‘केरल की जीवन-रेखा’ के रूप में जानी जाने वाली भरतपुझा नदी अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी मशहूर है।
स्रोत : विकी कॉमंस
भारत नदियों का देश है। गंगा, यमुना, गोमती, सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, साबरमती, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी और महानदी जैसी दर्ज़नों नदियां इसके विस्तृत भूभाग को सिंचत कर हरा-भरा बनाती हैं। भारत में नदियों को अक्सर उनकी लंबाई, जल-प्रवाह और आर्थिक व सांस्कृतिक महत्व के आधार पर पहचाना जाता है, लेकिन कभी-कभी उनकी “आयु” यानी नदी की उम्र भी उसकी एक खासियत बन जाती है। ऐसी ही एक नदी है दक्षिण भारत के केरल राज्य में, जो अब 'केरलम' हो गया है, बहने वाली भरतपुझा नदी। स्थानीय लोग इसे ‘नीला' और ‘पोन्नानी’ नदी के नाम से भी पुकारते हैं। इसे लेकर यह दावा अकसर सुनने को मिलता है कि यह ‘भारत की सबसे पुरानी नदी’ है। क्या यह बात सच है या महज़ एक लोक-धारणा? यह लोक-मान्यता भूगर्भ और इतिहास की कसौटी पर कितनी खरी उतरती है, इस लेख में हम इसी की पड़ताल करने जा रहे हैं।
बिना किसी लाग-लपेट के अगर इसका जवाब सीधा सा जवाब दिया जाए, तो वह है- ‘नहीं'। भले ही सदियों से यह दावा किया जाता हो और लोगों का ऐसा विश्वास हो, पर भरतपुझा को दावे के साथ भारत की सबसे प्राचीन नदी कहने के ठोस भूगर्भीय, भौगोलिक और ऐतिहासिक साक्ष्य मौजू़द नहीं हैं। यूं भी किसी नदी की सटीक उम्र तय कर पाना आसान नहीं है। यहां हम केवल पानी की धारा की बात नहीं कर रहे, बल्कि नदी के साथ वह भूभाग भी जुड़ा होता है, जिस पर वह बहती है। यह सच है कि केरल की नदियां करोड़ों वर्ष पुरानी प्रागैतिहासिक पर्वतों की शिलाओं से होकर गुजरती हैं, जिनकी आयु हिमालय से भी अधिक है। शायद इसी कारण यह धारणा बनी कि देश के इस भूभाग में भारत की सबसे प्राचीन नदियां बहती हैं और भरतपुझा उनमें सबसे प्राचीन नदी है। वास्तव में यह एक सांस्कृतिक सम्मानसूचक दावा है, जिसे कई तरह से परख कर देखने की आवश्यकता है।
करीब 209 किलोमीटर लंबी भरतपुझा नदी के किनारे केरल के कई प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं, जिसके चलते इसकी काफी धार्मिक मान्यता है और प्राचीनतम नदी होने का मिथक जुड़ा हुआ है।
दक्षिण भारत में भरतपुझा को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भरतपुझा नदी नदी पश्चिमी घाट की अनामलाई पहाड़ियों से निकलती है। यह केरल के पलक्कड़, मलप्पुरम, त्रिशूर जिलों और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों से होकर बहती है। अपने प्रवाह से एक बड़े क्षेत्र का जलभराव करते हुए केरल के मलप्पुरम जिले के पोन्नानी में अरब सागर में मिल जाती है। यह केरल की सबसे लंबी नदी है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के कारण इसे केरल की "सांस्कृतिक नदी" के रूप में जाना जाता है। स्थानीय साहित्य, लोकगीतों और परंपराओं में इसे जीवनदायिनी और प्राचीन धारा के रूप में चित्रित किया गया है। इसीलिए अकसर लेखों और लोकप्रिय विवरणों में इसे “भारत की सबसे पुरानी नदी” कह दिया जाता है। हालांकि, वैज्ञानिक रूप से किसी नदी को “सबसे पुरानी” घोषित करने के लिए भूगर्भीय साक्ष्य, चट्टानों की आयु, घाटी के विकास और टेक्टोनिक स्थिरता जैसे कारकों का अध्ययन जरूरी होता है। इस संदर्भ में आमतौर पर नर्मदा को भारत की प्राचीनतम नदी माना जाता है, क्योंकि यह ऐसी प्राचीन रिफ्ट घाटी से होकर बहती है, जिसकी संरचना करोड़ों वर्ष पुरानी है। इसलिए “सबसे पुरानी” का दावा संदर्भ पर भी निर्भर करता है कि क्या हम सांस्कृतिक प्राचीनता की बात कर रहे हैं या भूगर्भीय आयु की?
किसी नदी की उम्र तय करना सीधे-सीधे संभव नहीं, क्योंकि नदी का पानी हर पल बदलता रहता है। वैज्ञानिक नदी की आयु का अनुमान उसकी घाटी, तलछट, चट्टानों की परतों और टेक्टोनिक गतिविधियों के आधार पर लगाते हैं।
यदि कोई नदी अत्यंत प्राचीन चट्टानी संरचनाओं से होकर लगातार बहती रही है और उसकी दिशा में बड़े भूगर्भीय परिवर्तन नहीं हुए, तो उसे भूगर्भीय दृष्टि से प्राचीन माना जा सकता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत का प्रायद्वीपीय भूभाग भारतीय प्लेट का स्थिर हिस्सा है, जो हिमालय की तरह बार-बार उठान या बड़े बदलाव से नहीं गुजरा।
इस स्थिरता के कारण यहां की नदियां, जिनमें भरतपुझा भी शामिल है, लंबे समय से पश्चिम की ओर बह रही हैं। यही कारण है कि इन्हें अत्यंत प्राचीन धारा माना जाता है।
यह कहना कठिन है कि भरतपुझा भारत की “सबसे पुरानी” नदी है, क्योंकि यह उपाधि संदर्भ पर निर्भर करती है। भूगर्भीय रूप से नर्मदा जैसी नदियां भी अत्यंत प्राचीन मानी जाती हैं।
लेकिन केरल के संदर्भ में भरतपुझा निश्चित रूप से सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन धाराओं में एक है। इसकी घाटी, भू-संरचना और सांस्कृतिक इतिहास इसे विशिष्ट बनाते हैं।
इस बहस का सार यही है कि नदियों की आयु केवल वैज्ञानिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि मानव स्मृति, संस्कृति और भूगर्भीय समय के संगम से तय होती है।
भरतपुझा नदी के तटों पर नारियल के पेड़ों की कतारें इसके प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगाती हैं।
पश्चिमी घाट विश्व के प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में गिने जाते हैं। इनकी चट्टानें अरबों वर्ष पुरानी मानी जाती हैं। जब ऐसी प्राचीन शिलाओं से होकर कोई नदी बहती है, तो उसका इतिहास भी उसी भूगर्भीय कथा से जुड़ जाता है।
केरल की नदियां, जिनमें भरतपुझा और पेरियार नदी प्रमुख हैं, पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में मिलती हैं। इनका प्रवाह छोटा जरूर है, लेकिन भूगर्भीय दृष्टि से ये अत्यंत स्थिर भूभाग से होकर बहती रही हैं।
यह स्थिरता ही इन्हें विशिष्ट बनाती है। जहां उत्तर भारत की नदियां हिमालय के उठान और बदलती धाराओं से प्रभावित हुईं, वहीं केरल की नदियां अपेक्षाकृत स्थिर भू-संरचना में बहती रहीं।
भूगर्भीय दृष्टि से भरतपुझा को भारत की प्राचीनतम नदी भले ही नहीं कहा जा सकता, पर यह सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके तट पर कई प्राचीन मंदिर, साहित्यिक परंपराएं और सामाजिक आंदोलन विकसित हुए। मलयालम साहित्य में इसे “नीला” नाम से श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।
नदी के तट पर बसे गांवों और कस्बों ने कृषि, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। इस प्रकार नदी केवल जलधारा नहीं रही, बल्कि सभ्यता की धुरी बन गई। यही सांस्कृतिक पहचान इसे कभी-कभी इसे “सबसे पुरानी” नदी कहने का आधार बन जाती है। मोटे तौर पर इसका तात्पर्य होता है, एक ऐसी धारा जो सदियों से समाज की स्मृति में जीवित रही है।
आज भरतपुझा गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। अनियंत्रित रेत खनन, बांध निर्माण, भूजल दोहन और बदलते मानसून पैटर्न ने इसके प्रवाह को प्रभावित किया है। कई स्थानों पर गर्मियों में इसका तल लगभग सूख जाता है।
यदि कोई नदी भूगर्भीय रूप से प्राचीन हो, लेकिन वर्तमान में संकटग्रस्त हो, तो यह विडंबना ही कही जाएगी। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अनियमितता बढ़ रही है, जिससे इसके जलप्रवाह में उतार-चढ़ाव तेज हो गया है।
ऐसे में “सबसे पुरानी नदी” की बहस से अधिक जरूरी है उसके संरक्षण की चर्चा।
कलपतिपुझा नाम की सहायक नदी भरतपुझा की धाराओं को और भी प्रबल बनाती है।
केरल की कुछ प्रमुख नदियां, उनके उद्गम स्थल, प्रवाह क्षेत्र और लंबाई इस प्रकार है-
1. पेरियार नदी - सह्याद्री पर्वत से निकलने वाली यह नदी 244 किलोमीटर की यात्रा में केरल और पड़ोसी राज्य तमिलनाडु के एक बड़े इलाके को सींचती है। यह केरल राज्य की सबसे लंबी नदी है और घूमने के लिए यहां की सबसे अच्छी जगहों में से एक है। यह पेरियार झील के रूप में पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में देखने को मिलती है। इस नदी में कई सहायक नदियां भी आकर मिलती हैं। मुल्लापेरियार बांध और इडुक्की बांध इस नदी पर बने केरल के सबसे प्रसिद्ध बांध हैं।
2. भरतपुझा - इसे ‘केरल की जीवन-रेखा’ भी कहा जाता है। 209 किलोमीटर लंबी इस नदी के मार्ग में 11 किले हैं। इनके अलावा प्रसिद्ध मालम्पुझा बांध भीभी है। धार्मिक दृष्टि से भी इस नदी का विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें केरल के कई महत्वपूर्ण मंदिर स्थित हैं इसलिए यह कई धार्मिक अनुष्ठानों का केंद्र भी है।
3. पनबा - राज्य की इस तीसरी सबसे लंबी नदी का उद्गम पीरमेडु ऑप्रेशन पुलाचीमाला पर्वत में हुआ है। यह दक्षिणी गंगा, दक्षिण भागीरथी और बारिस नदी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसलिए यह देश के हजारों हिंदू भक्तों के लिए एक पवित्र स्थान है। केरल के प्रसिद्ध झरनों में से एक, पेरुन्थेनुवी झरना पंबा नदी तट पर स्थित है। यह नदी 176 किमी तक बहती है। इस नदी के मार्ग पर कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल स्थित हैं। केरल के सबसे महत्वपूर्ण चित्रों में से एक, इसके किनारे स्थित प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर है।
4. चलियार - बेपोर के नाम से भी प्रसिद्ध है चालियार नदी 169 किमी तक बहती है और राज्य की चौथी सबसे लंबी नदी है। लोगों के लिए जलस्रोत के साथ-साथ, यह नदी शहरों के बीच परिवहन का भी एक महत्वपूर्ण साधन है। यह नदी साल भर भरपूर प्रवाह और आकर्षण में रहती है और सूखती नहीं। इसलिए इस जलधारा को देखने के लिए कोई समय सीमा नहीं है।
5. काबिनी - काबिनी नदी 240 किलोमीटर की दूरी तय करके अंत में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। यह नदी पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके मार्ग में कई दर्शनीय स्थल हैं। नदी की एक अद्भुत रचना कुरुवा द्वीप है, जो 520 ओक में फैली हुई है और अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इसी नदी पर स्थित एक और महत्वपूर्ण स्थल है। यह रिवर बैकवाटर भी साल भर में फिल्मांकन का मंचन करती है। हालांकि गर्मियों में अकसर यह नदी सूख जाती है, फिर भी इसकी पथरीली घाटी के पत्थरों को निहारने का अपना अलग मज़ा है।
चाहे भरतपुझा को भारत की सबसे पुरानी नदी माना जाए या नहीं, इसमें कोई संदेह नहीं कि यह दक्षिण भारत की एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण धारा है।
प्राकृतिक विरासत की असली पहचान केवल उसकी आयु से नहीं, बल्कि उसके वर्तमान स्वास्थ्य से होती है। यदि हम अपनी नदियों को प्रदूषण, अतिक्रमण और अवैज्ञानिक विकास से नहीं बचा पाए, तो उनकी प्राचीनता का दावा केवल इतिहास की किताबों तक सीमित रह जाएगा।
इसलिए जरूरी है कि भूगर्भीय गौरव के साथ-साथ पारिस्थितिक जिम्मेदारी भी निभाई जाए, ताकि यह धारा आने वाले समय में भी उतनी ही जीवंत रहे, जितनी सदियों से रही है।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें