भारतीय शहरों में पानी का संकट अब केवल पानी की कमी या क़िल्लत तक सीमित नहीं रह गया है। अब इस संकट का संबंध इस पहलू से भी जुड़ चुका है कि उपलब्ध पानी किन लोगों तक पहुंच रहा है और किनके घरों की पाइपलाइन सूखी रह जा रही है।
अक्सर महानगरों में लोगों के सुबह की शुरुआत पानी के मोटर की आवाज़, पाइपलाइन पर लगी टंकियों और पानी के टैंकरों के पीछे क़तारें लगाने से होती है।
दिल्ली, नागपुर, नासिक, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में जल नेटवर्क पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इस दबाव को केवल आबादी या जल स्रोतों की कमी से समझना एक बड़ी भूल हो सकती है। जल वितरण नेटवर्क के भीतर अवैध कनेक्शन, बूस्टर या सक्शन पंप और अनियोजित शहरी विस्तार ऐसी समस्याएं हैं जो पानी की असमानता को तकनीकी रूप से और गहरा बना रही हैं। ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन यानी ORF की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पाइप लाइनों से भेजा जाने वाला जलापूर्ति का लगभग 38 फ़ीसद पानी उपभोक्ताओं तक पहुंचता ही नहीं है।
विश्व बैंक के अनुसार भारत के कई शहरों में लीकेज, चोरी, अवैध कनेक्शन और बिलिंग विफलताओं के कारण गायब होने वाला पानी (Non-Revenue Water) 40 से 70 फ़ीसद तक पहुंच जाता है। सीमित समय की जलापूर्ति इस समस्या को और बढ़ाती है।
भारतीय शहरों की कई कॉलोनियों में बूस्टर मोटर अब जलापूर्ति व्यवस्था का अनौपचारिक हिस्सा बन चुकी है। जिन इलाक़ों में पानी की आपूर्ति का दबाव कम होता जा रहा है, वहां लोग सीधे पाइपलाइन से पानी खींचने के लिए सक्शन पंप लगाते हैं।
लेकिन तकनीकी रूप से यह पूरी वितरण प्रणाली को असंतुलित कर देता है। जल नेटवर्क एक निश्चित प्रेशर पर डिज़ाइन होता है ताकि सभी घरों तक पानी बराबरी से पहुंचे। जैसे ही कुछ घर मोटर लगाकर अतिरिक्त पानी खींचने लगते हैं, आसपास के घरों में दबाव कम हो जाता है।
नई दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (NDMC) ने 2022 में चेतावनी दी थी कि ऑन-लाइन बूस्टर पंप जल नेटवर्क में दूषण, असमान दबाव और सप्लाई बाधित होने का बड़ा कारण बन रहे हैं।
भारतीय शहरों में पानी अब समान रूप से वितरित होने वाला सार्वजनिक संसाधन नहीं रह गया है। जल नेटवर्क के भीतर एक नई तरह की “तकनीकी असमानता” विकसित हो चुकी है।
जब कई लोग एक साथ सक्शन पंप चलाते हैं, तो पाइपलाइन के भीतर का दबाव कम होने लगता है और वैक्यूम जैसी स्थिति बनने लगती है। ऐसी स्थिति में टूटी पाइपलाइन या सीवर लाइन के पास से दूषित पानी सप्लाई नेटवर्क में घुस सकता है।
दिल्ली के जनकपुरी इलाके में सीवर मिले पेयजल के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने दिल्ली जल बोर्ड और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को फटकार लगाई थी। शिकायतों में जर्जर पाइपलाइनों के कारण दूषित पानी की आपूर्ति की बात सामने आई थी।
उसी तरह मई 2026 में नागपुर के गिट्टीखदान इलाके में गंभीर जल संकट की खबर सामने आई। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार अवैध कनेक्शन और दबाव असंतुलन के कारण कई इलाक़ों में दूषित पानी की आपूर्ति हो रही थी।
अधिकारियों ने माना कि स्थानीय विरोध और प्रशासनिक ढिलाई के कारण अवैध पंप हटाने में मुश्किल आ रही है।
नासिक नगर निगम के एक सर्वे के अनुसार शहर में लगभग 5 हज़ार अवैध जल कनेक्शन हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि Non-Revenue Water लगभग 45 फ़ीसद तक पहुंच चुका है।
लोग पानी के लिए लंबी दूरी तय करते हैं और कई बार असुरक्षित पानी खरीदने को मजबूर होते हैं।अंकित राणा, सर्वेयर, ग्रीनपीस इंडिया
भारतीय शहरों में पानी अब समान रूप से वितरित होने वाला सार्वजनिक संसाधन नहीं रह गया है। जल नेटवर्क के भीतर एक नई तरह की “तकनीकी असमानता” विकसित हो चुकी है। जिन घरों और कॉलोनियों के पास बड़ी मोटरें, भूमिगत टैंक, निजी बोरवेल और अतिरिक्त भंडारण क्षमता है, वे नेटवर्क से अधिक पानी खींच लेते हैं। जबकि निम्न-आय वर्ग और अनौपचारिक बस्तियां सीमित, अनियमित और कई बार दूषित जलापूर्ति पर निर्भर रहती हैं।
दिल्ली पर आधारित Infrastructural Violence: Five Axes of Inequities in Water Supply in Delhi नामक शोध के अनुसार पानी की असमानता केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि शहरी अवसंरचना और शासन व्यवस्था के भीतर मौजूद संरचनात्मक भेदभाव का नतीजा है।
अध्ययन के अनुसार दिल्ली की जल व्यवस्था गरीब और अनौपचारिक बस्तियों को व्यवस्थित रूप से कमजोर स्थिति में धकेलती है।
जिन परिवारों के पास आर्थिक क्षमता है, वे बड़ी मोटरें और टैंक लगाकर अधिक पानी जमा कर लेते हैं, जबकि गरीब परिवार सार्वजनिक नलों, टैंकरों या साझा पाइपलाइन पर निर्भर रहते हैं।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) की 24x7 जलापूर्ति पर आधारित तकनीकी मार्गदर्शिका के अनुसार सीमित समय की जलापूर्ति (intermittent water supply) लोगों को भूमिगत टैंक, बूस्टर पंप और निजी जल स्रोतों जैसे महंगे निजी समाधानों की ओर धकेलती है।
2023 के एक अध्ययन के अनुसार अनौपचारिक बस्तियों को नियमित जल नेटवर्क से बाहर रखने की नीति ने पानी को अधिकार के बजाय अनौपचारिक सौदेबाज़ी का विषय बना दिया है।
दिल्ली में हाल ही में ग्रीनपीस इंडिया द्वारा 12 अनौपचारिक बस्तियों में किया गया Water Access Audit भी इसी असमानता को दिखाता है। सर्वे में पाया गया कि 34 फ़ीसद परिवार निजी जल आपूर्तिकर्ताओं से पानी खरीदते हैं, जबकि 29 फ़ीसद लोग दिल्ली जल बोर्ड के टैंकरों पर निर्भर हैं।
कई परिवार अपनी मासिक आय का 15 फ़ीसद तक केवल पानी पर खर्च कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार गर्मियों में लोग घंटों लाइन में लगते हैं, लंबी दूरी तय करते हैं और कई बार असुरक्षित पानी पीने को मजबूर होते हैं।
जल असमानता का एक अन्य चेहरा “टैंकर अर्थव्यवस्था” भी है। दिल्ली पर किए गए एक शोध के अनुसार अनौपचारिक बस्तियों में पानी की आपूर्ति के लिए टैंकर प्रणाली एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था बन चुकी है। इस व्यवस्था के तहत पानी की आपूर्ति का नियंत्रण अक्सर ड्राइवरों और स्थानीय नेटवर्क के हाथ में रहता है।
अध्ययन के अनुसार पानी की आपूर्ति कई बार अनौपचारिक प्रभाव और लाभ (rent-seeking tendencies) के आधार पर तय होती है। इसका असर केवल जल उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक तनाव तक भी पहुंचता है।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संकट केवल पानी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जल व्यवस्था पर घटते भरोसे का भी संकट है।
भारतीय शहरों में जल संकट की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि समस्या व्यापक रूप से दिखाई देती है, लेकिन समाधान अक्सर बिखरे हुए और अस्थायी बने रहते हैं। कई जगह पाइपलाइन मानचित्र अधूरे हैं, लीकेज की निगरानी कमजोर है और पानी के दबाव की वास्तविक समय में मॉनिटरिंग लगभग नहीं होती। ऐसे में यह तक स्पष्ट नहीं पाता कि पानी कहां बह रहा है, कहां चोरी हो रहा है और कहां तक पहुंच ही नहीं पा रहा।
विश्व बैंक के अनुसार भारतीय शहरी जल व्यवस्था बिखरे हुए प्रशासनिक ढांचे (fragmented governance) की समस्या से जूझ रही है, जहां जवाबदेही और समन्वय दोनों कमजोर हैं।
उपलब्ध रिपोर्ट बताते हैं कि दिल्ली में 2024 तक 20,552 अवैध बोरवेल की पहचान की गई थी, लेकिन हज़ारों मामलों में कार्रवाई अब भी लंबित थी। यह दिखाता है कि समस्या केवल कानून की नहीं, बल्कि निगरानी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी है।
हाल के वर्षों में भारतीय शहरों में जल संकट से निपटने के लिए स्मार्ट मीटर, DMA नेटवर्क और 24x7 जलापूर्ति जैसी परियोजनाओं को शहरी जल संकट के समाधान के रूप में पेश किया गया है।
कर्नाटक में विश्व बैंक समर्थित कर्नाटक शहरी जल आपूर्ति आधुनिकीकरण परियोजना इसी दिशा का एक बड़ा उदाहरण है। परियोजना का उद्देश्य विश्वसनीय और समान जलापूर्ति के जरिए लोगों की निजी मोटरों और टैंकरों पर निर्भरता कम करना था।
नागपुर की 24x7 जलापूर्ति परियोजना इसका एक जटिल उदाहरण है। यह देश की शुरुआती बड़ी सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) आधारित जल परियोजनाओं में से एक थी। इसका उद्देश्य था कि शहर में पानी की चोरी कम हो, लीकेज घटे और हर घर तक बराबर दबाव से पानी पहुंचे। लेकिन परियोजना शुरू होने के कई वर्षों बाद भी बड़ी आबादी नियमित और समान जलापूर्ति से वंचित रही।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नागपुर में केवल 2.4 फ़ीसद उपभोक्ताओं को वास्तविक 24x7 जलापूर्ति मिल पा रही थी, जबकि अधिकांश इलाक़े अब भी सीमित समय और कम दबाव वाली जलापूर्ति पर निर्भर थे।
वहीं साल 2018 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि परियोजना शुरू होने के छह साल बाद भी शहर के केवल लगभग 15 फ़ीसद घरों तक ही चौबीसों घंटे पानी पहुंच पाया था, जबकि “non-revenue water” यानी लीकेज, चोरी और अनधिकृत निकासी के कारण होने वाला जल नुकसान लगभग 60 फ़ीसद तक बना हुआ था।
हाल के महीनों में नागपुर के कई इलाक़ों में लोगों ने कम दबाव, दूषित पानी और अनियमित वितरण के खिलाफ प्रदर्शन भी किए। स्थानीय रिपोर्ट बताते हैं कि कई निवासी इस बात से नाराज़ थे कि नई तकनीकी परियोजनाओं के बावजूद उन्हें गर्मियों में कई-कई दिनों तक पानी नहीं मिला।
हालांकि कुछ ऐसी पहलें भी देखने को मिलीं जिन्होंने यह दिखाया कि केवल मशीनें नहीं, बल्कि समुदाय की भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है।
नागपुर नगर निगम और Orange City Water ने जल संवाद नाम से एक अभियान शुरू किया था, जिसमें मोहल्ला बैठकों, स्वयं सहायता समूहों, स्कूल कार्यक्रमों और नागरिक संवाद के जरिए लोगों को जल प्रबंधन प्रक्रिया में शामिल करने की कोशिश की गई।
इस पहल के तहत हज़ारों स्थानीय बैठकें आयोजित की गईं ताकि लोग केवल उपभोक्ता न रहें, बल्कि जल व्यवस्था के साझेदार बनें।
साफ़ और सस्ता पानी कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि बुनियादी आवश्यकता है।वैशाली उपाध्याय, कैम्पेनर, ग्रीन पीस
रिपोर्ट के अनुसार इस अभियान में जल मित्र (Water Friends) जैसे सामुदायिक स्वयंसेवकों का नेटवर्क भी बनाया गया, जो स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण, शिकायतों और जागरूकता में मदद करते थे।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि इसने जल संकट को केवल इंजीनियरिंग समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक भरोसे और नागरिक भागीदारी के प्रश्न के रूप में देखने की कोशिश की।
यानी तकनीक ज़रूरी तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं। पाइपलाइनें बदली जा सकती हैं, सेंसर लगाए जा सकते हैं, लेकिन अगर शहर के भीतर भरोसा, पारदर्शिता और समान वितरण नहीं बनेगा, तो जल संकट बार-बार नए रूप में लौटता रहेगा।
भारतीय शहरों का जल संकट केवल सूखते जल स्रोतों की कहानी नहीं है। यह उस असमान शहरी ढांचे की कहानी भी है जहां पानी तक पहुंच धीरे-धीरे आर्थिक और तकनीकी क्षमता पर निर्भर होती जा रही है।
अवैध कनेक्शन और सक्शन पंप इस संकट के लक्षण भी हैं और कारण भी। वे बताते हैं कि नागरिकों का सार्वजनिक जल व्यवस्था पर भरोसा कमज़ोर हुआ है।
लेकिन जब हर घर नेटवर्क से अधिक पानी खींचने की कोशिश करता है, तो पूरा शहर असमानता और असुरक्षा के एक दुष्चक्र में फंस जाता है।
यही वह बिंदु है जहां पानी का सवाल केवल इंफ्रास्ट्रक्चर का नहीं, बल्कि शहरी न्याय, सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक अधिकार का सवाल बन जाता है।
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