क्या पाइप से आने वाला पानी वास्तव में सुरक्षित है? अगर नहीं, तो इस सुरक्षा का क्या मतलब है?

 

स्रोत: विकी कॉमंस

जल संरक्षण

पंजाब का भूजल आर्सेनिक और फ्लोराइड से दूषित, सुरक्षित पेयजल बन रहा चुनौती

जल जीवन मिशन के तहत पंजाब में लगभग हर ग्रामीण घर तक नल कनेक्शन पहुंच चुका है। लेकिन भूजल में बढ़ते रासायनिक प्रदूषण, कमजोर निगरानी और अस्पष्ट जवाबदेही यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या ‘हर घर नल’ वास्तव में ‘हर घर सुरक्षित जल’ में बदल पाया है।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

पिछले कुछ सालों में भारत के गांवों में नल से सुरक्षित पेयजल पहुंचाने को लेकर एक बड़ी उपलब्धि के रूप में जल जीवन मिशन (जेजेएम) की प्रगति को सराहा गया है। अप्रैल 2023 तक पंजाब के सभी ग्रामीण घरों में नल से पानी की आपूर्ति (फंक्शनल हाउसहोल्ड टैप कनेक्शंस) होने का दावा किया गया और इसे ‘हर घर जल’ की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया गया है। लेकिन नल से पानी पहुंचना और सुरक्षित पानी मिलना, ये दोनों एक ही बात नहीं हैं। और पंजाब में यह फर्क अब नज़र आने लगा है।

लेकिन जब इस ऐतिहासिक कदम के ज़रिए हर घर में पहुंचने वाले पानी की गुणवत्ता को परखा जाता है तो कई तरह के सवाल उठते हैं। जांच के दौरान उठने वाले सवालों में कुछ मुख्य सवाल हैं: क्या पाइप से आने वाला पानी वास्तव में सुरक्षित है? अगर नहीं, तो इस सुरक्षा का क्या मतलब है?

पाइप्ड वाटर कवरेज और वास्तविक जल गुणवत्ता

मीडिया रिपोर्ट और संसद में दिए गए अधिकारिक जवाबों के अनुसार, पंजाब के कई इलाकों में भूजल स्रोतों में रासायनिक प्रदूषण अब भी व्यापक रूप से मौजूद हैं। राज्य की 400 से अधिक ग्रामीण बस्तियों में आर्सेनिक और फ्लोराइड से दूषित पानी की आपूर्ति की पुष्टि की गई है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन प्रदूषकों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव दर्ज किए गए हैं। आर्सेनिक का लंबे समय तक सेवन त्वचा रोग, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है, जबकि फ्लोराइड की अधिक मात्रा दांतों और हड्डियों को नुकसान पहुंचा सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस), दोनों ने इन रसायनों के लिए स्वीकार्य सीमाएं निर्धारित की हैं। इसके बावजूद, पंजाब के कई इलाक़ों में पानी में इन रसायनों की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई है। साल 2025 की केंद्रीय भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार, यूरेनियम जैसे रेडियोएक्टिव तत्व भी जांच सैंपलों में सामान्य से अधिक मात्रा में पाए गए।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) और जल जीवन मिशन के तहत उपलब्ध जल गुणवत्ता आंकड़े इसका संकेत देते हैं कि बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ-साथ स्रोत की गुणवत्ता पर समान स्तर का निवेश नहीं हुआ है।

क्या ग्रामीणों को सच में सुरक्षित पानी मिल रहा है?

सरकारी कवरेज आंकड़े बताते हैं कि नल जल उपलब्धता लगभग सार्वभौमिक हो चुकी है। लेकिन वास्तविक जल गुणवत्ता के संकेतक अक्सर एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। 

जनवरी 2026 तक पंजाब के भूजल में यूरेनियम का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक पाया गया, जहां 32.6 फ़ीसद नमूनों में परमाणु जोखिम का संकेत मिला। कुछ स्थानीय रिपोर्टों का दावा है कि केंद्रीय भूजल बोर्ड की अन्य रिपोर्टों में 62.5 फ़ीसद नमूनों में यूरेनियम का स्तर सुरक्षित सीमा से ऊपर था।

हालांकि इसे सीधे किसी आधिकारिक रिपोर्ट में घोषित नहीं किया गया है, लेकिन मीडिया कवरेज इसी ओर इशारा करती है। इसके अलावा, सरकारी जानकारी के अनुसार राज्य की 257 बस्तियाों में भूजल आर्सेनिक और 119 बस्तियों में फ्लोराइड से दूषित हैं।

ये सभी आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि ‘हर घर नल’ की उपलब्धि और ‘हर घर सुरक्षित जल’ की वास्तविकता के बीच एक नीतिगत अंतर मौजूद है। जब गुणवत्ता संकेतक कवरेज से मेल नहीं खाते, तो जल आपूर्ति की सफलता को केवल कनेक्शन संख्या से मापना भ्रामक हो सकता है।

सरकारी जानकारी के अनुसार पंजाब की 257 बस्तियाों में भूजल आर्सेनिक और 119 बस्तियों में फ्लोराइड से दूषित हैं।

पंजाब का भूजल संकट: जब कृषि, ऊर्जा और जल नीति एक-दूसरे से टकराती हैं

पिछले एक दशक में पंजाब का भूजल संकट गहराता गया है। राज्य में भूजल का अत्यधिक दोहन, रसायनिक खादों/कीटनाशकों का उपयोग और खराब औद्योगिक/घरेलू अपशिष्ट प्रबंधन भूजल को दूषित कर रहा है।

एक पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में भूजल निकासी दर 150 फ़ीसद से भी ऊपर जा चुकी है, जो देश में सबसे ज़्यादा है। इसी रिपोर्ट ने यह भी सामने आया है कि राज्य के नौ जिलों में यूरेनियम, फ्लोराइड, नाइट्रेट और अन्य प्रदूषक सुरक्षित स्तर से ऊपर पाए गए हैं।

वैज्ञानिक समुदाय ने भी स्पष्ट किया है कि “पंजाब अब लगभग 10 मिलियन एकड़-फीट के वार्षिक भूजल गिरावट का सामना कर रहा है”, और इसे जल नीति में सुधार की तत्काल आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।

इसके अलावा, विशेषज्ञ भी लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि पंजाब का धान-गेहूं आधारित कृषि मॉडल, भूजल पर अत्यधिक निर्भरता, मुफ्त या सस्ती बिजली के कारण अनियंत्रित ट्यूबवेल दोहन, और जल संरक्षण पर अपेक्षाकृत कम निवेश ने राज्य को इस गहरे भूजल संकट की ओर धकेला है।

पंजाब में खेती के नाम पर हो रहे अत्यधिक दोहन के कारण बढ़ते भूजल संकट पर चिंता जताते हुए राज्य के पूर्व सिंचाई सचिव के. एस. पन्नू ने मोंगाबे-इंडिया के साथ अपनी बातचीत में कहा, “अगर यह वर्तमान रुख जारी रहा, तो भविष्‍य में पंजाब के पास अपने फसलों की सिंचाई के लिए भूजल नहीं बचेगा। अगर जल स्तर 300 मीटर से नीचे चला गया, तो पानी इतना अधिक दूषित हो जाएगा कि वह सिंचाई के लिए भी अनुपयुक्त हो जाएगा।”

केंद्रीय भूजल बोर्ड, नीति आयोग और विभिन्न अकादमिक अध्ययनों में यह बार-बार रेखांकित किया गया है कि जब तक कृषि-जल नीति, फसल पैटर्न और भूजल प्रबंधन को एक साथ नहीं देखा जाएगा, तब तक जल गुणवत्ता और जल उपलब्धता, दोनों पर दबाव बना रहेगा।

अगर भूजल दोहन का वर्तमान रुख जारी रहा, तो भविष्‍य में पंजाब के पास अपने फसलों की सिंचाई के लिए भूजल नहीं बचेगा। अगर जल स्तर 300 मीटर से नीचे चला गया, तो पानी इतना अधिक दूषित हो जाएगा कि वह सिंचाई के लिए भी अनुपयुक्त हो जाएगा।
के. एस. पन्नू, पूर्व सिंचाई सचिव, पंजाब

फ़रीदकोट का उदाहरण और स्पष्ट ज़मीनी हक़ीक़त

पंजाब का फ़रीदकोट जिला इस संकट की ज़मीनी तस्वीर पेश करता है। इस ज़िले में पानी की गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियां स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं। यह एक कृषि प्रधान इलाका है, जहां की अधिकांश ग्रामीण आबादी भूजल पर निर्भर है। स्थानीय लोगों के अनुसार फ़रीदकोट और उसके आसपास के कई गांवों में भूमिगत पानी में रासायनिक तत्वों की मौजूदगी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को बढ़ा रही है लेकिन समुदाय स्तर पर इसकी नियमित और व्यवस्थित निगरानी की कमी बनी हुई है।

इलाक़े के किसानों का कहना है कि उनके तालाबों और ट्यूबवेल से निकलने वाला पानी पहले अपेक्षाकृत साफ़ हुआ करता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में इसके रंग और स्वाद दोनों में अंतर आया है, जिसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी महसूस किया जा रहा है। हालांकि ये अनुभव स्थानीय स्तर पर व्यापक रूप से साझा किए जाते हैं, लेकिन इनकी व्यवस्थित और नियमित जल गुणवत्ता निगरानी अब भी एक चुनौती बनी हुई है।

निगरानी और जवाबदेही

सरकार का दावा है
कि गुणवत्ता निगरानी डेटा ऑनलाइन उपलब्ध है, और इससे नीति तथा स्थानीय हस्तक्षेप दोनों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

जहां रसायनिक प्रदूषण ज़्यादा है वहां कम्युनिटी वाटर प्यूरिफिकेशन प्लांट्स (सीडब्ल्यूपीपी) और व्यक्तिगत घरेलू स्तर पर शुद्धीकरण समाधान अंतरिम उपाय के रूप में लागू किए गए हैं। इसके साथ ही, सरकार ने फ़ील्ड टेस्ट किट के माध्यम से स्थानीय लोगों को जल गुणवत्ता जांच के लिए भी प्रशिक्षित किया है, ताकि ग्रामीण स्तर पर पानी की जांच की जा सके।

इसके बावजूद कुछ अहम सवाल बार-बार सामने आते हैं। जैसे कि अगर पानी दूषित पाया गया, तो वास्तविक सुधार या उपचार कब और कैसे होता है? और जब सीडब्ल्यूपीपी को अक्सर ‘अंतरिम’ समाधान के रूप में देखा जाता है तो मूल स्रोत और भूजल सुरक्षा पर काम अपेक्षाकृत सीमित क्यों रह जाता है?

सवाल यह भी है कि जल गुणवत्ता खराब पाए जाने पर जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है, क्या यह ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है, ज़िला प्रशासन की, लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) की, या राज्य जल आपूर्ति विभाग की? साथ ही, जब किसी क्षेत्र में पानी असुरक्षित घोषित किया जाता है, तो सुधारात्मक कार्रवाई की स्पष्ट समय सीमा क्या होती है और उसकी निगरानी कौन करता है। ये सभी प्रश्न अब भी अस्पष्ट बने हुए हैं।

सरकार का दावा है कि गुणवत्ता निगरानी डेटा ऑनलाइन उपलब्ध है, और इससे नीति तथा स्थानीय हस्तक्षेप दोनों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

स्वास्थ्य जोखिम केवल भविष्य की समस्या नहीं है

शोध और स्वास्थ्य विश्लेषण बताते हैं कि भूमिगत पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड और यूरेनियम जैसी रसायनिक तत्वों के सेवन से लंबी अवधि की स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कैंसर, गुर्दा/लिवर क्षति, और अन्य बीमारियों का ख़तरा बढ़ता है। साफ़ और रसायनों की संतुलित और स्वीकार्य मात्रा वाला पानी न मिलने पर ग्रामीण परिवारों के सामने यह समस्या केवल एक तकनीकी या आपूर्ति संबंधी चुनौती नहीं रह जाती, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट में बदल जाती है।

भूजल निकालने के लिए हम जितनी गहराई में जाते हैं, हम उतना ही ज्यादा नुकसान नीचे मौजूद एक्विफ़र को पहुंचाते हैं। और इस वजह से जमीन के भीतर मौजूद रासायनिक तत्व पानी में मिल जाते हैं। पंजाब हो या कोई और राज्य, जहां भी बहुत अधिक मात्रा में भूजल निकाला जा रहा है, वहां आर्सेनिक और फ्लोराइड मिलने की शिकायत आती ही आती है।
सुंदरराजन कृष्‍णन - एग्जिक्‍यूटिव डायरेक्टर, इंडिया नेचुरल रिसोर्स इकोनॉमिक्स एंड मैनेजमेंट

इस बारे में इंडिया नेचुरल रिसोर्स इकोनॉमिक्स एंड मैनेजमेंट के एग्जिक्‍यूटिव डायरेक्टर सुंदरराजन कृष्‍णन ने इंडिया वॉटर पोर्टल से बातचीत में कहा कि रासायनिक तत्वों का पानी में मिलना निर्भर करता है कि हम कितनी गहराई से पानी निकाल रहे हैं और कहां निकाल रहे हैं। अगर भूजल कृषि बहुल्य क्षेत्र से निकाल रहे हैं, तो वहां पर नाइट्रेट की मात्रा मिलना आम बात है। दरअसल हरित क्रांति के बाद से पूरे देश भर के खेतों में रासायनिक खाद का इस्‍तेमाल बढ़ा है। इस वजह से वर्षों तक जो रसायन फसलों में इस्‍तेमाल हुए वो मिट्टी में पड़े रहे और धीरे-धीरे जमीन के अंदर जाते रहे। हालांकि ये तत्व ऊपरी सतह पर ही मिलते हैं। वहीं कम गहराई पर मिलने वाले पानी में अक्सर यूरेनियम भी पाया जाता है और ज्यादा गहराई में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे तत्व।

अगर इनसे बचना है तो हमें जमीन के अंदर मौजूद जलभृत यानि एक्विफ़र (Aquifers) को रीचार्ज होने का समय देना चाहिए, न कि उसमें और गहरी ड्रिलिंग करनी चाहिए। ज्‍यादा गहराई पर बोरिंग करने से एक्वीफर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और नीचे मौजूद रासायनिक तत्व पानी में मिलने लगते हैं। और तो और, उसमें पहले की तरह वॉटर रिचार्ज भी नहीं होता है।

लोगों के स्वास्थ्‍य पर पड़ रहे प्रभावों पर सुंदरराजन ने कहा, "देश के लगभग सभी जिलों में ग्राउंड वॉटर टेस्टिंग सरकार द्वारा की जाती है। अगर ऐसी कोई भी रिपोर्ट आती है, तो सबसे पहले स्थानीय लोगों के साथ साझा की जानी चाहिए। ताकि अगर वो भूजल का इस्‍तेमाल पीने या भोजन पकाने में कर रहे हैं तो उसे रोक दें। दूसरी बात अगर आपके क्षेत्र में समय-समय पर ग्राउंटवॉटर की टेस्टिंग नहीं हो रही है, तो गॉंव वालों को पहल करनी चाहिए। अब तो बहुत ही कम दामों में टेस्टिंग किट उपलब्‍ध हैं। अगर गॉंव वाले पानी की टेस्टिंग करवाते हैं और पानी दूषित पाया जाता है तो उसे तुरंत रिपोर्ट करना चाहिए। नियम के अनुसार जिम्मेदार अधिकारियों को दी गई समय सीमा के भीतर ऐक्शन लेना होता है।"

नल से आगे की जल सुरक्षा

पाइप्ड वाटर कनेक्शन का विस्तार निश्चित रूप से भारत की जल आपूर्ति प्रणाली में एक सकारात्मक बदलाव है। लेकिन जल सुरक्षा का अर्थ सिर्फ “नल तक पानी” नहीं रह जाता, जब तक वह पानी स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित न हो।

इसलिए ज़रूरी है कि स्रोत स्तर पर स्थायी संरक्षण उपायों को प्राथमिकता दी जाए, निगरानी प्रणालियों को पारदर्शिता, गति और जवाबदेही की नई कसौटियों पर परखा जाए, और ग्रामीण समुदायों को तकनीकी समर्थन के साथ जल साक्षरता व स्वास्थ्य चेतना से जोड़ा जाए।

पंजाब में पानी की गुणवत्ता की समस्याएं केवल तकनीकी या प्रशासनिक नहीं हैं। वे सामाजिक, पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी नीति प्राथमिकताओं और प्रशासनिक फ़ैसलों से जुड़ी हैं। जब तक इन सबको एक साथ नहीं देखा जाएगा, “हर घर सुरक्षित जल” का वादा जमीन पर पूरा नहीं हो सकता।

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