शहरी विकास के नाम पर अकसर तालाबों ख़त्‍म कर दिया जाता है, जो एक उपयोगी जलस्रोत होने के साथ ही भूजल रीचार्ज में भी अहम भूमिका निभाते हैं। 

 

स्रोत : आईडब्‍लूपी

नदी और तालाब

नोएडा में हवाई अड्डा 'निगल' गया 8 तालाब, नजफगढ़ झील पर भी NGT ने मांगा जवाब

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए तालाबों के अधिग्रहण पर NGT ने यमुना प्राधिकरण से जबाव मांगा। नजफगढ़ झील के संरक्षण और सीमांकन पर भी केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मांगी रिपोर्ट। अब NGT तय करेगा झील का कितना इलाक़ा है वेटलैंड

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

विकास कार्यों की मार अकसर हरियाली और जल स्रोतों पर पड़ती देखने को मिलती है। इसे लेकर पर्यावरणीय मसलों पर नज़र रखने वाले नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (NGT) ने एक बार फिर सख्‍़ती दिखाई है। ट्रिब्युनल नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के विकास कार्य के लिए आठ तालाबों के अधिग्रहण पर यमुना प्राधिकरण से जबाव मांगा है। इसके साथ ही NGT ने नजफगढ़ झील के संरक्षण और सीमांकन पर भी केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से जवाब तलब किया है। 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पर्यावरणविद अभिष्ठ कुसुम गुप्ता ने 2022 में गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) जिले के 1031 तालाबों के अधिग्रहण और उनके जीर्णोद्धार के संबंध में याचिका NGT में दायर की थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार के 2016 के दिशा-निर्देशों के तहत इस बात का प्रावधान किया गया था कि विकास कार्यों के लिए सरकार ज़मीनों के साथ ही तालाबों का भी अधिग्रहण कर सकती है। इसके एवज़ में अधिग्रहीत तालाब के आकार से सवा गुना बड़ा तालाब विकसित करने का नियम था। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने 2020 में असंवैधानिक बताया। इसके बावजूद नोएडा एयरपोर्ट के लिए यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में आठ तालाबों का अधिग्रहण कर लिया। इनकी जगह पर नए तालाबों का विकास भी अबतक नहीं हुआ है। इसे लेकर NGT सख्त हो गया है। इस पर 19 जनवरी को एनटीजी का आदेश आया है। NGT ने यमुना प्राधिकरण को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने के लिए अधिग्रहीत तालाबों के विकास कार्यों की रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।

ट्रिब्युनल ने अपने आदेश में कहा कि यमुना प्राधिकरण को यह बताना होगा कि नोएडा एयरपोर्ट के लिए तालाब किस नियम के तहत अधिग्रहित किए गए और उनके बदले वैकल्पिक जलाशय कहां और कैसे बनाए गए। NGT ने यमुना प्राधिकरण से क्षेत्र में तालाबों के विकास कार्यों से जुड़ी रिपोर्ट चार सप्ताह में देने को कहा है। उधर NGT ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से भी उनके क्षेत्र के 50 तालाबों के संबंध में एक माह में विवरण देने के आदेश दिए हैं। इसमें हर तालाब का मूल क्षेत्रफल और उसपर अवैध कब्जा करने वालों के नाम शामिल करने होंगे। वहीं NGT ने तालाबों का गलत विवरण पेश करने व आदेशों का सही से पालन न करने पर नोएडा प्राधिकरण पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

याचिकाकर्ता की ओर से मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला भी दिया गया, जिसमें कहा गया है कि स्थानीय जलाशयों को खत्म करने की योजनाएं संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ हैं, भले ही उनके बदले विकल्प दिए जाएं। ऐसी योजनाओं को रद किया जा सकता है। NGT के इस आदेश से एयरपोर्ट के नाम पर अधिग्रहीत आठ तालाबों के सरंक्षण की उम्‍मीद जगी है, वहीं इससे जेवर एयरपोर्ट का काम भी प्रभावित होने की संभावना है।

तालाब केवल एक जलस्रोत ही नहीं होते, इनसे एक पूरा इको सिस्‍टम जुड़ा होता है, जो तालाबों को खत्‍म करने के साथ ही समाप्‍त हो जाता है। 

नजफगढ़ झील के सीमांकन पर सरकार से मांगा जवाब

इसी तरह दिल्‍ली-एनसीआर में स्थित एक अन्‍य प्राकृतिक जलाशय नजफगढ़ झील के संरक्षण और सीमांकन से जुड़े मामले में भी NGT ने सख्‍ती दिखाई है। कोर्ट ने लंबे समय से लंबित इस मामले में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा है। रिपोर्ट के बाद अब NGT खुद तय करेगा नजफगढ़ झील का कितना क्षेत्र वेटलैंड है और कितना नहीं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक NGT की प्रधान पीठ में मामले की सुनवाई के दौरान मंत्रालय ने कोर्ट को बताया कि नजफगढ़ झील को लेकर डब्ल्यूआईएसए और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया द्वारा तैयार अंतरिम रिपोर्टों को पुनः सत्यापन (री-वैलिडेशन) की आवश्यकता है। जिसके लिए राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र को जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में रिपोर्ट मार्च 2026 तक ही आ पाएगी। इसपर पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 अप्रैल की तिथि निर्धारित की है। 

विशेषज्ञों की टीम ने किया झील का शुरुआती सर्वेक्षण

न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव एवं विशेषज्ञ सदस्य डा. ए. सेंथिल वेल की पीठ में हुई सुनवाई में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हलफनामे दाखिल कर कोर्ट को बताया कि राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र की दो सदस्यीय विशेषज्ञ टीम ने 19 और 20 नवंबर को नजफगढ़ झील का शुरुआती सर्वेक्षण किया है। इस टीम में वैज्ञानिक डा. सुब्बारेड्डी बोनथु और डा. हरिहरन जी. शामिल थे। उनके साथ दिल्ली सरकार के सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग तथा गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण (जीएमडीए) के तकनीकी अधिकारी भी मौजूद थे। इस दो दिवसीय फील्ड सर्वे के दौरान झील की हाइड्रोलाजिक्ल और पारिस्थितिक सीमाओं का आकलन किया गया। इसमें जीपीएस मैपिंग, स्थल निरीक्षण, भूमि उपयोग का अध्ययन और जैव विविधता का गुणात्मक मूल्यांकन करने जैसी चीजों का भी आकलन किया गया। इस सर्वे के आधार पर एक प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन रिपोर्ट तैयार की गई है। जिसे कोर्ट में पेश किया गया है।

रिपोर्ट का स्‍टेटस क्‍या है, स्‍पष्‍ट करे मंत्रालय

ट्रिब्‍युनल ने मंत्रालय से पूछा है कि रिकार्ड पर रखी गई रिपोर्ट केवल फील्ड विजिट के दौरान तैयार की गई अवलोकनात्मक रिपोर्ट है या इसे राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र की आधिकारिक प्रारंभिक रिपोर्ट माना जाए। इसपर मंत्रालय ने NGT के समक्ष यह स्पष्ट करने के लिए समय मांगा। उन्होंने यह भी बताया कि राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र द्वारा नजफगढ़ झील पर अंतिम रिपोर्ट मार्च तक तैयार की जाएगी। सुनवाई के बाद NGT ने मंत्रालय को निर्देश दिया है कि मामले की अगली सुनवाई में वह यह स्पष्ट करे कि प्रस्तुत रिपोर्ट का स्वरूप क्या है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि कोई आपत्ति न हो तो डब्ल्यूआईएसए और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया द्वारा तैयार वे रिपोर्टें भी रिकार्ड पर रखी जाएं। जिनका पुनः सत्यापन राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र द्वारा किया जा रहा है।

क्‍या है हरियाणा वेटलैंड प्राधिकरण की रिपोर्ट

हरियाणा वेटलैंड प्राधिकरण ने 29 जुलाई 2024 को दाखिल अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अनुमानित रूप से 75 एकड़ क्षेत्र (60 मीटर चौड़ाई × 5000 मीटर लंबाई) को नजफगढ़ झील (ड्रेन) के रूप में चिन्हित किया गया है, जिसे वेटलैंड घोषित किया जा सकता है। हालांकि इसका दायरा जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं के पूरा होने के बाद बढ़ाया भी जा सकता है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ ने इसपर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह क्षेत्र 2000 से 5000 एकड़ तक है। सन  2014–2021 के बीच लिए गए उपग्रह चित्रों के अनुसार झील के जल भराव का क्षेत्र 200 एकड़ से लेकर 2048 एकड़ तक रहा है। 1882 के भूमि राजस्व अभिलेखों में भी 1772 एकड़ क्षेत्र पांच गांवों को इसके पानी से जलमग्न दिखाया गया है। 2009 से 2024 के बीच झील का जलमग्न क्षेत्र 1500 एकड़ से लेकर 5349 एकड़ तक दर्ज किया गया है। औसतन यह क्षेत्र लगभग 3800 एकड़ (1520 हेक्टेयर) बताया गया।

नज़फगढ़ झील, जो वर्षों से जारी जल प्रदूषण के चलते अब एक ड्रेन में बदल चुकी है। यह दिल्‍ली-एनसीआर का एक प्रमुख वेटलैंड है।

फ्लेमिंगो का नया ठिकाना बन रही नजफगढ़ झील

लगातार बढ़ते जलभराव के कारण नजफगढ़ झील और इसके आसपास के जलमग्न इलाकों में बड़ी संख्या में विदेशी और प्रवासी पक्षियों की आवाजाही बढ़ी है। नजफगढ़ झील फ्लेमिंगो से लेकर पेलिकन और सारस का नया ठिकाना बन रही है। काफी मात्रा में पानी होने के कारण जल पक्षियों का बेहतर हैबिटेट बन रहा है। बीते वर्ष यानी 2025 की एशिया वाटरबर्ड गणना में तीनों पक्षी प्रजातियां नजफगढ़ झील के आसपास देखी गई हैं। अब लोग काफी संख्या में विदेशी पक्षियों को देखने के लिए नजफगढ़ झील के आसपास भी पहुंचने लगे हैं। ऐसे में में इस पूरे जलभराव क्षेत्र को वेटलैंड घोषित करने की मांग तेज हो गई है। इसे लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में एक याचिका भी दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं ने ट्रिब्‍यूनल से मांग की है कि इस इलाके को वेटलैंड घोषित कर दिया जाए, इससे पक्षियों को सुरक्षित हैबिटेट मिलेगा और क्षेत्र के झील के पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षण मिलेगा। 

NGT में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बताया कि नजफगढ़ वेटलैंड के आकलन से जुड़ी रिपोर्ट वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया को पुनः निरीक्षण के लिए भेजी गई है। इसके साथ ही नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट को भी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का कार्य सौंपा गया है। मंत्रालय ने NGT को बताया कि रिपोर्ट के री-वैलिडेशन में दो से तीन महीने का समय लगेगा। 

इससे पहले हरियाणा वेटलैंड प्राधिकरण द्वारा 29 जुलाई 2024 को NGT में दाखिल रिपोर्ट में कहा गया था कि नजफगढ़ ड्रेन के किनारे 75 एकड़ क्षेत्र (लगभग 60 मीटर चौड़ाई और 5000 मीटर लंबाई) को वेटलैंड घोषित किया जा सकता है। साथ ही यह भी कहा गया कि जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं के पूरा होने के बाद इसका क्षेत्रफल बढ़ाया जा सकता है। हालांकि याचिकाकर्ता ने इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि वास्तविक जलभराव क्षेत्र प्राधिकरण के अनुमान से कहीं अधिक है। 

जलभराव से बढ़ीं किसानों की मुश्किलें 

नजफगढ़ झील के आसपास जलभराव का इलाक़ा बढ़ने से जहां प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद खुश हैं, वहीं इलाके़ के किसानों के लिए यह परेशानी का सबब बनता जा रहा है। करीब 10,000 एकड़ जमीन पर वर्षा जल के भराव ने दर्जन भर गांवों के किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी है। कई किसानों के खेत इस जलभराव की चपेट में आकर डूब गए हैं, जिससे उनकी खेती का रकबा घटता जा रहा है। कुछ छोटे किसानों की तो पूरी ज़मीने ही जलभराव के इस बढ़ते दायरे में आ गई हैं, जिससे उनके लिए आजीविका संकट खड़ा हो गया है। इन किसानों का कहना है कि सरकार को नजफगढ़ झील और उसके वेटलैंड का दायरा निश्चित कर उससे बाहर के क्षेत्रों को जलभराव से मुक्‍त करने के उपाय करने चाहिए। इसे लेकर किसानों ने सितंबर 2025 NGT में एक याचिका दायर की थी। इस याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बताया कि वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया को रिपोर्ट पुन निरीक्षण के लिए भेजी गई है। इसके साथ ही नेशनल सेंटर फार सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट को भी इसकी रिपोर्ट तैयार करने के लिए मामला भेजा गया है।

नजफगढ़ झील जलभराव के बढ़ते दायरे के चलते प्रवासी फ्लेमिंगो पक्षियों का नया ठिकाना बन गई है।

सूपर्णिका नदी में सीवेज बहाने पर भी मांगी रिपोर्ट

उधर, कर्नाटक के उडुपी जिले में श्री मूकांबिका मंदिर के आसपास के इलाक़ों में सूपर्णिका नदी में अपशिष्ट जल यानी सीवेज के बहाव पर भी NGT ने उडुपी जिला प्रशासन और कर्नाटक शहरी जल आपूर्ति एवं जल निकासी बोर्ड (KUWSDB) को फटकार लगाते हुए इसे रोकने के लिए व्यापक कार्य योजना प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश लंबे समय से एक प्रमुख तीर्थ स्थल कोल्लूर के पास नदी प्रदूषण की शिकायतों पर सुनवाई के बाद जारी किया गया है। ट्रिब्‍युनल की चेन्नई स्थित दक्षिण क्षेत्रीय पीठ के न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति पुष्पा सत्यनारायण और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. प्रशांत गर्गवा की पीठ ने उडुपी की उपायुक्त स्वरूपा टी. के. और KUWSDB के अध्यक्ष को एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। यह आदेश कोल्लूर के सामाजिक कार्यकर्ता हरीश तोलार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया गया है। रिपोर्ट में जिन बातों की स्पष्ट मांगी गई है, उनमें उपचारात्मक उपायों का विवरण, अनुमानित लागत, निर्धारित समय-सीमा, सीवेज को नदी में जाने से रोकने की रणनीति जैसी बातें शामिल हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि 2015 से 2020 के बीच लगभग 19.97 करोड़ रुपये की लागत से अंडरग्राउंड सीवरेज स्कीम (UGSS) लागू किए जाने के बावजूद सूपर्णिका नदी में सीवेज छोड़ा जा रहा है, जिससे नदी काफ़ी प्रदूषित हो गई है। मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026 को होगी।

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