उत्तर बिहार में कोसी की उफनती लहरों और दलदली किनारों के बीच जीवन कभी आसान नहीं रहा। यहाँ हर साल नदी अपना रास्ता बदलती है, तटबंध टूटते हैं और बस्तियाँ पानी में समा जाती हैं। इस उथल-पुथल भरी ज़मीन पर जीने वाली मिथिला की औरतों के दिलों में देवी सीता की छवि केवल एक पूज्य देवी की नहीं, बल्कि अपने ही जैसी एक संघर्षशील स्त्री की है।
कोसी तटबंध के भीतर रहने वाली महिलाओं का मानना है कि जब मिथिला की राजकुमारी और अयोध्या की महारानी सीता का जीवन महलों के बजाय जंगलों की ठोकरों में बीता, तो वे तो साधारण इंसान हैं। यह सोच उनके भीतर एक गहरा संबल पैदा करती है। वे मानती हैं कि प्रकृति का प्रकोप, चाहे वह कोसी की प्रलयंकारी बाढ़ हो या विस्थापन का दर्द, अमीर और गरीब में भेद नहीं करता। जब महारानी सीता दुख से नहीं बच सकीं, तो कोई साधारण औरत विपदाओं से कैसे भाग सकती है?
इस क्षेत्र में औरतों का यह विश्वास जहाँ उन्हें बाढ़ और तबाही से जूझने का हौसला देता है, वहीं विवाह के बाद की एक कठोर सामाजिक सच्चाई को भी बयां करता है। मिथिला की परंपरा में यह मान लिया गया है कि सीता की तरह हर नारी में वह शक्ति है कि वह ससुराल की हर कठिन परिस्थिति को सह ले। लेकिन इस सहनशीलता के पीछे एक मौन लाचारी भी छिपी है, विवाह के बाद बेटी के लिए मायके वापसी के सारे रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं।
सिया देवी (बायीं ओर)
कोसी क्षेत्र में शोध कार्य के दौरान 74 वर्ष की सिया देवी से मुलाक़ात हुई। उनके झुर्रीदार चेहरे और शांत आँखों में सात दशकों का संघर्ष साफ़ झलकता था। विवाह, विस्थापन और सीता के जीवन से अपने जुड़ाव पर बात करते हुए उन्होंने जो कहा, वह कोसी की हर औरत की अनकही दास्तान बन गया।
अपनी पुरानी यादों में उतरते हुए सिया देवी ने कहा, "हमारे मिथिला का यही नियम है बाबू, बेटी की डोली जिस ससुराल में चली जाए, फिर चाहे कुछ भी हो जाए, उसे पलटकर मायके की चौखट नहीं देखनी चाहिए। मेरा जन्म नेउरी गाँव में हुआ था, जो कोसी के प्रकोप से दूर था। वहाँ न पानी का डर था, न घर टूटने का ख़ौफ़। लेकिन चौदह बरस की कच्ची उम्र में मेरी शादी कोसी के तटबंध के भीतर करा दी गई। उस दिन के बाद से मेरी ज़िंदगी सीता मैया के वनवास जैसी हो गई।"
सिया देवी थोड़ा रुकीं और कोसी के शांत दिखते पानी की ओर इशारा करते हुए आगे बोलीं, "सीता जी तो चौदह साल वनवास काटकर लौट आई थीं, पर मेरा वनवास तो पिछले साठ सालों से जारी है। हर साल दो-तीन बार कोसी का पानी उफनकर हमारे घरों में घुस जाता है। महीनों तक पूरा इलाका टापू बना रहता है। न चूल्हा जलाने की सूखी लकड़ी बचती है, न पीने का साफ़ पानी। जब घर डूब जाते हैं, तो हम सब कुछ छोड़कर तटबंध की ऊँचाई पर प्लास्टिक तानकर बैठ जाते हैं। जब पानी उतरता है, तो फिर मिट्टी और कीचड़ समेटने लौट आते हैं। आधा जीवन तटबंध पर कटता है, आधा गाँव में। पर शिकायत किससे करें? सीता मैया ने जंगल को अपना नसीब मान लिया था, हमने कोसी की इस बाढ़ को अपना घर मान लिया है।"
सिया देवी की यह बात इस बात का आईना है कि कैसे कोसी की महिलाएँ पौराणिक कथाओं से अपनी पीड़ा को सहने का हौसला जुटाती हैं। देवी सीता का धैर्य उनके लिए ढाल भी है, और उस सामाजिक बंधन की स्वीकार्यता भी, जहाँ दुख चाहे कितना भी गहरा हो, एक बार बँध जाने के बाद पीछे मुड़कर देखने की कोई गुंजाइश नहीं बचती।
कोसी क्षेत्र के लोगों का जीवन को देखने का यह तरीका गहराई से उनकी भाग्यवादी सोच को दिखाता है। जब हर साल आने वाली बाढ़ घरों को बहा ले जाती है, फसलें बर्बाद कर देती है और इंसानों को बेबस कर देती है, तो लोगों के भीतर उम्मीद का टिके रहना मुश्किल हो जाता है। बार-बार की यह तबाही इंसान को भीतर से तोड़ देती है, जिसके चलते जीवन को लेकर कोई सकारात्मक या भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण नहीं बन पाता। लोग मान बैठते हैं कि दुख और नुकसान ही उनका नसीब है, जिससे लड़ना व्यर्थ है।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, जहाँ मौसम और बाढ़ का मिजाज पहले से कहीं अधिक अप्रत्याशित हो गया है, मिथिला की महिलाओं का यह नजरिया कई परतों में समझा जा सकता है। पहली नज़र में यह सोच आधुनिक या प्रगतिशील नहीं लगती, क्योंकि इसमें व्यवस्था को बदलने या विरोध करने की कोई माँग नहीं दिखती। फिर भी, इसे पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। कोसी के कठोर और संकटग्रस्त भूगोल में यह नजरिया महिलाओं के लिए एक तरह से बेहद व्यावहारिक और ज़रूरी मानसिक सहारा बन जाता है। जब कोई दूसरा विकल्प न बचे, तो सीता के वनवास से खुद को जोड़ लेना उन्हें रोज़मर्रा के उस दलदल में टूटने से बचाए रखता है।
हालाँकि, ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि इस सोच ने कोसी की नारी के जीवन को रत्ती भर भी नहीं बदला है। देवी सीता के त्याग और सहनशीलता से अपनी तुलना कर लेने भर से न तो उनके घरों में बाढ़ का पानी रुकता है, न ही उनके बुनियादी अधिकारों की स्थिति सुधरती है। पीड़ा को 'पवित्र' या 'स्वाभाविक' मान लेने का नुकसान यह हुआ है कि उनका संघर्ष कभी आवाज़ नहीं बन सका। वे बस सहती रहीं और समाज ने इसे नारी का महान गुण मानकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
यही कारण है कि अब इस सदियों पुरानी सोच को बदलने की सख्त ज़रूरत है। सहनशीलता को औरत का स्वाभाविक गुण मान लेना दरअसल उसकी बेबसी को नज़रअंदाज़ करना है। कोसी की महिलाओं को अब सिर्फ़ बाढ़ और विस्थापन को 'नसीब का खेल' मानकर
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