नून नदी के किनारे फैला यह इलाका एक ऐसे भू-भाग का हिस्सा है जो हर साल पानी को समेटता है, फैलाता है और धीरे-धीरे छोड़ता है, ठीक वैसा ही व्यवहार, जैसा एक वेटलैंड करता है।
चित्र: गोपेश कुमार, रिसर्च ऑफिसर, ICSSR
जैसे-जैसे मानसून करीब आ रहा है, उत्तर बिहार के कई इलाकों में एक पुराना सवाल फिर सामने आने लगता है। समस्तीपुर के मोरवा क्षेत्र में एक छोटी सी धर्मी जगह है जिसका नाम है केवल धाम। सावन में यहां लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है, लेकिन मानसून के साथ ही इस जगह का एक दूसरा रूप भी सामने आता है।
इस जगह से जुड़ी स्थानीय रिपोर्ट बताती हैं कि हर साल बाढ़ का पानी मंदिर परिसर तक पहुंच जाता है। किसी साल यह जलभराव कुछ दिनों का होता है, तो कभी हफ्तों तक बना रहता है। स्थानीय लोग इसे बाढ़ मानते हैं और प्रशासन के रिकॉर्ड में यह एक प्राकृतिक आपदा के रूप में दर्ज होता है। लेकिन सवाल यह है क्या यह केवल बाढ़ है, या एक ऐसी आर्द्रभूमि (वेटलैंड) जिसकी पहचान हमने कभी की ही नहीं?
दरअसल नून नदी के किनारे फैला यह इलाका एक ऐसे भू-भाग का हिस्सा है जो हर साल पानी को समेटता है, फैलाता है और धीरे-धीरे छोड़ता है, ठीक वैसा ही व्यवहार, जैसा एक वेटलैंड करता है।
नेशनल वेटलैंड एटलस (ISRO, 2011) के अनुसार उत्तर बिहार की बागमती, बूढ़ी गंडक और उनकी सहायक नदियां जलोढ़ बाढ़ मैदान प्रणाली (Alluvial floodplain system) के हिसाब से बहती हैं। नून नदी भी इसी प्रणाली का हिस्सा है।
हालांकि नून नदी कोई बड़ी नदी नहीं है, लेकिन यह उस बड़े बाढ़-क्षेत्र (floodplain) का हिस्सा है जहां उत्तर बिहार की नदियां अपने किनारों तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि फैलती हैं।
इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (IWMI, 2017) और रामसर कन्वेंशन, 2016 के अध्ययन में इसे नदी और ज़मीन के बीच हाइड्रोलॉजिकल कनेक्टिविटी (hydrological connectivity) कहा गया है। यानी नदी और ज़मीन के बीच ऐसा रिश्ता जो मौसम के साथ बदलता रहता है। उत्तर बिहार के बाढ़क्षेत्र वेटलैंड पर हुए अध्ययन बताते हैं कि नदी के पुराने रास्ते और तलछट का जमाव मिलकर ऐसे अस्थायी जल-तंत्र बनाते हैं। केवल धाम के आसपास की ज़मीन भी इसी तरह काम करती है। जैसे उसे अब भी याद हो कि पानी को कब रोकना है और कब छोड़ देना है। नून नदी का पानी जब अपने किनारों से बाहर आता है, तो केवल धाम के आसपास का इलाका:
जल संचय करता है।
धीरे-धीरे पानी छोड़ता है।
आसपास के भूजल को पुनर्भरण (recharge) करता है।
यानी यह पूरा क्षेत्र एक कार्यात्मक आर्द्रभूमि प्रणाली (functional wetland system) की तरह काम करता है। भले ही इसे आधिकारिक तौर पर वेटलैंड घोषित न किया गया हो।
बिहार राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण (2022-23) के अनुसार, बिहार में हाल के वर्षों में मछली उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। और इसमें वेटलैंड आधारित गतिविधियों की भूमिका मानी जाती है।
केवल धाम के लिए यह पानी दो तरह के अर्थ रखता है। एक तरफ़ जहां यह एक संकट बनता वहीं दूसरी ओर अपने साथ संभावनाएं भी लेकर आता है।
बरसात में (विशेष रूप से सावन के महीने में) जलजमाव के कारण लोगों के लिए मंदिर के परिसर तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। नतीजतन, स्थानीय व्यापार और मेले पर इसका असर पड़ता है। वहीं घरों और खेतों में भी जलजमाव की समस्या पैदा हो जाती है।
इंडियन काउंसल ऑफ़ सोशल साइंस एंड रिसर्च (ICSSR) के रिसर्च ऑफिसर गोपेश कुमार से बातचीत में स्थानीय लोगों ने बताया कि पानी भर जाने पर कई दिनों तक दुकान लगाना संभव नहीं होता, जिससे उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ता है।
लोगों का यह भी कहना है कि सावन में, जब सबसे ज़्यादा भीड़ होती है, वही समय होता है जब पानी सबसे बड़ी रुकावट बन जाता है। वहीं घरों और खेतों में भी जलजमाव की समस्या पैदा हो जाती है।
लेकिन दूसरी तरफ़ यह एक ऐसी संभावना बन जाती है जिसे शायद अभी तक ठीक से पहचाना नहीं गया है। समस्तीपुर के महिसर चौर (607 हेक्टेयर) जैसे इलाकों में ऐसे जलभराव को नियंत्रित कर मछली पालन और खेती दोनों को साथ-साथ चलाने के उदाहरण मिलते हैं।
बिहार राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण (2022-23) के अनुसार, बिहार में हाल के वर्षों में मछली उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। और इसमें वेटलैंड आधारित गतिविधियों की भूमिका मानी जाती है। इससे संकेत मिलता है कि केवल धाम का क्षेत्र भी “समस्या” से “संसाधन” में बदल सकता है। लेकिन इसके लिए सिर्फ बाढ़ नियंत्रण नहीं, बल्कि वेटलैंड की समझ ज़रूरी है।
पानी भर जाने पर कई दिनों तक दुकान लगाना संभव नहीं होता, जिससे उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ता है।गोपेश कुमार, रिसर्च ऑफिसर, ICSSR
नून नदी के किनारे फैला यह इलाका एक ऐसे भू-भाग का हिस्सा है जो हर साल पानी को समेटता है, फैलाता है और धीरे-धीरे छोड़ता है, ठीक वैसा ही व्यवहार, जैसा एक वेटलैंड करता है।
केवल धाम कोई अपवाद नहीं है, बल्कि एक बड़ी प्रणाली का हिस्सा है। नेशनल वेटलैंड एटलस (ISRO, 2011) के अनुसार बिहार में 21,998 वेटलैंड दर्ज हैं, जिसके तहत लगभग 4,03,209 हेक्टेयर का क्षेत्र आता है। इसके अनुसार राज्य के 74 फ़ीसद वेटलैंड नदी या जलधारणों (स्ट्रीम) से जुड़े हैं। इनमें चौर, गोखर झील (oxbow lakes) जैसे बाढ़क्षेत्र वेटलैंड प्रमुख हैं।
उत्तर बिहार में कोसी, गंडक, बागमती बेसिन में वेटलैंड की सघनता (density) सबसे ज़्यादा है। ये वेटलैंड बाढ़ के समय पानी को फैलने की जगह देते हैं और भूजल रिचार्ज में मदद करते हैं। साथ ही स्थानीय आजीविका का एक बड़ा आधार भी बनती हैं। ऐसे में केवल धाम का यह जलभराव उसी बड़े जल-तंत्र का एक छोटा-सा हिस्सा है।
उत्तर बिहार में बाढ़ सिर्फ पानी की अधिकता का नतीजा नहीं है, बल्कि उस जगह की कमी का भी, जहां यह पानी ठहर सके।
वैज्ञानिक और नीति अध्ययन एक ही बात दोहराते हैं। वे बताते हैं कि वेटलैंड दरअसल प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती हैं। वे पानी को रोकती हैं, धीरे-धीरे छोड़ती हैं और बाढ़ की तीव्रता को कम करती हैं। यानी पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में जब यह तंत्र कमजोर होता है, तो वही पानी तेज़ी से इकट्ठा होकर ज़्यादा विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लेता है।
लेकिन बिहार में इस प्राकृतिक प्रणाली की अलग ही चुनौतियां हैं। दरअसल उत्तर बिहार में बाढ़ सिर्फ पानी की अधिकता का नतीजा नहीं है, बल्कि उस जगह की कमी का भी, जहां यह पानी ठहर सके।
पिछले कुछ सालों में यहां तटबंध और एम्बैंकमेंट का विस्तार हुआ है। साथ ही नदियों के बाढ़क्षेत्र इलाकों में अतिक्रमण भी बढ़ा है। नतीजतन, भूमि उपयोग में तेजी से बदलाव आया है और जलभराव वाले क्षेत्रों को समस्या मानकर पानी को निकालने (drain) की कोशिशें की गई हैं।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के बाढ़ प्रबंधन अध्ययन के अनुसार इन कारणों से बाढ़क्षेत्रों का आपस का जुड़ाव (floodplain connectivity) ख़त्म हो गया है, और वेटलैंड ने स्पंज की तरह काम करना बंद कर दिया है। जिससे कि बाढ़ और सूखा दोनों ही प्रकार की घटनाओं की संख्या बढ़ने लगी है।
वेटलैंड के संरक्षण के लिए नीतिगत ढांचा मौजूद है। भारत में Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017 लागू हैं। बिहार में इसके तहत बिहार राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण का गठन किया गया है। इनका उद्देश्य वेटलैंड की पहचान करना, उनकी सूची तैयार करना और उनके संरक्षण एवं प्रबंधन की दिशा तय करना है। फिर भी ज़मीन पर तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
केवल धाम जैसे मौसमी जलभराव वाले क्षेत्र, बाढ़क्षेत्र वेटलैंड का हिस्सा तो हैं, लेकिन अक्सर नीति की नज़र से बाहर रह जाते हैं, क्योंकि उन्हें अभी भी “बाढ़-प्रभावित क्षेत्र” के रूप में ही देखा जाता है।
ऐसे में सवाल सिर्फ संरक्षण का नहीं, बल्कि पहचान और दृष्टिकोण का भी बन जाता है।
इसके लिए सबसे पहला कदम है, फ्लडप्लेन वेटलैंड की सही पहचान। इसका मतलब सिर्फ स्थायी झीलों और बड़े जलाशयों को सूचीबद्ध करना नहीं है। बल्कि हर साल पानी को थामने और छोड़ने वाले सभी मौसमी जलभराव वाले क्षेत्रों को भी शामिल करना है।
दूसरा, समुदाय की भूमिका को भी केंद्र में लाना होगा। अलग-अलग अध्ययनों में यह सामने आया है कि जहां स्थानीय समुदायों को वेटलैंड प्रबंधन में शामिल किया गया, वहां जल प्रवाह को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सका और आजीविका के अवसर भी बढ़े हैं।
तीसरा, नदी और वेटलैंड के बीच कनेक्टिविटी बनाए रखना जरूरी है। हर जलभराव को समस्या मानकर उसे बहाने या निकालने (drain) कर देना समाधान नहीं है। शोध बताते हैं कि वेटलैंड का क्षरण सीधे तौर पर स्थानीय आजीविका और पारिस्थितिकी दोनों को प्रभावित करता है।
इसके अलावा कई जगहों पर एकीकृत (integrated) प्रबंधन के प्रयासों से यह भी देखा गया है कि वेटलैंड संरक्षण और उपयोग, दोनों को साथ-साथ साधा जा सकता है, बशर्ते योजना में स्थानीय भागीदारी और पारिस्थितिक समझ को शामिल किया जाए।
शोध बताते हैं कि वेटलैंड का क्षरण सीधे तौर पर स्थानीय आजीविका और पारिस्थितिकी दोनों को प्रभावित करता है।
केवल धाम की यह कहानी किसी एक गांव या एक नदी तक सीमित नहीं है। यह उस पूरे भूगोल की झलक है, जहां पानी अब भी अपने रास्ते बनाने की कोशिश कर रहा है और हम उसे रोकने, मोड़ने या जल्दी से हटाने में लगे हुए हैं।
उत्तर बिहार के बाढ़क्षेत्र में ऐसी ज़मीनें नई नहीं हैं। बल्कि उन्हें देखने का हमारा नज़रिया नया हो गया है। ऐसा नज़रिया जिसके तहत जलभराव को अब भी एक समस्या के रूप में दर्ज किया जाता है, न कि एक ऐसे तंत्र के रूप में जो पानी को संभाल सकता है।
केवल धाम जैसे उदाहरण बताते हैं कि शायद समाधान हमेशा बड़े ढांचों या नई परियोजनाओं में नहीं है। बल्कि कभी-कभी वह मानव और पानी के बीच के रिश्तों की समझ, उसके नियंत्रण के तरीक़ों और प्रकृति के साथ विकसित होने वाली साझा सीख में भी छिपी होती है।
केवल धाम में हर साल आने वाला पानी यही सवाल दोहराता है।
और शायद, इसका जवाब भी वहीं कहीं मौजूद है, उसी ज़मीन में, जो हर साल पानी को थामती है और फिर चुपचाप छोड़ देती है।
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