इंद्रायणी नदी के किनारे साफ़ सफाई करते टीम इन्द्रामाई के सदस्य।
फ़ोटो - टीम इन्द्रामाई
महाराष्ट्र की पवित्र इंद्रायणी नदी को प्रदूषण, सीवेज और कचरे से बचाने के लिए युवा जागरूकता अभियान, सफाई अभियान और जनसहभागिता कार्यक्रम चला रहे है।
देहू और आलंदी जैसे तीर्थस्थलों से जुड़ी इंद्रायणी नदी की स्वच्छता बनाए रखना न केवल पर्यावरण संरक्षण बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए भी आवश्यक है।
जानिए इंद्रायणी नदी के बारे में विस्तार से, और पुणे के कुछ युवा कैसे कर रहे है इसे बचने का प्रयास ?
महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान मानी जाने वाली इंद्रायणी नदी आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। लेकिन स्थानीय स्तर पर कुछ युवा लगातार इसे बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है। ये युवा स्वयं नदी की साफ़ सफाई करते है और लोगों को जागृत करने का काम करते है।
यात्रा के दौरान इंद्रायणी नदी के किनारे नदी को साफ़ करते वालंटियर।
महाराष्ट्र की नदियां केवल जलधाराएं नहीं है, बल्कि यहां की संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। इन्हीं नदियों में इंद्रायणी नदी का विशेष स्थान है। संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की भक्ति परंपरा से जुड़ी यह नदी लाखों वारकरियों की आस्था का केंद्र है। हर वर्ष आषाढ़ी और कार्तिकी वारी (यात्रा) के दौरान लाखों श्रद्धालु इसके तट पर पहुंचते है। हालांकि, अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता के बावजूद आज इंद्रायणी नदी प्रदूषण और अव्यवस्थित विकास के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही है।
चार साल पहले पुणे के 5-6 युवाओं आकाश पांडे, ज्ञानेश्वरी म्हसे, देवेंद्र राऊत, आकांक्षा कायगुडे, विष्णु केशवन, आनंद लोणारी और अमर मालन मारुती ने तय किया कि केवल शिकायत करने के बजाय वे खुद नदी की सफाई के लिए मैदान में उतरेंगे। उन्होंने एक संस्था बनायीं - टीम इन्द्रामाई।
इंद्रायणी नदी महाराष्ट्र की एक महत्वपूर्ण और पवित्र नदी है, जिसका उद्गम पुणे जिले के लोणावला के निकट सह्याद्रि पर्वतमाला में स्थित कुरवंडे गांव से होता है। लगभग 104 किलोमीटर लंबी यह नदी पूर्व दिशा में बहते हुए पुणे जिले के तुलापुर के पास भीमा नदी में मिल जाती है।
इंद्रायणी नदी, पुणे महाराष्ट्र
इंद्रायणी, भीमा नदी की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है और इसका जल अंततः कृष्णा नदी तक पहुंचता है। नदी के प्रमुख सहायक जलस्रोतों में आंद्रा और कुंडली नदियां शामिल है। पश्चिमी घाट से निकलने के कारण यह नदी अपने ऊपरी भाग में प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता और समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र को पोषित करती है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में कृषि, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलापूर्ति की दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अनेक गांव और कस्बे स्थित है।
इंद्रायणी नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत विशेष है। इसके तट पर स्थित देहू संत तुकाराम महाराज की जन्मस्थली तथा आलंदी संत ज्ञानेश्वर महाराज की समाधि स्थली के रूप में प्रसिद्ध है। हर वर्ष लाखों वारकरी श्रद्धालु आषाढ़ी और कार्तिकी वारी के दौरान इस नदी के किनारे एकत्रित होते है, जिससे यह नदी महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा की जीवनरेखा बन गई है।
हालांकि, तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिक विकास और अनुपचारित सीवेज के नदी में प्रवाह के कारण इंद्रायणी नदी प्रदूषण की गंभीर समस्या का सामना कर रही है। कई स्थानों पर जल की गुणवत्ता में गिरावट, झाग बनने की घटनाएं और जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिले है। इसलिए नदी के संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट जल उपचार और जनभागीदारी आधारित प्रबंधन की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है, ताकि इसकी सांस्कृतिक विरासत और पारिस्थितिक महत्व को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सके।
इंद्रामाई टीम के आईटी इंजीनियर अमर मालन मारुति बताते है कि यह सब एक संयोग से शुरू हुआ था। कॉलेज खत्म होने के बाद राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) से जुड़े उनके मित्र अलग-अलग शहरों में नौकरी करने चले गए थे। लेकिन समाज के लिए कुछ करने की इच्छा बनी हुई थी।
अमर कहते है
“महाराष्ट्र में आषाढ़ी वारी के दौरान हम देहू, पुणे गए थे। वहां देखा कि लोग इंद्रायणी का पानी तीर्थ समझकर पी रहे है, उसमें स्नान कर रहे है। लेकिन उसी नदी में बड़ी संख्या में मछलियां मरकर किनारे पर पड़ी थीं। यह दृश्य हमारे लिए बहुत परेशान करने वाला था।”
वे आगे कहते है, आषाढ़ी वारी (पदयात्रा) का समय आते ही महाराष्ट्र की इंद्रायणी नदी एक बार फिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र बन जाती है। देहू और आलंदी में लाखों वारकरी जुटते है, संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालखियों के साथ पंढरपुर की ओर प्रस्थान करते है। इस दौरान इंद्रायणी का जल केवल नदी का पानी नहीं रह जाता, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ बन जाता है। लोग इसमें स्नान करते है, इसे माथे से लगाते है और पवित्र जल मानकर ग्रहण भी करते है। लेकिन इसी आस्था के केंद्र में आज एक गहरा पर्यावरणीय संकट और स्वास्थ्य ख़राब होने का जोखिम भी छिपा हुआ है।
इंद्रायणी नदी, जो महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है, आज प्रदूषण, औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और अतिक्रमण जैसी समस्याओं से जूझ रही है। नदी के किनारे रहने वाले लोग और पर्यावरण प्रेमी वर्षों से इसकी बिगड़ती स्थिति को देख रहे है। इसी चिंता ने कुछ युवाओं को नदी संरक्षण के लिए आगे आने को प्रेरित किया।
हालात इतने चिंताजनक है की इंद्रायणी को उन नदियों में गिनने लगे है जो आने वाले वर्षों में अपना प्राकृतिक स्वरूप खो सकती है। एक ओर श्रद्धालु इसके जल को तीर्थ मानकर ग्रहण करते है, वहीं दूसरी ओर नदी में मछलियों की मौत, बढ़ती जलकुंभी और घटती जल गुणवत्ता इसके संकट की कहानी बयां कर रही है।
अमर के अनुसार आषाढ़ी वारी (पद यात्रा) शुरू होने में अभी कुछ ही दिन बाकी है। लाखों वारकरी इंद्रायणी नदी के किनारे जुटेंगे, इसके जल को तीर्थ मानकर माथे से लगाएंगे और स्नान करेंगे। लेकिन इसी पवित्र मानी जाने वाली नदी के किनारे इस समय एक और दृश्य दिखाई देता है - हजारों मरी हुई मछलियां पानी की सतह पर तैरती हुई।
वर्ष 2022 में पुणे के कुछ युवा आषाढ़ी वारी के दौरान देहू पहुंचे थे। इनमें 29 वर्षीय आईटी इंजीनियर अमर मालन मारुति और उनके कुछ मित्र शामिल थे। कॉलेज के दिनों में वे राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) से जुड़े रहे थे और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय थे। हालांकि पढ़ाई पूरी होने के बाद सभी अपने-अपने काम और नौकरियों में व्यस्त हो गए थे, लेकिन समाज के लिए कुछ करने की इच्छा अब भी जीवित थी।
अमर के अनुसार वारी के दौरान इंद्रायणी नदी के किनारे पहुंचे इन युवाओं ने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। नदी में बड़ी संख्या में मछलियां मृत अवस्था में तैर रही थीं और कई किनारों पर आकर जमा हो गई थीं। दूसरी ओर श्रद्धालु उसी नदी में स्नान कर रहे थे और उसके जल को तीर्थ मानकर ग्रहण कर रहे थे।
अमर बताते है, जब हमने हजारों मरी हुई मछलियां देखीं और उसी समय लोगों को उसी पानी को पवित्र मानकर पीते देखा, तब हमें लगा कि यह केवल एक नदी का सवाल नहीं है, बल्कि आस्था, पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य का भी सवाल है।
इस स्थिति को देखकर अमर और उनके साथियों ने तय किया कि केवल सोशल मीडिया पर चिंता व्यक्त करने या प्रशासन को दोष देने से स्थिति नहीं बदलेगी। उन्होंने खुद नदी की सफाई शुरू करने का फैसला किया।
वर्ष 2022 में केवल 5-6 लोगों ने मिलकर देहू के घाटों और नदी किनारों की सफाई शुरू की। उन्होंने झाड़ू लगाई, कचरा हटाया और लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया।
अमर कहते है,
"पहले साल हमारे साथ सिर्फ 5-6 लोग थे। हमने सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ने की अपील की, लेकिन बहुत कम प्रतिक्रिया मिली। फिर भी हमने काम शुरू किया क्योंकि हमें लगा कि किसी को तो पहला कदम उठाना ही होगा।"
हालांकि पहले साल का अभियान छोटा था, लेकिन इस दौरान युवाओं ने एक महत्वपूर्ण बात महसूस की। उन्होंने देखा कि नदी संरक्षण के लिए योजनाएं तो बनती हैं, बजट भी स्वीकृत होते है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है। कई स्थानों पर सीवेज उपचार संयंत्र प्रभावी रूप से काम नहीं कर रहे थे और गंदा पानी सीधे नदी में पहुंच रहा था।
इन अनुभवों के बाद युवाओं ने अपने प्रयासों को संगठित रूप देने का निर्णय लिया। वर्ष 2023 में उन्होंने एक समूह बनाया, जिसका नाम रखा गया -"टीम इंद्रामाई"। इस नाम के पीछे भी एक विशेष सोच थी। अमर बताते हैं कि महाराष्ट्र में लोग नदियों को मां का दर्जा देते है। इसलिए इंद्रायणी को इंद्रामाई कहकर लोगों के मन में भावनात्मक जुड़ाव पैदा करने की कोशिश की गई।
"हम चाहते थे कि लोग नदी को केवल पानी का स्रोत न समझें, बल्कि अपनी मां की तरह उसका सम्मान करें। जब किसी चीज से भावनात्मक जुड़ाव होता है, तब उसके संरक्षण की संभावना भी बढ़ जाती है," वे कहते है।
पिछले कुछ वर्षों में इंद्रायणी नदी की स्थिति लगातार चिंताजनक होती गई है। नदी के कई हिस्सों में झाग (फोम), गंदा पानी, जलकुंभी की अत्यधिक वृद्धि और मछलियों की मौत जैसी घटनाएं सामने आई है। पिंपरी-चिंचवड़ और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला अपशिष्ट तथा शहरी क्षेत्रों का सीवेज नदी की जल गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। साल 2024 में नदी में जहरीले झाग दिखाई देने के बाद मामला इतना गंभीर हो गया कि National Green Tribunal ने भी स्वतः संज्ञान लिया और संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा।
इंद्रायणी नदी का संबंध संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की परंपरा से जुड़ा है। देहू और आलंदी जैसे तीर्थस्थल इसी नदी के किनारे बसे है। हर साल लाखों वारकरी यहां पहुंचते है और नदी को आध्यात्मिक रूप से पूजनीय मानते है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नदी की स्थिति लगातार खराब हुई है। इंद्रामाई की टीम के अनुसार पिंपरी-चिंचवड़, तलेगांव, चाकण और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला अपशिष्ट तथा शहरों का बिना उपचारित सीवेज नदी में पहुंच रहा है। इसके कारण नदी के जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और जलीय जीवों पर गंभीर असर पड़ रहा है।
नदी में बढ़ती जलकुंभी, पानी का काला पड़ना और समय-समय पर मछलियों की मौत की घटनाएं इसी संकट की ओर संकेत करती है। कई स्थानों पर घाटों और नदी किनारों पर प्लास्टिक, धार्मिक सामग्री और घरेलू कचरा भी बड़ी मात्रा में दिखाई देता है।
समूह का उद्देश्य केवल सफाई करना नहीं था। जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि नदी को बचाने के लिए लोगों की सोच बदलना भी जरूरी है।
इसी उद्देश्य से 2024 से टीम ने नुक्कड़ नाटक, जनजागरण अभियान और स्ट्रीट प्ले शुरू किए। आषाढ़ी वारी के दौरान जब हजारों श्रद्धालु, प्रशासनिक अधिकारी, पत्रकार और जनप्रतिनिधि मौजूद रहते है, तब टीम इंद्रामाई नदी की वास्तविक स्थिति को लोगों के सामने प्रस्तुत करती है।
स्वयंसेवक मरी हुई मछलियों, प्रदूषित जल और कचरे से भरे घाटों की तस्वीरें प्रदर्शित करते है। नाटकों के माध्यम से वे सवाल उठाते है कि जिस देश में नदियों को मां कहा जाता है, वहां उनकी यह हालत क्यों है? अमर कहते है, हमारा उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं है, बल्कि लोगों को सोचने पर मजबूर करना है कि नदी को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है।
अमर के अनुसार यह काम हम सब मिलकर करते है, यह किसी भी एक व्यक्ति का काम नहीं है। आषाढ़ी यात्रा के दौरान कई संस्थाएं सफाई अभियान चलाती हैं, लेकिन टीम इंद्रामाई का मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण काम तब होता है जब भीड़ लौट जाती है।
लाखों लोगों के जाने के बाद नदी किनारों और घाटों पर बड़ी मात्रा में कचरा जमा हो जाता है। टीम के सदस्य उसी समय सफाई अभियान चलाते है और कचरे को हटाने का काम करते है। इसके लिए स्वयंसेवक अपनी नौकरियों और पढ़ाई से समय निकालते है। कई सदस्य विशेष रूप से छुट्टियां लेकर इस अभियान में शामिल होते है।
अमर ये बताते है की देहु नगर परिषद और आलंदी नगर परिषद् से उन्हें सहयोग मिला है, इस कार्य में लगाने वाली सारी सामग्री जिसमें झाड़ू, फावड़ा, खुरपी, कचरा टोकरी, कचरा बैग आदि उन्हें उपलब्ध कराती है।
जहां 2022 में केवल पांच लोग थे, वहीं आज टीम के साथ 75 से अधिक वालंटियर सक्रिय रूप से जुड़े हुए है। हाल ही में 40 से अधिक नए लोगों ने भी संगठन से जुड़ने की इच्छा जताई है। उनकी कोर टीम में आकाश पांडे, मयूर बडगुजर, गजानन आव्हाळे, हर्षल महाजन, आकाश साठे है। इस वर्ष यह आयोजन 7-9 जुलाई को होना है।
इनमें आईटी पेशेवर, इंजीनियर, पत्रकारिता के छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हैं। अधिकांश सदस्य 22 से 29 वर्ष की आयु के है। समूह में महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी है और कई महिला स्वयंसेवक जागरूकता अभियानों का नेतृत्व करती है। चार वर्षों के प्रयासों के बावजूद अमर स्वीकार करते है कि नदी की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। वे कहते है, अगर लक्ष्य नदी को पूरी तरह स्वच्छ बनाना था तो हम अभी वहां नहीं पहुंचे है।
नदी में जितना प्रदूषण रोज पहुंचता है, उसके मुकाबले हमारा प्रयास बहुत छोटा है। लेकिन हमने लोगों के बीच जागरूकता जरूर बढ़ाई है। उनके अनुसार सबसे बड़ा बदलाव लोगों की सोच में दिखाई देता है। आज अधिक लोग नदी प्रदूषण पर चर्चा कर रहे है, सोशल मीडिया पर आवाज उठा रहे हैं और स्वयंसेवा के लिए आगे आ रहे है।
इंद्रायणी नदी में धार्मिक सामग्रीऔर मूर्तियां विसर्जित करना भी एक बड़ी समस्या है। अमर का मानना है कि इसका समाधान लोगों की आस्था का सम्मान करते हुए निकाला जाना चाहिए। वे सुझाव देते हैं कि प्रशासन विशेष विसर्जन कुंड बनाए, जैसे गणेश उत्सव के दौरान कई शहरों में बनाए जाते है। इससे मूर्तियों और धार्मिक सामग्री को सीधे नदी में डालने की आवश्यकता नहीं होगी और प्रदूषण भी कम होगा।
टीम इंद्रामाई अब अन्य स्थानीय समूहों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रही है। उनका मानना है कि नदी संरक्षण के लिए व्यापक जनआंदोलन की आवश्यकता है।
अमर कहते है, हम सरकार से सवाल जरूर पूछते है, लेकिन उससे पहले खुद जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करते है। अगर हम खुद नदी में कचरा फेंकेंगे और फिर प्रशासन को दोष देंगे, तो बदलाव संभव नहीं है।
आज इंद्रायणी नदी एक कठिन दौर से गुजर रही है। लेकिन इसके किनारों पर कुछ युवा ऐसे भी है जो मानते है कि नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और जीवन का आधार है। वे जानते है कि उनका प्रयास छोटा है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि हर बड़ा बदलाव एक छोटे कदम से ही शुरू होता है। इंद्रायणी को बचाने की यह लड़ाई अभी लंबी है, लेकिन इन युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि बदलाव की शुरुआत हमेशा सरकारों से नहीं, बल्कि खुद से भी हो सकती है।
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