मुला-मुठा नदियां आज शहरी सीवेज के प्रदूषण से बुरी तरह दूषित होकर मृत होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। 

 

फोटो : विकी कॉमंस

नदी और तालाब

मुला-मुठा : सह्याद्री की पहाड़ियों से निकली जुड़वां नदियां क्‍यों बन गईं शहरी गंदगी की दूषित धारा?

दोनों नदियों के पानी में इतना ज़हर घोल दिया गया है कि धाराएं पहाड़ी चट्टानों से टकराने पर सफेद झाग से भर उठती हैं। 'डेड रिवर' की श्रेणी में आने की कगार पर पहुंच चुकी हैं जुडवां नदियां।

Author : विनीता परमार और कुशाग्र राजेंद्र

देश में जब जुड़वां नदियों की बात होती है, तो सबसे पहले लोगों की जु़बान पर आता है गंगा-यमुना, केन-बेतवा और चंद्र-भागा नाम ही आते हैं। महाराष्‍ट्र में सह्याद्री की पहाडि़यों से निकलने वाली मुला-मुठा के बारे में लोग कम ही जानते हैं। आज हम आपको इन्‍हीं जुड़वां के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी कल-कल छल-छल ध्‍वनि कभी सह्याद्री के एक बड़े इलाके को जीवन और ऊर्जा देती थी, पर आज ये शहरी के कचरे और मल-जल की प्रदूषित धारा बन कर रह गई हैं। 

पहाड़ों से जो नदियां उतरती हैं, वे सिर्फ पानी की धाराएं नहीं होतीं। ये हजारों-लाखों लोगों के लिए जीवन-धारा भी होती हैं। इनके साथ पूरी एक सभ्यता-संस्‍कृति बहा करती है। सह्याद्री पहाड़ की मुला और मुठा भी ऐसी ही दो नदियां हैं। पहली पहाड़ी जंगलों की कोख से जन्मती है, दूसरी सह्याद्री की चट्टानों से रिस कर निकलती है। दोनों अपनी-अपनी चाल, अपने-अपने मिजाज के साथ सभ्यता और संस्कृति में रंग भरती पुणे पहुंचती है। दोनों नदियां पुणे में संगमवाड़ी पर मिलती हैं। यहीं से उनकी साझा यात्रा शुरू होती है मुला-मुठा के नाम से। काका साहेब कालेकर इन दोनों नदियों के शांत मंथर गति और सुरम्य वातावरण पर फूले नहीं समाते थे। आज वही मुला-मुठा भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में शुमार हो चुकी हैं। आज पुणे शहर और यहां की दोनों नदियों के बीच रिश्ते बदतर हो चले है। अब ये दोनों नदियां पिंपरी चिंचवाड़ औद्योगिक क्षेत्र और पुणे शहर ने निकले गंदे पानी के निस्तारण का जरिया बन कर रह गए गई। यहां तक कि  इन्हें मृत भी माना जाने लगा है। आखिर ऐसा क्या हो गया पिछले कुछ दशकों में कि लगभग हर शहर उन नदियों को निगलने में अमादा है, जिसके किनारे वो शहर बसे और जिनका पानी पी कर समृद्ध हुए? 

भीमा नदी में मिल जाती हैं मुला-मुठा  

यह जुड़वां नदियां केवल भूगोल का हिस्‍सा नहीं हैं वे उन सभ्यताओं की स्मृति हैं जो दो जलधाराओं के बीच पनपीं, प्रकृति और के बीच उन प्रेम-कथाओं की गूंज हैं जो पहाड़ों से मैदानों तक फैली हैं, और उस गहरी मानवीय प्रवृत्ति का प्रमाण हैं कि हम हर चीज़ को जोड़े में देखना चाहते हैं,-अकेले नहीं, जैसे द्वन्द समास। दो नदियों का मिलना केवल जल का संगम नहीं होता वह दो स्वभावों, दो स्मृतियों और दो सभ्यताओं का एक होना है। 

गंगा-यमुना से लेकर दज़ला-फरात (टिग्रिस-यूफ्रेट्स) तक, चंद्र-भागा से लेकर रियो नीग्रो-अमेजन तक इन जोड़ियों ने नगर बसाए, संस्कृतियाँ गढ़ीं और पौराणिक कथाओं को जन्म दिया। मुला-मुठा  की अप्सराएं हों या रोंगीत-तीस्ता के प्रेमी, राइन-मोसेल का जर्मन कोना हो या मनाउस (रियो नीग्रो और सोलिमोएस) में दो रंगों के पानी का अद्भुत साथ हर जोड़ी अपने-अपने तट की भाषा बोलती है। संस्कृत में "यम" का अर्थ "जुड़वाँ" भी है। भूवैज्ञानिक डॉ. के.एस. वाल्डिया बताते हैं कि जब कोई नई धारा किसी पुरानी नदी का पानी छीनकर उसे सुखा देती है, तो उस नई धारा को "यमुना" कहा जाता है, जैसे ब्रह्मपुत्र की एक शाखा जमुना है, वही मेघालय में धनसिरी की एक धारा भी यमुना ही है। यानी यमुना शब्द में ही जुड़वांपन का भाव है। 

वैसे नदियों की शब्दावली में जुड़वां नाम अपवाद है। समान्यतः जब दो नदियां मिलती हैं तब अक्सर उनमें से एक अपना नाम छोड़कर दूसरी में मिल जाती है। पर विश्व की हर सभ्यता ने अपनी किसी ना किसी दो नदियों को एक साथ पुकारा है, मुला-मुठा ही क्यों, तुंगभद्रा (तुंगा और भद्रा), क्योंकि जोड़े में बहना भी तो जीवन का सबसे पुराना रूपक है। आगे मुला और मुठा  नदी भीमा में मिलती है, भीमा कृष्णा में और कृष्णा अंततः बंगाल की खाड़ी में जाकर थमती है।

मुला-मुठा का इतिहास 

मुला-मुठा की मौजूदा वेदना जानने से पहले इन पुरातन पहाड़ियों को जानना जरूरी है जिसका उम्र गिन-गिनकर इंसान थक जाए। मुला-मुठा लगभग छः करोड़ साल पहले पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार के बीच आपसी उठापटक के बीच बह निकली। जब धरती के भीतर से ज्वालामुखी फूटे और लावे की परतें जमती-जमती पश्चिमी घाट बना, तभी से सह्याद्री ने अपने आंचल में इन नदियां समेट रखी हैं। ये वही समय था जब हिमालय के बनने की धमक गूंज रही थी। हिमालय से भी पुरानी, और गंगा सहित उत्तर भारत की सभी नदियों के उद्गम से भी पहले से मुला-मुट्ठा गंगा सह्याद्री को मैदान बनाने में जुटी थी। जब गंगा का अस्तित्व भी नहीं था, तब इन नदियों के किनारे जीवन पल रहा था।

पुरातत्वविदों को इस क्षेत्र में मिले पंद्रह से बीस हजार वर्ष पुराने पाषाण उपकरण इस बात की साक्षी हैं कि मुला और मुठा मानव सभ्यता की आदिम स्मृतियों में दर्ज है। इन्होंने ना सिर्फ शुरुआती मानव बस्ती को बसते देखा बल्कि दक्कन में सभ्यता को पनपते देखा, यादवो का साम्राज्य देखा, पेशवाआं को समृद्ध होते देखा और अब पुणे जैसे आधुनिक शहर को फलते फूलते देख रही है। पुणे शहर के इसी फैलाव और समृद्धि के बीच अब मुला-मुठा नदी की सांसें उखड़ रही है। मुला और मुठा सह्याद्री की ये दो बेटियां आज भी बह रही हैं। लेकिन, उनके बहने और हमारे बीच उन्हें देखने की एक बड़ी खाई बन गई है। जो नदी कभी प्रवासी पक्षियों की पसंदीदा सैरगाह थी, आज उसका जल इतना दूषित हो चुका है कि पक्षियों तक ने उसका किनारा छोड़ दिया है। जहाँ कभी गांव और शहर नदियों की तरफ बसते थे, घरों का मुंह नदी की तरफ होता था, पिछले कुछ दशक में दोनों नदियाँ ऐसी बदसूरत हुई कि वहाँ अब इमारतें नदी को पीठ दिखाकर बन रही हैं। 

संगमवाड़ी में इन नदियों का मिलन केवल जल का संगम नहीं था; वह भूगोल, संस्कृति और सभ्यता का जन्मस्थान बना, वहीं मानव बस्ती ने अपने पहले स्थायी कदम रखे। नदी के किनारे जीवन यापन की समस्त व्यवस्था थी, जिसके बिना कोई नगर जन्म नहीं ले सकता। समय के साथ इस बस्ती को लोगों ने पुण्यविषय कहा अर्थात एक ऐसा स्थान जिसे जल और प्रकृति ने पवित्र बनाया था। बाद में यह नाम पुण्यनगरी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। फिर जैसे लोकभाषा लंबे शब्दों को अपने स्नेह से छोटा कर देती है, पुण्यनगरी धीरे-धीरे पुणे बन गया। इस प्रकार पुणे शहर के नाम में प्रकृति और मुला मुठा के प्रति कृतज्ञता समाहित हैं।

मुला और मुठा पानी सहित सभी संसाधन दिए, व्यापार के मार्ग दिए और आगे चल कर शहर की एक बौद्धिक पहचान बनी। शहर ने उनकी गोद में पलना सीखा, उनके किनारों पर अपने सपने बोए, और उन्हीं के साथ अपना इतिहास रचा। पुणे की आत्मा को यदि किसी एक दृश्य में देखा जा सकता है, तो वह है दो नदियों का शांत संगम, जिसे शहर ने अपने भीतर उस प्राचीन जल-स्मृति को संजोए हुए है।

उद्गम और पड़ाव

पश्चिमी घाट की जिस सह्याद्री शृंखला से ये नदियां जन्म लेती हैं, यहां के जंगल, मिट्टी, चट्टानें सब मिलकर एक अदृश्य जल-तंत्र बनाते हैं। बारिश का पानी सीधे नदी में नहीं दौड़ता, पहले पत्तियां उसे थामती हैं, फिर जड़ें उसे धरती में उतारती हैं, और फिर वही पानी झिरियों और सोतों के रूप में धीरे-धीरे रिसता हुआ नदी में लौट आता है। यही कारण है कि इन नदियों का जल केवल आसमान का नहीं, धरती की कोख का भी होता है।

मुला नदी मुलशी के घने जंगलों में पहली बार आकार लेती है। मुलेश्वर देवराई यानी मुलेश्वर का पवित्र वन के शिव के मंदिर के पास के एक छोटे से तालाब से एक पतली धारा फूटती है, मुला। जंगल उसकी मां है, पहाड़ उसका घर। थोड़ी ही दूर उतर में पवना नदी और नीचे दक्षिण में रामनदी आकार लेती है जो पुणे शहर के पास मुला में एक एक करके मिल कर उसे और भर देती है। मुला के रास्ते में मुलशी बांध उसे रोकता है, तो वहीं पवना नदी पर पवना झील और रामनदी पर मानस और पाषण झील अब पुणे शहर की प्यास बुझाने के काम आ रहा रही हैं।

मुठा नदी का उद्गम सह्याद्री के वेग्रे गांव में है। मराठी में इसे "मुठा ई" मुठा आई कहते हैं यानी मां मुठा। यह नाम यूं ही नहीं मिला। सदियों तक इस नदी ने पुणे के लोगों को पानी दिया, उनके खेत सींचे, उनके घरों की प्यास बुझाई। मोसे और अम्बी नदियां आकर मुठा में मिल जाती हैं। तेम्घर बांध मुठा का पानी रोकता है तो पानशेत बांध और वारासगांव बांध मुठा की सहायक अम्बी नदी और मोस नदी का। और आगे खड़कवासला बांध ना सिर्फ पुणे शहर की प्यास बुझाता है, बल्कि समूचे इस इलाके में गन्ने की खेती का आधार भी है। हालांकि की अब मुठा पर कई पुल बन गए हैं, पर सबसे पहला और ऐतिहासिक पुल लकड़ी के पुल के नाम से जाना जाता है। ये अलग बात है कि असल में यह पत्थर से बना है। 

पुणे शहर के संगमवाड़ी, जिसे संगम ब्रिज या बसली ब्रिज भी कहते है, में दोनों नदिया मिलती है जिसे काका साहेब कालेलकर नदियों का सबसे शांत संगम बताते हैं। यहां से एक युग्म नाम वाली नदी का जन्म होता है मुला-मुठा। असल में ये दोनों बहने रजा गजनक के श्राप से मुक्ति के लिए भीमा शंकर की पहाड़ी से निकले भीमा नदी की तलाश में पूरब की दिशा में बहते हुए यह नदी आगे पूर्व की दिशा में बहते हुए वालकी और रांजणगांव सांडस के पास भीमा नदी में मिल जाती है। भीमा आगे कृष्णा में मिलती है और कृष्णा अंततः बंगाल की खाड़ी में जाकर विलीन होती है।

पौराणिक कथाओं में है उल्‍लेख

मुला और मुठा केवल नदिया नहीं हैं; वे सह्याद्री की स्मृतियों में जीवित दो अप्सराएं हैं। कहा जाता है कि सह्याद्री की पर्वतमालाओं में राजा गजनक कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी साधना इतनी प्रबल थी कि जैसा होता आया है देवराज इंद्र को भय हुआ कि कहीं यह तप उनके स्वर्गिक पद को चुनौती न दे दे। इंद्र ने अपनी सत्ता की रक्षा के लिए दो अनुपम अप्सराओं को राजा की तपस्या भंग करने के लिए भेजा। जब राजा गजनक ने इस छल को समझा, तो उनके श्राप से  दोनों अप्सराएं क्षणभर में नदियों में बदल गईं एक मुला बनी, दूसरी मुठा। अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए उन्होंने क्षमा मांगी। तब राजा का हृदय कुछ पिघला और उन्होंने कहा कि जब वे आगे चलकर भीमा नदी में समाहित होंगी, तभी उन्हें इस श्राप से मुक्ति मिलेगी। 

मुठा को एक शाही मराठा रानी की तरह कल्पित किया जाता है पुणे के बीचोंबीच बहती हुई, दृढ़ और गरिमामय धारा तो मुला को एक वन-कन्या की तरह शहर की सीमाओं के साथ शांत, थोड़ी दूरी बनाए हुए। दोनों का स्वभाव अलग, दोनों का रास्ता अलग, लेकिन संगम पर दोनों एक हो जाती हैं।

स्वर्णिम काल और टूटन 

छत्रपति शिवाजी के शासनकाल में पुणे को जो प्रमुखता मिली, उसे पेशवाई में और भी विस्तार मिला। 18वीं सदी तक इन नदियों और इस शहर दोनों के लिए सबसे स्वर्णिम समय था। नदी के तट पर मंदिर बने, घाट बने, बगीचे लगे। मुठा के किनारे लगभग एक किलोमीटर के दायरे में ही करीब चौदह घाट थे, जो ना सिर्फ स्नान की जगहें थी बल्कि यहाँ से मराठा राजनीती मोड़ लेती थी। नदी के किनारे समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र था, प्रवासी पक्षियों का कलरव था, पानी की धारा में एक पूरा जीवंत संस्रार था। तब घरों का मुंह घाट की तरफ होता था क्योंकि नदी जीवन का केंद्र थी, उससे पीठ मोड़कर घर बनाने का रिवाज नहीं था। नदियों से मुंह  मोड़ लेना तो हमने हाल में सीखा है जब नदियों को अपने घरेलू गंदे पानी के निस्तारण का जरिया बना लिया। अब साफ पानी में रहने वाले पक्षी नदी से जा चुके है, खास कर पानी में अन्दर गोता लगाने वाली बतखे, पाइड किंगफ़िशर और फिजांट टेल्ड जकाना और उसके बदले गंदे पानी और सडन में रह सकने वाले पक्षी जैसे सतह पर तैरने वाले बतख, कौवे, चिलो का बसेरा बन गया है नदी क्षेत्र। 

यह टूटन एक दिन में नहीं हुई। सन 1880 में खड़कवासला में मुला पर पहला बांध बना। फिर एक के बाद एक तीन और बांध बने। नल में पानी आने लगा तो नदी के घाट पर जाने की जरूरत कम होती गई। जरूरत कम हुई तो लगाव भी कम होता गया। नदी धीरे-धीरे जीवन के केंद्र से हटकर हाशिये पर जाने लगी। निर्णायक चोट 1961 ई.  में लगी जब मुठा की सहायक अम्बी नदी पर बना पानशेत बांध ढह गया। इसकी चोट खड़कवासला बाँध तक पहुंची और उसमें भी दरार आ गई। जो पानी पूरे साल शहर की प्यास बुझाने के लिए जमा था, वह कुछ ही घंटों में बह गया। बाढ़ अपने साथ घाटों की सुंदरता, तटों के बगीचे और विरासती इमारतें बहा ले गई। जो बचा उखड़े पेड़, चट्टानें, गाद वह वहीं पड़ा रहा। किसी ने उठाने की कोशिश नहीं की। जो नदी का किनारा कभी शहर की पहचान था, वह रातोंरात एक उपेक्षित, मैली जगह बन गया। शहर ने उस दिन से नदी को पीठ दिखा दी और यह पीठ फिर कभी नहीं मुड़ी।

प्रदूषण का गहराता संकट

जब बांधों से पानी मिलने लगा तो नदी की उपयोगिता केवल बहाव तक सिमट गई और जब नदी उपयोगी नहीं रही तो वह कचरा-घर बन गई। जो घाट कभी संस्कृति और संवाद के केंद्र थे, वे सीवेज और मलबे के ठिकाने बन गए।

मुठा को घरेलू नालों ने घेर लिया। हर मोहल्ले का सीवेज उसमें आकर गिरने लगा। मुला का हाल अलग तरह का है पिंपरी-चिंचवाड़ के कारखानों का रासायनिक कचरा पवना नदी के रास्ते मुला में आता और उसकी देह को भीतर से खोखला करता। एक नदी घर के नाले की मार झेलते रही है, दूसरी कारखानों के जहर से जूझते धीरे-धीरे मरने लगी।

हाल यह है पुणे शहर का आधा से अधिक घरलू गन्दा पानी, सीवेज इन नदियों में बिना शोधन के सीधे बहाया जा रहा है। मॉनसून को छोड़ दें तो बाकी महीनों में इन नदियों के पानी में घुलनशील ऑक्सीजन उस स्तर से बहुत नीचे रहती है जिसमें जीव जीवित रह सकें। शहर निर्माण का मलबा, ठोस कचरा दैनिक उपयोग के रसायन से नदी ना सिर्फ मृत हो रही है बल्कि उसका विस्तार भी सिमट रहा है। पानी में जहरीले रसायन की मात्र इतनी अधिक है की पानी का बहाव जहां चट्टानों से टकराता है, नदी सफेद झाग से भर उठती है। जब नदी में किंगफिशर की जगह कौवे आ जाएं तो समझिए नदी की आत्मा जा चुकी है। अब मुठा को मृत नदी मान लिया गया है। एक करोड़ साल पुरानी नदी के लिए यह मृत शब्द बहुत भारी है।

नदी के मरने का सिलसिला केवल पुणे शहर तक ही सीमित नहीं है। आगे कावडी गाँव के पास नदी में कभी दूर-दूर से प्रवासी पक्षी आते थे। पर अब नदी का पानी इतना दूषित है प्रवासी पक्षी अब मुला-मुठा से दूर ही रहते है। मुला-मुठा का दूषित पानी भीमा में मिलता है, भीमा से उजानी बांध का जलाशय भी दूषित हो चूका है और आगे कृष्णा नदी तक यह जहर फैल रहा है। एक शहर की लापरवाही पूरी एक नदी शृंखला को रोगी बना चुकी है।

बचाव की कोशिशें और उनकी असफलताएं

पुणे में नदी बचाने की कोशिशें हो रही हैं कई संस्थाएं काम कर रही हैं। नागरिक भी अभियान चलते हैं, जिसके तहत नदी किनारों की सफाई होती है। नागरिक सुचिता के कुछ कुछ प्रयास दीखते भी है लेकिन ये प्रयास नाकाफी है। नदी में फेंका कूड़े का थैला सिर्फ थैला नहीं है यह इंसानों और नदियों के बीच ख़त्म हो रहे रिश्ते की धमक है। प्लास्टिक की थैलियां चुनने से नदी नहीं बचाया जा सकता है, जब तक धरेलू और कारखानों से निकला गन्दा पानी शोधित नहीं होगा। कुछ कुछ धमक राष्‍ट्रीय स्तर तक ग्रीन ट्रिब्यूनल तक भी पहुंचती हैं। पर, जब तक कारखानों का रासायनिक कचरा नदी में आता रहेगा, तब तक ये अभियान ऊपर-ऊपर की सफाई हैं जड़ की बीमारी वहीं रहती है।

एक और समस्या है। हर संस्था अपने हिसाब से काम करती है। कोई एक किनारे की सफाई करता है, कोई जागरूकता फैलाता है, कोई कानूनी लड़ाई लड़ता है। लेकिन ये सब अलग-अलग धाराएं हैं, जो कहीं एक होकर नहीं बहतीं। जब तक ये एक नहीं होतीं, नदी का बचना मुश्किल है।

मुला और मुठा करोड़ों साल से बह रही हैं। इन्होंने पेशवाओं का पुणे देखा है, मराठा साम्राज्य का उत्थान-पतन देखा है, और आधुनिक महानगर को फैलते हुए देखा है। लेकिन जो इन्होंने पिछले कुछ दशकों में देखा है, वह शायद उनके इतिहास का सबसे दुखद अध्याय है। पुणे आज भी समृद्ध हो रहा है, लेकिन जिन नदियों की गोद में यह शहर पला बढ़ा, उन्हें पूरी तरह बिसरा चुका है।  मुला-मुठा दिन-ब-दिन सिकुड़ती जा रही हैं, जो पानी उनमें आज बह रहा है उसमे पानी कम और ज़हर ज्यादा है। इसे देखकर तो मन में यही सवाल उठता है कि क्‍या अब पुणे को मुला-मुठा की न परवाह रह गई है न ही ज़रूरत? 

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