जल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा पर अक्सर अलग-अलग चर्चा की जाती है, जबकि ग्रामीण भारत के लाखों परिवारों के लिए ये दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। पानी की उपलब्धता यह तय करती है कि किसान कौन-सी फसल उगाएंगे, उनकी उपज कितनी होगी और अंततः परिवारों को पर्याप्त तथा पौष्टिक भोजन मिल पाएगा या नहीं। इसलिए जल सुरक्षा केवल सिंचाई का मुद्दा नहीं, बल्कि खाद्य और पोषण सुरक्षा की आधारशिला भी है।
महाराष्ट्र जैसे राज्य में, जहां अलग-अलग क्षेत्रों में वर्षा का वितरण बेहद असमान है और सूखा एक बार-बार आने वाली चुनौती है, वहां जल और खाद्य सुरक्षा के बीच संबंध को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्यावरण शोध संचार में प्रकाशित शोधकर्ताओं मेघा डी. म्हास्कर और परमेश्वर डी. उदमले के अध्ययन ने पहली बार महाराष्ट्र के जिला और उप-जिला स्तर पर जल एवं खाद्य सुरक्षा का एकीकृत आकलन प्रस्तुत किया है।
अध्ययन में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के बीच गहरी असमानताएं सामने आई हैं। जहां कोंकण, पुणे और नासिक के कई हिस्सों में जल एवं खाद्य सुरक्षा की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, वहीं मराठवाड़ा और विदर्भ के बड़े हिस्से अब भी जल संकट, भूजल पर बढ़ते दबाव, कृषि की संवेदनशीलता और कुपोषण जैसी परस्पर जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि जिन क्षेत्रों में भूजल का दोहन अपेक्षाकृत कम है, वे जरूरी नहीं कि खाद्य सुरक्षा के मामले में भी बेहतर हों। कई आदिवासी बहुल उप-जिलों में भूजल पर दबाव कम होने के बावजूद कुपोषण, पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन तक सीमित पहुंच तथा सुरक्षित जल सेवाओं की कमी जैसी गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवल भूजल की उपलब्धता या उसका कम दोहन खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता, बल्कि पोषण, आजीविका, बुनियादी जल सेवाओं और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान होता है।
महाराष्ट्र जलसुरक्षा निर्देशांक
स्रोत: म्हास्कर और उदमले (2026), महाराष्ट्र राज्य, भारत में उप-जिला स्तर पर जल और खाद्य सुरक्षा का एकीकृत आकलन। पर्यावरण अनुसंधान संचार, खंड 8 (2026), 065019, पृष्ठ 4।
महाराष्ट्र की विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों के कारण राज्य में जल और खाद्य सुरक्षा की स्थिति समान नहीं है। राज्य में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1,181 मिलीमीटर होती है, लेकिन इसके बावजूद राज्य का लगभग एक-तिहाई भौगोलिक क्षेत्र वर्षा छाया क्षेत्र में आता है, जहां वर्षा कम और अनियमित होती है।
यही कारण है कि महाराष्ट्र का लगभग 42.5 प्रतिशत क्षेत्र सूखा-प्रवण माना जाता है। वर्षा में क्षेत्रीय असमानता और बार-बार पड़ने वाले सूखे का सीधा असर जल उपलब्धता, कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है, जिससे कई क्षेत्रों में किसानों और ग्रामीण समुदायों के सामने आजीविका और पोषण संबंधी गंभीर चुनौतियां उत्पन्न होती हैं।
महाराष्ट्र की अधिकांश ग्रामीण आबादी के लिए कृषि आज भी आजीविका और अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और मौसम की बढ़ती अनिश्चितता के कारण कृषि क्षेत्र पर जोखिम लगातार बढ़ रहा है, जिसका सीधा प्रभाव जल उपलब्धता, फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है।
इन परस्पर जुड़े संबंधों को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने राज्य के जिला और उप-जिला स्तर पर जल एवं खाद्य सुरक्षा का व्यापक आकलन किया। इस अध्ययन में जल उपलब्धता, पहुंच, उपयोग और स्थिरता के साथ-साथ खाद्य उपलब्धता, पहुंच, उपयोग और स्थिरता जैसे विभिन्न संकेतकों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के निष्कर्ष महाराष्ट्र में जल और खाद्य सुरक्षा की क्षेत्रीय स्थिति का अब तक का सबसे विस्तृत और समग्र चित्र प्रस्तुत करते हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों के बीच मौजूद असमानताओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
अध्ययन के अनुसार, महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में जल उपलब्धता के स्तर में काफी असमानता है। कोंकण संभाग राज्य का सबसे अधिक जल-संपन्न क्षेत्र पाया गया, जबकि पुणे संभाग दूसरे स्थान पर रहा। इसके विपरीत, मराठवाड़ा का छत्रपति संभाजीनगर संभाग और विदर्भ का नागपुर संभाग जल उपलब्धता के मामले में सबसे कमजोर क्षेत्रों के रूप में सामने आए। यह अंतर दर्शाता है कि राज्य के कुछ हिस्सों में पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में जल की कमी कृषि, आजीविका और खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है।
उप-जिला स्तर पर सातारा जिले का महाबलेश्वर जल की उपलब्धता के मामले में राज्य में सबसे आगे पाया गया। इसके विपरीत, नांदेड़ जिले का धर्माबाद सबसे कम जल उपलब्धता वाला उप-जिला दर्ज किया गया। इसके बाद विदर्भ क्षेत्र के लाखांदूर और जरी जामनी उप-जिलों में भी जल उपलब्धता का स्तर बेहद निम्न पाया गया। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र के विभिन्न उप-जिलों के बीच जल संसाधनों की उपलब्धता में गहरी क्षेत्रीय असमानताएं मौजूद हैं।
एक रोचक निष्कर्ष यह भी है कि सातारा जिले के महाबलेश्वर में भरपूर वर्षा होने के बावजूद भूजल दोहन की दर 61.09 प्रतिशत दर्ज की गई, जो यह दर्शाती है कि यह क्षेत्र अपनी जल आवश्यकताओं के लिए भूजल पर काफी हद तक निर्भर है। इसके विपरीत, कम वर्षा वाले नांदेड़ जिले के धर्माबाद में भूजल दोहन की दर केवल 15.31 प्रतिशत पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका एक संभावित कारण वहां भूजल संसाधनों तक सीमित पहुंच या उनकी कम उपलब्धता हो सकती है।
जल सुरक्षा: महाराष्ट्र में उप-जिला स्तर पर स्थानिक विविधताएं।
स्रोत: म्हास्कर और उदमले (2026), महाराष्ट्र राज्य, भारत में उप-जिला स्तर पर जल और खाद्य सुरक्षा का एकीकृत आकलन। पर्यावरण अनुसंधान संचार, खंड 8 (2026), 065019, पृष्ठ 12।
अध्ययन में पेयजल अवसंरचना (ड्रिंकिंग वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर) तक पहुंच में भी उल्लेखनीय असमानताएं सामने आई है। नागपुर और अमरावती संभाग के कुछ हिस्सों में वन भूमि के डायवर्जन (Forest Land Diversion) के कारण पेयजल उपलब्ध कराने में चुनौतियां हैं, जबकि कोंकण क्षेत्र में दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां (Topographical Constraints) जल तक पहुंच को प्रभावित करती हैं।
पालघर जिले के आदिवासी बहुल मोकाडा उप-जिले में अपर्याप्त जल अवसंरचना के कारण पेयजल तक पहुंच सबसे कम दर्ज की गई। वहीं, नासिक और धाराशिव जिलों के कई उप-जिलों में 100 प्रतिशत बिजली उपलब्ध होने के बावजूद पेयजल आपूर्ति सुविधा वाले गांवों का पूरी तरह अभाव पाया गया। अध्ययन के निष्कर्ष बताते है कि केवल जल की उपलब्धता ही सुरक्षित पेयजल सेवाओं तक पहुंच की गारंटी नहीं देती, बल्कि इसके लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा और प्रभावी जल वितरण व्यवस्था भी आवश्यक है।
जल सुरक्षा सूचकांक, महाराष्ट्र।
स्रोत: म्हास्कर और उदमले (2026), महाराष्ट्र राज्य, भारत में उप-जिला स्तर पर जल और खाद्य सुरक्षा का एकीकृत आकलन। पर्यावरण अनुसंधान संचार, खंड 8 (2026), 065019, पृष्ठ 14।
जल के उपयोग के तरीके को देखने पर क्षेत्रीय अंतर और अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। जल की अधिक उपलब्धता वाले कोंकण क्षेत्र के कल्याण में जल उपयोग का स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया, इसके बाद दर्यापुर और ठाणे का स्थान रहा। इन क्षेत्रों को बेहतर बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच और उन्नत जल सेवाओं का लाभ मिलता है। कल्याण में 93.2 प्रतिशत परिवारों को उपचारित नल के पानी की सुविधा उपलब्ध है, जबकि यहां डायरिया जैसी बीमारियों की घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं।
इसके विपरीत, कोंकण क्षेत्र का जव्हार जल उपयोग के मामले में सबसे निचले स्तर पर है, जिसके बाद वाशी और मोकाडा का स्थान आता है। जव्हार और मोकाडा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में उपचारित नल के पानी तक पहुंच बहुत सीमित है। जव्हार में केवल 21.6 प्रतिशत परिवारों को ही उपचारित पेयजल उपलब्ध हो पाता है। इन क्षेत्रों में डायरिया जैसी बीमारियों की दर भी अधिक दर्ज की गई है। अध्ययन के निष्कर्ष जल की गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, मानव कल्याण और जल तक पहुंच एवं उपयोग में मौजूद असमानताओं के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करते हैं।
महाराष्ट्र के उप-जिलों में खाद्य सुरक्षा में स्थानिक विविधताएं।
स्रोत: म्हास्कर और उदमले (2026), महाराष्ट्र राज्य, भारत में उप-जिला स्तर पर जल और खाद्य सुरक्षा का एकीकृत आकलन। पर्यावरण अनुसंधान संचार, खंड 8 (2026), 065019, पृष्ठ 16।
स्थिरता (Stability) का आयाम यह दर्शाता है कि कोई क्षेत्र बार-बार आने वाले जलवायु झटकों का सामना करने में कितना सक्षम है। मराठवाड़ा क्षेत्र बार-बार पड़ने वाले सूखे और सीमित भूजल भंडार के कारण विशेष रूप से अधिक संवेदनशील क्षेत्र के रूप में सामने आता है।
इस क्षेत्र के भीतर, लाखांदूर में जल संकट वाले गांवों की संख्या कम होने और भूजल उपलब्धता अधिक होने के कारण स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर पाई गई। इसके विपरीत, फुलंबरी, सिल्लोड और खुल्दाबाद जैसे क्षेत्र बड़ी संख्या में जल संकट से प्रभावित गांवों और सीमित भूजल संसाधनों के कारण गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अध्ययन में पाया गया कि सूखे की आवृत्ति सभी क्षेत्रों को प्रभावित करती है, लेकिन इसका प्रभाव उन क्षेत्रों पर अधिक पड़ता है जो पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं।
महाराष्ट्र के उप-जिलों में खाद्य सुरक्षा सूचकांक।
स्रोत: म्हास्कर और उदमले (2026), महाराष्ट्र राज्य, भारत में उप-जिला स्तर पर जल और खाद्य सुरक्षा का एकीकृत आकलन। पर्यावरण अनुसंधान संचार, खंड 8 (2026), 065019, पृष्ठ 18।
समग्र जल सुरक्षा सूचकांक (Water Security Index) से क्षेत्रीय असमानताओं की स्पष्ट तस्वीर सामने आती है। कोंकण क्षेत्र का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा, जहां 59 प्रतिशत उप-जिले उच्च श्रेणी (High Category) में और 24 प्रतिशत उप-जिले बहुत उच्च श्रेणी (Very High Category) में आते हैं। पुणे क्षेत्र का प्रदर्शन भी मजबूत रहा, जहां 41 प्रतिशत उप-जिलों को अत्यधिक जल सुरक्षित (Highly Water Secure) और 54 प्रतिशत को बहुत अधिक जल सुरक्षित (Very Highly Water Secure) श्रेणी में रखा गया है।
इसके विपरीत, मराठवाड़ा के छत्रपति संभाजीनगर संभाग में निम्न श्रेणी (Low Category) वाले उप-जिलों का अनुपात सबसे अधिक दर्ज किया गया, जो गंभीर जल सुरक्षा चुनौतियों को दर्शाता है। वहीं, नागपुर संभाग में मध्यम श्रेणी (Medium Category) वाले उप-जिलों की संख्या अधिक है, जो जल सुरक्षा के मध्यम स्तर को दर्शाता है।
उप-जिला स्तर पर महाबलेश्वर का जल सुरक्षा सूचकांक सबसे अधिक दर्ज किया गया, जिसके बाद कोल्हापुर का राधानगरी और जलगांव का रावेर रहे। वहीं, मोकाडा, वाशी और कलंब सबसे कम जल सुरक्षित क्षेत्रों में शामिल हैं, जिसका प्रमुख कारण कमजोर बुनियादी ढांचा और उपलब्ध जल संसाधनों का अपर्याप्त उपयोग है।
महाराष्ट्र में उप-जिला स्तर पर संयुक्त जल और खाद्य सुरक्षा सूचकांक।
स्रोत: म्हास्कर और उदमले (2026), महाराष्ट्र राज्य, भारत में उप-जिला स्तर पर जल और खाद्य सुरक्षा का एकीकृत आकलन। पर्यावरण अनुसंधान संचार, खंड 8 (2026), 065019, पृष्ठ 19।
राज्यभर में खाद्य उपलब्धता में काफी अंतर पाया गया है। कोपरगांव में फलों और सब्जियों की व्यापक खेती, फसल विविधीकरण और अधिक संख्या में पशुधन के कारण खाद्य उपलब्धता सबसे अधिक दर्ज की गई। चांदवड़ और पारनेर का प्रदर्शन भी बेहतर रहा। वहीं, आदिवासी बहुल जिले ठाणे में खाद्य उपलब्धता सबसे कम पाई गई। अध्ययन में बताया गया है कि आदिवासी बहुल क्षेत्र अक्सर कम खाद्य सुरक्षा का सामना करते हैं और ये क्षेत्र कई बार जल असुरक्षा वाले क्षेत्रों से भी जुड़े होते हैं।
अध्ययन में विदर्भ क्षेत्र में खाद्य पहुंच को लेकर बड़े अंतर सामने आए हैं। कामठी, श्रीवर्धन और मुरुड का प्रदर्शन बेहतर रहा, जिसका कारण मजबूत परिवहन नेटवर्क, बेहतर बुनियादी ढांचा और उच्च साक्षरता दर है।
इसके विपरीत, गडचिरोली जिले के भामरागढ़ और एटापल्ली में खाद्य पहुंच के कुछ सबसे कम स्कोर दर्ज किए गए। जव्हार का प्रदर्शन भी कमजोर रहा, जो बाजारों, सेवाओं और सरकारी सहायता प्रणालियों तक पहुंच में आदिवासी समुदायों के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाता है।
कामठी में 100 प्रतिशत राशन कार्ड कवरेज दर्ज किया गया, जबकि भामरागढ़ में यह केवल 20.81 प्रतिशत है। इसी तरह, साक्षरता दर में भी बड़ा अंतर देखा गया, जहां कामठी में यह 87.57 प्रतिशत है, जबकि भामरागढ़ में 54.71 प्रतिशत। ये निष्कर्ष खाद्य पहुंच में सुधार के लिए सामाजिक बुनियादी ढांचे के महत्व को रेखांकित करते हैं।
खाद्य सुरक्षा केवल उपलब्धता और पहुंच तक सीमित नहीं है। यह पोषण संबंधी परिणामों से भी जुड़ी हुई है। अध्ययन में पाया गया कि रायगढ़ जिले के माणगांव, रोहा और अलीबाग में खाद्य उपयोग की स्थिति बेहतर है, जहां भोजन की खपत और पोषण संबंधी संकेतक अपेक्षाकृत मजबूत हैं।
इसके विपरीत, जव्हार, अक्राणी और चिखलदरा जैसे आदिवासी बहुल उप-जिलों में लोग अब भी खराब पोषण का सामना कर रहे हैं, जो उच्च शिशु मृत्यु दर और बच्चों में कुपोषण के स्तर से दिखाई देता है। परिणाम बताते हैं कि उन क्षेत्रों में भी पोषण संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं, जहां भोजन भौतिक रूप से उपलब्ध हो सकता है।
खाद्य स्थिरता यह मापती है कि कृषि प्रणालियां समय के साथ उत्पादन को बनाए रखने में कितनी सक्षम हैं। अमरावती और छत्रपति संभाजीनगर संभाग में सीमित भंडारण सुविधाओं, कम सिंचाई कवरेज और कम फसल तीव्रता के कारण खाद्य स्थिरता विशेष रूप से कम दर्ज की गई है। नागपुर का प्रदर्शन भी कमजोर रहा।
अध्ययन में वर्षा की अनिश्चितता को कृषि उत्पादकता को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक बताया गया है। जल संकट वाले क्षेत्रों में अक्सर अधिक पानी वाली नकदी फसलों की खेती करने की क्षमता सीमित होती है, जबकि सिंचित क्षेत्र सामान्यतः जलवायु संबंधी झटकों के प्रति कम संवेदनशील होते हैं।
खाद्य सुरक्षा सूचकांक (Food Security Index) से क्षेत्रीय अंतर स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। अमरावती संभाग में खाद्य सुरक्षा का स्तर सबसे कम दर्ज किया गया, जो गंभीर चिंताओं को दर्शाता है। वहीं, पुणे और नासिक का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा, जहां क्रमशः 61 प्रतिशत और 43 प्रतिशत उप-जिले ‘बहुत उच्च’ श्रेणी (Very High Category) में आते हैं।
कोंकण क्षेत्र का प्रदर्शन भी अपेक्षाकृत बेहतर रहा, जहां बड़ी संख्या में उप-जिले बहुत अधिक खाद्य सुरक्षित श्रेणी में वर्गीकृत किए गए हैं। वहीं, छत्रपति संभाजीनगर संभाग में बड़ी संख्या में उप-जिले मध्यम श्रेणी (Medium Category) में आते हैं, जो मध्यम स्तर की खाद्य सुरक्षा स्थितियों को दर्शाता है।
बेहतर जल संसाधन प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर जल अभाव का आकलन महत्वपूर्ण है। स्रोत: आईडब्ल्यूपी फ्लिकर तस्वीरें।
जब जल और खाद्य सुरक्षा के संकेतकों का एक साथ विश्लेषण किया जाता है, तो क्षेत्रीय असमानताएं और अधिक स्पष्ट हो जाती हैं। पुणे में संयुक्त जल और खाद्य सुरक्षा सूचकांक सबसे अधिक दर्ज किया गया, जहां इसके 64 प्रतिशत उप-जिले ‘बहुत उच्च’ श्रेणी (Very High Category) में आते हैं। नासिक और कोंकण का प्रदर्शन भी मजबूत रहा।
इसके विपरीत, छत्रपति संभाजीनगर संभाग में निम्न श्रेणी (Low Category) वाले उप-जिलों का अनुपात सबसे अधिक दर्ज किया गया, जो गंभीर जल और खाद्य सुरक्षा चुनौतियों को दर्शाता है। नागपुर और अमरावती संभाग मुख्य रूप से मध्यम श्रेणी (Moderate Category) में आते हैं।
भारत सरकार के आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme) के तहत चिन्हित कई जिले अब भी लगातार संवेदनशील स्थिति में बने हुए हैं। धाराशिव, गडचिरोली, नंदुरबार और वाशिम जल एवं खाद्य सुरक्षा दोनों संकेतकों में कमजोर प्रदर्शन करते हैं।
धाराशिव और वाशिम के सभी उप-जिले निम्न श्रेणी में आते हैं, जबकि गडचिरोली और नंदुरबार के आधे उप-जिले भी इसी श्रेणी में शामिल हैं। अध्ययन में बताया गया है कि गडचिरोली और नंदुरबार जैसे आदिवासी बहुल और वन क्षेत्रों में रहने वाले जिले अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करते हैं, जिनमें भौगोलिक अलगाव, बिखरी हुई भूमि जोत और जल प्रबंधन के लिए सीमित संस्थागत क्षमता शामिल हैं।
यह अध्ययन दर्शाता है कि महाराष्ट्र में जल सुरक्षा, कृषि उत्पादन और पोषण एक-दूसरे से कितने गहराई से जुड़े हुए हैं। निष्कर्ष बताते हैं कि मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में, जहां संवेदनशीलता का स्तर अभी भी अधिक है, वहां लक्षित हस्तक्षेपों की तत्काल आवश्यकता है। भूजल पुनर्भरण, जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) के विस्तार और कम पानी वाली फसलों को अपनाने जैसे उपाय सूखे से निपटने की क्षमता को मजबूत कर सकते हैं और खाद्य सुरक्षा के परिणामों में सुधार ला सकते हैं।
वहीं, कोंकण, नासिक और पुणे जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्रों को कृषि उत्पादकता बनाए रखते हुए जल उपयोग दक्षता (Water Use Efficiency) में सुधार पर ध्यान देने की आवश्यकता है। अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह उप-जिला स्तर पर मौजूद कमजोरियों की पहचान करता है। यह दिखाता है कि कोंकण जैसे अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों में भी आदिवासी क्षेत्र पीछे हैं और वहां खाद्य एवं जल संसाधनों तक पहुंच में असमानताएं बनी हुई हैं।
इस तरह का सूक्ष्म स्तर का विश्लेषण नीति निर्माताओं को निवेश की प्राथमिकताएं तय करने, क्षेत्र-विशिष्ट कार्यक्रम तैयार करने और उनकी प्रगति को अधिक प्रभावी तरीके से ट्रैक करने में सहायता कर सकता है।
नोट - यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था- From Marathwada to Konkan: How water and food security vary across Maharashtra’s regions जिसका अनुवाद सयाली पराते ने किया है।
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