अप्रैल-मई में इस प्रकार हुआ था केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ आंदोलन 

 
संघर्ष और विवाद

केन-बेतवा परियोजना : 34 हजार में कैसे घर बनवाएं किसान? क्या फिर से होगा आंदोलन?

केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित किसानों का कहना है कि 30-40 हजार रुपये में घर बनाना संभव नहीं। पुनर्वास और मुआवजे को लेकर फिर आंदोलन की आशंका जताई जा रही है।

Author : सतीश भारतीय

केन–बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन अप्रैल 2026 में हुआ जब आदिवासी और किसान समुदाय के लोग मुआवज़ा समेत कई अन्य मांगों को लेकर नदी किनारे सांकेतिक चिता बिछा कर लेट गए, जल सत्याग्रह किया, मिट्टी आंदोलन और अनशन भी। सरकार के आश्‍वासन के बाद आंदोलन स्थगित तो हो गया, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, क्योंकि सभी मांगों में सबसे बड़ी मांग मुआवज़े की है और उस पर फिलहाल संतोषजनक फैसला नहीं हुआ है। 

तो क्या केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ फिर से आंदोलन होगा? यह सवाल इसलिए मुखर हो रहा है क्योंकि अब किसानों की रोज़मर्रा का जीवन प्रभावित होने लगा है। घर के चूल्हे से लेकर बच्चों के भविष्‍य तक पर संकट मंडरा रहा है।   

क्या है केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट? 

केन-बेतवा लिंक परियोजना एक नदी जोड़ो परियोजना है‌। जिसमें  केन नदी का पानी बेतवा में स्थानांतरित  किया जाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में वर्ष 2021 में परियोजना के कार्यान्वयन को मंजूरी दी गई थी। इस परियोजना से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं - 

  • इस परियोजना में 23 लाख पेड़ों को काटा जाना है। 

  • परियोजना के चरण 1 में केन नदी पर  77 मीटर ऊंचा दौधन बांध बनाया जाएगा। 

  • दोनों नदियों को जोड़ने वाली लिंक नहर की कुल लंबाई 221 किमी होगी। 

  • यह नहर बीच में करीब 2 किलोमीटर लंबी सुरंग से होकर गुजरेगी। 

  • परियोजना के चरण 2 में कुल 10.62 लाख हेक्टेयर वार्षिक सिंचाई का अनुमान है। 

  • इससे लगभग  62 लाख आबादी को पेयजल आपूर्ति का अनुमान है। 

  • 103 मेगावाट जल विद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन होने की भी उम्मीद है।

मध्‍य प्रदेश से निकलती केन नदी 

इस परियोजना की कुल लागत 2020-21 के मूल्य स्तर पर  44,605 करोड़ रुपये आंकी गई है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस परियोजना के लिए 39,317 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता को मंजूरी दी है, जिसमें 36,290 करोड़ रुपये का अनुदान और  3,027 करोड़ रुपये का ऋण शामिल है। कुछ शर्तों के साथ इस परियोजना को पर्यावरण मंजूरी भी दी गई है। वहीं,  8 वर्ष में परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य है। परियोजना के बारे में विस्तार से पढ़ें। 

परियोजना से प्रभावित हुए 1913 परिवार   

बुंदेलखंड में जल संकट को‌ दूर करने के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना को‌ आकार दिया जा रहा है। इस परियोजना का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिलान्यास भी कर चुके हैं। परियोजना में एक विशाल जलाशय का निर्माण किया जाएगा जिसके कारण कुल  9,000 हेक्टेयर भूमि डूब जाएगी। जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व (पीटीआर) कोर की 4,141 हेक्टेयर, पीटीआर बफर की 1,314 हेक्टेयर और 10 गांवों की 2,171 हेक्टेयर भूमि शामिल है। इन जमीनों पर तमाम गॉंवों बसे हुए हैं जहां के लगभग 1,913 परिवार प्रभावित होंगे। इस स्थति में प्रभावित परियोजना में उचित मुआवजा ना मिलने की शिकायतें शिलान्यास के बाद से आने लगीं। प्रभावितों ने उचित मुआवजे पाने के लिए तमाम ज्ञापन दिए लेकिन अब तक सुनवाई नहीं हुई है।

केन-बेतवा लिंक परियोजना की वजह से विस्थापित किसान एवं आदिवासी समुदायों के लोग 

मुआवजे के लिए आंदोलन

बीते अप्रैल माह में मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में परियोजना से प्रभावित आदिवासियों और किसानों ने आंदोलन किया। आंदोलन में मुख्य रूप से मुआवज़े, पुनर्वास और विस्थापन के मुद्दों को लेकर हुआ था। यह आंदोलन 5 अप्रैल से शुरू हुआ और करीब 12 दिनों तक चला था। हालाँकि, आदोंलन के दूसरे दिन 4 अप्रैल को ही प्रशासन द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा-163 भी लगा दी। जिसके तहत सभा करने, एकजुट होने पर रोक लगा दी। 

इस आदोंलन में प्रभावितों ने पंचतत्व सत्याग्रह किया। जिसमें प्रभावित जल में खड़े रहे। शरीर पर मिट्टी लगाई। चिता पर लेटे। फांसी लगाई। साथ में, भूख और चूल्हा बंद प्रदर्शन किया। इस दौरान गाँव हमारा-मनमानी तुम्हारी नहीं चलेगी’ जैसे कई नारे भी लगाए गए। आखिर में, प्रभावितों ने महाआंदोलन की चेतावनी देकर प्रशासन को मुआवजा पर पुन: विचार का वक्त दिया।

केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ अप्रैल-मई 2026 में इस तरह हुआ था आंदोलन 

नहीं मिला पर्याप्त मुआवज़ा तो कैसे होगा पुनर्वास? 

केन-बेतवा लिंक परियोजना में प्रभावितों से जब बात की तो पता चला कि किसी को मुआवज़ा कम मिला है तो किसी के मुआवजे में कटौती हुई है। और जिस दर से मुआवज़ा दिया भी गया वो पर्याप्त नहीं है। आलम यह है कि पैसे की कमी परिवारों को संकट में डाल रही है। 

अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कदवारा गाँव के 27 वर्षीय मनोज अहिरवार ने कहा, “हमारी 2.5 एकड़ जमीन है। इस जमीन का मुआवजा 5 लाख रुपए एकड़ के हिसाब से मिला है। जबकि, हमें सरकार प्लाट दे रही है उसका 5 लाख 50 हजार रुपए काट रही है। यह क्या हमारे साथ न्याय हुआ।?”  

मध्‍य प्रदेश का कदवारा गॉंव 

इसी गॉंव की 25 वर्षीय पार्वती अहिरवार बताती है कि उनके दो मंजिला मकान, बाथरूम और किचिन का मुआवजा 80 हजार रुपए दिया गया है। नया घर बनाए तो कैसे बनाएं।

राजेन्द्र अहिरवार (28) बताते हैं, “हमारे परिवार में 10 सदस्यों की जीविका 5 एकड़ भूमि पर कृषि से चलती है। लेकिन, 5 एकड़ भूमि का 5 लाख के हिसाब से 25 लाख रुपए मुआवजा आया है। कृषि के आलवा हमारे पास कोई स्किल और रोजगार  नहीं है। अब जमीन खरीदने जा रहे हैं तब 10 लाख रुपए एकड़ मिल रही है। ऐसे में हम जमीन नहीं खरीद पा रहे।” 

घर बनाने के लिए मिला 34 हजार रुपए मुआवज़ा 

गाँव में हम आगे हम निरसिया अहिरवार (65), प्रसादी अहिरवार (60), कविता अहिरवार (50), दिविया अहिरवार (52) से भी बात की तो पता चला कि निरसिया को 4 कमरों का 80 हजार रुपए मुआवजा मिला। प्रसादी को दो मंजिला घर का 60 हजार रुपए और कविता अहिरवार को घर के मुआवजे के नाम पर सिर्फ 34 हजार रुपए का नोटिस मिला। 

नैगुवां गाँव के प्रभावित आदिवासी सुरेन्द्र सौर (34) की मानें तो जब-जब मुआवज़े के लिए जाते हैं, तब तब पैसे की डिमांड रख दी जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी 30-30 हजार रुपए लेकर मुआवजे की फाइल आगे बढ़ा रहे हैं।  

गाँव के प्रकाश सौर (26), मिट्ठू सौर (55), मल्ला सौर (30) से भी हमारी बात होती है। तीनों ग्रामीण कहते हैं कि उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला है। मुआवजा नहीं मिला तो हम कैसे अपना घर छोड़ दें? जब हमारा घर ही नहीं रहेगा, तब हमारे पास बचेगा क्या? उन्‍होंने सरकार से दरख्‍वास्त की कि सरकार एक सम्मानजनक मुआवजा प्रदान कर दे। ताकि वे अपने परिवार के लिए अच्छा घर बना सकें।

टूटे मकान के बाहर बैठे किसान 

आधा मुआवज़ा मिला, आधा कब मिलेगा पता नहीं? 

नैगुवां गाँव के बाद हम पलकोंहा गाँव गए तो पाया कि यहां के कई ग्रामीणों को आधा-अधूरा मुआवजा मिला है। रामचरण अहिरवार (40) ने कहा, “हमारी करीब 15 एकड़ जमीन हैं। जो परियोजना में अधिग्रहित की गई है। इस जमीन से केवल 5 एकड़ जमीन का मुआवजा मिला है। जबकि, 10 एकड़ जमीन का मुआवजा अभी भी नहीं मिला है। हमारे 2 घर भी बने हुए हैं। इन घरों का भी कोई मुआवजा हमें नहीं मिला। ना ही मुआवजा का कोई नोटिस मिला है। हमें समझ नहीं आ रहा मुआवजा वितरण की कैसे प्रक्रिया है।”

कुंजिलाल अहिरवार (60) भी घर के मुआवजा से वंचित रह गए हैं। वे हमें मुआवजा का नोटिस दिखाते हुए कहते हैं कि 2023 से मुआवजे के लिए शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं। बावजूद अभी तक मुआवजा नहीं आया।

किसान अयोध्‍या सिंह अहिरवार 

केन-बेतवा लिंक के प्रभावित किसान कैसे काटेंगे ज़िंदगी?

स्थानीय किसान अयोध्या अहिरवार (75) की मानें तो इस परियोजना की मुआवजा सूची में उनका नाम नहीं है। मेरे लिए मुआवजा हासिल करना तो और कठिन है। मेरे दो घर हैं। पहले घर में 4 कमरे बने हुए हैं। वहीं, दूसरा घर दो मंजिला है। इसके अलावा हमारी ढेड़ एकड़ जमीन भी है। इस सबका हमें कोई मुआवजा नहीं मिला है।

आगे अयोध्या यह भी दावा करते हैं कि, ‘गाँव में कई लोगों के पास सरकारी पट्टे वाली  जमीन थी। जिनके पट्टे का मुआवजा देने के बजाए प्रशासन ने पट्टे ही निरसस्त कर दिए। इससे समझ आता है कि, पट्टे वाली जमीन की कोई कीमत नहीं तब सरकार क्यों यह जमीन देती है।

सुकवाहा गॉंव के सरपंच भगवान सिंह गोंड 

सुकवाहा गाँव के सरपंच भगवान सिंह गोंड (65) के अनुसार सुकवाहा गाँव में मुआवजे की स्थिति बेहद गंभीर हे। उन्‍होंने कहा कि परियोजना के अंतर्गत आने वाले गाँव में ग्रामीणों की ज़मीनों को प्रशासन ने जांच प्रक्रिया में डलवा दिया। वहीं, बड़े पैमाने पर किसानों की ज़मीनों पर लगे पेड़-पौधों का मुआवजा सर्वे नहीं किया गया। लोगों के घरों का कम मुआवजा दिया जा रहा है। 

आगे सरपंच भगवान सिंह यह भी कहते हैं, “परियोजना में प्रमुख समस्या यह है कि, मुआवजा संबंधी प्रक्रियाएं व्यवस्थित ढंग से नहीं की जा रहीं है। जबकि, मेरे पास कई ग्रामीण मौखिक तौर पर मुआवजे में भ्रष्टाचार की शिकायत लेकर आते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि, हमसे हजारों से लेकर लाखों रुपए आधिकारी ले रहे हैं हमारा मुआवजा देने के लिए।” 

मुआवज़े की सूची से पूरा का पूरा गॉंव वंचित 

केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा हेतु शासन-प्रशासन और राजनैतिक लोगों को ज्ञापन भी लिखे गए। यह ज्ञापन ग्रामवासी और कई संगठन बार-बार देते आ रहे हैं। इन्हीं में से एक ज्ञापन आदिवासी युवा शक्ति संगठन द्वारा राष्ट्रपति के नाम 16 दिसम्बर 2024 को दिया गया। ज्ञापन में लिखा है कि, परियोजना से पन्ना जिले के 8 गांव कूडन, गहदरा, रक्सेहा, कोनी, कटारी, बिल्हटा, खमरी और महरा प्रभावित क्षेत्र हैं। इन गांवों का उचित मुआवजा नहीं दिया जा रहा है और पुनर्वास व पुर्नस्थापना से भी वंचित किया जा रहा है।

सुकवाहा गॉंव, मध्‍य प्रदेश 

पत्र में आगे उल्लेख है कि, परियोजना की पूर्ण जानकारी दिए बिना, सरपंच, जनप्रतिनिधियों, लोगों से जानकारी छिपाकर क्षेत्र को विस्थापित किया जा रहा है। मुआवजा राशि एवं विस्थापन प्रक्रिया पूर्ण किए बिना प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा एनओसी जारी करके वन विभाग को विस्थापित क्षेत्र स्थानांतरित कर दिया है। जिससे कृषि और वन से जुड़ी आय पर रोक लगा दी गई है। ऐसे में लोग बेरोजगार हो गए हैं। 

ज्ञापन पत्र में संगठन ने मांगे भी दर्ज की। इन मांगों में लिखा गया है कि परियोजना की वितरण राशि पैकेज में 18 वर्ष के वयस्कों को भी शामिल किया जाए। परियोजना में विस्थापन प्रक्रिया का पुनः सर्वे करके राशि वितरित की जाए। विस्थापितों को भूमि आवंटित की जाए। विस्थापितों के पुनर्वास में बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी अन्य सुविधाएं मुहैया करवायी जाएं। 

इसके पहले भी जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन ने परियोजना से संबंधित एक पत्र कलेक्टर के नाम दिनांक 08/10/2024 को लिखा। पत्र में लिखा गया कि, परियोजना विस्थापन में हमारी मांगें नहीं मानी गई, तब अपनी आवाज हम हाई कोर्ट तक ले जायेगें। ऐसे ही एक पत्र परियोजना से प्रभावित लोगों ने दिनांक 18/09/2024 को जिला कलेक्टर पन्ना के नाम लिखा। पत्र में लिखा गया कि, परियोजना प्रभावित ग्रामीणों को जब तक पैकेज और मकान राशि का भुगतान नहीं किया जाता तब तक हमको कृषि करने की अनुमति दी‌ जाए। 

वहीं, परियोजना प्रभावित ग्राम डुगरिया, ग्राम पंचायत राईपुरा के ग्रामवासियों ने एक पत्र  कलेक्टर के नाम लिखा। जिस पर दिनांक 27/12/2022 उल्लिखित है। इस पत्र में वर्णित है कि, पन्ना के बिजावर तहसील‌ के डुगरिया, ढोढन, पलकौहा, खरयानी, मैनारी, सुकवाहा जैसे अन्य कुल मिलाकर 15 गांव को विस्थापित किया जाना है। ये 15 गांव‌ आदिवासी बाहुल्य गांव हैं। जिन्हें पन्ना नेशनल पार्क के गांव भी माना जाता है। बड़ी मेहनत से इन गांव में लोगों ने खेत और घर बनाए हैं। यहां बिजली-सड़क जैसी सुविधाएं दशकों बाद आई हैं। परियोजना के विस्थापन में आदिवासी और ग्रामवासियों से राय तो दूर नियमत: उन्हें जानकारी तक नहीं दी जा रही। 

कन-बेतवा परियोजना पर जारी निर्माण कार्य 

केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरुद्ध किसानों ने दर्ज की आपत्तियां  

पत्र में आगे केन-बेतवा लिंक परियोजना अधिग्रहण से संबंधित आपत्तियों का उल्लेख किया गया। इन आपत्तियों में लिखा गया कि, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम 2013 के अंतर्गत अधिग्रहण की जानकारी दी जाए। वर्तमान प्रस्तावित अधिग्रहण की ग्राम पंचायत या ग्रामसभा से कोई भी स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई है। जो गैरकानूनी है। 

आगे लिखा गया है कि, परियोजना विस्थापन में लोगों की राय ली जाए कि, वह गांव छोड़ना चाहते हैं या नहीं। जो गांव छोड़ना चाहता है उस वोटर को 30 लाख रुपए और जमीन के बदले जमीन या जमीन का मुआवजा 50 लाख रुपए हेक्टेयर दिया जाए। भूमिहीनों के लिए कम से कम तीन एकड़ जमीन दी जाए। शिक्षित युवाओं को रोजगार और सभी ग्रामों को सुविधा दी जाएं। इन्हीं मांगों के साथ अधिग्रहण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए। 

केन-बेतवा लिंक परियोजना के विषय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र सामाजिक कार्यकर्ता और आप (आम आदमी पार्टी) से जुड़े रहे अमित भटनागर ने भी लिखा। पत्र पर दिनांक 22/12/2024 अंकित है। इस पत्र के कुछ अंश में अमित भटनागर लिखते हैं कि, परियोजना भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 का गंभीर उल्लंघन करती है।

केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित होंगे बाघ 

केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने  एक रिसर्च की है। जिसमें बताया गया है कि,  इस परियोजना के कारण पन्ना बाघ अभ्यारण (पन्ना टाइगर रिजर्व (पीटीआर)) का एक बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाएगा। तब रिजर्व में स्थित बाघों के आवास क्षेत्र का  58.03 वर्ग किमी (10.07%) का प्रत्यक्ष अनुमानित नुकसान होगा। इसके अतिरिक्त उनके आवास के विखंडन एवं संपर्क टूटने से मुख्य बाघ क्षेत्र का  105.23 वर्ग किमी हिस्सा अप्रत्यक्ष तौर से प्रभावित होगा। इससे बाघों के साथ-साथ अन्य वन्य जीवों चीतल, सांभर आदि खतरे में हैं। साथ ही 20 लाख पेड़ों का नुकसान होगा। 

(वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (फारेस्ट एडवाइजरी कमेटी) की एक मीटिंग के मिनट्स के अनुसार इस परियोजना के लिए संभवत 46 लाख पेड़ों को काटा जायेगा।) राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) पहले ही इस पर अपनी चिंता व्यक्त कर चुकी है। 

किसानों व आदिवासियों को संबोधित करते अमित भटनागर 

सामाजिक कार्यकर्ता, एक्सपर्ट और एड्वोकेट का विचार 

इस परियोजना सालों से प्रभावितों के मुआवजे की लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर से जब हमने बात की तो उन्हों ने कहा, “परियोजना में बहुत से विस्थापित उचित मुआवज़े से वंचित रह गए हैं। वहीं, परियोजना से 46 लाख पेड़ों का कटना, जंगल उजड़ना, टाइगर रिज़र्व का बर्बाद होना, आदिवासी जनजीवन नष्ट होने का संकट है।”

अमित भटनागर ने आगे कहा, “सदियों में अपना जीवन संभार पाए लोगों को ऐसी परियोजनाएं एक झटके में उजाड़ देती हैं। ऐसे में सरकार कोई और विकल्प भी तलाश  सकती है। वहीं, इस परियोजना में भू-अर्जन और विस्थापन कानूनों का उचित पालन नहीं हो रहा। ऐसे में प्रभावितों के मुआवजा संबंधी अधिकार बाधित हो रहे हैं।“

पन्ना टाइगर रिजर्व में बाधित होगी जानवरों की आवाजाही 

केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर हमने पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट देहरादून में इनवॉरमेन्टल क्वालिटी मानीटरिंग ग्रुप के डायरेक्टर अनिल गौतम से भी उनका नजरिया जाना। उन्होंने कहा कि इस परियोजना लोगों को उचित मुआवजे की चुनौती तो झेलनी ही पड़ रही है मगर, इसके साथ परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व को डूबने, जानवरों के आवागमन पर संकट, नदियों की जैव-विविधता में बदलाव जैसे संकट भी पैदा होगें। इस परियोजना निर्माण में तर्क रखा गया कि, केन नदी में ज्यादा पानी है और बेतवा में कम पानी है। यह तर्क सही नहीं है। क्योंकि दोनों में वर्षा दर समान है।

पन्ना टाइगर रिजर्व

केन और बेतवा नदी के पानी की गुणवत्ता होगी प्रभावित 

आगे अनिल गौतम बयां करते हैं, “कोई भी नदी तब तक नदी मानी जाती है जब तक उसका पानी बहता रहता है। अगर पानी को एक जगह रोक दिया जाए तब पानी की गुणवत्ता भी खत्म होगी और जलीय जीव-जंतुओं पर भी खराब प्रभाव पड़ेगा। देखा जाए तब नदियां प्राकृतिक हैं। ऐसे में केन-बेतवा नदी को लिंक करना प्रकृति के विरुद्ध भी है।”

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जबलपुर के ऐड्वोकेट राहुल श्रीवास्तव से भी हमने केन-बेतवा लिंक परियोजना में प्रभावितों के कानूनी दायरे को लेकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि इस परियोजना में प्रभावित वर्ग की सुरक्षा लिए कई कानून हैं। जिनकी समीक्षा आवश्यक है। परियोजना के कानून और उसकी प्रक्रियाओं पर सरकार को ध्यान देना चाहिए ताकि, लोगों के मुआवजा सम्बधी अधिकार प्रभावित ना हो।

मध्‍य प्रदेश से बहती केन नदी 

आगे वह कहते हैं कि केन-बेतवा लिंक परियोजना में पुनर्वास नीति, 2013 के अनुसार  विस्थापित किए जा रहे लोगों की सहमति और असहमति का ध्यान रखते हुए सुविधाएं दी जानी चाहिए। वहीं, प्रभावितों के कम मुआवजा को लेकर कानूनी कार्यवाई करना चाहिए। जबकि, मुआवजा के संबंध में भ्रष्टाचार की स्थिति हो तब मामले में एफआईआर की जानी चाहिए।  

मुआवज़े को लेकर ज़‍िला कलेक्टर से बात करने की कोशिश कई बार की, पहले जवाब मिला कि शाम को बात करते हैं, लेकिन उसके बाद बार-बार फोन किए जाने पर भी उत्तर नहीं मिला।

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

SCROLL FOR NEXT