बिहार का दरभंगा शहर एक ज़माने में बड़ी संख्‍या में मौजूद तालाबों के कारण 'तालाबों का शहर' के नाम से जाना जाता था। पर, बीते वर्षों में तालाबों पर अतिक्रमण, प्रदूषण और भूजल स्‍तर में गिरावट जैसी समस्‍याओं के चलते ये तालाब सिमटते जा रहे हैं। 

 

स्रोत : विकी कॉमंस

नदी और तालाब

सुंदरीकरण के नाम पर दरभंगा के तीन ऐतिहासिक तालाबों 'खात्‍मे’ पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर

पर्यटन सुविधाओं की ख़ातिर तालाबों को मिट्टी से भरकर कई तरह के निर्माण करा रही बिहार सरकार, 2 मई को होगी ‘तालाब बचाओ अभियान’ की ओर से दायर याचिका पर अगली सुनवाई, बुडको को नोटिस जारी

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

हमारे गांव, कस्‍बों, शहरों के तालाब एक पारंपरिक जलस्रोत होने के साथ ही अकसर उस स्‍थान की  सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से भी जुड़े होते हैं। पर, देशभर में तेजी से हो रहे शहरीकरण, कॉलोनियों की बसावटों और प्‍लॉटिंग जैसी गतिविधियां इन तालाबों को निगलती जा रही हैं। कुछ ऐसा ही मामला बिहार के दरभंगा जिले में भी देखने को मिला, जिसके खिलाफ स्‍थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्‍वयंसेवी संस्‍था ने न केवल सशक्‍त अवाज़ उठाई, बल्कि अपने शहर की पहचान से जुड़े तालाबों के अस्तित्‍व की लड़ाई को देश की सर्वोच्‍च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक ले गए। कोर्ट ने इसे एक गंभीर मामला मानते हुए न सिर्फ़ सुनवाई के लिए स्‍वीकार कर लिया है, बल्कि मामले की जल्‍द सुनवाई की आवश्‍यकता को देखते हुए इसकी सुनवाई के लिए 2 मई की तारीख तय की है। 

मामला दरभंगा के तीन ऐतिहासिक तालाबों दिग्घी, हराही और गंगासागर से जुड़ा है। तीनों तालाब के कथित सुंदरीकरण के नाम पर सरकारी एजेंसी बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम लिमिटेड (बुडको) ने इनके बड़े हिस्‍सों को पाटकर वहां निर्माण कार्य चालू कर दिया था। स्‍थानीय लोगों व पर्यावरण प्रेमियों द्वारा तीनों प्राचीन तालाबों पर मनमाने ढंग से किए जा रहे इस निर्माण कार्य का विरोध किए जाने के बावजूद सरकारी महकमा  मिट्टी भराई और निर्माण कार्य पर रोक लगाने को राज़ी नहीं हुआ। इसके चलते यह लड़ाई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), पटना उच्च न्यायालय होते हुए देश की अब सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची। इस मामले में 'तालाब बचाओ अभियान' की ओर से दायर याचिका को कोर्ट में 2 मई को सुना जाएगा।

याचिका दायर करने वाले तालाब बचाओ अभियान (टीबीए) ने कोर्ट से इस मामले में त्‍वरित हस्तक्षेप करते हुए मिट्टी भराई पर रोक, अतिक्रमण हटाने और तालाबों को उनके मूल स्वरूप में बहाल करने का आदेश देने का आग्रह किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य की सरकारी एजेंसी बुडको NGT और पटना उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करते हुए हराही,दिग्घी और गंगासागर तालाब पर मनमाने ढंग से निर्माण कार्य को जारी रखे हुए है। इससे करीब 800-900 वर्ष पुराने इन ऐतिहासिक जलाशयों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। 

सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इन प्राचीन तालाबों को लेकर जिस प्रकार चिंता जताई है, उससे लोगों में इन तीनों तालाबों के मूल अस्तित्व में वापस आने की उम्‍मीद जाग उठी है। न्यायालय ने अभियान के अधिवक्ता कमलेश कुमार मिश्र ,रेणु कुमारी की दलीलों और साक्ष्यों और एनजीटी के आदेश पर विचार करने के बाद कहा कि ऐसे विशाल और ऐतिहासिक तालाबों का इतने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण और इसे भरने की साजिश न्यायालय की भी चिंता का विषय है। साथ ही कोर्ट ने तालाब को उसके मूल अस्तित्व में वापस लाने को लेकर राज्य सरकार सहित पक्षों को नोटिस जारी करने का आदेश भी दिया है। इस बारे में दोनों अधिवक्‍ताओं ने एक फेसबुक पोस्‍ट के जरिये जानकारी साझा की है। इसमें उन्‍होंने बताया है कि तीनों तालाबों को भर कर वहां पर टॉयलेट और रेस्‍टोरेंट आदि बनाने के कार्य पर रोक लगाने व तालाबों पर अतिक्रमण पर रोक लगाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसपर चिंता जताते हुए कहा है कि इस तरह से तालाबों को पाटना अनुचित है।

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 लंबे समय से जारी है विरोध

तालाब बचाओ अभियान के संयोजक नारायणजी चौधरी और उनके सहयोगी हराही, दिग्घी और गंगासागर तालाब के कथित सुंदरीकरण के नाम पर बुडको की मनमानी के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष कर रहे है। वे डीएम से लेकर शीर्ष पदाधिकारियों को तालाब के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व, इसके पर्यावरणीय पहलुओं से अवगत करा चुके हैं। साथ ही प्रशासन को ऐसे मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के आदेश दिखाए। इसके वाबजूद बुडको के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया और न ही उसने अपने निर्माण कार्य को रोका। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई।

टीबीए के संयोजक नारायण चौधरी ने बताया कि संस्‍था की ओर से राज्य सरकार के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका 25 मार्च कोही रिट केस के रूप में स्वीकृत हो गई थी, लेकिन उस वक्‍त सुनवाई की तिथि निश्चित नहीं हुई थी। अब (4 अप्रैल को) मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने बुडको को नोटिस जारी कर दिया है। यह याचिका राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश के अवमानना को लेकर दिए गए प्लीडर नोटिस के आलोक में दायर की गई थी, जिसमें एनजीटी के आदेशों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। संस्‍था ने कोर्ट को बताया है कि गंगासागर, दिग्घी और हराही तालाब एक ही जुड़े हुए वेटलैंड तंत्र का हिस्सा हैं, जो लगभग 1.8 किलोमीटर की लंबाई में फैले हैं। यह बात बिहार राज्य वेटलैंड प्राधिकरण के अभिलेख में भी दर्ज है। इसके बावजूद बुडको वेटलैंड संरक्षण से जुड़े नियमों का उल्‍लंघन करते हुए इनपर मनमाने ढंग से निर्माण कार्य कर रहा है। 

दरभंगा ही नहीं पूरे बिहार में तालाबों पर अतिक्रमण हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीन तालाबों पर जो अग्रिम आदेश दिया है वो एक बड़ी सफलता है। बिहार में अभी दर्जनों तालाब हैं जिन पर अतिक्रमण किया जा रहा है। उनमें से 27 ऐसे हैं जिन पर पूरी तरह अतिक्रमण हो चुका है। इनके केस एनजीटी में चल रहे हैं। एक-एक तालाब में दो से तीन एकड़ तक के अतिक्रमण में प्राकृतिक संसाधन पूरी तरह नष्‍ट हो रहे हैं। 
- एडवोकेट रेणु, कॉर्पस जूरिस इंडिया (लॉ फर्म)   

तीनों तालाबों के एकीकरण की थी योजना

बिहार सरकार हराही, दिग्घी और गंगासागर तालाब को आपस में जोड़कर यहां उत्तराखंड की नैनी झील की तर्ज़ पर पर्यटन की सुविधाएं विकसित करने की योजना पर काम कर रही थी। इससे एकीकृति तालाब का आकार करीब 156 एकड़ का हो जाता और यह प्रदेश के सबसे बड़े तालाब के रूप में सामने आता। जिसके बाद यहां वाटर स्पोर्ट्स समेत कई तरह की पर्यटन सुविधाओं को शुरू करने की भी योजना थी। इनमें घाट का निर्माण, चेंजिंग रूम, शौचालय, फूड कोर्ट, नौका विहार, जेट स्की, सौर ऊर्जा से संचालित स्ट्रीट लाइट, बेंच, कियोस्क पार्क, ओपेन जिम और पार्किंग जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसके लिए 75.28 करोड़ रुपये डीपीआर को शासन की मंजूरी मिलने के बाद बुडको ने काम शुरू कर दिया था।

दरअलस, दरभंगा के ये तीनों तालाब एक तकरीबन एक सीध में स्थित हैं। इसे देखते हुए इन्‍हें आपस में जोड़कर इनका आकार बढ़ाने की योजना थी। पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रगति यात्रा पर दरभंगा पहुंचे तो उन्होंने तीनों तालाबों को एकीकृत कर सुंदरीकरण की योजना का शिलान्यास किया। तीनों तालाबों में क्षेत्रफल के मामले सबसे बड़ा दिग्घी तालाब है, जिसका रकबा 112 बीघा 10 कट्ठा है। इसके ठीक उत्तर हराही तालाब का रकबा 62 बीघा 10 कट्ठा है।

दरभंगा के तालाब शहरी और ग्रामीण इलाकों में एक प्रमुख जलस्रोत होने के साथ ही सामाजिक गतिविधियों का केंद्र भी रहे हैं। 

पहले भी हुए हैं सुंदरीकरण के प्रयास

शहर के इन तीनों प्रमुख तालाब का सुंदरीकरण महाराज रुद्र सिंह (1839–1850) ने अपने कार्यकाल में कराया था। इसके बाद रईस हाजी मो. वाहिद अली खान ने यह काम कराया था। इसके बाद कोई पहल नहीं की गई।

वर्ष 1974 में तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्रा ने तीनों तालाबों को पर्यटन स्थल बनाने की घोषणा की थी, लेकिन आज तक सर्वे और डीपीआर बनाने से आगे तक कार्य नहीं बढ़ा।

वर्ष 1993 तत्कालीन डीएम अमित खरे ने इसके सुंदरीकरण का प्रयास किया, लेकिन तबादले के कारण उनका सपना पूरा नहीं हो सका। वर्ष 1994 में छात्र संस्था तरू-मित्र ने रैली निकालकर आंदोलन किया था।

प्राचीन इतिहास से जुड़े हैं तीनों तालाब

दरभंगा में 225 से अधिक तालाब हैं, जिनका निर्माण इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में उस समय के शासकों ने कराया। हराही, दिग्घी और गंगासागर तालाब का निर्माण दरभंगा के यशस्‍वी नरेश गंग सिंह देव ने करवाया था।  उनके वंश ने करीब 350 वर्षों तक मिथिलांचल पर शासन किया और इस दौरान पूरे इलाके में दर्ज़नों तालाबों का निर्माण कराया। इन तालाबों ने आज भी अपने निर्माता का नाम और उनसे जुड़ी कहानियों को जीवित रखा हुआ है। गंग सिंह देव का तालाब ही अब गंगा सागर के नाम से जाना जाता है, हराही ('हड्डियों वाला') को यह नाम इसलिए मिला क्योंकि खुदाई के दौरान वहां एक पुराना कंकाल मिला था। 

29 तालाबों के सुंदीकरण की थी नगर निगम की योजना 

दरभंगा नगर निगम ने पिछले साल शहर के 29 तालाबों के सुंदरीकरण की योजना बनाई थी। प्रत्‍येक तालाब के लिए 25 लाख रुपये का बजट तय किया था। इसकी टेंडर प्रक्रिया 10 जून 2025 को शुरू हुई थी। इन 29 तालाबों में दामोदरी पोखर, राजकुमारगंज पोखर, कंकालनी मंदिर पोखर, छठी पोखर और कई अन्य प्रमुख तालाब शामिल थे। जिन तालाबों का उद्धार होना था, उसमें दामोदरी पोखर, राजकुमारगंज पोखर, कंकालनी मंदिर पोखर, छठी पोखर, आजमनगर शिक्षक कॉलोनी में कटहल बन्नी पोखर, बेला दुल्ला पोखर, भवाईया पोखर, नवटोलिया पोखर, राजा रामधनी पोखर, दुर्गा मंदिर के पास स्थित पोखर, मिर्जापुर के नवरत्न मंदिर तालाब, चुना भट्टी पोखर, धर्मपुर पोखर, हनुमानगंज प्रोफेसर कॉलोनी स्थित बालू पोखर, सुभाष चौक से आयकर चौराहा के बीच एमआरएम कॉलेज में स्थित तालाब, लाल बाग के जटियारी पोखर, हरि बोल तालाब, राधा कृष्ण समिति के वृंदावन घाट, बॉयज हॉस्टल के निकट पोखर, मिर्जा खान तालाब, कचहरी पोखर, बंगाली टोला में महंत जी पोखर, पोखरिया पोखर, लक्ष्मीपुर पोखर, राम जानकी मंदिर पोखरा, राय साहब पोखर, राम जानकी मंदिर पोखरा, शामिल थे। 

बारिश में पानी से लबालब भरे तालाब साल के बाकी महीनों में खेती और पीने के पानी के लिए लोगों का सहारा बनते हैं। दरभंगा के बहुरा बुजुर्ग गांव का यह तालाब इसी का एक बेहतरीन उदाहरण है। 

रातोरात 'चोरी' हो गया था तालाब

करीब दो साल पहले दरभंगा में रातोरात एक तालाब चोरी होने का चौंकाने वाला मामला भी सामने आ चुका है।  दरभंगा के विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र के वार्ड नंबर 4 में स्थित नीम पोखर नाम से जाने जानेवाले करीब 36 डिसमिल के सार्वजनिक तालाब के एक बड़े हिस्‍से को रातोरात मिट्टी से भर दिया गया। तालाब पर कब्‍जा जमाने वाले भूमाफियाओं ने रात में ही वहां एक बांस की झोपड़ी और बांस की बाड़ भी खड़ी कर दी गई। ऐसा यह आभास देने के लिए किया गया कि यह किसी की रिहायशी  जमीन है। दरअसल, पहले इस तालाब का इस्तेमाल स्थानीय मछुआरे मछली पकड़ने और सिंघाड़ा और मखाने उगाने के लिए करते थे। बाद में प्रदूषण के कारण इसमें मछलियां खत्‍म होने पर कई वर्षों से इसका इस्तेमाल नहीं हो रहा था। सरकार द्वारा इसके व्यावसायिक उपयोग के लिए कोई निविदा भी जारी नहीं की गई थी। इसका फायदा उठाते हुए भूमाफियाओं ने इस तालाब को मिट्टी से पाटकर इसकी ज़मीन को बेचने की योजना बना डाली, जिसे रात के अंधेरे में अंजाम दिया गया। दरभंगा के तत्‍कालीन जिलाधिकारी राजीव रौशन ने इस मामले में बताया था कि इस घटना की सूचना मिलने के बाद उन्होंने स्थानीय सर्कल अधिकारी से पूछे जाने पर पता चला था कि इसके स्वामित्व को लेकर पटना उच्च न्यायालय में एक मुकदमा चल रहा था। इस बीच भूमाफिया ने तालाब पर अतिक्रमण किया और उसे मिट्टी और कचरे से भर दिया ताकि वह गायब हो जाए। उन्‍होंने मामले का संज्ञान लेते हुए तालाब को भरकर स्वरूप बदलने की सूचना पर उन्होंने पूर्व की स्थिति बहाल करने का आदेश दिया। साथ ही जमीन की जमाबंदी तत्काल रद्द करने का आदेश भी दिया गया।

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