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चौक, घंटाघर, बालागंज, दुबग्गा, खदरा और फैजुल्लागंज, अल्लू नगर, डिगुरिया, धैला, बख्शी का तालाब, चंद्रिका देवी समेत कई इलाकों में घुसा पानी
शहर के जिन इलाकों में आज भरा है पानी, वहां पहले था बाढ़ मैदान, खेत, तालाब, पुराने जलमार्ग
जिन सड़कों पर दौड़ती थीं गाडि़यां, वहां चल रही है नाव, पटरी से उतरी लोगों की जिंदगी
लखनऊ में इस समय 1985 के बाद अबतक की सबसे भयानक बाढ़ आई है। गोमती का पानी चौक, घंटाघर, बालागंज, दुबग्गा, खदरा और फजुल्लागंज, अल्लू नगर, डिगुरिया, धैला, बख्शी का तालाब, चंद्रिका देवी समेत शहर के कई निचले इलाकों में पहुंच चुका है। नदी का जलस्तर बढ़ने पर सिंचाई विभाग को गोमती बैराज के सभी 10 गेट खोलने पड़े। इससे गोमती के किनारे बने रिवरफ्रंट के निचले हिस्से पानी में डूब गए हैं।
गोमती का जलस्तर सामान्य से करीब 8 फीट ऊपर 108.14 मीटर दर्ज किया गया है। इससे पहले लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के लिए तैयार की गई IIT रुड़की की Hydrological Study for Gomti River Front Development रिपोर्ट में दिए गए हनुमान सेतु गेज पर 20 सितंबर 1985 को गोमती का जलस्तर हनुमान सेतु के downstream gauge पर 109.780 मीटर और अधिकतम बहाव 2,106.54 क्यूमेक (74,361 क्यूसेक) दर्ज किया गया था। इस रिपोर्ट में 1969–2011 के सालाना अधिकतम बाढ़ आंकड़ों की तुलना में 1980 में जलस्तर 109.305 मीटर और 1982 में 108.640 मीटर बताया गया था।
केंद्रीय जल आयोग की flood forecasting व्यवस्था में लखनऊ का हनुमान सेतु भी flood forecast station के रूप में शामिल है। उत्तर प्रदेश की आपदा प्रबंधन योजना में इस स्थान का warning level 108.5 मीटर, danger level 109.5 मीटर और दर्ज highest flood level 110.85 मीटर बताया गया है, जो 9 नवंबर 1971 को दर्ज हुआ था।
इस बार की बाढ़ की खास बात यह है कि लखनऊ और उसके आसपास के जिलों में स्थानीय स्तर पर बारिश रुक जाने के बाद भी गोमती का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। इसका एक बड़ा कारण नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र से आया पानी है। यानी लखनऊ में दिखाई दे रही बाढ़ की पूरी कहानी लखनऊ में हुई बारिश से नहीं समझी जा सकती। यह बाढ़ दरअसल, गोमती नदी के उद्गमस्थल पीलीभीत से लेकर, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, और बाराबंकी जैसे जिलों में नदी के कैचमेंट एरिया में जलस्तर बढ़ने का नतीजा है। वैसे, गोमती इन जिलों के अलावा अयोध्या, सुल्तानपुर और जौनपुर जिलों से भी होकर बहती है।
बाढ़ के स्तर को लोगों के मन में पहला सवाल यही उठ रहा है कि आखिर गोमती में इतना पानी कहां से आया? क्योंकि पिछले चार दशकों में तो उन्होंने लखनऊ में ऐसी बाढ़ देखी नहीं। पर बाढ़ के कारणों के बारे में सोचा जाए तो असली सवाल है कि हमने गोमती के पानी के फैलने के लिए कितनी जगह छोड़ी है? क्या बाढ़ को रोकने के लिए बनाई गई हमारी संरचनाएं नदी की समस्या का समाधान कर रही हैं या उसका दबाव बढ़ा रही हैं?
वास्तव में हमने ही नदी के लिए छोड़े गए प्राकृतिक रास्तों को शहर के विस्तार के साथ लगातार छोटा किया है। इसलिए गोमती की इस बाढ़ को सिर्फ असामान्य बारिश या नदी के उफान की प्राकृतिक घटना मान लेना भी अधूरी तस्वीर होगी। जिस जमीन पर आज कॉलोनियां, सड़कें, संस्थान और दूसरी शहरी संरचनाएं दिखाई देती हैं, उसका एक हिस्सा कभी नदी के फैलाव, बाढ़ मैदान, खेतों, तालाबों और पुराने जलमार्गों का हिस्सा था। नदी जब सामान्य स्थिति में होती है तो उसका पानी एक सीमित चैनल में दिखाई देता है, लेकिन बड़ी बाढ़ के समय नदी सिर्फ उसी दिखाई देने वाले चैनल में नहीं बहती। वह अपने पुराने रास्तों और आसपास की नीची जमीन की ओर भी फैलती है। यही किसी नदी के प्राकृतिक बाढ़ व्यवहार का हिस्सा है।
गोमती के मामले में यह बात और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वैज्ञानिक अध्ययनों ने लखनऊ में नदी के चैनल को संकरा करने, किनारों को मजबूत करने और रिवरफ्रंट विकास के कारण नदी की प्राकृतिक प्रक्रियाओं में बदलाव की ओर ध्यान दिलाया है। 2018 के एक अध्ययन के अनुसार रिवरफ्रंट परियोजना के दौरान करीब 8.1 किलोमीटर हिस्से में नदी के दोनों किनारों पर डायफ्राम दीवार बनाई गई, नदी के Floodplain की चौड़ाई करीब 450 मीटर से घटाकर 240 मीटर और Clear Waterway को करीब 250 मीटर से 100-125 मीटर तक सीमित किया गया। अध्ययन ने इसे नदी की प्राकृतिक प्रक्रियाओं और बाढ़ व्यवहार में बदलाव से जोड़ा था।
गोमती में आई बाढ़ के कारणों के बारे में पूछने पर पिछले दो दशकों से गोमती पर काम कर रहे पर्यावरणविद व लखनऊ के सामाजिक कार्यकर्ता ऋद्धि किशोर गौड़ ने इंडिया वाटर पोर्टल से कहा कि बाढ़ की वजह हम खुद हैं। उन्होंने अपनी बात को कुछ इस तरह समझाया -
अभी जो बाढ़ आई है, उसकी मुख्य वजह हम (इन इलाकों के लोग) ही हैं। लोगों ने सस्ते दामों के चक्कर में गोमती के बाढ़ मैदान, कैचमेंट एरिया, यहां तक कि बंधे के पार तक की जमीनें लेकर घर बना रखे हैं। अब इसकी कीमत उन्हें अपनी घर-गृहस्थी के बाढ़ में डूबने के रूप में चुकानी पड़ रही है। लखनऊ में गोमती के किनारे-किनारे बहुत बड़े पैमाने पर निजी स्तर पर कॉलोनियां काटकर बसावट हुई है। यह इलाके एक तरह से अवैध हैं, क्योंकि इन कॉलोनियों का लखनऊ विकास प्राधिकरण या आवास विकास जैसी किसी एथॉरिटी से अप्रूवल नहीं है। न ही नियमों के मुताबिक इनका कोई डेवलपमेंट शुल्क जमा किया गया है, जिससे यहां मानकों के मुताबिक मूलभूत सुविधाओं का विकास किया जाए। सबकुछ जैसे-तैसे चल रहा है। हाल के दशकों में लखनऊ में यह सब इतने बड़े पैमाने पर हुआ है कि सरकारी तंत्र भी इसके आगे बेबस दिखाई दे रहा है। गोमती के किनारों बर इतनी बड़ी संख्या में बसे लोगों को विस्थापित करके उनका पुनर्वास किया जाना संभव नहीं है। इसलिए जुगाड़ की व्यवस्थाओं से चीजों को संभाला जा रहा है। बाढ़ आने के बाद अब फैजुल्लागंज और आसपास के इलाकों को भविष्य में इस तरह के जलभराव से बचाने के लिए यहां बंधा बनाने का प्रस्ताव को शासन ने मंजूरी दी है। इस बंधे के बनने पर इन इलाकों में आगे चलकर शायद पानी न आए। पर नदी तो अपने रास्ते बह रही है। हम ही उसमें बाधक बन रहे हैं, जिसकी कीमत चुकानी हमें पड़ रही है। एक तरह से देखा जाए, तो नदी अपने ऊपर किए जा रहे अत्याचारों का बदला ले रही है। इस बाढ़ के जरिये वह हमें हमारी करतूतों का सबक सिखा रही है।ऋद्धि किशोर गौड़, सामाजिक कार्यकर्ता व पर्यावरणविद (लखनऊ)
नदी के किनारे बसी अवैध बस्तियां सबसे पहले और सबसे ज्यादा बाढ़ की चपेट में आती हैं।
उत्तर प्रदेश में 2026 का मानसून भी सामान्य नहीं रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार राज्य में इस साल 2008 के बाद सबसे अधिक बारिश दर्ज हुई और लखनऊ में सामान्य से करीब 24 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई। लेकिन गोमती की बाढ़ के लिए सिर्फ लखनऊ की बारिश देखना पर्याप्त नहीं है। गोमती की इस बाढ़ को समझने के लिए नदी के पूरे तंत्र को देखना जरूरी है। क्योंकि, नदी का जलस्तर किसी एक स्थान की बारिश से तय नहीं होता। वर्षा जल के अलावा उसके पीछे छोटी-बड़ी सहायक नदियां, भूजल, कैचमेंट एरिया, मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता, शहरी ड्रेनेज, बैराज और नदी के बाढ़ मैदान (Floodplain) की स्थिति भी जिम्मेदार होती है।
गोमती लखनऊ से बहुत पहले अपना लंबा सफर तय करती है। इसका बेसिन करीब 30,437 वर्ग किलोमीटर में फैला है और नदी लगभग 960 किलोमीटर की यात्रा के बाद गंगा में मिलती है। सई इसकी प्रमुख सहायक नदी है, जबकि सरायन, कठना, बेहता, रथ, लूनी, कल्याणी, कुंडा और पिली जैसी छोटी नदियां भी अलग-अलग हिस्सों में इसमें पानी पहुंचाती हैं। इसलिए लखनऊ की मौजूदा बाढ़ को समझने के लिए पूरे गोमती बेसिन को इन 7 बिंदुओं के जरिये समझना होगा -
किसी नदी में दिखाई देने वाला पानी सिर्फ बारिश से आया पानी नहीं होता। बारिश खत्म होने के बाद भी नदी में जो पानी बना रहता है, उसमें भूजल का योगदान होता है। नदी के प्रवाह के इस अपेक्षाकृत स्थायी हिस्से को Baseflow कहा जाता है। गोमती की खासियत यह है कि इसका प्रवाह सिर्फ मानसूनी बारिश पर निर्भर नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययनों में इसे भूजल आधारित नदी यानी Groundwater-Fed River बताया गया है, यानी भूजल नदी के प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
साइंस जरनल रिसर्च गेट में Impact of Declining Groundwater Levels on River Flows in the Ganga Alluvial Plain-A Case Study of Gomti River, India शीर्षक से प्रकाशित उर्वशी शर्मा, अदीबा खान और प्रोफेसर वेंकेटेश दत्ता की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक गोमती के Baseflow में भूजल का योगदान नदी के कुल प्रवाह का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अध्ययन में लखनऊ में गोमती का Baseflow index 0.76 बताया गया है। हालांकि गर्मियों में यह बहुत कम हो जाता है।
अध्ययन में हनुमान सेतु पर अप्रैल के Lean Flow का औसत करीब 15 क्यूमेक और आगे माईघाट पर करीब 25 क्यूमेक बताया गया है। पर, नदी के बेसिन में Shallow Groundwater का योगदान भी महत्वपूर्ण है, जिसके कारण बाढ़ के समय नदी का जलस्तर कई मीटर तक बढ़ जाता है। इन आंकड़ों का मतलब यह है कि गोमती को सिर्फ बरसात की नदी मानना गलत होगा। गर्मियों में नदी में कम पानी दिखाई देना उसके पूरे जल तंत्र के कमजोर होने का संकेत हो सकता है। दूसरी ओर, मानसून में जब पूरा Catchment संतृप्त हो जाता है और बारिश का पानी तेजी से नदी में पहुंचता है तो नदी का व्यवहार अचानक बदल जाता है। इसलिए गर्मियों में जो नदी पानी की कमी से जूझती दिखाई देती है, वह कई बार मानसून में बाढ़ की नदी बन जाती है। यह दोनों ही स्थितियां नदी के Baseflow से जुड़ी हुई हैं।
नदी सिर्फ पानी देती नहीं, भूजल से पानी लेती भी है। गोमती और लखनऊ के भूजल के बीच संबंध दोतरफा है। नदी के आसपास की जलोढ़ जमीन में मौजूद भूजल नदी के प्रवाह को बनाए रखने में योगदान देता है। दूसरी ओर, नदी और उसके Floodplain से पानी का रिसाव आसपास के Aquifer को Recharge करने में मदद कर सकता है। इसीलिए नदी के किनारे की जमीन को केवल खाली जमीन या विकास के लिए उपलब्ध क्षेत्र मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। वह नदी और भूजल के बीच संपर्क क्षेत्र भी हो सकती है।
गोमती पर हुए शोध में नदी और उसकी सहायक नदियों को बेसिन में भूजल रिचार्ज के महत्वपूर्ण स्रोतों में शामिल किया गया है। शोध में यह भी बताया गया कि लखनऊ में नदी के आसपास बड़े पैमाने पर भूजल दोहन होता है और नदी का प्रवाह तथा भूजल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि नदी के किनारे कंक्रीट, दीवार, सड़क और अन्य निर्माण का प्रभाव केवल बाढ़ तक सीमित नहीं रहता। यदि नदी और उसके बाढ़ मैदान के बीच पानी के प्राकृतिक आदान-प्रदान की जगह कम होती है तो इसका असर भूजल रिचार्ज और नदी के प्रवाह पर भी पड़ता है।
गोमती रिवरफ्रंट पर किए गए अध्ययन में channelization और नदी के प्राकृतिक रूप में बदलाव के संभावित प्रभावों में groundwater table तथा Baseflow में कमी की आशंका भी जताई गई थी। इसलिए बाढ़ के समय नदी का पानी किनारे की जमीन में कहां फैल रहा है, यह उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है जितना यह कि गर्मियों में भूजल से नदी को कितना पानी मिल रहा है।
गोमती अकेली नदी नहीं है। लखनऊ में दिखाई देने वाली गोमती के पीछे सहायक नदियों की प्रणाली (Tributary Network) काम करता है। सई इसकी प्रमुख सहायक नदी है। इसके अलावा सरायन, कठना, बेहटा, रथ, लूनी, कल्याणी, कुकरैल, कुंडा और पिली जैसी छोटी नदियां अलग-अलग स्थानों पर गोमती में मिलती हैं। सरायन लखनऊ से करीब 45 किलोमीटर upstream में गोमती में मिलती है, जबकि सई आगे जाकर जौनपुर के पास गोमती से जुड़ती है।
इसका मतलब है कि किसी एक दिन लखनऊ में बारिश न होने का यह अर्थ नहीं कि गोमती का जलस्तर नहीं बढ़ेगा। ऊपर के catchment में हुई बारिश और tributaries में बढ़ा पानी नीचे की ओर यात्रा करता है और कुछ समय बाद लखनऊ पहुंच सकता है।
उत्तर प्रदेश की राज्य आपदा प्रबंधन रिपोर्ट भी गोमती बेसिन में बाढ़ के प्रमुख कारणों में भारी बारिश तथा सई, कठना और कुकरैल जैसी सहायक धाराओं से आने वाले पानी को शामिल करती है। रिपोर्ट ने यह भी माना है कि शहरों की अपर्याप्त Drainage व्यवस्था, Floodplain और Wetlands पर अतिक्रमण स्थिति को और खराब कर सकते हैं। इसलिए गोमती की बाढ़ के समय सिर्फ मुख्य नदी का जलस्तर दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। एक बेहतर Flood Management System में यह भी लगातार देखा जाना चाहिए कि उसकी प्रमुख सहायक नदियों में पानी कितना है, उनकी Discharge कितनी तेजी से बढ़ रही है और वह पानी लखनऊ की ओर किस गति से बढ़ रहा है।
गोमती का जलस्तर बढ़ने से लखनऊ के कई इलाकों में नदी का पानी सड़कों पर भर गया है।
आमतौर पर केवल नदी के किनारे की खाली जमीन को Floodplain को समझा जाता है, जबकि, वास्तव में इसका दायरा इससे काफी अधिक होता है। दरअसल Floodplain नदी की प्राकृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बड़ी बाढ़ के समय नदी अपने मुख्य channel से बाहर निकलकर इसी क्षेत्र में फैलती है। इस तरह यह नदी के लिए भविष्य की बाढ़ का रास्ता होता है। इस फैलाव से बाढ़ की ऊर्जा और पानी का कुछ हिस्सा आसपास के क्षेत्र में वितरित होता है।
गोमती के floodplain का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लखनऊ में नदी के आसपास का शहरी विस्तार तेजी से बढ़ा है। जहां कभी खेत, खुली जमीन, Wetlands या पुराने नदी मार्ग थे, वहां अब स्थायी निर्माण दिखाई देता है। ऐसे में नदी के फैलने की प्राकृतिक जगह कम होती जाती है।
2018 के अध्ययन में लखनऊ में गोमती के Riverfront Development के बाद Floodplain की चौड़ाई सीमित किए जाने का उल्लेख किया गया था। अध्ययन के अनुसार परियोजना के दौरान नदी के 8.1 किलोमीटर हिस्से में channel को नियंत्रित और संकरा किया गया था।
यही सवाल 2026 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के सामने भी आया। जुलाई 2026 में NGT ने गोमती के Riverbank और Active Floodplain में ऐसे निर्माण पर अंतरिम रोक लगाने का निर्देश दिया, जो 2016 के गंगा संरक्षण संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन करता हो। मामले में लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) और अन्य संबंधित एजेंसियों को नोटिस भी जारी किए गए।
मौजूदा बाढ़ को लेकर सबसे पहला सवाल लोगों के मन में यही उठ रहा है कि लखनऊ में बारिश रुक गई, फिर भी गोमती इतना ज़्यादा क्यों बढ़ी? इसे समझने के लिए नदी के आसपास के इलाकों में बारिश यानी upstream rainfall को समझना जरूरी है। नदी का पानी नीचे की ओर बहता है। इसलिए लखनऊ में बारिश रुक जाने के बाद भी यदि गोमती के ऊपरी catchment में तेज बारिश हुई है तो उसका असर कुछ समय बाद लखनऊ में दिखाई दे सकता है।
3 अक्टूबर की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में स्थानीय बारिश थमने के बावजूद upstream catchment से बड़े पैमाने पर पानी आया और गोमती का जलस्तर सामान्य से करीब आठ फीट ऊपर पहुंच गया। इसके बाद सभी 10 बैराज गेट खोलने पड़े और रिवरफ्रंट के निचले हिस्से पानी में डूब गए। यही वजह है कि शहर की बाढ़ चेतावनी व्यवस्था को सिर्फ लखनऊ के rainfall data पर निर्भर नहीं किया जा सकता। नदी basin के ऊपरी हिस्सों में बारिश, tributary discharge और river level की real-time जानकारी को एक साथ देखना होगा। इस तरह बाढ़ को केवल एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे नदी basin की घटना के रूप में देखना जरूरी है।
किसी भी नदी के बहाव और बाढ़ के नियंत्रण में उसके पानी को रोकना, मोड़ना या सुरक्षित निकालना सबसे अहम काम होता है। लखनऊ में यह काम मुख्यरूप से गोमती नगर के गोमती बैराज से किया जाता है। गोमती बैराज नदी के जलस्तर और शहर की जलापूर्ति व्यवस्था दोनों से जुड़ा महत्वपूर्ण ढांचा है। नदी के बीच स्थित बैराज का एक उद्देश्य शहर के upstream हिस्से में पानी का स्तर बनाए रखना और जलापूर्ति के लिए पानी उपलब्ध कराना रहा है।
लेकिन बाढ़ के समय स्थिति बदल जाती है। जब upstream से बड़ी मात्रा में पानी आता है तो बैराज के गेट खोलकर पानी को नीचे की ओर प्रवाहित करना पड़ता है। मौजूदा बाढ़ में सभी 10 गेट खोले जाने की सूचना इसी जलप्रवाह प्रबंधन का हिस्सा है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। बैराज बांध की तरह बड़ी मात्रा में बाढ़ का पानी रोकने वाला जलाशय (reservoir) नहीं होता। उसका संचालन नदी के प्रवाह और जलस्तर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। इसलिए किसी बड़ी flood wave के सामने उसका काम पानी को हमेशा रोक देना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार सुरक्षित रूप से प्रवाहित करना होता है।
लेकिन शहर में नदी के किनारे पहले से तटबंध, दीवारें और दूसरी संरचनाएं मौजूद हों तो जलप्रवाह का असर अलग-अलग हिस्सों में बदल सकता है। एक स्थान पर पानी को रोकने वाली संरचना दूसरे स्थान पर पानी के दबाव और जलभराव का जोखिम बढ़ा सकती है। इसीलिए बैराज संचालन को नदी की पूरी hydraulic system से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
बाढ़ से बचने के लिए तटबंध बनाना अपने आप में गलत विचार नहीं है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में ऐसी संरचनाएं लोगों और संपत्ति को बाढ़ से सुरक्षा दे सकती हैं। लेकिन, समस्या तब पैदा होती है जब नदी के प्राकृतिक floodplain को लगातार संकरा किया जाए और नदी को यह मानकर नियंत्रित किया जाए कि वह हमेशा तय सीमा के भीतर ही बहेगी।
लखनऊ में अब IIM रोड क्षेत्र में फैजुल्लागंज को बार-बार आने वाली बाढ़ से बचाने के लिए तटबंध बनाने का प्रस्ताव पास किया गया है। इसका उद्देश्य नदी के पानी को बस्ती में पहुंचने से रोकना है। यह तत्काल सुरक्षा के लिहाज से उपयोगी हो सकता है, खासकर उन इलाकों के लिए जहां बड़ी आबादी लंबे समय से बाढ़ का सामना कर रही है। लेकिन लंबी अवधि के लिए सवाल यह है कि तटबंध के दूसरी तरफ नदी के फैलाव के लिए कितनी जगह छोड़ी गई है।
गोमती रिवरफ्रंट पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन Impact of river channelization and riverfront development on fluvial habitat: evidence from Gomti River, a tributary of Ganges ने भी यही व्यापक सवाल उठाया था। शोध के अनुसार channelization और नदी की चौड़ाई को सीमित करने से नदी की प्राकृतिक प्रक्रियाएं प्रभावित हुईं। अध्ययन में यह आशंका जताई गई कि ऐसी इंजीनियरिंग से downstream flooding, groundwater और नदी के ecological processes पर असर पड़ सकता है।
रिवरफ्रंट पर दूसरे वैज्ञानिक अध्ययन में भी गोमती को groundwater-fed river बताया गया है और नदी के channelization तथा riverfront development के जल गुणवत्ता और ecological sensitivity पर प्रभावों का अध्ययन किया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि रिवरफ्रंट या हर तटबंध बाढ़ का कारण है। बाढ़ के पीछे भारी बारिश, upstream runoff और tributaries जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं भी होती हैं। लेकिन, सवाल यह है कि हमारी संरचनाएं उस प्राकृतिक बाढ़ को कितना सहने योग्य बनाती हैं और कितना उसे संकट में बदल देती हैं।
दशकों बाद लखनऊ में आई ऐसी बाढ़ का सबसे जरूरी सवाल यह है इसकी जिम्मेदार नदी है या खुद हम? क्योंकि, गोमती की मौजूदा बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा नहीं का जा सकता। यह बात सही है, कि इस साल उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों के मुकाबले बारिश कुछ अधिक हुई है, जिससे गोमती के कैचमेंट एरिया में पानी बढ़ा है। अच्छी बारिश से सई, कठना, कल्याणी, कुकरैल और बेहटा जैसी गोमती की सहायक नदियों का जलस्तर भी बढ़ा है। हालांकि सरकार की ओर से इन नदियों के जलस्तर में वृद्धि के ताजा आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं। पर मौजूदा बाढ़ के मद्देनज़र इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बाढ़ को लेकर दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके नुकसान को सिर्फ पानी की मात्रा यानी जलस्तर से तय नहीं किया जा सकत। नुकसान इस बात से भी तय होता है कि जलभराव कितने बड़े इलाके में हुआ है यानी पानी को फैलने की कितनी जगह मिली है?
अगर नदी का floodplain खुला हुआ है और wetlands सुरक्षित हैं और तालाबों पर अतिक्रमण नहीं हुआ है, तो यह सब मिलकर पानी की एक बड़ी मात्रा को खुद में समा कर काफी हद तक बाढ़ को रोक सकते हैं। इसके उलट floodplain और wetlands को अगर अतिक्रमण और अवैध निर्माण से खत्म या सीमित कर दिया गया है, तो नदी का बहाव संकरा होने से बाढ़ विनाशकारी बना सकती है। उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी UPSDMA की 2025 की रिपोर्ट भी गोमती बेसिन में अपर्याप्त ड्रेने और बाढ़ मैदान एवं वेटलैंड्स पर अतिक्रमण को बाढ़ की स्थिति बिगाड़ने का प्रमुख कारण बताती है।
इसलिए लखनऊ के लिए बाढ़ प्रबंधन का अगला चरण केवल और ऊंचे तटबंध बनाने का नहीं होना चाहिए। शहर को यह भी तय करना होगा कि गोमती को कहां फैलने दिया जाएगा, कौन-सी जमीन floodplain रहेगी, कौन-से पुराने तालाब और जलमार्ग बचाए जाएंगे और नदी तथा भूजल के बीच प्राकृतिक संबंध को कैसे बनाए रखा जाएगा। गोमती की मौजूदा बाढ़ लखनऊ शहर और नदी के बीच बदलते रिश्ते की कहानी है। नदी को नियंत्रित करने की कोशिश और नदी के प्राकृतिक व्यवहार के बीच जो दूरी बढ़ी है, उसका असर हर बड़ी बाढ़ में दिखाई देता है।
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