देश के अलग-अलग हिस्सों में पानी का और पानी की वजह से संघर्ष भी अलग-अलग प्रकार का है। ये वो संघर्ष है जो अक्सर आंकड़ों और योजनाओं के बीच अदृश्य रह जाता है। हर घर नल पहुंचाने के दावों के बीच आज भी ऐसे गॉंव हैं, जहां महिलाएं मीलों चलकर पानी लाती हैं। बांध बनाने की तमाम योजनाएं आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन आज भी ऐसे इलाके हैं, जहां बाढ़ का प्रभाव साल भर तक रहता है। कहीं बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, कहीं आजीविका के लिए लोग हर रोज़ जोखिम उठाते हैं....
ऐसी ही कुछ गंभीर बातों का उल्लेख हम इस फोटो स्टोरी में करने जा रहे हैं। ये तस्वीरें नहीं उन महिलाओं का दर्द है जो रोज़ मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं। ये तस्वीरें सबूत हैं बच्चों की छूटती पढ़ाई का केवटों की टूटती आजीविका का और उन परिवारों की जद्दोजहद का, जिनके लिए पानी कभी कमी है तो कभी तबाही। यह फोटो स्टोरी भारत में पानी के साथ रोजमर्रा की लड़ाई को बयां करती है।
मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले का अंजनवाड़ा गांव जहां महिलाओं को हर रोज़ करीब डेढ़ किमी पैदल चलकर पानी लाना पड़ता है।
मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के डूब प्रभावित इलाके में कुल 10 गाँव हैं। जिनमें से एक गाँव अंजनवाड़ा। यहां की महिलाओं ने इस गाँव के आलावा बाहरी दुनिया देखी ही नहीं है। इनके सर्दी और गर्मी के कपड़े एक जैसे रहते हैं। यह नर्मदा नदी के किनारे का इलाका है। यहां महिलाएं हर दिन पीने के पानी के लिए एक से डेढ़ किलोमीटर पहाड़ी से उतर कर नर्मदा नदी के तट पर आती हैं और भरे हुए कलसे लेकर वापस पहाड़ी चढ़ती हैं।
इस गांव तक पहुंचने के लिए नाव से करीब एक घंटे की यात्रा तय करनी पड़ती है। इस गॉंव में जब कोई महिला गर्भवती होती है और उसे अस्पताल ले जाना बहुत कठिन कार्य होता है। बारिश के दौरान नाव नहीं चलती है। ऐसे में गर्भवती महिला को चार कोनो की झोली या फिर चारपाई में लिटाकर 10-15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।
यहाँ बिजली की कोई सुविधा नहीं है। पुरुषों को तो नाव से बाहर जाने का मौका मिल भी जाता है महिलाओं का जीवन यहीं कैद होकर रह जाता है। बरसात के तीन चार महीने तो इन्हें बिलकुल बाहर निकलने का मौका नहीं मिलता क्योंकि इस दौरान नदी में उफान रहती है।
बिहार के कोसी तटबंध क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है।
बिहार में कोसी तटबंध के गांवों में रहने वालों का जीवन हमारे और आप जैसा बिल्कुल नहीं है। यहाँ के लोगों को एक बार अपने गाँव से मुख्य सड़क तक आने के लिए 10 बार सोचना पड़ता है क्योंकि इनके आवागमन का एकमात्र साधन नाव ही है। इन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए 3 से 4 घंटे नाव में सफर तय करके नदी पार करनी पड़ती है। एक नाव में 15 से 20 लोग तक यात्रा करते हैं। सामान ज़्यादा होने पर लोगों की संख्या कम हो जाती है। साग, सब्जी, दवा, गेहूं पिसाई, गैस भरवाई जैसे अनगिनत कामों के लिए इन्हें शहर जाना पड़ता है। इनके लिए साल के सात-आठ महीने नाव से यात्रा करना रोज की मजबूरी है।
ये तस्वीर मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले की है। यह महिला रोजाना दो किमी दूर से पानी भरकर लाती है।
मध्य प्रदेश के इस दूरस्थ इलाके में महिलाएं रोजाना करीब 2 किमी की दूरी तय कर पानी भर कर लाती हैं। यहां लोग लड़की का मचान बनाकर उस पर पानी रखते हैं। ये लोग नायकड़े समुदाय के हैं जिनके पास खुद की जमीन नहीं है। रोजी-रोटी के लिए पलायन कर जाते हैं। इनकी कोई भी पीढ़ी स्कूल नहीं गयी। जो स्कूल गये भी वो पांचवी से ज्यादा नहीं पढ़ सके।
कोसी के तटबंधों पर बसे गांवों में घरों का हाल कुछ ऐसा होता है।
यह तस्वीर सुपौल की है जहां बाढ़ प्रभावित ग्रामीण इलाकों में घरों का हाल कुछ ऐसा होता है। यह सिघरहट्टा गाँव का एक घर है जहां के ज्यादातर घरों में जरूरत का बहुत कम सामान रहता है। यहाँ के लोग सीमित संसाधनों के साथ अपना गुजर बसर सालों से करते आ रहे हैं। बाढ़ के वक्त वे इन्हीं घरों में महीनों तक खटिया के ऊपर खटिया रखकर रहते हैं। ऊँचाई पर ही खाना बनाते हैं। इनके घरों में हेमशा नमी रहती है। गॉंव वाले अपने कच्चे घर बांस, तिरपाल और घास-फूस की मदद से बनाते हैं। ये घर कितने दिन चलेंगे इन्हें खुद पता नहीं होता है। घरों में सुविधाओं के नाम पर खाना बनाने के कुछ बर्तन, राशन और सीमित कपड़े हैं। कूलर,फ्रिज और वाशिंग मशीन जैसी सुविधाएं तो इनके लिए सपने जैसी हैं।
बाढ़ प्रभावित कोसी तटबंधों में नाव चालक अपनी रोज़ी-रोटी के लिए हर दिन जोखिम उठाते हैं
यह तस्वीर बिहार के कोसी क्षेत्र के उस गॉंव की है जो ज्यादातर समय चारों तरफ से पानी से घिरा है। जहां आने-जाने का एकमात्र सहारा नाव ही है। ऐसे हालात में नाव चालक अपनी रोज़ी-रोटी के लिए हर दिन जोखिम उठाते हैं और सुबह से शाम तक पानी में ही रहते हैं। सुपौल जिले के निर्मली गांव के 25 वर्षीय श्रवण कुमार भी यही काम करते हैं। वे कहते हैं कि नाव चलाते समय डर लगता है, क्योंकि बीच में पानी गहरा होता है, लेकिन पेट पालने के लिए यह उनका एकमात्र सहारा है।
अंजनवाड़ा गांव में एक भी स्कूल नहीं है। इस वजह से यहां की लड़कियां कभी स्कूल नहीं गईं।
नर्मदा नदी के किनारे बसे अंजनवाड़ा गांव में पानी की कमी और दुर्गम भौगोलिक हालात ऐसे हैं कि यहां एक भी स्कूल नहीं है। जो स्कूल बने भी वहां दूरी और दुर्गम रास्तों की वजह से शिक्षक पहुंचते नहीं हैं। इस गाँव की लड़कियां कभी स्कूल नहीं जा पाईं। ऐसा नहीं उन्हें पढ़ने का शौक नहीं पर उन्हें पढ़ने का मौका ही नहीं मिला। स्कूल पहुंचने के लिए यहाँ के बच्चों को एक घंटे तक नाव से सफर कर मुख्य सड़क तक जाना पड़ता है। नाव से पढ़ने का मौका सिर्फ गाँव के कुछ एक लड़कों को मिल पाता है। लड़कियां तो स्कूल के बारे में सोच भी नहीं सकतीं।
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में चित्रकोट ब्लॉक में आज भी आदिवासी समुदाय पहाड़ियों से निकलने वाली जल धाराओं पर निर्भर हैं।
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में रहने वाले आदिवासी समुदाय पहाड़ों से निकलने वाली जलधाराओं से पानी एकत्र करते हैं और उसे छानकर पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इस पानी के लिए उन्हें करीब एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। कुछ गॉंवों में आज भी सैकड़ों लोग इसी पानी पर निर्भर हैं। यह पानी बहती हुई धारा नहीं बल्कि पहाड़ों से नीचे आने के बाद गड्ढों में जमा हो जाता है। जाहिर है, जमा हुआ पानी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है। आदिवासी महिलाएं यहीं पर नहाती हैं, बच्चों को नहलाती हैं और बर्तन व कपड़े भी धोती हैं, ताकि घर तक केवल पीने के लिए पानी ले जाना पड़े।
यह बिहार के सुपौल जिले में नाव से उतरने के बाद तय करना पड़ता है सुनसान रास्ता
बिहार के सुपौल जिले में कोसी तटबंध के भीतर बसे कई गाँव ऐसे हैं जहां के लोग मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए सुनसान रास्तों से होकर गुजरते हैं। घंटों पैदल चलने के बाद वे नाव तक पहुंचते हैं और फिर नाव से लंबा सफर तय कर मुख्य सड़क तक पहुंचते हैं। यक प्रक्रिया उनकी रोज की जिन्दगी का हिस्सा है। इसी रास्ते से बच्चों को स्कूल भी जाना पड़ता है क्योंकि पांचवीं के बाद इन गांवों में कोई स्कूल नहीं है। बाढ़ के दिनों में यह सफर और मुश्किल हो जाता है जिससे बच्चे महीनों तक स्कूल नहीं जा पाते। इस सुनसान रास्ते महिलाएं और लड़कियां अकेले नहीं निकलती वो समूहों में जाती हैं। इस गाँव में रहने वाले लोगों को घर से बाहर निकलने के लिए काफी सोचना पड़ता है, आसान नहीं हैं यहाँ का जीवन।
कोसी इलाके में रहने वाली यह महिला तीसरी बार गर्भवती हुई है इनके दो छोटे बच्चे और हैं।
कोसी तटबंध के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बसे गॉंव जलभराव के कारण बाकी क्षेत्रों से कट जाते हैं, इस वजह से यहां मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंच पाती हैं। गरीबी की मार झेल रहे परिवार अपनी बेटियों की शादी कम उम्र में कर देते हैं। शिक्षा के अभाव में जी रहीं इन लड़कियों के स्वास्थ्य पर तब गहरा असर पड़ता है जब ये कम उम्र में माँ बन जाती हैं। इन क्षेत्रों में इलाज के लिए डॉक्टर या स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं हैं। इसका सबसे ज़्यादा असर गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में अधिकतर प्रसव गांव में ही महिलाओं की मदद से कराए जाते हैं।
महिलाएं खुद नाव चलाकर नदी पार कर जानवरों का चारा और बाजार से सामान लाती हैं।
बिहार के कोसी तटबंध पर नाव चलाना यहाँ रहने वाली महिलाओं के लिए हुनर भी है और मजबूरी भी। हर साल बाढ़ के बाद चारों ओर पानी ही पानी रहता है। ऐसे हालात में ये महिलाएं नाव चलाकर नदी के उस पार से जानवरों के लिए चारा लाती हैं। जरूरत का सामान खरीदने के लिए भी उन्हें नाव से ही जाना पड़ता है। घंटों नाव चलाने के बाद ही वे मुख्य सड़क तक पहुंच पाती हैं।
यह तस्वीर बिहार के सुपौल जिले की है जहां महिलाएं जानवरों के लिए चारा लाने घुटनों तक पानी से होकर गुजरती हैं।
बाढ़ग्रस्त इलाकों में लोग हर दिन संघर्ष भरा जीवन जीते हैं। यह तस्वीर बिहार के सुपौल जिले की है, जहां महिलाएं जानवरों के लिए चारा लाने घुटनों तक पानी से होकर गुजरती हैं। उन्हें लंबे समय तक उसी पानी में खड़ा रहना पड़ता है। त्वचा से जुड़ी बीमारियों से जूझने के बावजूद वे हर दिन यही काम दोहराती हैं क्योंकि यह उनकी इच्छा नहीं, बल्कि मजबूरी है।
पानी में लगातार खड़े रहने की वजह से मुसहर समुदाय की महिलाओं के पैरों में त्वचा से जुड़ी समस्याएं हो जाती है।
बिहार के सुपौल जिले में कोसी नदी के किनारे एक मुसहर बस्ती है जहां महिलाएं मजदूरी करके अपना गुज़ारा करती हैं। वे खेतों में लंबे समय तक पानी में खड़े रहकर धान लगाने का काम करती हैं। पानी में लगातार खड़े रहने की वजह से इन महिलाओं के पैरों में त्वचा से जुड़े रोग हो जाते हैं। यह स्वास्थ्य समस्या इस समुदाय की ज्यादातर महिलाओं में पायी गई। अगर ये खेतों में धान न लगाएं तो इनके लिए गुजर बसर करना मुश्किल हो जाता है। ये महिलाएं बहुत अधिक समय तक पानी में रहती हैं जिस कारण पैरों में बहुत खुजली होती है और फिर रोग पकड़ लेते हैं।
भागलपुर में जहांगीरा बस्ती में मछुआरा समुदाय के लगभग 60 घर पूरी तरह गंगा नदी पर निर्भर है।
यह तस्वीर भागलपुर जिले की जहांगीरा बस्ती की है जहां मछुआरा समुदाय के लगभग 60 घर बसे हुए हैं। इस बस्ती के लोगों का जीवन पूरी तरह गंगा नदी पर निर्भर है। वे इसी नदी से मछली पकड़कर अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं। नहाने, कपड़े धोने और बर्तन साफ करने जैसे रोजमर्रा के सभी काम भी इसी नदी के पानी से किए जाते हैं। नहीं पता इसका पानी कितना साफ है पर पीने के लावा रोजमर्रा के सभी कामों की निर्भरता उनकी इसी पानी पर रहती है।
ललितपुर की यह तस्वीर जमरार बाँध परियोजना क्षेत्र की है, जहां बाँध बनने के बाद करीब 1500 पेड़ पानी में डूब गए।
यह तस्वीर साल 2022 में उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के जमरार बाँध परियोजना क्षेत्र से ली गई है। महरौनी ब्लॉक के केवलारी गाँव की लगभग दस एकड़ ज़मीन पर बाँध बनाया गया, जिसका निर्माण वर्ष 2008 में शुरू हुआ और 2016 में पूरा हुआ। इस परियोजना के लिए गाँव वालों की जमीन अधिग्रहित की गई। जमीन का मुआवजा तो दिया गया, लेकिन खेतों में खड़े करीब 1500 पेड़ों का कोई मुआवजा नहीं मिला।
बाँध में पानी भरते ही ये सभी पेड़ जलाशय में डूब गए और पूरी तरह नष्ट हो गए। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पेड़ों के नुकसान से उनकी आजीविका और पर्यावरणीय निर्भरता दोनों प्रभावित हुईं, लेकिन इसके बदले उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया।
उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के चाय बागान इलाकों में स्थानीय लोगों ने पहली बार बाढ़ जैसी आपदा का सामना किया।
अक्टूबर 2025 में उत्तर बंगाल में आई बाढ़ ने जलपाईगुड़ी जिले के टंडू और बामनडंगा चाय बागान क्षेत्रों को आसपास के इलाकों से अलग कर दिया था। नदी के तेज बहाव से टंडू पुल टूटने की वजह से ये इलाके पूरी तरह काट गए। यह तस्वीर उसी क्षेत्र की है, जहां आवाजाही के लिए टूटे पुल पर बांस की अस्थायी सीढ़ी बनाई गई। कई फीट ऊंचाई पर बनी यह सीढ़ी जोखिम भरी थी, लेकिन मजबूरी में लोग इसी का सहारा लेते रहे।
दशकों बाद इस क्षेत्र में ऐसी बाढ़ देखी गई। स्थानीय लोगों के लिए यह पहला अनुभव था। इस आपदा के दौरान सरकारी मदद सीमित रही, जबकि समुदायों की भागीदारी अधिक दिखाई दी। इसी बांस के पुल के जरिए आसपास के गांवों से लोग बाढ़ प्रभावित चाय बागान मजदूरों तक राहत सामग्री पहुंचाते रहे। संकट की इस घड़ी में चाय बागान क्षेत्रों में सामूहिक सहयोग और एकजुटता साफ नजर आई।
ये तस्वीरें तो महज़ कुछ उदाहरण हैं जो पानी के साथ लोगों के रिश्तों को दर्शाते हैं। रिश्ता ऐसा कि कहीं लोग ईश्वर से पानी के लिए प्रार्थना करते हैं, तो कहीं हर साल बाढ़ नहीं आने की मन्नत मांगते हैं। कई जगह नदियां परिवारों की जिंदगी का सहारा हैं, तो कहीं कहर बन कर सालों साल लोगों की जिंदगी पर टूटती हैं। पानी और जिंदगी के बीच की जद्दोजहद सदियों से जारी है। ये लोग हर रोज बस एक ही उम्मीद लेकर जागते हैं - कभी तो जिंदगी में सवेरा होगा।
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