छोटा तालाब, भोपाल

 

फ़ोटो - राशीद नूर खान 

नदी और तालाब

भोपाल के छोटे तालाब पर पर्यावरणीय खतरा, पेड़ों को रासायनिक इंजेक्शन, एनजीटी सख्त

भोपाल के छोटे तालाब पर अतिक्रमण का मामला अब गर्म हो गया है। एनजीटी ने इस तालाब को संकट से निकालने के लिए सख्‍त निर्देश दिये हैं।

Author : सयाली पराते

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक पहचान इसकी झीलों से है, लेकिन वर्तमान में यहां का पारिस्थितिकी तंत्र एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। छोटा तालाब में निर्माण कार्य और पर्यावरणीय नुकसान के मामले में हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), केंद्रीय क्षेत्रीय पीठ, भोपाल ने सुनवाई करते हुए नाराजगी व्यक्त की है और जांच के लिए कमेटी बनाई है। इस दौरान लोअर लेक के संरक्षण को लेकर अत्यंत महत्वपूर्ण और सख्त आदेश पारित किए है।

पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर खान द्वारा पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर मुद्दे उठाये गए थे, जिसमें भोज वेटलैंड लोअर लेक भोपाल के Full Tank Level (FTL), बफर जोन तथा प्रभाव क्षेत्र में हो रहे अवैध निर्माण, अतिक्रमण, भूमि भराव, वृक्षों के विनाश एवं पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन शामिल है। भोज वेटलैंड भोपाल अंतरराष्ट्रीय महत्व का अधिसूचित रामसर स्थल है।

प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दे और उल्लंघन

न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों और अधिवक्ता हर्षवर्धन तिवारी की दलीलों ने झील के अस्तित्व पर मंडरा रहे निम्नलिखित खतरों को स्पष्ट किया है।

राशीद नूर खान के अनुसार प्रोफेसर कॉलोनी रोड और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्थित विशाल वृक्षों को कृत्रिम तरीके से सुखाया जा रहा है। पेड़ों को एक तरह से रासायन‍िक इंजेक्शन दिए जा रहे हैं। मशीनों से पेड़ों के तनों में छेद कर उनमें रासायनिक पदार्थ डाले जा रहे हैं। उनके अनुसार यह कृत्य संभावित अवैध निर्माण और भूमि पर कब्जा करने की नीयत से किया जा रहा है, ताकि बाद में सूखे पेड़ों को हटाकर वहां कंक्रीट का जाल बिछाया जा सके।

भोपाल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक विरासत और झीलों के कारण देश भर में एक अलग पहचान रखता है। यहां की बड़ी झील और छोटी झील शहर के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है, जो न केवल भोपाल की सुंदरता बढ़ाती है बल्कि लाखों लोगों की पेयजल आवश्यकताओं को भी पूरा करती है।

झील पर मंडराता पर्यावरणीय संकट  

छोटा तालाब, भोपाल 

राशिद नूर खान द्वारा इस याचिका में कुछ फोटो प्रस्तुत किये गए थे, जो साफ-साफ दिखाते हैं की कैसे पर्यावरण पर संकट गहरा रहा है। उनके अनुसार कई स्थानों पर नालों और पाइपों के माध्यम से गंदा और सीवेज जल सीधे लोअर लेक में गिर रहा है। इससे न केवल जल की गुणवत्ता खराब हो रही है, बल्कि जलीय जैव विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। झील के किनारों पर भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरा और गंदगी का जमाव देखा गया है, जो Wetlands Rules का खुला उल्लंघन है।

अवैध रूप से मिट्टी, मलबा और निर्माण सामग्री डालकर झील के जल क्षेत्र को कम किया जा रहा है। बफर ज़ोन में स्थायी और अस्थायी निर्माण गतिविधियां धड़ल्ले से चल रही है, जिससे झील का प्राकृतिक स्वरूप बदल रहा है।

लेक फिलिंग की गतिविधियां

उनके अनुसार झील के किनारों और बफर जोन में अवैध रूप से मिट्टी, मलबा तथा अन्य निर्माण सामग्री डालकर लेक फिलिंग की गतिविधियां लगातार की जा रही है। इससे झील का प्राकृतिक जल क्षेत्र सिकुड़ रहा है और वेटलैंड का पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। कई स्थानों पर झील के किनारों को कृत्रिम रूप से भरकर भूमि का स्वरूप बदला जा रहा है, ताकि भविष्य में निर्माण गतिविधियों के लिए जमीन तैयार की जा सके।

इसके अलावा, बफर जोन में स्थायी और अस्थायी निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियां, तटीय क्षेत्र में संरचनात्मक हस्तक्षेप और तटरेखा में बदलाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। ये सभी गतिविधियां Wetlands Rules, 2017 के प्रावधानों, पर्यावरणीय मानकों तथा National Green Tribunal और Supreme Court of India द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों के विपरीत मानी जा रही है।

एनजीटी के कड़े निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते इसे प्रथम दृष्टया गंभीर पर्यावरणीय उल्लंघन माना है और निम्नलिखित निर्देश जारी किए है -

  • एनजीटी ने एक उच्च स्तरीय संयुक्त समिति गठित की है जिसमें MoEF & CC (क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल), CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड), वेटलैंड अथॉरिटी/EPCO और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल है।

  • भोपाल नगर निगम को निर्देशित किया गया है कि वह व्यक्तिगत रूप से स्थल का निरीक्षण करे और पर्यावरण विरोधी गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाए। वहीं जांच समिति को चार सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट और की गई कार्रवाई का प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होगा।

देश के रामसर स्थलों में से एक भोज वेटलैंड केवल भोपाल की सुंदरता नहीं, बल्कि इसके जल स्तर को बनाए रखने और जलवायु नियंत्रण के लिए एक अनिवार्य अंग है। एनजीटी की यह सक्रियता शहर के पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक उम्मीद है। मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई 2026 को निर्धारित की है।

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