नमामि गंगे योजना के तहत आज़मगढ़ में प्रशासन की पहल पर श्रमदान करके तमसा नदी की सफाई करते ग्रामीण।
सस्रोत : पीआईबी
गंगा की सहायक नदी तमसा गाद जमाव, कचरे, प्रदूषण और अतिक्रमण जैसी समस्याओं के चलते साल दर साल तेज़ी से सिमटती जा रही है। अपनी जलधारा से गंगा को समृद्ध करने वाली इस छोटी सी नदी को पुनर्जीवित करने की एक पहल बीते दिनों उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में शुरू हुई है। इसके तहत नदी के करीब 89 किलोमीटर लंबे हिस्से में स्वैच्छिक श्रमदान से नदी की साफ-सफाई के साथ किनारों पर फलदार पौधों का रोपण किया जा रहा है। खास बात यह है कि नदी की दशा सुधारने का यह काम जेसीबी या मशीनों के बजाय स्थानीय ग्रामीणों, स्कूलों के बच्चों, महिला समूहों, मनरेगा कार्यकर्ताओं और कई स्वयंसेवी संगठनों के श्रमदान से किया जा रहा है। नमामि गंगे परियोजना के तहत सरकारी देखरेख में किए जा रहे इन प्रयासों का असर भी स्पष्ट तौर पर दिखने लगा है। प्रयासों से जल की गुणवत्ता में सुधार, जैव विविधता का पुनरुद्धार और आसपास के कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता और सिंचाई क्षमता में वृद्धि हुई है।
भारत में तमसा नाम की दो नदियां मौजूद हैं। इस वजह से अकसर लोग इन्हें लेकर भ्रमित हो जाते हैं। एक तमसा नदी वह है, जिसको टोंस के नाम से भी जाना जाता है। यह मध्य प्रदेश के मैहर जिले में कैमूर पर्वतमाला में स्थित तमसा कुण्ड नामक जलाशय से निकलकर उत्तर-पूर्व की ओर बहती है। इस के मार्ग में कई सुंदर जलप्रपात हैं और मार्ग में सतना नदी इससे मिलती है। इसके बाद यह प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम से करीब 32 किलोमीटर दूर सिरसा में गंगा में मिल जाती है। तमसा नदी की कुल लम्बाई लगभग 265 किलोमीटर है। उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर, अयोध्या और आज़मगढ़ जिलों से होकर बहती है। पहले यह सीतामढ़ी के निकट से बहती थी, जहां पर महर्षि बाल्मिकी आश्रम है। वहीं पर सीता जी का समाहित स्थल भी बताया जाता है।
इसके अलावा दूसरी तमसा नदी, जिसके जीर्णोद्धार का प्रयास इस अभियान के तहत किया गया है, वह उत्तर प्रदेश के फैजाबाद डिवीजन के अंबेडकर नगर से शुरू होती है। इसे छोटी सरयू के नाम से भी जाना जाता है और यह मऊ से होकर गुजरती है और फेफना में एक अन्य नदी से मिलती है। यह संयुक्त धारा अंजोरपुर में गंगा से मिलती है । वैसे तो यह एक सदानीरा यानी बारहमासी नदी है, पर प्रचंड गर्मी के मौसम में इसका स्वरूप सिमट कर एक पतली धारा जैसा ही रह जाता है। बरसात के मौसम में मानसूनी बारिश से यह फिर अपने विशाल रूप में वापस आ जाती है और इसमें इतना पानी हो जाता है कि कभी-कभी आसपास के इलाकों में इससे बाढ़ आ जाती है। इसमें ऐसी ही बाढ़ 2005 में आई थी।
तटों और नदी की सफाई के बाद कुछ ऐसी दिख रही है तमसा नदी।
केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में लगभग 89 किमी के हिस्से में, 111 ग्राम पंचायतों के साथ मिलकर इस नदी को नया जीवन देने का काम किया है। आजमगढ़ के जिला मजिस्ट्रेट रविंद्र कुमार ने बताया है कि नदी की स्वच्छता और इसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय और आर्थिक लाभों के बारे में सभी ग्राम प्रधानों को जागरूक करने के लिए जिला स्तर पर बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में हुई चर्चा के आधार पर एक कार्य योजना तैयार की गई, जिसमें निम्नलिखित बातों पर ध्यान केंद्रित किया गया -
नदी के उथले हिस्सों से गाद निकालना
नदी किनारों से कूड़ा और मलबा हटाना
नदी किनारे की खाली जमीन का मापन और अवैध अतिक्रमण हटाना
नदी किनो और आसपास की उपलब्ध ज़मीनों पर फलदार वृक्षों का रोपण
खास बात यह है कि नदी के किनारों पर फलदार पौधों का रोपण किया जा रहा है। इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति है कि वृक्षारोपण अभियान न केवल पारिस्थितिक बहाली में योगदान देता है, बल्कि यह आर्थिक मूल्य भी प्रदान करता है। रोपे गए फलदार वृक्षों के पौधों से भविष्य में मिलने वाले फलों का उपयोग स्थानीय लोग और संबंधित ग्राम पंचायतों द्वारा किया जा सकता है।
दोनों ही तामसा नदियों का पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है। इन्हें श्रीराम और सीता से जुड़े प्रसंगों से जोड़कर देखा जाता है। कैमूर पर्वत से निकलने वाली तमसा नदी के बारे में मान्यता है कि पहले यह सीतामढ़ी के निकट से बहती थी, जहां पर बाल्मिकी आश्रम है। वहीं पर सीता जी का समाहित स्थल भी है। कहा जाता है कि यहां पर आज भी सीता जी का केश स्रपित जैसा बाल वाला घास उगती है, जिसे कोई भी पशु नही खाते है। अभी यह नदी सिरसा बाजार के पास गंगा नदी में मिलती है।
दूसरी ओर, अयोध्या के निकट बहने वाली एक तमसा नदी का उल्लेख भी रामायण में मिलता है। इसमें बताया गया है कि वन को जाते समय श्रीराम, लक्ष्मण और सीता ने प्रथम रात्रि इसी तमसा नदी के तट पर बिताई थी। जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में इस प्रकार किया गया है-
'’ततस्तुतमसातींर रम्यमाश्रित्य राघव:, सीतामुद्वीक्ष्य सौमित्रमिदंवचनमव्रबीत्।
इयमद्य निशापूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनं वनवासस्य भद्रंते न चोत्कंठितुमर्हसि।'’
वाल्मीकि ने तमसा को ‘शीघ्रगामाकुलवर्ता तमसामतरन्नदीम्’ शीघ्र प्रवाहिनी तथा भंवरों वाली गहरी नदी कहा है। कालिदास ने 'रघुवंश' में, तपस्वी श्रवण की मृत्यु तमसा के तट पर ही होने की घटना का वर्णन किया है। उन्होंने तमसा के तीर पर तपस्वियों के आश्रमों का भी उल्लेख किया है। कहा जाता है कि तमसा नदी के तट पर ही वाल्मीकि ने निषाद द्वारा मारे जाते हुए क्रोंच को देखकर करुणार्द्र स्वरों में अनजाने में ही संस्कृत लोकिक साहित्य के प्रथम श्लोक की रचना की थी, जिससे रामायण कथा का सूत्रपात हुआ। तुलसीदास ने तमसा का वर्णन राम की वनयात्रा तथा भरत के चित्रकूट की यात्रा के प्रसंग में किया है-
'तमसा तीर निवास किय, प्रथम दिवस रघुनाथ'
इसके अलावा उन्होंने लिखा है-
'तमसा प्रथम दिवस करिवासू, दूसर गोमती तीर निवासू।'
सफाई से पहले गंदगी, जलकुंभी और गाद के जमाव के कारण तमसा नदी सिमट कर काले, बदबूदार पानी की एक पतली धारा जैसी हो गई थी।
नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत तमसा नदी की सफाई के काम को अंजाम देने के लिए करने के लिए स्वच्छ गंगा राज्य मिशन और जिला गंगा समिति के साथ समन्वित प्रयास किए गए। स्वच्छता अभियान और जागरूकता अभियानों के माध्यम से स्कूली बच्चों, युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय निवासियों को जागरूक किया गया। इससे बड़ी संख्या में लोग स्वेच्छा से श्रमदान के लिए आगे आए। इस तरह सामुदायिक प्रसास से नदी तटों और घाटों से प्लास्टिक, पॉलीथीन और अन्य ठोस कचरे को हटाया गया। काम में तेजी लाने के लिए प्रशासन की ओर से सफाई कर्मचारियों को भी तैनात किया गया, प्रमुख स्थानों पर कूड़ेदान लगाए गए और लोगों को नदी में कचरा फेंकने से रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाए गए। इस पहल का नदी तटों पर होने वाली धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी सकारात्मक सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, जिससे यह सुनिश्चित हुआ है कि नदी किनारे पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों और पवित्र स्नान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को स्वच्छ और अधिक व्यवस्थित माहौल मिले और वह स्वयं कूड़ा-कचरा न फैला कर नदी को साफ-सुथरा व प्रदूषण मुक्त रखने में सहायक बनें।
अधिकारियों का कहना है कि गंगा की सहायक नदी होने के नाते, तामसा की स्वच्छता बनाए रखना गंगा की शुद्धता और निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। निरंतर प्रयासों से नदी के जल की गुणवत्ता में सुधार और इसकी जैव विविधता को बेहतर बनाने से नदी के आसपास के कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता और सिंचाई क्षमता में वृद्धि हुई है। इससे इन इलाकों की खेती में भी सुधार देखने को मिल रहा है। मिट्टी की उर्वरता में सुधार और बेहतर सिंचाई की उपलब्धता से स्थानी किसानों को बेहतर उपज प्राप्त होने की उम्मीद जगी है। आजमगढ़ के उप आयुक्त (श्रम एवं रोजगार) राम उद्रेज यादव ने ग्राम पंचायतों द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और एमजीएनआरईजीए के साथ उनके समन्वय पर प्रकाश डाला। निर्वाचित प्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं और सामुदायिक स्वयंसेवकों ने सामूहिक रूप से गाद निकालने, सफाई करने और वृक्षारोपण गतिविधियों में योगदान दिया, जिससे नदी जीर्णोद्धार के सहभागी मॉडल को मजबूती मिली।
यूपी के आज़मगढ़ जिले में 111 ग्राम पंचायतों के लोगों ने मिलकर तमसा नदी को जलकुंभी और कूड़े-कचरे से मुक्त कर इसे एक नया जीवन दे दिया है।
तामसा नदी का पुनरुद्धार इस बात का प्रमाण है कि निरंतर प्रशासनिक प्रतिबद्धता और सक्रिय जनभागीदारी के संयोजन से नदी पारिस्थितिकी तंत्र को सफलतापूर्वक बहाल किया जा सकता है। यह बताता है कि जब राज और समाज एक साथ खड़े होते हैं, तो नदी या परिवेश सिर्फ साफ ही नहीं होते, जीवंत हो उठते हैं। समसा में की गई यह पहल गंगा बेसिन में सहायक नदियों और छोटी नदियों के संरक्षण के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। इसकी सफलता से संभावना जगी हैं कि आगे चलकर गंगा की अन्य सहायक नदियों के साथ-साथ तमसा नदी के संरक्षण और नियमित सफाई के प्रयास नमामि गंगा अभियान के तहत मिशन मोड में चलाए जाएंगे। इससे गंगा को एक अविरल, निर्मल, स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ नदी प्रणाली में बदलने की परिकल्पना को मजबूती मिलेगी।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें