दौधन बांध के निर्माण कार्य के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ी और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पर्यावरण प्रबंधन योजना से जुड़े कार्य भी परियोजना की शुरुआती गतिविधियों में शामिल है। एक रिपोर्ट के अनुसार परियोजना को 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन नदी जोड़ परियोजनाओं में प्रगति हुई या जिन्हें मंजूरी मिली, उनका विवरण और उनसे होने वाले लाभ।

क्रमांकनदी जोड़ परियोजनालाभान्वित राज्यवार्षिक सिंचाई (लाख हेक्टेयर)घरेलू एवं औद्योगिक जल (MCM)जलविद्युत (MW)
1केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP)उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश10.62 (उ.प्र. 2.51; म.प्र. 8.11)194103 मेगावाट जलविद्युत + 27 मेगावाट सौर
2गोदावरी (इंचमपल्ली)-कृष्णा (नागार्जुनसागर) लिंकतेलंगाना2.3823226
3कृष्णा (नागार्जुनसागर)-पेन्नार (सोमशिला) लिंकआंध्र प्रदेश1.7123640
4पेन्नार (सोमशिला)-कावेरी (मणिमुक्ता) लिंकआंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पुडुचेरी0.51 (आंध्र प्रदेश); 1.14 (तमिलनाडु)43 (आंध्र प्रदेश); 618 (तमिलनाडु); 62 (पुडुचेरी)
5संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंकमध्य प्रदेश और राजस्थान10.15 (म.प्र. 6.11; राजस्थान 4.03)2,043 (म.प्र. 92.9; राजस्थान 1,949.91)
6कृष्णा (अलमट्टी)-पेन्नार लिंककर्नाटक और आंध्र प्रदेश0.69 (कर्नाटक); 1.57 (आंध्र प्रदेश)10.1 पेयजल + 22.3 औद्योगिक जल
7बेदती-वरदा लिंककर्नाटक1.0538
8नेत्रावती-हेमावती लिंककर्नाटक0.34
9गोदावरी (SSMP/इंचमपल्ली)-कृष्णा (पुलिचिंतला) लिंकतेलंगाना और आंध्र प्रदेश4.74 (तेलंगाना 0.36; आंध्र प्रदेश 4.38)तेलंगाना 26.89; आंध्र प्रदेश 319.7
10गोदावरी (पोलावरम)-कृष्णा (विजयवाड़ा) लिंक (पोलावरम सिंचाई परियोजना)आंध्र प्रदेश4.36665960
11कृष्णा (श्रीशैलम)-पेन्नार लिंकआंध्र प्रदेश1.795811
12कोसी-घाघरा लिंकबिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल8.35बिहार 0; उत्तर प्रदेश 1.20; नेपाल 1.10
13गंडक-गंगा लिंकउत्तर प्रदेश और नेपाल34.58 (उ.प्र. 28.80; नेपाल 5.78)7004,375 मेगावाट बांध चरण + 18 मेगावाट नहर चरण
14यमुना-राजस्थान लिंकहरियाणा और राजस्थान2.51 (हरियाणा 0.11; राजस्थान 2.40)301,702
15राजस्थान-साबरमती लिंकराजस्थान और गुजरात11.53 (राजस्थान 11.21; गुजरात 0.32)1025,126
16चुनार-सोन बैराज लिंकबिहार और उत्तर प्रदेश0.60 (बिहार 0.10; उ.प्र. 0.49)
17गंगा (फरक्का)-दामोदर-सुवर्णरेखा लिंकपश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड12.30 (प.बं. 11.18; ओडिशा 0.39; झारखंड 0.73)432
18सुवर्णरेखा-महानदी लिंकपश्चिम बंगाल और ओडिशा2.16 (प.बं. 0.18; ओडिशा 1.98)19820

सिंचाई से खाद्य सुरक्षा तक

देश में कृषि अभी भी मानसून और पानी की उपलब्धता पर काफी निर्भर है। ऐसे में यदि जल संकट वाले कृषि क्षेत्रों में सिंचाई का विस्तार होता है तो फसल उत्पादन और किसानों की आय पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।

नदी जोड़ परियोजना के समर्थकों का मानना है कि अतिरिक्त सिंचाई क्षमता से वर्षा आधारित खेती पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे सूखे के दौरान फसल नुकसान का जोखिम भी कम हो सकता है।

लेकिन सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना ही खाद्य सुरक्षा की पूरी कहानी नहीं है। फसल का चयन, भूजल की स्थिति, मिट्टी की गुणवत्ता, बाजार और किसानों की लागत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यदि नदी से पानी खेत तक पहुंच भी जाए, लेकिन किसान अत्यधिक पानी वाली फसलों की ओर चले जाएं, तो लंबे समय में नई जल समस्या पैदा हो सकती है। इसलिए नदी जोड़ परियोजनाओं के साथ जल दक्ष सिंचाई और फसल विविधीकरण को भी बढ़ावा देना जरूरी होगा।

क्या नदी जोड़ने से बाढ़ और सूखा दोनों खत्म हो जाएंगे?

नदी जोड़ परियोजना को लेकर सबसे अधिक चर्चा इसके बाढ़ और सूखा प्रबंधन से जुड़े संभावित लाभों को लेकर होती है। सिद्धांत रूप में यदि अतिरिक्त जल को संग्रहित कर दूसरे क्षेत्रों में भेजा जाए तो कुछ क्षेत्रों में बाढ़ के चरम प्रवाह को नियंत्रित करने और जल की कमी वाले क्षेत्रों में पानी पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि नदी जोड़ने से देश में बाढ़ और सूखा पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। बाढ़ केवल नदी में अधिक पानी होने की वजह से नहीं आती। शहरीकरण, बाढ़भूमि पर निर्माण, जल निकासी की समस्या, वनों की कटाई और अत्यधिक वर्षा जैसी कई परिस्थितियां बाढ़ को बढ़ाती है।

इसी तरह सूखा केवल नदी में पानी की कमी का परिणाम नहीं है। भूजल का अत्यधिक दोहन, खराब जल प्रबंधन, फसल पैटर्न और वर्षा में बदलाव भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं। इसलिए नदी जोड़ को एक संभावित जल प्रबंधन उपाय के रूप में देखना अधिक उचित होगा, न कि बाढ़ और सूखे का अकेला समाधान।

पर्यावरणीय चिंताएं क्यों महत्वपूर्ण है?

नदियां सिर्फ पानी की पाइपलाइन नहीं हैं। उनका अपना प्राकृतिक प्रवाह होता है, जो नदी के किनारे के जंगलों, आर्द्रभूमियों, मछलियों, जलीय जीवों, कृषि और स्थानीय समुदायों से जुड़ा होता है।

किसी नदी के प्रवाह को बदलने से उसके पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर असर पड़ सकता है। बड़े बांध और जलाशय बनने से वन क्षेत्र और वन्यजीव आवास प्रभावित हो सकते हैं। वहीं नहरों के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की आवश्यकता पड़ सकती है।

इसीलिए नदी जोड़ परियोजनाओं में पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का आकलन बेहद महत्वपूर्ण है। सरकारी परियोजना दस्तावेजों में भी पर्यावरण, पारिस्थितिकी और पुनर्वास से संबंधित पहलुओं को परियोजना नियोजन का हिस्सा बनाया गया है। 

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती

नदी जोड़ परियोजना के भविष्य को जलवायु परिवर्तन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत में मानसून की अनिश्चितता, कम समय में अत्यधिक बारिश, लंबे शुष्क दौर और बढ़ते तापमान जैसी घटनाएं जल संसाधनों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती हैं।

ऐसे में आज जिस नदी बेसिन में पानी अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध है, वहां भविष्य में भी वही स्थिति बनी रहेगी, यह मान लेना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए नदी जोड़ परियोजनाओं के लिए भविष्य के जलवायु परिदृश्यों को ध्यान में रखते हुए जल उपलब्धता का आकलन जरूरी है। इसके अलावा प्रत्येक नदी बेसिन के लिए पर्यावरणीय प्रवाह यानी Environmental Flow को भी महत्व देना होगा, ताकि नदी केवल नहरों और जलाशयों तक सीमित न हो जाए।

राज्यों की सहमति सबसे बड़ी जरूरत

देश की अधिकांश प्रमुख नदियां एक से अधिक राज्यों से होकर गुजरती हैं। इसलिए नदी जोड़ परियोजनाओं का कार्यान्वयन केवल केंद्र सरकार के निर्णय से संभव नहीं है। संबंधित राज्यों की सहमति और सहयोग भी जरूरी है।

जल बंटवारे को लेकर पहले से मौजूद अंतरराज्यीय विवाद ऐसी परियोजनाओं को जटिल बना सकते हैं। इसके अलावा किसी नदी से पानी दूसरे बेसिन में स्थानांतरित करने का फैसला स्थानीय स्तर पर भी कई सवाल पैदा कर सकता है।

इसलिए परियोजनाओं की सफलता के लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था, पारदर्शी जल आंकड़े और राज्यों के बीच दीर्घकालिक समझौते आवश्यक हैं।

क्या बड़े प्रोजेक्ट के साथ छोटे समाधान भी जरूरी हैं?

देश का जल संकट केवल बड़े बांधों और नहरों से हल नहीं किया जा सकता। नदी जोड़ परियोजना के साथ स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण को भी समान महत्व देना होगा।

इसके लिए 

  • वर्षा जल संचयन

  • तालाबों और कुओं का पुनर्जीवन

  • भूजल पुनर्भरण

  • जलागम विकास

  • ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई

  • कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा

  • पारंपरिक जल संरचनाओं का संरक्षण जैसे उपाय जरूरी हैं।

कई क्षेत्रों में स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण कम लागत में जल सुरक्षा मजबूत कर सकता है।

आगे की राह क्या?  नदी नहीं, पूरे नदी तंत्र को समझना होगा

भारत की नदी जोड़ परियोजना एक विशाल और दीर्घकालिक जल संसाधन योजना है। 30 नदी लिंक की पहचान, 26 व्यवहार्यता रिपोर्ट और 13 विस्तृत परियोजना रिपोर्ट का पूरा होना बताता है कि कार्यक्रम तकनीकी अध्ययन के स्तर पर काफी आगे बढ़ चुका है। वहीं केन-बेतवा परियोजना इसके कार्यान्वयन की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।

लेकिन भारत की जल सुरक्षा का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि कितनी नदियां जोड़ी गईं। असली सवाल यह होगा कि कितना पानी उपलब्ध है, कितने समय तक उपलब्ध रहेगा, किसे मिलेगा और इसकी कीमत पर्यावरण तथा स्थानीय समुदायों को कितनी चुकानी पड़ेगी।

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