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जलागम, जलग्रहण क्षेत्र, अपवाह क्षेत्र क्या है? परिभाषा और महत्व

Author : इंडिया वाटर पोर्टल

जलागम (Watershed), जिसे जलग्रहण क्षेत्र या अपवाह क्षेत्र भी कहा जाता है, पृथ्वी की सतह का वह प्राकृतिक क्षेत्र है जहां गिरने वाला वर्षा जल, हिमपात का पिघला जल या अन्य स्रोतों का जल एक ही नदी, नाले, झील, जलाशय या जल निकाय की ओर प्रवाहित होता है।

सरल शब्दों में, जिस क्षेत्र का सारा पानी एक ही जल स्रोत में एकत्र होता है, उसे जलागम क्षेत्र कहा जाता है।

जलागम की परिभाषा

जलागम वह भौगोलिक क्षेत्र है, जिसकी सीमाओं के भीतर गिरने वाला समस्त वर्षाजल प्राकृतिक ढाल के कारण किसी एक सामान्य निकास बिंदु, नदी, झील या जलाशय की ओर प्रवाहित होता है।

जलागम के उदाहरण

कुछ प्रमुख जलागम क्षेत्रों के उदाहरण -

  • गंगा नदी जलागम क्षेत्र - भारत का सबसे बड़ा नदी बेसिन।

  • नर्मदा नदी जलागम क्षेत्र - मध्य भारत का महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र।

  • गोदावरी नदी बेसिन - दक्षिण भारत का प्रमुख अपवाह क्षेत्र।

  • ताप्ती नदी जलागम क्षेत्र -  मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में फैला हुआ क्षेत्र।

  • चंबल नदी जलागम क्षेत्र  -  राजस्थान और मध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र।

जलागम के प्रमुख घटक

एक जलागम क्षेत्र में सामान्यतः निम्नलिखित घटक शामिल होते है -

  1. वर्षा (Rainfall)

  2. नदी एवं नाले (Streams and Rivers)

  3. भूजल (Groundwater)

  4. वनस्पति एवं वन क्षेत्र

  5. मिट्टी और स्थलाकृति

  6. जल निकास बिंदु (Outlet)

जलागम का महत्व

जलागम क्षेत्र जल संसाधन प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1. जल संरक्षण में सहायक - जलागम विकास के माध्यम से वर्षा जल को संरक्षित किया जा सकता है तथा भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) बढ़ाया जा सकता है।

2. मृदा संरक्षण - जलागम प्रबंधन मिट्टी के कटाव को कम करता है और भूमि की उर्वरता बनाए रखने में सहायता करता है।

3. भूजल स्तर में सुधार - चेक डैम, खेत तालाब और कंटूर ट्रेंच जैसी संरचनाओं से भूजल स्तर बढ़ता है।

4. कृषि उत्पादकता में वृद्धि - मिट्टी में नमी बढ़ने से सिंचाई की उपलब्धता सुधरती है और फसलों की पैदावार बढ़ती है।

5. बाढ़ और सूखा प्रबंधन - जलागम क्षेत्र का वैज्ञानिक प्रबंधन बाढ़ के जोखिम को कम करने और सूखे के प्रभाव को घटाने में मदद करता है।

6. जैव विविधता संरक्षण - वनों, घासभूमियों और जल स्रोतों के संरक्षण से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होता है।

जलागम को प्रभावित करने वाले कारक

1. वर्षा की मात्रा - अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल प्रवाह अधिक होता है।

2. स्थलाकृति (Topography) - पर्वतीय क्षेत्रों में जल तेजी से बहता है, जबकि समतल क्षेत्रों में धीरे-धीरे प्रवाहित होता है।

3. मिट्टी का प्रकार - रेतीली मिट्टी जल को अधिक अवशोषित करती है, जबकि चिकनी मिट्टी में सतही अपवाह अधिक होता है।

4. वनस्पति आवरण - घने वन जल को रोकने और भूमि में समाहित करने में मदद करते हैं।

5. मानव गतिविधियां - वनों की कटाई, शहरीकरण और अनियोजित निर्माण जलागम की प्राकृतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं।

जलागम प्रबंधन 

जलागम प्रबंधन का उद्देश्य वर्षा जल का संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, मिट्टी संरक्षण और जल संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित करना है।

इसके अंतर्गत निम्नलिखित गतिविधियां की जाती है -

  • चेक डैम निर्माण

  • खेत तालाब निर्माण

  • कंटूर बंडिंग

  • वनीकरण

  • वर्षा जल संचयन

  • नाला उपचार

  • चारागाह विकास

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन में भूमिका

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी समस्याओं से निपटने में जलागम प्रबंधन एक प्रभावी उपाय माना जाता है। यह जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जलागम के उपयोग

  • जल संरक्षण

  • भूजल पुनर्भरण

  • सिंचाई प्रबंधन

  • मृदा संरक्षण

  • बाढ़ नियंत्रण

  • सूखा प्रबंधन

  • ग्रामीण विकास

  • पर्यावरण संरक्षण

जलागम या जलग्रहण क्षेत्र पृथ्वी की प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली का एक महत्वपूर्ण भाग है। यह वर्षा जल के संग्रहण, भूजल पुनर्भरण, मृदा संरक्षण और जल संसाधनों के सतत प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वर्तमान समय में जल संकट, सूखा और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच जलागम प्रबंधन सतत विकास और जल सुरक्षा की दिशा में एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहा है।

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