सिक्किम के सूखते झरने हिमालय में गहराते जल संकट का संकेत हैं, जहां घटती बर्फबारी, जलवायु परिवर्तन और कमजोर पुनर्भरण क्षेत्र भारत की जल सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं।

 

चित्र: ICIMOD

जलवायु परिवर्तन

क्यों खत्म हो रहा है हिमालय का पानी? सिक्किम से मिल रहे बड़े संकेत

हिमालय को भारत और एशिया का “जल-स्तंभ” माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में यह प्रणाली कमजोर पड़ती दिख रही है। हिमालय का पानी क्यों सूख रहा है, इसके बड़े संकेत सिक्किम मिल रहे हैं... पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

बचपन से ही जब हम पहाड़ों के बारे में सोचते हैं, तो हमारे मन में लगभग एक ही तस्वीर उभरती है। बर्फ से ढकी चोटियां, बादलों के बीच से बहती जलधाराएं और हर मोड़ पर पानी की कलकल की आवाज़। लेकिन हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के बीच हिमालय में जल संकट गहरा रहा है। वैसे तो इसके कई कारण हैं, लेकिन एक बड़ा कारण सिक्किम से मिला है। वो है सूखते झरने!

सिक्किम के कई हिस्सों में लोगों से पानी के उपयोग में कमी लाने की अपील की गई है और कुछ क्षेत्रों में जलापूर्ति को दिन में केवल एक बार तक सीमित कर दिया गया है। दरअसल जिन राज्य के कई झरने सूख चुके हैं और कई धीरे-धीरे सूख रहे हैं। यह केवल एक मौसमी समस्या नहीं, बल्कि हिमालय के बदलते जल चक्र की गंभीर चेतावनी है।

सिक्किम सरकार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच राज्य में अच्‍छी बारिश या हिमपात नहीं हुआ।

हिमालय का बदलता जल चक्र

हिमालय को लंबे समय से एशिया का “वॉटर टावर” कहा जाता है। यही पर्वत-श्रृंखला गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और उनकी सहायक नदियों के विशाल जलग्रहण तंत्र को जीवन देती है। बर्फ, ग्लेशियर, मौसमी हिमपात, झरने और वर्षा मिलकर उस जटिल जल चक्र का निर्माण करते हैं, जिस पर करोड़ों लोगों की पेयजल, कृषि और ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें निर्भर करती हैं।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह जल चक्र तेजी से अस्थिर होता दिख रहा है। सिक्किम सरकार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच राज्य में अच्‍छी बारिश या हिमपात नहीं हुआ। नतीजतन, जलस्रोतों का डिस्चार्ज सितंबर 2025 की तुलना में लगभग 50 फ़ीसद तक घट गया।

यह केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं है। यह हिमालयी जल व्यवस्था में गहराते संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है। बर्फ अब कम समय तक टिक रही है, तेजी से पिघल रही है, और धीरे-धीरे रिसकर जलस्रोतों को पुनर्भरित करने के बजाय अचानक अपवाह (runoff) के रूप में नीचे बह जा रही है। इसका असर कुछ महीनों बाद झरनों, धाराओं और गर्मियों के आधार प्रवाह (baseflow) में साफ दिखाई देता है।

अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र ICIMOD के हालिया विश्लेषण भी इस बात का संकेत देते हैं कि हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में बर्फ के टिकने की अवधि और उसके पिघलने के पैटर्न में महत्त्वपूर्ण बदलाव आया है। इसका सीधा असर क्षेत्र के जल-संतुलन पर पड़ रहा है।

सूखते झरने: असली संकट की शुरुआत

हिमालयी जल संकट को अक्सर ग्लेशियरों के संदर्भ में देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। सिक्किम जैसे राज्यों में जल व्यवस्था का बड़ा हिस्सा spring-fed systems यानी झरनों और छोटी धाराओं पर आधारित है।

जब सर्दियों में पर्याप्त हिमपात और वर्षा नहीं होती, तो इन झरनों का पुनर्भरण कमजोर पड़ जाता है। परिणामस्वरूप वसंत और गर्मियों में जल उपलब्धता घट जाती है। यही कारण है कि अब कई पहाड़ी कस्बों में पानी की आपूर्ति सीमित करनी पड़ रही है।

इस संकट का एक मानवीय पक्ष भी है। ऊंचाई पर बसे गांवों में पानी की उपलब्धता घटने पर सबसे पहले असर महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ता है, जिन्हें दूर-दराज के स्रोतों से पानी लाना पड़ता है। कई क्षेत्रों में जल संकट अब घरों से पहले रास्तों और पगडंडियों पर दिखाई देने लगा है जब महिलाएं दूर स्थित जल स्रोतों से पानी लाने के लिए हाथ में ख़ाली बर्तन लेकर घर से निकलती हैं।

ऊंचाई पर बसे गांवों में पानी की उपलब्धता घटने पर सबसे पहले असर महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ता है, जिन्हें दूर-दराज के स्रोतों से पानी लाना पड़ता है।

यह केवल सिक्किम की कहानी नहीं

सिक्किम का जल संकट किसी एक राज्य की स्थानीय समस्या नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र में उभरते जल असंतुलन की झलक है।

उत्तराखंड में स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARRA) के आंकड़े बताते हैं कि कई जिलों में प्राकृतिक जलस्रोतों के पुनर्भरण में गंभीर गिरावट दर्ज की गई है। बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे जिलों में नौले, धारे और पारंपरिक जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में भी स्थिति चिंताजनक है। कांगड़ा और चंबा जिलों में जलापूर्ति योजनाएं शीतकालीन वर्षा और हिमपात की कमी से प्रभावित हुई हैं। कई योजनाएं आंशिक रूप से निष्क्रिय हो चुकी हैं, जिससे गर्मियों में जल संकट और गहरा होने की आशंका है।

हिमाचल प्रदेश में सर्दियों के दौरान सामान्य से उल्लेखनीय रूप से कम वर्षा और हिमपात दर्ज किया गया, जिसका सीधा असर जलधाराओं आधारित प्रणालियों और भूजल पुनर्भरण (groundwater recharge) पर पड़ा।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि हिमालयी जल संकट अब क्षेत्रीय नहीं, बल्कि प्रणालीगत (systemic) समस्या बन चुका है।

बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे जिलों में नौले, धारे और पारंपरिक जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से आगे: विकास मॉडल पर सवाल

यह संकट केवल कम बारिश या कम हिमपात की कहानी नहीं है। जलवायु परिवर्तन इसका एक प्रमुख कारण है, लेकिन पूरी व्याख्या नहीं। उतना ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हिमालयी क्षेत्रों का विकास मॉडल स्वयं जल तंत्र के खिलाफ काम कर रहा है।

पहाड़ों में जल केवल वर्षा से नहीं आता, बल्कि वह मिट्टी, ढलानों, जंगलों और चट्टानों के माध्यम से धीरे-धीरे रिसकर झरनों और धाराओं के रूप में बाहर आता है। यही प्रक्रिया जल चक्र की स्थिरता का आधार है।

लेकिन जब इन पुनर्भरण क्षेत्रों (recharge zones) पर सड़कें, होटल, पार्किंग और कंक्रीट संरचनाएं बनती हैं, तो पानी के प्राकृतिक रिसाव मार्ग बाधित हो जाते हैं। इससे वर्षा जल तेजी से बहकर चला जाता है, और जमीन के भीतर पुनर्भरण की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।

हिल कटिंग, अनियोजित शहरीकरण और बढ़ता पर्यटन दबाव इस समस्या की गंभीरता को बढ़ा रहे हैं। इन क्षेत्रों में होने वाले हर नए निर्माण से केवल भूमि की पारिस्थितिकी नहीं बदलती बल्कि जल के अदृश्य प्रवाह पर भी इसका असर पड़ता है।

पीक सीजन में जल मांग स्थानीय क्षमता से अधिक हो जाती है, जिससे स्थायी निवासियों और पर्यटन उद्योग के बीच संसाधन प्रतिस्पर्धा (resource competition) बढ़ती है।

विकास, शासन और पारिस्थितिकी के बीच बढ़ता तनाव

हिमालयी जल संकट केवल जलवायु परिवर्तन या प्राकृतिक असंतुलन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह शासन और विकास नियोजन की संरचनात्मक सीमाओं को भी उजागर करता है। 

कई पर्वतीय राज्यों में जल संसाधन प्रबंधन अभी भी क्षेत्रीय दृष्टिकोण (sectoral approach) पर आधारित है। यहां जल, शहरी विकास, पर्यटन और पर्यावरणीय नियोजन अलग-अलग संस्थागत ढांचों में काम करते हैं। इस खंडित शासन के कारण जल पुनर्भरण क्षेत्रों की सुरक्षा एकीकृत रूप से सुनिश्चित नहीं हो पाती।

इसके साथ ही, पर्वतीय क्षेत्रों में विकास मॉडल अक्सर पारिस्थितिक वहन क्षमता (ecological carrying capacity) को ध्यान में रखे बिना विस्तार करता है।

सड़क निर्माण, होटल विकास और शहरी विस्तार कई बार उन संवेदनशील ढलानों और जलग्रहण क्षेत्रों में होते हैं जहां प्राकृतिक जल रिसाव (infiltration) सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। परिणामस्वरूप, जल का प्राकृतिक पुनर्भरण बाधित होता है और वर्षा जल तेजी से सतही बहाव (surface runoff) के रूप में नष्ट हो जाता है।

पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था इस समस्या की जटिलता को बढ़ा देती है। पीक सीजन में जल मांग स्थानीय क्षमता से अधिक हो जाती है, जिससे स्थायी निवासियों और पर्यटन उद्योग के बीच संसाधन प्रतिस्पर्धा (resource competition) बढ़ती है। 

कई क्षेत्रों में यह स्थिति स्थानीय जलस्रोतों के असमान उपयोग और अस्थायी जल संकट का कारण बन जाती है, जिससे जल प्रबंधन में नियामक (regulatory) अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

क्या हिमालयी क्षेत्रों का विकास मॉडल स्वयं जल तंत्र के खिलाफ काम कर रहा है?

पर्यटन और जल दबाव

उत्तराखंड जैसे राज्यों में पर्यटन आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसका जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कई क्षेत्रों में स्थानीय जलस्रोत पर्यटन मौसम के दौरान अतिरिक्त मांग के कारण प्रभावित होते हैं।

होटल, होमस्टे और अन्य सुविधाएं स्थानीय जल आपूर्ति प्रणालियों पर निर्भर होती हैं, जिससे पीक सीजन में स्थानीय निवासियों के लिए जल उपलब्धता कम हो जाती है।

यह स्थिति एक विरोधाभास पैदा करती है। एक तरफ जहां पर्यटन से नए आर्थिक अवसर मिलते हैं, वहीं दूसरी तरफ वही संसाधन प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ICIMOD द्वारा विकसित स्प्रिंगशेड प्रबंधन (springshed management) का ढांचा हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक वैज्ञानिक और समुदाय-आधारित समाधान प्रस्तुत करता है।

समाधान की दिशा

इस संकट का समाधान केवल पाइपलाइनों या वैकल्पिक जल स्रोतों में नहीं है। वास्तविक समाधान जल के मूल स्रोतों यानी झरनों और उनके पुनर्भरण क्षेत्रों की बहाली में है।

सिक्किम का धारा विकास मॉडल इसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इस मॉडल में कंटूर ट्रेंच (contour trenches), पुनर्भरण पिट और वनस्पति अवरोध (vegetative barriers) जैसे उपायों के माध्यम से वर्षा जल को ढलानों से तेजी से बह जाने के बजाय भूमि में रिसने का अवसर दिया जाता है। इससे झरनों के आधार प्रवाह (baseflow) में सुधार होता है और मौसमी जल उपलब्धता अधिक स्थिर रहती है।

राष्ट्रीय स्तर पर जल संरक्षण की दिशा में जल जीवन मिशन और एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP) जैसे प्रयास महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये कार्यक्रम केवल जल आपूर्ति के विस्तार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वर्षा जल संचयन, मृदा संरक्षण और प्राकृतिक पुनर्भरण तंत्र को मजबूत करने पर भी जोर देते हैं। विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में इन योजनाओं का उद्देश्य स्रोत-आधारित जल सुरक्षा (source sustainability) को सुनिश्चित करना है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ICIMOD द्वारा विकसित स्प्रिंगशेड प्रबंधन (springshed management) का ढांचा हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक वैज्ञानिक और समुदाय-आधारित समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान, भू-जल प्रवाह का विश्लेषण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के माध्यम से झरनों के पुनर्जीवन की प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया जाता है।

लेकिन केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। पुनर्भरण क्षेत्रों की सुरक्षा, अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण, और जल प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को संस्थागत रूप देना ज़रूरी है।

हिमालयी जल संकट को केवल जलवायु परिवर्तन, कम वर्षा या स्थानीय प्रबंधन की विफलता के रूप में देखना अधूरा होगा। यह दरअसल एक प्रणालीगत (systemic) असंतुलन है, जिसमें जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास, कमजोर शासन संरचना और बदलता भूमि उपयोग एक साथ मिलकर पर्वतीय जल-तंत्र की प्राकृतिक लय को बाधित कर रहे हैं। 

झरनों और नदियों का सूखना केवल जल की कमी का संकेत नहीं है, बल्कि यह उस पूरे पारिस्थितिक और संस्थागत ढांचे के कमजोर पड़ने का संकेत है जिस पर हिमालयी जीवन-व्यवस्था निर्भर करती है। यदि पुनर्भरण क्षेत्रों की सुरक्षा, वैज्ञानिक जल नियोजन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो यह संकट केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों के माध्यम से करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा को प्रभावित करेगा।

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