ढलानों पर कंटूर ट्रेंच बनाने से बारिश का पानी बह कर बर्बाद होने के बजाय उसमें जमा होकर भूजल को रिचार्ज करता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
सूखते तालाब-पोखर और तेजी से घटता भूजल स्तर आज लगभग पूरे देश की एक दुखद कहानी बना हुआ है। देश में पानी को लेकर गहराती चिंताओं के बीच छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के ग्रामीणों ने वर्षा जल संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश की है। जिले के 551 ग्राम पंचायतों और 1140 से अधिक गांवों के लाखों ग्रामीणों ने अपने मजबूत संकल्प से महज 15 दिनों के भीतर जिले में 17 तरह की कुल 3.41 लाख जल संरक्षण संरचनाएं तैयार की गईं। इनमें रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए सोख्ता गड्ढे और सोकपिट जैसी लघु जल संरक्षण संरचनाएं, ब्रश वुड स्ट्रक्चर, वाटर एब्जॉर्प्शन ट्रेंच (WAT), स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच (SCT), कंटीन्यूअस कंटूर ट्रेंच (CCT) और नालों पर बोरी बंधान बनाना शामिल हैं। इसके साथ ही मनरेगा और विभिन्न विभागों के समन्वय से तालाब, डबरी, गेबियन और कूप जैसी संरचनाओं का भी निर्माण किया गया। इस सामूहिक प्रयास के जरिये पहली ही बारिश में करीब 31 करोड़ लीटर पानी का संचय कर लिया गया। इस तरह हर साल पानी की कमी से जूझने वाले हजारों ग्रामीणों ने इस बार हालात बदलने के संकल्प के साथ तकरीबन साल भर के लिए पानी का इंतज़ाम कर लिया है।
वर्षा का जल संजोने के लिए गांव-गांव में बारिश की हर बूंद को बचाने का अभियान चलाया गया। इससे प्रेरित हो कर लोगों ने श्रमदान किया, 15 दिन में खेतों और जंगलों में जल संरचनाएं बनाईं, घरों में सोख्ता गड्ढे तैयार किए। इसका नतीजा यह हुआ कि इस मानसून की पहली ही बारिश में ही करीब 31 करोड़ लीटर वर्षा जल संचय हो गया। इस तरह ग्रामीणों का यह सामूहिक प्रयास सिर्फ जल संरक्षण की सफलता नहीं, बल्कि जनभागीदारी की ताकत का एक ऐसा उदाहरण बन गया, जिसने जिले के साथ ही पूरे देश के लिए उम्मीद की नई राह खोल दी है।
"मोर गांव, मोर पानी 2.0" को आधार बना शुरू की पहल
महासमुंद जिला लंबे समय से गिरते भू-जल स्तर और पानी की समस्या से परेशान रहा है। खरीफ और रबी दोनों सीजन में बड़े पैमाने पर धान की खेती होने से भू-जल पर दबाव लगातार बढ़ता गया। पानी की किल्लत खासकर गर्मी के मौसम में लोगों की सबसे बड़ी चिंता बन जाती थी। ऐसे में जिले में जल संरक्षण को जन आंदोलन बना कर सरकार के "मोर गांव, मोर पानी 2.0" अभियान से प्रेरणा लेते हुए यहां के लोगों ने अपने इलाके में जल संरक्षण और भू-जल स्तर बढ़ाने के लिए व्यापक स्तर पर काम शुरू किया। प्रशासन के मार्गदर्शन में 551 ग्राम पंचायतों और 1140 से अधिक गांवों में विशेष अभियान चलाया। इस दौरान लाखों ग्रामीणों ने स्वेच्छा से श्रमदान किया और जल संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लिया। अभियान का उद्देश्य बारिश के पानी को गांवों में ही रोकना और जमीन के भीतर जल स्तर को बढ़ाना था।
14 मई से 30 मई तक चलाए गए इस विशेष अभियान का असर मानसून की पहली बारिश के साथ ही स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। इस साल देश में मानसून की बारिश देर से शुरू होने के बावजूद इस अभियान के जरिये जिले में लगभग 31 करोड़ लीटर पानी का संचय किया गया। अभियान के तहत बनाए गए या पुनर्जीवित किए गए तालाबों, खेत तालाबों, सोख गड्ढों और अन्य वर्षा जल संचयन संरचनाओं ने पानी को रोकने में अहम भूमिका निभाई। कई गांवों में किसानों ने बताया कि आसपास के कुओं और हैंडपंपों में पानी का स्तर पहले की तुलना में बेहतर दिखाई देने लगा है। यदि मानसून के दौरान इसी तरह लगातार पानी का संचय होता रहा तो आने वाले महीनों में सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और पशुपालन के लिए भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। यह उपलब्धि इसलिए भी काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि पहले काफी बड़ी मात्रा में पानी बहकर सीधे नालों और नदियों में चला जाता था। अब यह पानी बहने के बजाय जमीन में समा रहा है, जोकि भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करेगा।
छत्तीसगढ़ के महासमुंद की तरह ही ओडिशा के कोल्हा बरपदा में भी कंटूर ट्रेंच बनाकर जल संरक्षण का काम सफलतापूर्वक किया जा चुका है।
ग्रामसभा में जब पानी की लगातार बढ़ती समस्या पर चर्चा हुई तो ग्रामीणों ने केवल शिकायत करने के बजाय समाधान तलाशने का निर्णय लिया। बैठक में यह तय किया गया कि हर घर में सोख्ता गड्ढा बनाया जाएगा ताकि वर्षा का पानी सीधे जमीन में समा सके। इसके बाद गांव के लोगों ने श्रमदान और आपसी सहयोग से यह काम शुरू किया। किसी ने खुदाई की, किसी ने निर्माण सामग्री जुटाई और कई परिवारों ने अपने घरों के आसपास जल निकासी की दिशा बदलकर पानी को सोख्ता गड्ढों तक पहुंचाने की व्यवस्था की। ग्रामीणों का कहना है कि अब लगभग हर घर में सोख्ता गड्ढा तैयार हो चुका है। गांव के घर-घर सोख्ता गड्ढे बनाने के साथ ही जंगल क्षेत्र में भी करीब 400 छोटे सोख्ता गड्ढे तैयार किए गए, ताकि वर्षा का पानी उनमें जमा होकर धीरे-धीरे धरती में समा सके। इसके अलावा बरसाती नालों में बोरियों की सहायता से अस्थायी स्टॉप डैम तैयार किए गए। इन संरचनाओं का उद्देश्य पानी के तेज बहाव को रोकना और उसे अधिक समय तक क्षेत्र में बनाए रखना था। ग्रामीणों का मानना है कि छोटे-छोटे जल स्रोतों का यह नेटवर्क भविष्य में जल उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ आसपास की मिट्टी की नमी बनाए रखने में भी सहायक होगा। इस सामूहिक प्रयास से बारिश का पानी बेकार बहने के बजाय जमीन में जा रहा है, जिससे भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा मिल रहा है और आसपास के हैंडपंपों व कुओं के जलस्तर में भी सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।
गांव के युवा भी इस अभियान में पीछे नहीं रहे। हर्ष चंद्राकर बताते हैं कि जनभागीदारी के कारण लोगों में जल संरक्षण के प्रति नई जागरूकता पैदा हुई है। पहले बारिश का पानी तेजी से नालों में बहकर गांव से बाहर निकल जाता था, लेकिन अब युवाओं ने ग्रामीणों के साथ मिलकर उसे रोकने का प्रयास शुरू किया है। इसी पहल के तहत 15 बोरी बंधान डैम बनाए गए, जिनसे पानी का बहाव धीमा हो रहा है और वह अधिक देर तक रुका रह पा रहा है। युवाओं ने निर्माण कार्य के साथ-साथ लोगों को यह भी समझाया कि पानी बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का दायित्व है। उनका कहना है कि यदि इसी तरह सामूहिक प्रयास जारी रहे तो आने वाले वर्षों में गांव को जल संकट से काफी हद तक राहत मिल सकती है।
जिला पंचायत के सीईओ हेमंत रमेश नंदनवार के अनुसार जिले की सभी 551 ग्राम पंचायतों में व्यापक अभियान चलाकर 3 लाख 41 हजार जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण किया गया है। इनमें सोख्ता गड्ढे, खेत तालाब, चेक डैम, नाला बंधान और अन्य वर्षा जल संचयन व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन संरचनाओं की मदद से अब तक लगभग 31 करोड़ लीटर पानी का संचय किया जा चुका है। अधिकारियों का कहना है कि यह पानी पहले सीधे बहकर नदियों और नालों में चला जाता था, लेकिन अब इसका बड़ा हिस्सा जमीन में समा रहा है। इससे भू-जल स्तर में सुधार होने की संभावना बढ़ी है। आने वाले समय में इसका लाभ किसानों को सिंचाई के लिए, ग्रामीणों को पेयजल के लिए और पूरे क्षेत्र को जल सुरक्षा के रूप में मिल सकता है। प्रशासन का मानना है कि यदि इस तरह के अभियान नियमित रूप से जारी रहे तो जिले में जल संकट की स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक महासमुंद कलेक्टर विनय कुमार लंगेह का इस अभियान के बारे में कहना है कि मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में "मोर गांव, मोर पानी 2।0" अभियान को जनभागीदारी के साथ आगे बढ़ाया गया। इस अभियान में कृषि विभाग, वन विभाग, जिला पंचायत और जनपद पंचायत सहित कई विभागों ने मिलकर काम किया। साथ ही आम लोगों से भी अपने स्तर पर सोख्ता गड्ढे और अन्य जल संरक्षण संरचनाएं बनाने की अपील की गई।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के "जल संचय-जन भागीदारी" अभियान की भावना के अनुरूप किए गए इस प्रयास ने साबित कर दिया है कि जब प्रशासन और जनता साथ मिलकर काम करते हैं तो बड़े से बड़ा लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है।
गांवों में एक पारंपरिक जल स्रोत के रूप में तालाबों का अपना ही महत्व है। बरसात के मौसम में मानसूनी वर्षा के जल का संचय करके इन तालाबों को सालभर पानी से लबरेज रखा जा सकता है।
वर्षा जल संग्रहण के लिए तालाब बनाना ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जल संरक्षण का प्रभावी उपाय है। सही स्थान और वैज्ञानिक विधि से बनाया गया तालाब बारिश के पानी को संचित कर भूजल पुनर्भरण, सिंचाई और पशुपालन में उपयोगी बन सकता है। सबसे पहले ऐसे स्थान का चयन किया जाता है जहां वर्षा का पानी स्वाभाविक रूप से एकत्र होता हो और आसपास का जलग्रहण क्षेत्र पर्याप्त हो। इसके बाद तालाब का आकार भूमि की उपलब्धता और वर्षा की मात्रा के अनुसार तय किया जाता है। आमतौर पर ढलान वाली भूमि पर तालाब अधिक प्रभावी रहता है क्योंकि वहां पानी आसानी से पहुंचता है।
खुदाई के दौरान ऊपर की उपजाऊ मिट्टी को अलग सुरक्षित रखा जाता है ताकि बाद में किनारों पर उपयोग किया जा सके। तालाब की गहराई सामान्यतः 2 से 5 मीटर तक रखी जाती है और किनारों को हल्की ढलान देकर मजबूत बनाया जाता है ताकि कटाव न हो। यदि मिट्टी रेतीली हो तो तली में चिकनी मिट्टी की परत, प्लास्टिक लाइनर या जियोमेम्ब्रेन बिछाई जा सकती है ताकि पानी का रिसाव कम हो। वर्षा जल को तालाब तक लाने के लिए नालियां बनाई जाती हैं और प्रवेश बिंदु पर गाद रोकने हेतु सिल्ट ट्रैप लगाया जाता है। अंत में अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए ओवरफ्लो व्यवस्था बनाई जाती है, जिससे भारी बारिश में तालाब टूटने का खतरा कम हो जाता है। वर्षा जल संग्रहण यानी रेन वाटर हार्वेस्टिंग की तकनीक के बारे में जानकर आप भी अपने घर के आसपास इसे आजमा कर पानी का संचय कर सकते हैं, जिससे इलाके के भूजल स्तर को सुधारने में मदद मिल सकती है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए आप हमारी हाल में ही प्रकाशित स्टोरी रेन वाटर हार्वेस्टिंग क्या है? महत्व, तरीके, फायदे और आवश्यकता को पढ़कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
उपयुक्त स्थान और जलग्रहण क्षेत्र का चयन करें।
भूमि का सर्वे कर तालाब का आकार व गहराई निर्धारित करें।
ऊपरी उपजाऊ मिट्टी को अलग सुरक्षित रखें।
निर्धारित माप के अनुसार खुदाई करें।
किनारों को ढलानदार और मजबूत बनाएं।
तली में रिसाव रोकने वाली परत लगाएं (यदि आवश्यक हो)।
वर्षा जल लाने के लिए नालियां बनाएं।
सिल्ट ट्रैप और ओवरफ्लो निकासी की व्यवस्था करें।
तालाब को नाले या सीवर के प्रदूषित जल से न जोड़ें।
किनारों पर पर्याप्त चौड़ाई और ढलान रखें।
रेतीली मिट्टी में लाइनिंग अवश्य करें।
गाद जमाव रोकने के लिए नियमित सफाई करें।
तालाब के आसपास पेड़ लगाकर मिट्टी का कटाव कम करें।
भारी वर्षा के लिए सुरक्षित ओवरफ्लो निकासी रखें।
बच्चों और पशुओं की सुरक्षा हेतु आवश्यक घेराबंदी करें।
हर मानसून से पहले तटबंध और इनलेट की जांच करें।
मध्य प्रदेश के वनवासी बहुल जिले झाबुआ में भी बीते वर्षों में पर्यावरण और जल संरक्षण की अनूठी मिसाल देखने को मिली है। यहां आदिवासी-वनवासी समाज के लोगों ने जल संग्रहण के लिए 106 तालाब बिना सरकार की मदद के ही तैया कर दिए। ग्रामीणों ने यह काम अपनी आदिवासी परंपरा हलमा के तहत सामूहिक श्रमदान से किया है। इस पहल ने यहां की तस्वीर ही बदल कर रख दी है। एक समय था जब सिंचाई के लिए पानी की कमी की वजह से यहां के कियान बड़ी मुश्किल से केवल एक फसल ले पाते थे। लेकिन, तालाबों के बनने के बाद यहां दो फसलें और उनके बीच में सब्जियां उगाने में भी कोई दिक्कत नहीं हो रही है। यहां तालाबों के लिए जल बचाने का अभूतपूर्व बदलाव और वनवासियो में जागरूकता लाने में हम भूमिका शिवगंगा झाबुआ’ नाम की एक संस्था ने निभाई। संस्था के प्रयासों से 06 बड़े तालाबों का निर्माण कराने के साथ ही 1।61 लाख कंटूर ट्रेंच बनाकर हर साल करीब 870 करोड़ लीटर वर्षा जल का संग्रहण किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप इलाके का भूजल स्तर तेजी से बढ़ा है। तालाबों के जरिये जल संचर करने के साथ ही ग्रामीणों ने आसपास के एक बड़े इलाकों में एक बड़ा जंगल भी विकसित किया, जिसमें पांच लाख से ज्यादा पेड़ लगे हैं। आज यहां 21 हजार से अधिक प्रशिक्षित वनवासी युवा 750 गांवों में जन, जल, जंगल और जमीन की समृद्धि के लिए काम कर रहे हैं। अगर आप हलमा परंपरा के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो हाल ही में प्रकाशित हमारी यह स्टोरी पढ़ें क्या है ‘हलमा’ की परंपरा, जिसके के सहारे एमपी के ग्रामीणों ने दूर किया गंभीर जल संकट जिसमें रतलाम की बजाना तहसील के तीन गांवों के अदिवासियों द्वारा हलमा की प्राचीन परंपरा के तहत सामूहिक श्रमदान के जरिये सूख चुके पानी के नालों को फिर से खोद कर जलाशय तैयार किए जाने के बारे में विस्तार से बताया गया है।
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