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वृष्टि छाया प्रदेश (Rain Shadow Area) क्या है ? कारण, विशेषताएं और भारत के प्रमुख उदाहरण

Author : इंडिया वाटर पोर्टल

वृष्टि छाया प्रदेश (Rain Shadow Area) वह क्षेत्र होता है जहाँ पर्वतों के कारण वर्षा बहुत कम होती है। जब समुद्र से आने वाली नम हवायें  पर्वतों से टकराती हैं, तो वे ऊपर उठकर ठंडी हो जाती है और पर्वत के पवनाभिमुख (Windward) भाग में वर्षा कर देती है।

 वर्षा के बाद हवा में नमी कम हो जाती है। यही शुष्क हवा जब पर्वत के दूसरी ओर विमुख भाग में उतरती है, तो उसका तापमान बढ़ जाता है और वह वर्षा नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप पर्वत के पीछे स्थित क्षेत्र शुष्क या अर्ध-शुष्क बन जाता है, जिसे वृष्टि छाया प्रदेश कहा जाता है।

जलवायु विज्ञान और भूगोल में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है क्योंकि यह किसी क्षेत्र की जलवायु, कृषि, वनस्पति, जल संसाधनों और मानव जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।

वृष्टि छाया प्रदेश क्या है?

वृष्टि छाया प्रदेश वह भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ पर्वतों द्वारा वर्षा करने वाली हवाओं को रोक दिए जाने के कारण सामान्य से बहुत कम वर्षा होती है। यह क्षेत्र पर्वतों के लीवार्ड (Leeward) अर्थात् पीछे की ढाल पर स्थित होता है।

पर्वत के पीछे स्थित वह शुष्क क्षेत्र जहां नम हवायें वर्षा करने के बाद नमी खो देती है, वृष्टि छाया प्रदेश कहलाता है।”

वृष्टि छाया प्रदेश बनने की प्रक्रिया

वृष्टि छाया बनने की प्रक्रिया को निम्न चरणों में समझा जा सकता है -

  • समुद्र से नम हवाएं भूमि की ओर चलती हैं।

  • ये हवाएँ पर्वतों से टकराकर ऊपर उठती हैं।

  • ऊँचाई पर पहुँचने पर तापमान कम होने से जलवाष्प संघनित होकर बादलों का निर्माण करती है।

  • पर्वत के पवनाभिमुख भाग में भारी वर्षा होती है।

  • वर्षा के बाद हवाओं में नमी कम हो जाती है।

  • यही शुष्क हवाएँ पर्वत के दूसरी ओर नीचे उतरते समय गर्म हो जाती हैं।

  • गर्म एवं शुष्क हवा वर्षा नहीं कर पाती, जिससे पर्वत के पीछे का क्षेत्र सूखा रह जाता है।

वृष्टि छाया प्रदेश की प्रमुख विशेषताएं

  • वार्षिक वर्षा बहुत कम होती है।

  • जलवायु शुष्क या अर्ध-शुष्क होती है।

  • वनस्पति विरल होती है।

  • जल स्रोत सीमित होते हैं।

  • सिंचाई पर कृषि निर्भर रहती है।

  • तापमान में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है।

  • सूखे की संभावना अधिक रहती है।

  • भूजल स्तर अपेक्षाकृत कम हो सकता है।

भारत में वृष्टि छाया प्रदेश के प्रमुख उदाहरण

1. दक्कन का पठार (Deccan Plateau)

भारत का सबसे प्रसिद्ध वृष्टि छाया क्षेत्र दक्कन का पठार है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की हवाएँ पश्चिमी घाट से टकराकर केरल, कर्नाटक और गोवा में भारी वर्षा करती हैं। इसके बाद यही हवाएँ नमी खोकर पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में पहुँचती हैं।

इस कारण -

  • पुणे

  • सोलापुर

  • अहमदनगर

  • बीड

  • उस्मानाबाद

  • विजयपुर (बीजापुर)

  • अनंतपुर जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है।

2. लद्दाख

हिमालय पर्वत मानसूनी हवाओं को रोक देता है। परिणामस्वरूप लद्दाख भारत के सबसे शुष्क क्षेत्रों में शामिल है। यहाँ कई स्थानों पर वार्षिक वर्षा 100 मिमी से भी कम होती है।

3. स्पीति एवं लाहौल घाटी

हिमाचल प्रदेश की स्पीति और लाहौल घाटियां भी हिमालय की वृष्टि छाया में आती है। यहां शीत मरुस्थलीय परिस्थितियाँ पाई जाती है।

विश्व के प्रमुख वृष्टि छाया प्रदेश

  • अटाकामा मरुस्थल (चिली)

  • पटागोनिया (अर्जेंटीना)

  • ग्रेट बेसिन (अमेरिका)

  • तिब्बती पठार

  • गोबी मरुस्थल (मंगोलिया-चीन)

कृषि पर प्रभाव

कम वर्षा होने के कारण कृषि पूरी तरह वर्षा पर निर्भर नहीं रह सकती।

इन क्षेत्रों में किसान 

  • सूखा सहन करने वाली फसलें उगाते हैं।

  • ड्रिप सिंचाई अपनाते हैं।

  • जल संरक्षण तकनीकों का उपयोग करते हैं।

मुख्य फसलें -

  • ज्वार

  • बाजरा

  • दालें

  • चना

  • कपास

  • मूंगफली

जल संसाधनों पर प्रभाव

वृष्टि छाया क्षेत्रों में -

  • भूजल पुनर्भरण कम होता है।

  • नदियों का प्रवाह सीमित रहता है।

  • तालाब और जलाशय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • वर्षा जल संचयन की आवश्यकता बढ़ जाती है।

जैव विविधता पर प्रभाव

कम वर्षा के कारण यहां की वनस्पति विशेष प्रकार की होती है।

प्रमुख वनस्पतियां 

  • कांटेदार झाड़ियां 

  • सूखा सहन करने वाले पौधे

  • घास के मैदान

  • ज़ेरोफाइटिक (Xerophytic) वनस्पति, जानवर भी शुष्क परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित होते हैं।

जलवायु परिवर्तन और वृष्टि छाया प्रदेश

जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता बढ़ रही है। इससे वृष्टि छाया क्षेत्रों में कई नई चुनौतियां सामने आ रही है 

  • वर्षा में और कमी

  • लंबे सूखे

  • जल संकट

  • भूजल का अत्यधिक दोहन

  • कृषि उत्पादकता में गिरावट

  • गर्मी की तीव्रता में वृद्धि

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इन क्षेत्रों में जल प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल कृषि की आवश्यकता और बढ़ेगी।

समाधान

वृष्टि छाया क्षेत्रों को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए निम्न उपाय महत्वपूर्ण है -

  • वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting)

  • जलग्रहण क्षेत्र विकास (Watershed Development)

  • ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई

  • सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा

  • वनीकरण और पौधारोपण

  • भूजल पुनर्भरण

  • पारंपरिक जल संरक्षण संरचनाओं का पुनर्जीवन

  • जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का उपयोग

भारत में सफल उदाहरण

महाराष्ट्र के कई वृष्टि छाया क्षेत्रों में जलयुक्त शिवार अभियान, पानी फाउंडेशन और विभिन्न वॉटरशेड विकास कार्यक्रमों के माध्यम से जल संरक्षण के सफल प्रयास किए गए है। इन पहलों ने भूजल स्तर बढ़ाने, सिंचाई क्षमता सुधारने और किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

वृष्टि छाया प्रदेश प्रकृति की एक महत्वपूर्ण भौगोलिक घटना है, जो पर्वतों और मानसूनी हवाओं की परस्पर क्रिया से बनती है। इन क्षेत्रों में कम वर्षा के कारण जल संकट, सीमित कृषि और विशिष्ट जैव विविधता देखने को मिलती है।

भारत में दक्कन का पठार, लद्दाख और स्पीति घाटी इसके प्रमुख उदाहरण है। बदलते जलवायु परिदृश्य में इन क्षेत्रों के लिए जल संरक्षण, सतत कृषि, वनीकरण और वैज्ञानिक जल प्रबंधन अत्यंत आवश्यक हो गए है।

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