फ़ोटो - विकिकॉमन्स
जलीय चक्र (Hydrologic Cycle), जिसे जल चक्र भी कहा जाता है, पृथ्वी पर जल के निरंतर संचरण की प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में जल महासागरों, नदियों, झीलों, मिट्टी, हिमनदों और वायुमंडल के बीच लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर संचरित होता रहता है। यह चक्र सूर्य की ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा संचालित होता है तथा पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जल चक्र के कारण ही पृथ्वी पर वर्षा होती है, नदियां बहती हैं, भूजल का पुनर्भरण होता है और पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा मनुष्यों को जल उपलब्ध होता है।
जलीय चक्र वह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें जल वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा, सतही प्रवाह, अंतःस्रवण तथा वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से लगातार पृथ्वी और वायुमंडल के बीच घूमता रहता है। पृथ्वी पर जल का महासागर से वायुमंडल और फिर वर्षा के रूप में वापस पृथ्वी पर आने का निरंतर प्राकृतिक चक्र जलीय चक्र कहलाता है।
वाष्पीकरण - जलीय चक्र की शुरुआत सूर्य की गर्मी से होती है। सूर्य की ऊर्जा के कारण महासागरों, नदियों, झीलों और अन्य जल स्रोतों का पानी गर्म होकर जलवाष्प में बदल जाता है। इस प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताओ में यह महासागर सबसे बड़ा स्रोत हैं। तापमान बढ़ने पर वाष्पीकरण अधिक होता है। हवा की गति और आर्द्रता भी इसे प्रभावित करती है।
वाष्पोत्सर्जन - पेड़-पौधे अपनी पत्तियों के माध्यम से जलवाष्प छोड़ते हैं। इस प्रक्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहा जाता है। वनों वाले क्षेत्रों में वाष्पोत्सर्जन वर्षा चक्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वाष्पोत्सर्जन + वाष्पीकरण = वाष्पोत्सर्जन-समेकन - जब वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ होती हैं, तो इसे Evapotranspiration कहा जाता है। यह जलवायु विज्ञान में अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।
संघनन (Condensation)- जलवाष्प ऊपर उठकर ठंडी हो जाती है और छोटे-छोटे जल कणों में बदल जाती है। इन्हीं जल कणों से बादल बनते हैं। इसे संघनन कहते हैं।
वर्षा (Precipitation)- जब बादलों में जल कण अधिक भारी हो जाते हैं, तब वे वर्षा, हिमपात, ओलावृष्टि या बूंदाबांदी के रूप में पृथ्वी पर गिरते हैं। वर्षा जल चक्र का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
सतही प्रवाह (Surface Runoff) - वर्षा का जो जल भूमि में नहीं समाता, वह नदियों, झीलों और अंततः महासागरों की ओर बह जाता है। इसे सतही प्रवाह कहते हैं।
अंतःस्रवण (Infiltration)- वर्षा का कुछ जल मिट्टी के भीतर समा जाता है। यह प्रक्रिया अंतःस्रवण कहलाती है। इसी से भूजल का पुनर्भरण होता है।
भूजल प्रवाह (Groundwater Flow)- भूमि के भीतर संचित जल धीरे-धीरे नदियों, झीलों या समुद्र तक पहुँचता है। इस प्रक्रिया से जल चक्र पूरा होता है।
महासागर
समुद्र
नदियाँ
झीलें
तालाब
हिमनद
भूजल
मिट्टी
वनस्पति
पृथ्वी पर जीवन बनाए रखता है। सभी जीव-जंतुओं और पौधों के लिए जल उपलब्ध कराता है।
वर्षा का जल मिट्टी में जाकर जलभृतों को पुनः भरता है।
जलवायु को नियंत्रित करता है। जल चक्र पृथ्वी के तापमान और मौसम को संतुलित रखने में मदद करता है।
कृषि के लिए आवश्यक है । फसलों की सिंचाई और मिट्टी की नमी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
नदियों का प्रवाह बनाए रखता है। वर्षा और भूजल दोनों मिलकर नदियों को जल प्रदान करते हैं।
मिट्टी से होकर गुजरने वाला जल प्राकृतिक रूप से काफी हद तक शुद्ध हो जाता है।
सूर्य का ताप
तापमान
वायु की गति
आर्द्रता
स्थलाकृति
वनस्पति
महासागरीय धाराएँ
जलवायु परिवर्तन
आज जलवायु परिवर्तन जलीय चक्र को तेजी से प्रभावित कर रहा है। इसके प्रमुख प्रभावो में अनियमित वर्षा, अत्यधिक वर्षा की घटनायें, लंबे सूखे, ग्लेशियरों का पिघलना, भूजल स्तर में गिरावट, बाढ़ की बढ़ती घटनायें, मानसून के स्वरूप में बदलाव शामिल है।
IPCC की रिपोर्टों के अनुसार, बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण जल चक्र अधिक तीव्र हो रहा है, जिससे कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और कुछ में गंभीर जल संकट देखने को मिल रहा है।
भारत की अधिकांश कृषि मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है।
जलीय चक्र
मानसून को प्रभावित करता है।
जलाशयों को भरता है।
भूजल पुनर्भरण करता है।
पेयजल उपलब्ध कराता है।
सिंचाई व्यवस्था को बनाए रखता है।
वर्षा जल संचयन
जलग्रहण क्षेत्र विकास
वनों का संरक्षण
भूजल का सतत उपयोग
नदियों और झीलों का संरक्षण
जल प्रदूषण पर नियंत्रण
जलवायु परिवर्तन को कम करने के प्रयास
जलीय चक्र पृथ्वी की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रियाओं में से एक है। यह महासागरों, नदियों, झीलों, मिट्टी, वनस्पतियों और वायुमंडल के बीच जल का निरंतर संचरण सुनिश्चित करता है। इसी चक्र के कारण वर्षा होती है, भूजल का पुनर्भरण होता है और जीवन के लिए आवश्यक जल उपलब्ध रहता है।
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और अनियोजित शहरीकरण इस प्राकृतिक चक्र को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, वन संरक्षण और सतत जल प्रबंधन को बढ़ावा देना आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
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