आर्द्रभूमि का अर्थ है नमी या दलदली क्षेत्र। आर्द्रभूमि की मिट्टी झील, नदी, विशाल तालाब के किनारे का हिस्सा होता है जहाँ भरपूर नमी पाई जाती है। इसके कई लाभ भी हैं। आर्द्रभूमि जल को प्रदूषण से मुक्त बनाती है। आर्द्रभूमि वह क्षेत्र कहलाता है जिसका सारा या थोड़ा भाग वर्ष भर जल से भरा रहता है।
भारत में आर्द्रभूमि ठंडे और शुष्क इलाकों से होकर मध्य भारत के कटिबन्धी मानसूनी इलाकों और दक्षिण के नमी वाले इलाकों तक फैली हुई है। हमारे देश में दक्षिण प्रायद्वीप में उपस्थित आर्द्रभूमि अधिकतर मानव निर्मित हैं जिन्हें ‘एरी’ यानी हौदी कहते हैं। यह एरी मानव आवश्यकताओं के लिये जल उपलब्ध कराती हैं।
आर्द्रभूमियाँ भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.63 प्रतिशत क्षेत्रफल यानी कुल 15,26,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर फैली हुई है। इसके अलावा 2.25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल से कम आकार वाली करीब 5,55,557 छोटी-छोटी आर्द्रभूमियों के रूप में चिन्हित किया गया है, इनका भी अपना विशेष महत्त्व है। वैसे कुल आर्द्रभूमियों में से 69.22 प्रतिशत क्षेत्र आन्तरिक आर्द्रभूमियों द्वारा आच्छादित है। जबकि तटीय आर्द्रभूमियों का प्रतिशत 27.13 है।
आर्द्रभूमियों के असंख्य लाभों के कारण ये हमारे लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। असल में आर्द्रभूमि की मिट्टी, झील, नदी, विशाल तालाब या किसी नमीयुक्त किनारे का हिस्सा होती है जहाँ भरपूर नमी पाई जाती है। इसके कई लाभ भी हैं। भूजल स्तर को बढ़ाने में भी आर्द्रभूमियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसके अलावा आर्द्रभूमि जल को प्रदूषण से मुक्त बनाता है।
बाढ़ नियंत्रण में भी इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। आर्द्रभूमि तलछट का काम करती है जिससे बाढ़ जैसी विपदा में कमी आती है। आर्द्रभूमि पानी को सहेजे रखती है बाढ़ के दौरान आर्द्रभूमियाँ पानी का स्तर कम बनाए रखने में सहायक होती हैं। इसके अलावा आर्द्रभूमि पानी में मौजूद तलछट और पोषक तत्वों को अपने में समा लेती है और सीधे नदी में जाने से रोकती है।
इस प्रकार झील, तालाब या नदी के पानी की गुणवत्ता बनी रहती है। समुद्री तटरेखा को स्थिर बनाए रखने में भी आर्द्रभूमियाँ का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। ये समुद्र द्वारा होने वाले कटाव से तटबन्ध की रक्षा करती हैं। आर्द्रभूमियाँ समुद्री तूफान और आँधी के प्रभाव को सहन करने की क्षमता रखती हैं। आर्द्रभूमियाँ पानी के संरक्षण का एक प्रमुख स्रोत है।
आर्द्रभूमियाँ जैव विविधता संरक्षण के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। आर्द्रभूमियाँ बहुत सारे जीवों का ठिकाना हैं। हमारे देश की पारिस्थितिकी सुरक्षा में इन आर्द्रभूमियों की अहम भूमिका है। खाद्यान्नों की कमी और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों के बीच हमें आर्द्रभूमियों को बचाने की जरूरत है ताकि वे अपनी पारिस्थितिकी भूमिका निभा सकें। आर्द्रभूमियाँ जैवविविधता को सुरक्षित रखती हैं।
आर्द्रभूमियाँ शीतकालीन पक्षियों और विभिन्न जीव-जन्तुओं का आश्रय स्थल होती हैं। विभिन्न प्रकार की मछलियाँ और जन्तुओं के प्रजनन के लिये भी ये उपयुक्त होती हैं। इन आर्द्रभूमियों पर विशेष मौसम में कई पक्षी आते हैं।
आर्द्रभूमियाँ प्रवासी पक्षियों की पनाहस्थली के रूप में विख्यात हैं। ऐसे क्षेत्र पट्ट शीर्ष राजहंस, पनकौआ, बायर्स वाॅचार्ड, ओस्प्रे, इण्डियन स्किम्मर, श्याम गर्दनी बगुला, संगमरमरी टील, बंगाली फ्लोरीकॉन पक्षियों का मनपसन्द स्थल होते हैं।
पक्षियों का कलरव और रंग रूप, हमेशा से ही पक्षी निहारकों को इन आर्द्रभूमियों की ओर आकर्षित करते रहे हैं। ये आर्द्रभूमियाँ जैव विविधता के मामले में बहुत धनी होती हैं। भरतपुर स्थित केवलादेव पक्षी विहार, कई प्रवासी पक्षियों की पसन्दीदा स्थल है।
आर्द्रभूमियाँ अपने आस-पास बसी मानव बस्तियों के लिये जलावन लकड़ी, फल, वनस्पतियाँ, पौष्टिक चारा और जड़ी-बूटियों की स्रोत होती हैं।
कमल, जो कि दुनिया के कुछ विशेष सुन्दर फूल होने के साथ ही भारत का राष्ट्रीय फूलों है, आर्द्रभूमियों में उगता है। आर्द्रभूमियाँ अपने आस-पास अनेक ऐसे वनस्पतियों और जीवों को आश्रय प्रदान करती हैं जो आर्थिक विकास में सहायक होते हैं। आर्द्रभूमि विविधता से परिपूर्ण पारिस्थिति तंत्र का द्योतक है।
मणिपुर की लोकटक झील देशी और विदेशी सैलानियों के लिये आकर्षण का केन्द्र है। इस झील को दुनिया भर में अपनी तरह का अकेला ‘तैरता वन्य प्राणी विहार’ का दर्जा हासिल है। लेकिन प्रदूषण के चलते अब इसमें हानिकारक खरपतवार उग रहे हैं।
प्रकृति अपने विविध रूपों में हमारे पृथ्वी ग्रह को सुन्दर बनाए हुए है। आर्द्रभूमियाँ प्रकृति का ऐसा ही अनोखा और अनुपम रूप है। असल में आर्द्रभूमि नमी या दलदली क्षेत्र होते हैं जो अपनी अनोखी पारिस्थितिकी के कारण महत्त्वपूर्ण हैं।
आर्द्रभूमियों के अन्तर्गत झीलें, तालाब, दलदली क्षेत्र, हौज, कुण्ड, पोखर एवं तटीय क्षेत्रों पर स्थित मुहाने, लगून, खाड़ी, ज्वारीय क्षेत्र, प्रवाल क्षेत्र, मैंग्रोव वन आदि क्षेत्र शामिल होते हैं। गुजरात का नलसरोहर, उड़ीसा की चिल्का झील और भितरकनिका मैंग्रोव क्षेत्र, राजस्थान का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, दिल्ली का ओखला पक्षी अभयारण्य आदि आर्द्रभूमियों के कुछ उदाहरण हैं। पारिस्थितिकीय दृष्टि से यह झील अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस झील में एक तैरता पौधा उगता है जिसे
‘बुल लामजाओ खरपतवार’ या ‘फुमड़ी’
कहते हैं। यह पौधा केवल यहीं उगता है और कहीं नहीं। इस पौधे पर एक हिरण की प्रजाति पलती है जिसे पिगभी हिरण (संगाई) कहा जाता है। फुमड़ी पौधे की संख्या कम हो जाने से इस हिरण की संख्या भी कम होने लगी है। इनकी संख्या 100 से कम हो गई है।
वर्तमान में भारत की बहुत सी आर्द्रभूमियों पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं। आर्द्रभूमियाँ प्रदूषण के कारण संकट में हैं। तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगल, उद्योग, शहरीकरण के लिये जलग्रहण क्षेत्र से छेड़खानी, हजारों टन रेत का जमाव और कृषि रसायनों के जहरीले पानी का आ मिलना आर्द्रभूमियों की बर्बादी का कारण है।
भारत में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहाँ आर्द्रभूमियों की बर्बादी के साथ ही जंगली जानवरों या पौधों पर संकट मँडरा रहा है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के दलदली क्षेत्र में ‘दलदली हिरण’ पाया जाता है। यह हिरण भी कम हो रहा है।
इस प्रजाति के हिरणों की संख्या लगभग एक हजार बची है। इसी प्रकार तराई वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली फिशिंग कैट यानी मच्छीमार बिल्ली पर भी बुरा असर पड़ रहा है। इसके साथ ही गुजरात के कच्छ क्षेत्र में जंगली गधा भी खतरे में है।
असम के काजीरंगा और मानव दलदलीय क्षेत्रों से जुड़ा एक सींग वाला भारतीय गैंड़ा भी प्रायः विलुप्त प्राणियों की श्रेणी में शामिल है। इसी प्रकार ओटर, गैंजेटिक डाॅल्फिन, डूरोंग, एशियाई जलीय भैंस जैसे आर्द्रभूमियों से जुड़े अनेक जीव खतरे में हैं।
रेंगने वाले जीव जैसे समुद्री कछुआ, घड़ियाल, मगरमच्छ, जैतूनी रिडली और जलीय माॅनीटर पर भी आर्द्रभूमियों के प्रदूषित होने के कारण संकट मँडरा रहा है। जीवों के अतिरिक्त कुछ वनस्पतियाँ भी आर्द्रभूमि के संकट से प्रभावित हो रही हैं।
कई सारी वनस्पतियों, सरीसृपों, पक्षियों और जनजातियों आदि की निवास स्थली यह आर्द्रभूमियों के बढ़ते प्रदूषण, बिगड़ती जलवायु, विकास के दुष्परिणामों आदि के कारण अपना स्वरूप खोती जा रही है। भारत में आर्द्रभूमि के संरक्षण के लिये पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 1987 से एक कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
इस कार्यक्रम के अन्तर्गत अभी तक 15 राज्यों में 27 आर्द्रभूमि क्षेत्र चिन्हित किये गए हैं। इनके अन्तर्गत पंजाब में कंजली और हरिके, उड़ीसा में चिल्का, मणिपुर में लोकटक, चंडीगढ़ में सुखना और हिमाचल में रेणुका क्षेत्र हैं। इन जगहों में संरक्षण और उनके बारे में जागरुकता लाने के प्रयास किये जा रहे हैं।
इसके अलावा केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, सुन्दरवन, मनास और काजीरंगा को ‘अन्तरराष्ट्रीय विरासत’ का दर्जा दिया गया है। इन क्षेत्रों में देश-विदेश के मेहमान पक्षी आते हैं। इसलिये इनको बचाने के लिये अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं।
आर्द्रभूमियाँ व्यापक स्तर पर आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आधार रही हैं। इसीलिये 2 फरवरी, 1971 को 70 राष्ट्रों ने आर्द्रभूमियों पर एक सम्मेलन ईरान के रामसर शहर में बुलाया था। इसी दिन आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिये वहाँ एक अन्तरराष्ट्रीय सन्धि हुई थी जिसे रामसर सन्धि भी कहा जाता है। अब इस संधि पर 163 देशों ने हस्ताक्षर कर दिये हैं।
यह सन्धि विश्व के दुर्लभ व महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमियों को रामसर स्थल के रूप में चिन्हित करने के साथ ही अनेक अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिये जागरुकता का प्रसार करती है। इसीलिये 1997 से प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसके अन्तर्गत व्यापक रूप से आम लोगों को आर्द्रभूमियों के महत्त्व और लाभों के प्रति जागरूक करना है।
वर्ष 2013 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने जल सहयोग का अन्तरराष्ट्रीय वर्ष घोषित किया। इसलिये 2 फरवरी, 2012 को मनाए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय आर्द्रभूमि दिवस का विषय भी आर्द्रभूमि और जल प्रबन्धन से सम्बन्धित रखा गया।
अभी तक विश्व भर की 2062 आर्द्रभूमियों को रामसर क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया है जो करीब 19,72,58,541 हेक्टेयर में फैली हुुई हैं। इन क्षेत्रों में से 35 प्रतिशत क्षेत्र पर्यटन सम्भावित क्षेत्र हैं। इनमें से 45 आर्द्रभूमियों को विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया है। इस सूचि में भारत का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान भी शामिल है।
भारत ने इस समझौते पर 1981 में हस्ताक्षर किये और यहाँ के केवल 26 आर्द्रभूमियों को रामसर संरक्षित आर्द्रभूमियों का दर्जा हासिल है। जो 6,89,131 हेक्टेयर में फैली हैं।
उड़ीसा की चिल्का झील और राजस्थान का केवलादेव राष्ट्रीय पार्क रामसर के तहत संरक्षित होने वाले पहले दो दलदल थे। भारत का सबसे बड़ा रामसर साइट भीमबन्द-कोल वेटलैंड (1512.5 वर्ग कि.मी.) केरल में है।
वैसे हमारे देश में भी आर्द्रभूमि पर्यटन पर ध्यान दिया जा रहा है। इसके तहत गुजरात राज्य में पिछले तीन सालों से ‘ग्लोबल बर्ड वाॅचर्स कांफ्रेंस’ की जा रही है। ऐसे आयोजनों का उद्देश्य यही होता है कि आर्द्रभूमियों को बढ़ते प्रदूषण, बदलती जलवायु और अनियंत्रित विकास से उत्पन्न खतरों आदि से बचाया जा सके ताकि इन क्षेत्रों में हमेशा जीवन के विविध रूप मुस्कुराते रहें।
| क्रं. | आर्द्रभूमि | अधिसूचित | राज्य | क्षेत्रफल (हेक्टेयर) |
|---|---|---|---|---|
| 1 | अष्टमुडी आर्द्रभूमि | 19.08.2002 | केरल | 61400 |
| 2 | भितरकनिका मैंग्रोव आर्द्रभूमि | 19.08.2002 | उड़ीसा | 65000 |
| 3 | भोज ताल | 19.08.2002 | मध्य प्रदेश | 3201 |
| 4 | चन्द्रताल आर्द्रभूमि | 08.11.2005 | हिमाचल प्रदेश | 49 |
| 5 | चिल्का | 01.10.1981 | उड़ीसा | 116500 |
| 6 | डिपोल बिल | 19.08.2002 | असम | 4000 |
| 7 | पूर्वी कोलकाता आर्द्रभूमि | 19.08.2002 | पश्चिम बंगाल | 12500 |
| 8 | हरिका झील | 23.03.1990 | पंजाब | 4100 |
| 9 | होकेरा आर्द्रभूमि | 08.11.2005 | जम्मू एवं कश्मीर | 1375 |
| 10 | कंजिली | 22.01.2002 | पंजाब | 183 |
| 11 | केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान | 01.10.1981 | राजस्थान | 2873 |
| 12 | कौलुरू झील | 19.08.2002 | आंध्र प्रदेश | 90100 |
| 13 | लोकटक झील | 23.03.1990 | मणिपुर | 26600 |
| 14 | नलसरोवर पक्षी अभयारण्य | 24.09.2012 | गुजरात | 12000 |
| 15 | पाइंट कैलिमर वन्यजीव अभयारण्य एवं पक्षी विहार | 19.08.2002 | तमिलनाडु | 38500 |
| 16 | पोंग बाँध झील | 19.08.2002 | हिमाचल प्रदेश | 15662 |
| 17 | रेणुका आर्द्रभूमि | 08.11.2002 | हिमाचल प्रदेश | 20 |
| 18 | रोपर | 22.01.2002 | पंजाब | 1365 |
| 19 | रुद्रसागर झील | 08.11.2002 | त्रिपुरा | 240 |
| 20 | सांभर झील | 23.03.1990 | राजस्थान | 24000 |
| 21 | साथामुकोटा झील | 19.08.2002 | केरल | 373 |
| 22 | सुरिनसर-मान्सर झील | 08.11.2005 | जम्मू एवं कश्मीर | 350 |
| 23 | सौमित्री | 19.08.2002 | जम्मू एवं कश्मीर | 12000 |
| 24 | ऊपरी गंगा नदी | 08.11.2005 | उत्तर प्रदेश | 26590 |
| 25 | बेमनाड-कोल आर्द्रभूमि | 19.08.2002 | केरल | 151250 |
| 26 | वुलर झील | 23.03.1990 | जम्मू एवं कश्मीर | 18900 |
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नवनीत कुमार गुप्ता
परियोजना अधिकारी,
विज्ञान प्रसार, सी-24, कुतूब संस्थानिक क्षेत्र
नई दिल्ली -110016
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