इस साल सुपर अलनीनो के कारण भारत के कई इलाकों में मानसून की वर्षा की भारी कमी देखने को मिल रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इससे खरीफ की बुवाई में 23% की कमी आई है।
स्रोत: विकी कॉमंस
इस साल मानसून कमजोर होने और देरी से आने के कारण खेती को तगड़ा झटका लगा है। फसल की सिंचाई और रोपाई के लिए बारिश का पानी न मिलने के कारण सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 25 जून तक खरीफ फसलों की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में 22.7% कम हुई है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप (Crop Weather Watch Group) के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में खरीफ फसलों की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में 53.74 लाख हेक्टेयर कम रही है।
इस अवधि तक देश में खरीफ की कुल बुवाई 182.72 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह आंकड़ा 236.46 लाख हेक्टेयर था। इस तरह खरीफ की बुवाई में करीब 22.7% की कमी दर्ज की गई है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इस बार देशभर में खरीफ फसल के धान की बुवाई 25.75 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष के 34.41 लाख हेक्टेयर से 8.65 लाख हेक्टेयर कम है। कपास की बुवाई 45.36 लाख हेक्टेयर से घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गई, यानी इसमें 15.70 लाख हेक्टेयर की भारी कमी आई है।
इसी तरह दलहन फसलों अरहर, उड़द और मूंग का रकबा भी 21.46 लाख हेक्टेयर से घटकर 14.92 लाख हेक्टेयर रह गया। मक्का, जौ, रागी, बाजरे जैसे मोटे अनाज का कुल रकबा 31.84 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष के 36.07 लाख हेक्टेयर से कम है। हालांकि ज्वार के रकबे में कुछ बढ़ोतरी हुई है, जबकि मक्का का रकबा घटकर 15.71 लाख हेक्टेयर रह गया, जो पिछले वर्ष 18.61 लाख हेक्टेयर था।
तिलहन फसलों की स्थिति सबसे अधिक प्रभावित रही। कुल तिलहन बुवाई 36.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गई। इसमें सबसे बड़ी गिरावट सोयाबीन में दर्ज की गई, जिसका रकबा 19.97 लाख हेक्टेयर से घटकर 6.92 लाख हेक्टेयर रह गया। मूंगफली की बुवाई भी 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर 8.87 लाख हेक्टेयर रह गई।
इसके विपरीत गन्ने का रकबा 56.64 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 57.31 लाख हेक्टेयर हो गया है, जबकि जूट एवं मेस्ता की बुवाई में भी मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई।
जून में मानसून के आगमन के साथ ही देश में खरीफ फसलों की बुवाई शुरू हो जाती है, जो जुलाई के आखिर तक चलती है। इस साल जून में मानसून की चाल काफी धीमी रही। इस कारण जून माह के दौरान देश में सामान्य से 43 फीसदी कम वर्षा हुई और अधिकांश कृषि क्षेत्र बारिश में कमी से जूझ रहे हैं।
बीते दो सप्ताह से मानसून मध्य भारत के आसपास अटका हुआ है और उत्तर भारत तक नहीं पहुंचा है। जबकि, देश के लगभग आधे कृषि क्षेत्र की सिंचाई अब भी सीधे मानसून पर निर्भर है। जिन इलाकों में नहर, ट्यूबवेल या अन्य सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं, वहां कमजोर मानसून का असर सबसे पहले दिखाई देता है। किसान पर्याप्त मिट्टी की नमी का इंतजार करते हैं और बुवाई टाल देते हैं।
इसके विपरीत सिंचित क्षेत्रों में कुछ हद तक बुवाई जारी रह सकती है। यही वजह है कि कमजोर मानसून का सबसे अधिक असर वर्षा आधारित (Rainfed) कृषि वाले राज्यों और जिलों पर पड़ता है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 29 जून को जारी बुलेटिन में कहा है कि अगले दो-तीन दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के शेष हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं।
IMD ने कोंकण एवं गोवा, मध्य महाराष्ट्र, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में कहीं-कहीं भारी से बहुत भारी वर्षा की संभावना जताई है। वहीं, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में भी अच्छी बारिश का पूर्वानुमान है। दूसरी ओर, पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों तथा हरियाणा, दिल्ली और चंडीगढ़ में लू की स्थिति बने रहने की संभावना भी जताई गई है।
खरीफ बुवाई में बड़ी गिरावट का प्रभाव केवल खेती और किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरे कृषि तंत्र और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि धान, तिलहन और दालों का उत्पादन घटता है तो आगे चलकर खाद्यान्न और खाद्य तेलों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
भारत अपनी लगभग 55–60% खाद्य तेल की घरेलू जरूरत आयात के माध्यम से पूरी करता है। ऐसे में सोयाबीन, मूंगफली और अन्य तिलहनों की कमजोर बुवाई आयात बिल बढ़ा सकती है, जिसका असर घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर मानसून का असर कुछ महीनों बाद खुदरा महंगाई (Retail Inflation) में भी दिखाई दे सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नरों सहित कई आर्थिक आकलनों में यह माना गया है कि खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) भारत की कुल खुदरा महंगाई का सबसे बड़ा घटक है और खराब मानसून इसकी प्रमुख वजहों में से एक हो सकता है।
यदि खरीफ उत्पादन अपेक्षा से कम रहता है तो चावल, दालें, सब्जियां और खाद्य तेल महंगे हो सकते हैं। हालांकि फिलहाल सरकार के पास भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से चावल का पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध है, जिससे तत्काल आपूर्ति संबंधी दबाव को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों में मानसून के तेजी से आगे बढ़ने और कई राज्यों में अच्छी बारिश का पूर्वानुमान जताया है। ऐसे में अब किसानों की उम्मीदें जुलाई के पहले पखवाड़े पर टिकी हैं। यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी मात्रा में और नियमित वर्षा होती है तो धान, सोयाबीन, कपास और मक्का की बुवाई में तेजी आ सकती है और शुरुआती कमी काफी हद तक पूरी हो सकती है। लेकिन, यदि मानूसन आगे भी कमजोर रहा तो इसका बुरा असर न केवल बुवाई बल्कि पैदावार और कृषि उत्पादन पर भी पड़ना तय है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार खरीफ फसलों के लिए जुलाई का पहला और दूसरा सप्ताह सबसे निर्णायक माना जाता है। यदि इस अवधि में अच्छी और व्यापक वर्षा हो जाए तो देर से बुवाई होने के बावजूद धान, सोयाबीन, मक्का, दालें और तिलहन जैसी कई फसलों की भरपाई काफी हद तक संभव है। लेकिन यदि बारिश का अभाव लंबे समय तक बना रहता है तो किसानों को कम अवधि वाली (Short Duration) किस्मों की ओर जाना पड़ता है, जिससे कई बार उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक केवल कुल वर्षा नहीं, बल्कि उसकी समयबद्धता (Timing) और भौगोलिक वितरण (Distribution) को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते हैं।
कृषि के लिए केवल औसत वर्षा पर्याप्त नहीं होती। यदि एक-दो दिनों में अत्यधिक बारिश हो जाए और उसके बाद लंबे समय तक सूखा रहे, तो मिट्टी में नमी टिक नहीं पाती और फसल को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। धान की नर्सरी तैयार करने, रोपाई तथा सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलों की बुवाई के लिए लगातार हल्की से मध्यम बारिश अधिक उपयोगी मानी जाती है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षों में मानसून अधिक अनियमित होता जा रहा है, जिसमें लंबे शुष्क अंतराल (Dry Spell) और अचानक भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे खेती का जोखिम लगातार बढ़ रहा है।
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले ही राज्यों के साथ तैयारी शुरू कर दी थी। कृषि मंत्रालय के अनुसार कम सिंचाई वाले और वर्षा पर अत्यधिक निर्भर जिलों की विशेष निगरानी की जा रही है। राज्यों को वैकल्पिक फसल योजना (Contingency Plan), कम अवधि वाली किस्मों के बीज, डीजल पंप सहायता तथा अन्य आवश्यक कृषि इनपुट उपलब्ध कराने की सलाह दी गई है, ताकि यदि मानसून और कमजोर पड़े तो किसानों का नुकसान कम किया जा सके।
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) और राज्य कृषि विभागों के साथ मिलकर वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों के लिए जिला-स्तरीय आकस्मिक (District Agriculture Contingency) योजनाएं तैयार की हैं। इन योजनाओं में सामान्य से कम वर्षा, बुवाई में देरी या लंबे शुष्क दौर की स्थिति में किसानों को वैकल्पिक फसलें और कम अवधि (Short Duration) वाली किस्में अपनाने की सलाह दी जाती है।
देश के 700 से अधिक जिलों के लिए ऐसी आकस्मिक कृषि योजनाएं तैयार की गई हैं। इनमें धान की जगह मोटे अनाज, दलहन या तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों का विकल्प, कम अवधि में तैयार होने वाली किस्मों के बीज उपलब्ध कराना, नमी संरक्षण (Moisture Conservation), जीवन रक्षक सिंचाई (Life-saving Irrigation) और जल संरक्षण उपायों को प्राथमिकता दी गई है।
कृषि मंत्रालय ने राज्यों से बीज भंडारण, उर्वरकों की उपलब्धता, डीजल पंप सहायता तथा किसानों तक मौसम आधारित कृषि सलाह (Agromet Advisory) समय पर पहुंचाने को भी कहा है, ताकि कमजोर मानसून की स्थिति में उत्पादन पर पड़ने वाले असर को यथासंभव कम किया जा सके।
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि भारतीय मानसून पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। कई क्षेत्रों में लंबे सूखे अंतराल के बाद अचानक अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं। इससे एक ओर खेतों में समय पर बुवाई प्रभावित होती है, तो दूसरी ओर तेज बारिश होने पर मिट्टी का कटाव और जलभराव जैसी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य की कृषि को जलवायु-अनुकूल (Climate Resilient) बनाने के लिए जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, सूखा सहनशील किस्में और बेहतर मौसम पूर्वानुमान आधारित खेती को तेजी से अपनाना होगा।
इनमें से 3–4 सबहेड आपकी स्टोरी में जोड़ने से खबर केवल "बुवाई 23% पिछड़ी" तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसके व्यापक कृषि, जल और खाद्य सुरक्षा संबंधी प्रभावों को भी समग्र रूप से प्रस्तुत करेगी।
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