ब्रिटिश काल में बंजर जमीनों पर हरियाली के लिए विदेश से भारत लाया गया विलायती बबूल (Prosopis juliflora) आज दक्षिण भारत के कई हिस्सों में भूजल और पर्यावरणीय संकट का कारण बन गया है।
फोटो : विकी कॉमंस
करीब डेढ़ सौ साल पहले भारत के शुष्क इलाकों को तेजी से हरा-भरा बनाने और ईंधन के लिए जलावन लकड़ी की जरूरतें पूरी करने के लिए करीब डेढ़ सौ साल पहले विदेश से लाया गया विलायती बबूल (Prosopis juliflora) आज दक्षिण भारत के कई हिस्सों में भूजल और पर्यावरणीय संकट का कारण बन गया है। विशेष रूप से तमिलनाडु में यह पेड़ जल स्रोतों, घास के मैदानों और स्थानीय जैव विविधता के लिए भी एक बड़ा खतरा बन चुका है। इसी खतरे को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इस विदेशी प्रजाति को चरणबद्ध तरीके से हटाने और उसकी जगह देसी प्रजाति के पौधों को लगाने की विस्तृत योजना तैयार करने का निर्देश दिया है।
विलायती बबूल यानी Prosopis juliflora, जिसे भारत में गंडा बबूल और तमिल भाषा में सीमाई करुवेलम भी कहा जाता है, मूल रूप से मध्य और दक्षिण अमेरिका की प्रजाति है। इसे 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान भारत लाया गया था। इस पौधे को भारत में लाने के कई उद्देश्य थे -
बंजर भूमि को हरा करना,
रेगिस्तानी क्षेत्रों में वृक्षारोपण,
ईंधन के लिए लकड़ी व चारकोल की आपूर्ति,
मिट्टी के कटाव को रोकना।
लेकिन, अपने तेजी से फैलाव और अन्य पेड़-पौधों पर हावी होने की प्रवृत्ति के चलते कुछ ही समय में यह पेड़ आक्रामक विदेशी प्रजाति यानी Invasive Species में बदल गया।
बीते वर्षों के दौरान तमिलनाडु के कई जिलों रामनाथपुरम, मदुरै, शिवगंगा, डिंडीगुल और करूर में विलायती बबूल ने तेजी से फैलते हुए हजारों हेक्टेयर भूमि पर कब्जा कर लिया। खाली पड़ी ज़मीनों के साथ ही इससे खेती, तालाब, झीलें, नदियों के किनारे और चरागाह भी प्रभावित होने लगे। इस समस्या को देखते हुए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों और किसानों ने वर्षों से सरकारी विभागों में इसकी शिकायतें दर्ज़ कराईं। इन शिकायतों पर कोई ठोस कार्यवाही न होने के कारण बाद में इस मुद्दे को लेकर कोर्ट में जनहित याचिकाएं (PIL) दायर की गईं। इन याचिकाओं में विलायती बबूल को लेकर आमतौर पर इन बिंदुओं को उठाया गया -
भूजल और जल निकायों को नुकसान पहुंचा रहा है।
देसर वनस्पतियों को खत्म कर रहा है।
जैव विविधता और पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है।
ग्रामीण आजीविका और पशुपालन पर असर डाल रहा है।
मामला कई वर्षों तक अदालत में चलता रहा और कोर्ट ने विभिन्न विभागों से रिपोर्ट भी मांगी। अदालत ने पाया कि केवल पेड़ काटने का आदेश देना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि यह प्रजाति दोबारा तेजी से उग आती है।
मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) ने इस बात को समझाा कि केवल विलायती बबूल के मौजूदा पेड़ों को काटना समाधान नहीं है। बल्कि इनके उन्मूलन के लिए वैज्ञानिक और दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। इसे देखते हुए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि—
विलायती बबूल हटाने की चरणबद्ध योजना बने।
हटाए गए क्षेत्रों में देशी प्रजातियों का वृक्षारोपण किया जाए।
जल निकायों और संरक्षित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए।
पुनः उगने से रोकने के लिए नियमित निगरानी की जाए।
विभिन्न विभाग मिलकर कार्रवाई करें।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि यदि खाली भूमि छोड़ दी गई तो विलायती बबूल फिर से उग आएगा। इसलिए इसकी जगह बिना देखभाल के भी पनपने वाले देसी प्रजाति के पौधों का रोपण किया जाए।
विलायती बबूल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जड़ें काफी गहरी होना है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि इसकी जड़ें जमीन में काफी गहराई तक पहुंच जाती हैं और बड़े पैमाने पर ज़मीन में मौजूद नमी को खींच लेती हैं। इसलिए यह पेड़ शुष्क परिस्थितियों में भी जीवित रहता है, क्योंकि इसकी जड़ें गहराई से पानी खींच सकती हैं। बड़ी संख्या में उगने पर यह एक बड़े इलाके के स्थानीय जल संतुलन को बुरी तरह प्रभावित करता है।
विलायती बबूल के अनियंत्रित फैलाव के कारण तमिलनाडु में कई तालाबों और झीलों के किनारे इसके घने जंगल बन गए। इससे वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा आई और जलभराव क्षेत्रों का आकार कम हुआ। फलस्वरूप एक बड़े इलाके में भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge) प्रभावित हुआ। घनी झाड़ियां और जड़ों के जटिल जाल ने कई जगहों पर जल निकायों की प्राकृतिक संरचना को तहस-नहस कर दिया, जिससे जल संरक्षण के उपायों का प्रभाव भी काफी कम हो गया और यह इलाके जल संकट से जूझने लगे ।
विलायती बबूल की सबसे खतरनाक विशेषता इसका अत्यधिक प्रसार है। तेजी से फैलने के कारण यह कुछ वर्षों में यह इतना घना हो जाता है कि सूर्य का प्रकाश जमीन तक नहीं पहुंच पाता। इससे स्थानीय घास और छोटे पौधे नष्ट होने लगते हैं। इसके तेजी से विस्तार के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं -
एक पेड़ हजारों बीज पैदा करता है।
बीज पशुओं के जरिए दूर-दूर तक फैलते हैं।
सूखे में भी जीवित रह सकता है।
कटने के बाद जड़ों से दोबारा उग आता है।
विलायती बबूल से भूजल, जैव विविधता को होते खतरे को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को इस विदेशी प्रजाति के पेड़ों को चरणबद्ध तरीके से हटाने और उसकी जगह देसी प्रजाति के पौधों को लगाने की विस्तृत योजना तैयार करने का निर्देश दिया है।
विलायती बबूल का स्थानीय स्तर पर पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की जैव विविधता पर काफी तगड़ा असर पड़ता है। यह फैलता है, वहां देशी पेड़ों और घासों की संख्या तेजी से घटने लगती है। यह सब कुछ इस प्रकार होता है -
देशी वनस्पतियां खत्म होती हैं : विलायती बबूल बहुत तेजी से फैलने वाली प्रजाति है। यह घने झुरमुट बनाकर जमीन, पानी, पोषक तत्वों और धूप पर अपना कब्जा जमा लेता है। इसके कारण स्थानीय पेड़-पौधों और घासों को बढ़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं मिल पाते और उनकी संख्या धीरे-धीरे कम होने लगती है। कई क्षेत्रों में इसने स्थानीय वनस्पतियों को लगभग पूरी तरह विस्थापित कर दिया है।
चरागाह समाप्त होते हैं : दक्षिण भारत के कई घास के मैदानों और खुले चरागाहों में विलायती बबूल के फैलाव ने पशुओं के लिए चारे का संकट पैदा कर दिया है। जहां पहले देशी घासें उगती थीं, वहां अब कांटेदार झाड़ियां दिखाई देती हैं। इससे पशुपालकों को अपने मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा जुटाने में कठिनाई होने लगी है और पारंपरिक चरागाहों का क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है।
पक्षियों और छोटे जीवों का आवास प्रभावित : घास के मैदान केवल घास का क्षेत्र नहीं होते, बल्कि अनेक पक्षियों, कीटों, सरीसृपों और छोटे स्तनधारियों का घर भी होते हैं। जब इन क्षेत्रों पर विलायती बबूल का कब्जा हो जाता है, तो इन जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होने लगता है। कई घासभूमि-आश्रित पक्षियों के लिए भोजन, घोंसले और प्रजनन स्थल कम पड़ने लगते हैं, जिससे उनकी आबादी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन : किसी एक विदेशी प्रजाति का किसी क्षेत्र पर अत्यधिक हावी हो जाना पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन को बिगाड़ देता है। वैज्ञानिक इसे 'मोनोकल्चर प्रभाव' कहते हैं। ऐसी स्थिति में पौधों और जीवों की विविधता घट जाती है, खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है और पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक लचीलापन (Resilience) कमजोर पड़ जाती है। परिणामस्वरूप पूरा क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से अधिक संवेदनशील और असंतुलित हो जाता है।
विलायती बबूल स्थानीय स्तर पर पर्यावरण को कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। संक्षेप में इसे इस प्रकार समझा जा सकता है -
जंगल की आग का खतरा बढ़ाता है : विलायती बबूल की सूखी टहनियां, पत्तियां और झाड़ियां बड़ी मात्रा में ज्वलनशील पदार्थ का काम करती हैं। गर्मियों में इनके सूखने पर आग लगने और उसके तेजी से फैलने की आशंका बढ़ जाती है। कई स्थानों पर यह देखा गया है कि जहां इस पेड़ के घने झुरमुट हैं, वहां आग पर काबू पाना भी अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है। जंगल की आग से न केवल वनस्पति, बल्कि पक्षियों, छोटे जीवों और मिट्टी की गुणवत्ता को भी भारी नुकसान पहुंचता है।
कांटेदार झाड़ियां बनकर रास्ते रोक देता है : विलायती बबूल की शाखाओं पर लंबे और नुकीले कांटे होते हैं, जो समय के साथ घने और अभेद्य झुरमुट का रूप ले लेते हैं। इससे ग्रामीणों, चरवाहों और वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित होती है। कई क्षेत्रों में ये झाड़ियां पारंपरिक रास्तों, चरागाहों और जल स्रोतों तक पहुंच को भी मुश्किल बना देती हैं। पशुओं के घायल होने और चराई क्षेत्रों के सिकुड़ने की घटनाएं भी इससे जुड़ी रही हैं।
कृषि भूमि पर तेजी से कब्जा करता है : यह पेड़ विशेष रूप से परती या कुछ समय के लिए छोड़ी गई कृषि भूमि पर बहुत तेजी से फैलता है। एक बार इसकी जड़ें जम जाने के बाद इसे हटाना बेहद कठिन हो जाता है, क्योंकि कटने के बाद भी यह फिर से उग आता है। कई इलाकों में किसानों को अपनी जमीन दोबारा खेती योग्य बनाने के लिए भारी खर्च करना पड़ा है। इसके प्रसार से कृषि योग्य भूमि का क्षेत्र भी धीरे-धीरे कम हो सकता है।
आर्द्रभूमियों और जल निकायों के लिए खतरा : तालाबों, झीलों, नालों और अन्य आर्द्रभूमियों के किनारों पर विलायती बबूल के फैलाव से इन पारिस्थितिक तंत्रों की प्राकृतिक संरचना प्रभावित होती है। इसके घने झुरमुट जल प्रवाह में बाधा पैदा कर सकते हैं और स्थानीय घासों तथा जलीय पौधों को विस्थापित कर देते हैं। इससे वेटलैंड्स पर निर्भर पक्षियों, उभयचरों और अन्य जीवों का आवास प्रभावित होता है। यही कारण है कि कई पर्यावरणविद इसे जल निकायों और आर्द्रभूमियों के लिए एक गंभीर पारिस्थितिक खतरा मानते हैं।
विलायती बबूल को हटाना इसलिए मुश्किल है क्योंकि इसे केवल काट देने से समस्या खत्म नहीं होती। इसकी जड़ें जमीन में जीवित रहती हैं और कुछ ही समय में नए पौधे निकल आते हैं। इसके बीज भी कई वर्षों तक मिट्टी में सक्रिय रह सकते हैं और अनुकूल परिस्थितियां मिलते ही फिर अंकुरित हो जाते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसके उन्मूलन के लिए जड़ों सहित हटाने के साथ ही इसकी जगह देसी प्रजातियों के पौधों को लगाने (पुनर्वनीकरण) और नए पौधों की लगातार निगरानी को जरूरी मानते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार विलायती बबूल को केवल काट देना पर्याप्त नहीं है क्योंकि—
जड़ें जीवित रहती हैं,
ठूंठ से नए पौधे निकल आते हैं,
बीज वर्षों तक मिट्टी में जीवित रह सकते हैं।
इसीलिए विलायती बबूल के फैलाव को नियंत्रित या खत्म करने के लिए वैज्ञानिक इन कामों की सलाह देते हैं कि :
पेड़ों को जड़ों सहित हटाया जाए।
खाली भूमि पर तुरंत देशी पौधे लगाए जाएं।
लगातार निगरानी की जाए।
समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
भारत में विलायती बबूल (Prosopis juliflora) की तरह कई अन्य विदेशी (Invasive Alien Species) पेड़-पौधे भी हैं, जो स्थानीय जैव विविधता, कृषि और पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। ऐसे प्रमुख पेड़-पौधों की सूची इस प्रकार है-
| हिंदी नाम | वैज्ञानिक नाम | मूल क्षेत्र | भारत में प्रमुख नुकसान |
|---|---|---|---|
| पार्थेनियम (कांग्रेस घास/गाजर घास) | Parthenium hysterophorus | मध्य अमेरिका | फसलों की पैदावार घटाता है, एलर्जी और दमा बढ़ाता है, चरागाहों को नष्ट करता है। |
| लैंटाना | Lantana camara | मध्य और दक्षिण अमेरिका | देशी पौधों को दबाता है, जंगलों और वन्यजीव आवास को नुकसान पहुंचाता है। |
| जलकुंभी | Eichhornia crassipes | अमेज़न बेसिन, दक्षिण अमेरिका | जल निकायों को ढक लेता है, ऑक्सीजन कम करता है और जलीय जीवों को प्रभावित करता है। |
| विलायती बबूल | Prosopis juliflora | मध्य एवं दक्षिण अमेरिका | भूजल, चरागाहों और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है। |
| बेशरम/बेहया | Ipomoea carnea | उष्णकटिबंधीय अमेरिका | आर्द्रभूमियों में फैलकर देशी वनस्पतियों को समाप्त करता है। |
| सुबबूल | Leucaena leucocephala | मेक्सिको और मध्य अमेरिका | स्थानीय पौधों को प्रतिस्पर्धा में पीछे छोड़ देता है। |
| सियाम वीड | Chromolaena odorata | मध्य और दक्षिण अमेरिका | जंगलों और कृषि भूमि में तेजी से फैलकर देशी घासों को खत्म करता है। |
| माइल-ए-मिनट वीड | Mikania micrantha | मध्य एवं दक्षिण अमेरिका | पेड़ों पर चढ़कर उन्हें ढक देता है और उनकी वृद्धि रोक देता है। |
विशेषज्ञों का मानना है कि विलायती बबूल हटाने का अभियान केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहना चाहिए। राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और अन्य राज्यों में भी यह तेजी से फैल चुका है। हालांकि कुछ शुष्क क्षेत्रों में इसे ईंधन और भूमि संरक्षण के लिए उपयोगी माना जाता है, लेकिन जल निकायों, घास के मैदानों और संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में इसका अनियंत्रित प्रसार गंभीर पर्यावरणीय समस्या बन चुका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में आक्रामक विदेशी प्रजातियों के प्रबंधन के लिए अभी तक कोई व्यापक राष्ट्रीय रणनीति नहीं है। ऐसे में विलायती बबूल का मामला केवल एक पेड़ तक सीमित नहीं, बल्कि यह इस बड़े सवाल को भी सामने लाता है कि देश अपनी जैव विविधता, आर्द्रभूमियों और घास के मैदानों को विदेशी आक्रामक प्रजातियों से कैसे बचाएगा। यदि समय रहते वैज्ञानिक और समन्वित कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसके पर्यावरणीय और आर्थिक दुष्परिणाम और गंभीर हो सकते हैं।
दक्षिण भारत में एक बड़ी समस्या बन चुका विलायती बबूल दुनिया के कई देशों के लिए एक समस्या बना हुआ है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में केन्या (Kenya), इथियोपिया (Ethiopia)) और ऑस्ट्रेलिया (Australia) शामिल हैं। इसके अलावा भी कई देशों में भी Prosopis juliflora को आक्रामक विदेशी प्रजाति माना जाता है। इन देशों में भी इसके नियंत्रण के लिए बड़े अभियान चलाए गए हैं।
विलायती बबूल की कहानी इस बात का उदाहरण है कि किसी विदेशी प्रजाति को बिना उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव समझे बड़े पैमाने पर लाना कितना महंगा पड़ सकता है। तमिलनाडु में मद्रास हाईकोर्ट का आदेश केवल एक पेड़ को हटाने का निर्देश नहीं है, बल्कि यह देश को यह संदेश भी देता है कि पर्यावरणीय पुनर्स्थापन केवल कटाई से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक योजना, देशी प्रजातियों की बहाली और दीर्घकालिक निगरानी से ही संभव है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो यह हरियाली बढ़ाने वाला पेड़ आने वाले वर्षों में भूजल, जैव विविधता और पारिस्थितिकी के लिए और बड़ा संकट बन सकता है।
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