चंडीगढ़ की लाइफलाइन कही जाने वाली सुखना लेक का जल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे झील के सूखने का खतरा पैदा हो गया है।
स्रोत : विकी कॉमंस
चंडीगढ़ की लाइफलाइन सुखना लेक के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जलस्तर इतना कम हो गया है कि रेगुलेटरी एंड पर फ्लड गेट वाले हिस्से की लेक में एक बूंद पानी भी नहीं बचा। बड़ी-बड़ी दरारें सतह पर उभर आई हैं। मुख्य लेक में भी पानी पांच से सात फिट तक कम हो चुका है। इस हिस्से में भी किनारे नजर आने लगे हैं।
सुखना झील के सूखने को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अधिकारियों को फटकार लगाने के बाद पर्यावरण विशेषज्ञों ने झील चिंता जताते हुए झील के संरक्षण के लिए तत्काल कार्रवाई शुरू करने का आह्वान किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तो गर्मी की शुरुआत ही हुई है। अप्रैल मई में जब पारा 50 डिग्री सेल्सियस पहुंचेगा तब क्या हाल होगा। वाष्पीकरण के कारण लेक का पानी ज्यादा तेजी से उड़ता है।
सुखना झील के सूखने के पीछे कई प्राकृतिक और मानवजनित कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे बड़ा कारण बढ़ती गर्मी है, जिससे वाष्पीकरण की दर तेज हो जाती है और पानी तेजी से कम होता है। हाल के वर्षों में हीटवेव के कारण झील का जल स्तर लगातार गिरता देखा गया है।
दूसरी बड़ी समस्या गाद (सिल्टेशन) है। शिवालिक पहाड़ियों से आने वाली मिट्टी झील में जमा होकर इसकी गहराई को लगातार कम कर रही है, जिससे जल भंडारण क्षमता घटती जा रही है। इसके अलावा, झील पूरी तरह वर्षा-आधारित है, इसलिए कम बारिश या अनियमित मानसून का सीधा असर इसके जल स्तर पर पड़ता है। साथ ही, कैचमेंट एरिया में अवैध निर्माण और पर्यावरणीय लापरवाही ने भी स्थिति को और खराब किया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता जताते हुए प्रशासनिक विफलताओं और निर्माण गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया है। इन सभी कारणों के संयुक्त प्रभाव से सुखना झील का जल स्तर तेजी से गिर रहा है।
आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH) से जुड़े शोध अध्ययन के अनुसान अत्यधिक गर्मी और वाष्पीकरण के कारण प्रतिदिन लगभग आइ मिलीमीटर पानी कम हो जाता है। यह हाल तब है जब वर्ष 2025 के मानसून सीजन में लेक का पानी खतरे के निशान से ऊपर पहुंचने पर कई बार फ्लड गेट खोलने पड़े थे। समुद्र तल की गहराई से नापने पर 1163 फीट से ऊपर होते ही लेक के फ्लड गेट खोलने पड़ते हैं। महज छह महीने में ही लेक का जलस्तर सात से आठ फिट तक गिर चुका है।
स्टडी में यह पाया गया है कि तापमान, हवा की गति और आर्द्रता जैसे मौसमी कारकों का पानी के वाष्पीकरण पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इस अध्ययन में 1987-2018 के बीच के डेटा का विश्लेषण कर “पैन एवापोरेशन” (खुले जल सतह से वाष्पीकरण) को मापा गया। शोध के अनुसार, गर्मी बढ़ने और शुष्क परिस्थितियों में पानी तेजी से वाष्पित होता है, जिससे जलाशयों, तालाबों और नहरों में प्रतिदिन पानी की मात्रा घटती है। वाष्पीकरण की दर आमतौर पर मिलीमीटर प्रतिदिन (mm/day) में मापी जाती है और कई क्षेत्रों में यह कुछ मिलीमीटर प्रतिदिन तक हो सकती है, जो लंबे समय में बड़े जल नुकसान में बदल जाती है। यह स्टडी खास तौर पर जल प्रबंधन, सिंचाई योजना और जल संकट के आकलन में महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह बताती है कि जल की कमी सिर्फ उपयोग से नहीं, बल्कि वायुमंडलीय प्रक्रियाओं से भी बढ़ रही है।
झील के कई इलाकों में पानी इतना घट गया है कि सतह दिखाई देने लगी है। कई जगह सतह के सूखने से उसमें दरारें पड़ गई हैं।
सुखना कोई प्राकृतिक झील नहीं है। इसे 1958 में शिवालिक की पहाड़ियों के पानी को रोकने के लिए बनाया गया था। शिवालिक की पहाड़ियों से गुजरने वाले सुखना चो नाले के पानी को बांध बनाकर रोका गया था। बाद में झील की जल भंडारण क्षमता को बढ़ाने के लिए लेक का एरिया बढ़ाया गया था। इस तरह सुखना झील के लिए मुख्य जल स्रोत सुखना चो नाले का पानी और बारिश का का पानी यानी रेन वाटर ही है। शिवालिक की पहाड़ियों से होकर चो नाले का पानी लेक में पहुंचता है, जिसमें हाल के वर्षों में कमी आई है। इस कारण लेक का स्तर 2015-2016 में काफी गया था। उस दौरान लेक के बीचों बीच बड़ा हिस्सा सूख गया था और पर्यटक झील के बीच स्थित एक द्वीप की तरह इसकी सैर तक करने लगे थे।
सुखना लेक में गाद (सिल्ट) जमा होने की समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि यह दशकों से लगातार बढ़ती रही है। शिवालिक की पहाड़ियों से आने वाला वर्षा जल अपने साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी और महीन कण बहाकर लेक तक पहुंचाता है। समय के साथ यह गाद लेक की तलहटी में जमा होती गई, लेकिन नियमित रूप से इसकी सफाई या ड्रेजिंग नहीं की गई। परिणामस्वरूप, लेक की जल भंडारण क्षमता लगातार घटती चली गई और आज यह अपनी मूल क्षमता के आधे से भी कम रह गई है।
लेक में शिवालिक की पहाड़ियों से पानी के साथ मिट्टी भी बहकर पहुंचने वाली गाद लेक की तलहटी में जमा होती गई। इसे कभी निकाला ही नहीं गया। यही वजह है कि लेक में जल भंडारण की क्षमता आधी भी नहीं रही। इस कारण लेक जल्दी भरती और सूखती है। कई बार कोर्ट तक ने गाद निकालने के लिए आदेश दिए। लेकिन प्रशासन के स्तर पर इसका निर्णय नहीं लिया जा सका। इसका सीधा असर लेक के जल संतुलन पर पड़ा है। बरसात के दौरान यह जल्दी भर जाती है, जबकि गर्मियों में उतनी ही तेजी से सूखने लगती है। इससे न केवल पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होता है, बल्कि पर्यटन और स्थानीय जल प्रबंधन पर भी असर पड़ता है। कई बार न्यायालय ने गाद हटाने के निर्देश दिए, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर ठोस और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए जा सके।
सुखना झील की दुर्दशा और निरंतर घटते जलस्तर पर चिंता जताते हुए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा से संबंधित चल रहे मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। झील के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध निर्माण और पर्यावरण क्षरण पर सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सख्त नाराज़गी जताते हुए कहा, "सुखना झील, और कितना सुखाओगे? यह विनाश के कगार पर है। चंडीगढ़ में नौकरशाहों और पंजाब में कुछ राजनीतिक दलों की मिलीभगत से अवैध निर्माण हो रहे हैं और झील पूरी तरह से विनाश के कगार पर है। बिल्डर माफियाओं ने नौकरशाहों के साथ मिलीभगत करके इसे पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया है।"
सुखना झील के सूखने की ओर ध्यान दिलाते हुए अदालत ने आगे कहा, “कानून बिल्कुल स्पष्ट है। कमी सिर्फ जवाबदेही की है। न्याय और संविधान में ऐसे मामलों से निपटने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों को उन अधिकारियों की पहचान करनी चाहिए जो प्रदूषण के दौर में प्रभारी थे और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। जब किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता, तो उल्लंघन आम बात हो जाती है। कारण चाहे जो भी हो, सबसे पहली बात तो झील की रक्षा करना है। नौकरशाही की उलझनों में पड़ने और एक-दूसरे पर दोष मढ़ने से पारिस्थितिकी तंत्र ही बाधित होता है।”
सुखना झील के कैचमेंट एरिया की सुरक्षा एक अहम सवाल बना हुआ है। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसे लेकर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इस इलाके में हुए अवैध निर्माणों को गिराने का आदेश दिया था। नवंबर 2024 में भी न्यायालय ने इस बारे में पंजाब सरकार, चंडीगढ़ प्रशासन और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। इसके बाद पंजाब सरकार ने कोर्ट में अपनी अनुपालन हलफनामा पेश किया था, जिसमें कहा गया था कि 100 मीटर इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) पर्याप्त नहीं है और इसे बढ़ाकर 1 से 3 किलोमीटर किया जाएगा, जिसका अंतिम अनुमोदन मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाएगा। साथ ही हलफनामे में स्पष्ट किया गया कि ESZ के भीतर कोई भी स्थायी निर्माण नहीं होगा। आधे किलोमीटर (500 मीटर) के दायरे में कोई कॉमर्शियल निर्माण नहीं होगा। झील के 0.5 से 1.25 किलोमीटर के इलाके में केवल कम ऊंचाई की इमारतें (15 फीट तक) बन सकती हैं। सुखना झील से 1.25 किलोमीटर से अधिक दूरी में नए आवासीय और अन्य भवनों का निर्माण अनुमति प्राप्त है।
झील के जलस्तर में कमी आने से आने वाले दिनों में इसमें बोटिंग करना बंद हो सकता है।
सुखना झील और इसका जलग्रहण क्षेत्र चंडीगढ़ के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन इसका पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) पंजाब और हरियाणा तक फैला हुआ है । इससे झील की सुरक्षा की जिम्मेदारी दो राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश पर आ जाती है। जिम्मेदारियों का यह बिखराव भी झील की बदहाली की एक वजह है। यह मुख्य रूप से अपने जलग्रहण क्षेत्र से मौसमी जल प्रवाह पर निर्भर करती है और झील वर्षा जल से पोषित है। इस तरह कोई सतत और बड़ा जल स्रोत न होना झील के अस्तित्व को लेकर कई बार अनिश्चितता पैदा कर देता है।
इसके अलावा झील के कुछ इलाकों पर अवैध कब्जों से भी इसका दायरा घटता जा रहा है, क्योंकि जब किसी झील पर अतिक्रमण हो जाता है और आम लोग इसमें शामिल होते हैं, तो नुकसान की भरपाई करना और भी मुश्किल हो जाता है । ऐसे में सुखना झील को अतिक्रमण मुक्त करने की प्रक्रिया में देरी किए जाने पर, तो नुकसान और भी गहरा हो सकता है।
शहरी झीलों के संरक्षण पर एक दशक से अधिक समय से काम कर रही हैदराबाद की पर्यावरण कार्यकर्ता और अधिवक्ता लुबना सरवत का सुझाव है कि यदि झील में पानी के प्रवाह के चैनलों को बिना किसी रुकावट के छोड़ दिया जाए, तो झील सूखेगी नहीं। उन्होंने कहा कि वर्षा के आधार पर जलस्तर स्वाभाविक रूप से घटता-बढ़ता रहता है, लेकिन पूर्ण जलस्तर (एफटीएल) और जलग्रहण क्षेत्र की सीमाएं नहीं बदलती हैं। गर्मियों में जब पानी कम हो जाता है, तब निर्माण कार्य करना वैज्ञानिक और कानूनी रूप से गलत है।"
उन्होंने हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2001 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के अंतर्गत जल निकायों की रक्षा करना सरकारों और राजस्व अधिकारियों का कर्तव्य है। फैसले में तालाबों, झीलों, जंगलों और अन्य सार्वजनिक संसाधनों को प्रकृति का वरदान बताया गया था जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं और अधिकारियों को गैर-आबादी भूमि में आवंटन की अनुमति न देने की चेतावनी दी गई थी।
सुखना झील का पारिस्थितिक तंत्र एक संवेदनशील और संतुलित जल-आधारित प्रणाली है, जो आसपास के पर्यावरण और जैव विविधता को सहारा देता है। यह झील शिवालिक पहाड़ियों से आने वाले वर्षा जल पर निर्भर करती है, जिससे इसमें पोषक तत्वों का प्रवाह बना रहता है। झील में मछलियों, जलीय पौधों और सूक्ष्म जीवों की विविधता पाई जाती है, जो एक स्वस्थ एक्वाटिक इकोसिस्टम का संकेत है।
सर्दियों में यहां प्रवासी पक्षियों का आगमन इसे और भी समृद्ध बनाता है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण बर्ड हैबिटेट के रूप में उभरती है। हालांकि, बढ़ती गाद, शहरी प्रदूषण और मानव गतिविधियों का दबाव इसके पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। जल स्तर में उतार-चढ़ाव और पोषक तत्वों की अधिकता से यूट्रोफिकेशन जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं। इसलिए, झील के संरक्षण के लिए कैचमेंट एरिया प्रबंधन, गाद हटाने और प्रदूषण नियंत्रण जैसे उपाय बेहद आवश्यक हैं।
अपनी खूबसूरती और बोटिंग जैसी सुविधाओं के चलते सुखना लेक वर्षों से चंडीगढ़ वासियों और और अन्य पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है।
सुखना झील एक मानव-निर्मित झील है, जिसे 1958 में बनाया गया था।
इसका निर्माण Le Corbusier और P. L. Verma की योजना के तहत हुआ था।
यह झील शिवालिक पहाड़ियों से आने वाले वर्षा जल पर निर्भर करती है—कोई स्थायी नदी इसमें नहीं गिरती।
सर्दियों में यहां साइबेरिया और मध्य एशिया से आने वाले प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में देखे जाते हैं।
यह चंडीगढ़ का प्रमुख पर्यटन स्थल है, जहां बोटिंग, वॉकिंग और लेजर एक्टिविटीज होती हैं।
गाद (सिल्ट) जमने के कारण इसकी जल भंडारण क्षमता लगातार घटती जा रही है। यह एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती है।
झील को बचाने के लिए कई बार कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और संरक्षण के आदेश दिए हैं।
सुबह-शाम का दृश्य यहां बेहद आकर्षक होता है, इसलिए इसे “City’s Lifeline” भी कहा जाता है।
इस झील के कैचमेंट एरिया में निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाई गई है, ताकि मिट्टी का बहाव (सिल्टेशन) कम किया जा सके और झील की उम्र बढ़ाई जा सके।
Sukhna Lake Marathon और अन्य फिटनेस इवेंट्स के कारण यह जगह हेल्थ और वेलनेस एक्टिविटीज का भी प्रमुख केंद्र बन चुकी है।
चंडीगढ़ की लाइफलाइन कही जाने वाली सुखना झील का इस तरह तेजी से सूखना केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि शहरी जल प्रबंधन और पर्यावरणीय उपेक्षा की गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते गाद हटाने (ड्रेजिंग), कैचमेंट एरिया में वनीकरण और अवैध निर्माण पर सख्ती, वर्षा जल संचयन तथा झील में अतिरिक्त जल पहुंचाने जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले महीनों में स्थिति और भयावह हो सकती है। साथ ही झील में गिरने वाले अनट्रीटेज सीवेज यानी अनुपचारित अपशिष्ट जल के शोधन और पुन: उपयोग से भी झील को सहारा दिया जा सकता है। यदि समय रहते गाद हटाने, कैचमेंट एरिया के संरक्षण और जल पुनर्भरण जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले महीनों में स्थिति और भयावह हो सकती है। यह जरूरी है कि प्रशासन, विशेषज्ञ और आम नागरिक मिलकर इस झील को बचाने के लिए ठोस पहल करें, ताकि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवित और संरक्षित रह सके।
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