फोटो - सयाली पराते
महाराष्ट्र के 358 में से 305 तालुक सूखे की चपेट में आ गए हैं। यानी लगभग 75% से अधिक हिस्सा एक बड़े संकट से जूझ रहा है। तमाम लोग इसे बारिश की कमी मान रहे हैं, जबिक सूखा केवल बारिश की कमी का नाम नहीं है, बल्कि यह पानी, खेती, खाद्य सुरक्षा और लोगों की आजीविका को प्रभावित करने वाला एक गंभीर पर्यावरणीय संकट है। जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक सामान्य से कम बारिश होती है या पानी की उपलब्धता मांग के मुकाबले घट जाती है, तो सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है।
सूखे के प्रभाव मौसम से लेकर नदियों, भूजल, मिट्टी की नमी और फसलों तक दिखाई देते हैं। लेकिन क्या सभी तरह के सूखे एक जैसे होते हैं? सूखे के अलग-अलग प्रकार क्या हैं, इसके पीछे कौन-से प्राकृतिक और मानवीय कारण जिम्मेदार हैं और जलवायु परिवर्तन के दौर में भविष्य में इसकी चुनौती कितनी बढ़ सकती है? आइए, समझते हैं सूखे की प्रकृति, इसके कारणों और इससे जुड़ी चुनौतियों को।
National Drought Mitigation Center के अनुसार सूखे के 4 प्रकार बताएं गए है जिनमें मौसम सम्बन्धी, जल सम्बन्धी, कृषि सम्बन्धी और सामाजिक आर्थिक सूखे शामिल है, जो कुछ निम्न प्रकार है -
मौसम सम्बन्धी सूखा - इसे सामान्यतः किसी भी क्षेत्र की औसत वर्षा की तुलना में कम हुई वर्षा और शुष्क अवधि के आधार पर तय किया जाता है। यह जलवायु परिस्थिति पर निर्भर करता है, क्योंकि वर्षा पर पड़ने वाली वायुमंडलीय परिस्थिया अलग होती है। कुछ क्षेत्रों में मौसम संबंधी सूखे को वर्षा वाले दिनों की संख्या एक निश्चित सीमा से कम होने के आधार पर मापा जाता है। यह तरीका उन क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त है जहां वर्षभर नियमित वर्षा होती है, जैसे उष्णकटिबंधीय वर्षावन, आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय और आर्द्र मध्य अक्षांशीय जलवायु वाले क्षेत्र। उदाहरण के तौर पर ब्राजील का मानाउस, अमेरिका का न्यू ऑरलियन्स और इंग्लैंड का लंदन शामिल हैं।
भारत की बात करे तो मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की 2024 की रिपोर्ट को देखा जाये तो कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा हुई, जबकि अलग अलग हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का वितरण असंतुलित होता जा रहा है, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे जैसी स्थिति बन रही है।
कृषि सूखा - यह वह स्थिति है जब मिटटी में उपलब्ध नमी फसलों की आवश्यकताओ को पूरा नहीं कर पति है और इससे कृषि पूरी तरह प्रभावित हो जाती है। तब वहां कृषि सूखा होता है। कृषि सूखा केवल बारिश तक सिमित नहीं है, कृषि सूखा तब हो सकता है जब बारिश कम हो, तापमान ज्यादा हो, भूजल स्तर में गिरावट हुई हो या फिर जलाशयों में पानी की कमी हुई हो। इसके अलावा अन्य कारण भी शामिल है।
एक रिपोर्ट के अनुसार मई 2025 में मैसूर क्षेत्र में सामान्य से 70% कम प्री-मानसून वर्षा होने के कारण खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई। भूजल स्तर और बांधों का जल स्तर घटने से किसानों में कृषि संकट बढ़ गया।
जल वैज्ञानिक सूखा - ये वो सूखा है, जिसमें लम्बे समय तक कम वर्षा होने के कारण जल स्त्रोतों से पानी कम होने लगता है और भूजल स्तर में गिरावट होने लगती है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव साथी और भूमिगत जल स्त्रोतों पर पड़ता है, इन स्त्रोतों में पेयजल, सिंचाई और विद्युत उत्पादन आधारित गतिविधिया सम्मिलित है। यह सूखा मौसम संबंधी और कृषि सूखे की तुलना में धीरे-धीरे दिखाई देता है। सूखे के दौरान जल संसाधनों पर दबाव बढ़ जाता है और कृषि, उद्योग, बिजली उत्पादन और घरेलू जरूरतों के बीच पानी को लेकर संघर्ष भी बढ़ सकता है।
एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में बेंगलुरु में BWSSB और BBMP के लगभग 50% बोरवेल या तो सूख गए थे या उनमें बहुत कम पानी बचा था। रिपोर्ट में बताया गया कि शहर के 14,781 बोरवेल में से 3,297 पूरी तरह सूख चुके थे।
सामाजिक आर्थिक सूखा - सामाजिक आर्थिक सूखा से तात्पर्य उस स्थिति से है जब पानी की का कमी के कारण किसी वास्तु की मांग और उसकी आपूर्ति अधिक हो जाती है। यह सूखा मौसम सम्बन्धी, कृषि और जल वैज्ञानिक सूखे से जुदा होता है, लेकीन इसका सीधा असर लोगो के जीवन पर पड़ता है, जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थितियां प्रभावित होती है।
भारत में देखे तो कमजोर मानसून और भूजल में गिरावट के कारण कर्नाटक में सामाजिक आर्थिक सूखे का उदहारण देखने को मिलता है, जिसमें 2024 में इस गंभीर जल संकट का असर केवल पेयजल नहीं बल्कि होटल, कम्पनी और आम लोगो पर ज्यादा पड़ा। कुछ इलाकों में पानी के टैंकरों के दाम दोगुने तक बढ़ गए और लोगों को पानी खरीदने पर अधिक खर्च करना पड़ा।
देश में सूखा घोषित करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए 2016 में एक मैन्युअल जारी किया। Drought Management Manual 2016 को Department of Agriculture and farmers welfare ने जारी किया है। इस मैन्युअल के आधार पर यह तय होता है की देश में कब और कहा सूखा घोषित किया जायेगा। 2020 में इसमें कुछ संशोधन किया गया है, जिसके आधार पर ये समझा जा सकता है की सूखा कब घोषित किया जाता है।
सूखा घोषित करने के मुख्या 3 चरण बताएं गए है, जो निम्न प्रकार है -
वर्षा आधारित आकलन - सूखा घोषित करने का यह पहला चरण है, जिसमें किसी जिले या क्षेत्र में हुई वास्तविक वर्षा की तुलना सामान्य वर्षा से की जाती है। इसमें मुख्या रूप से मानसून में वर्ष की कमी, लम्बे समय तक वर्षा का न होना या फिर बारिश का वितरण असामान्य हो, ऐसी स्थिति में उस क्षेत्र को सूखा प्रभावित माना जाता है।
वर्षा के आधार पर प्रारंभिक संकेतों में सामान्य से कम वर्षा, लगातार सूखा होना, कमजोर मानसून, कृषि सीजन में बारिश का असंतुलित होना शामिल है। इसके बाद दुसरे चरण की और जाया जाता है।
प्रभाव संकेतो का मूल्याकन - दूसरे चरण में यह देखा जाता है की कम बारिश का असर जमीन, फसलों और जल संसाधनों पर कितना पड़ा है। इसके मुख्या रुप से चार प्रमुख प्रभाव संकेतक बताए गए है, जो निम्न प्रकार है -
फसल बुवाई क्षेत्र - यह तब होता है जब सामान्य रूप से कम बारिश हो और फसल ख़राब हो गयी हो।
मिटटी की नमी - इसके अंतर्गत मिटटी में नमी की कमी के कारण फसल सुखाने लगती है।
वनस्पति संकेतक - सॅटॅलाइट और रिमोट सेसिंग की सहायता से हरियाली और फसल स्थिति का विश्लेषण किया जाता है।
जल सम्बन्धी संकेतक - इसके अंतर्गत जलाशयों का स्तर, भूजल की स्थिति, नदियों और जलस्त्रोतो का प्रवाह देखा जाता है।
ग्राउंड ट्रुथिंग (Ground Truthing / Verification) - यह सूखे का तीसरा और अंतिम चरण है, जो सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें प्रशासनिक अधिकारी और टीम गांवों में जाकर वास्तविक स्थिति की जांच करते हैं। जिसमें सूखा प्रभावित माने गए क्षेत्रों के कम से कम 10% गांवों का निरीक्षण अनिवार्य है।
गांवों का चयन Random Basis पर किया जाता है। प्रत्येक गांव में प्रमुख फसलों की स्थिति देखी जाती है। ग्राउंड ट्रुथिंग के लिए फसल की वास्तविक स्थिति, पानी की उपलब्धता, पशुओं की स्थिति और ग्रामीण संकट का आकलन करने के लिए जरूरी है। इसके लिए मोबाइल ऐप और जीपीएस आधारित डेटा संग्रह की भी सिफारिश की गई है।
Drought Management Manual 2016 के अनुसार किसी क्षेत्र को तब सूखाग्रस्त घोषित किया जाता है जब सामान्य से काफी कम वर्षा हो, फसल और जल संसाधनों पर गंभीर प्रभाव दिखाई दे, वैज्ञानिक संकेतक सूखे की पुष्टि करें और ग्राउंड ट्रुथिंग में वास्तविक स्थिति प्रमाणित हो जाए। इसके बाद राज्य सरकार संबंधित जिले, तहसील या ब्लॉक को सूखाग्रस्त घोषित कर सकती है।
एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2026 में प्रशांत महासागर में बनने वाली जलवायु घटना अल नीनो के कारण भारत में सूखे की आशंका बढ़ गई है।
भारतीय मौसम विभाग ने अनुमान जताया है कि 2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है और देश में वर्षा दीर्घकालिक औसत के लगभग 92% तक सीमित रह सकती है। यानी इस बार करीब 8% कम बारिश होने की संभावना जताई है।
अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इससे व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ती हैं और मानसून प्रभावित होता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जून के बाद सुपर अल नीनो की स्थिति बनने की आशंका है, जिससे अगस्त और सितंबर में बारिश और कम हो सकती है।
कम वर्षा का सबसे अधिक असर मध्य और पश्चिम भारत के उन क्षेत्रों पर पड़ सकता है, जहां खेती मुख्य रूप से मानसूनी बारिश पर निर्भर है। इससे खरीफ फसलों, विशेषकर दलहन और तिलहन उत्पादन में गिरावट आ सकती है। जलाशयों का स्तर घटने, भूजल संकट बढ़ने और खाद्य महंगाई बढ़ने की भी आशंका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो का प्रभाव और अधिक गंभीर होता जा रहा है।
सूखे के कारणों को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है। सूखा केवल कम वर्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार है The Borgen Project के अनुसार सूखे के निम्न कारण है -
वर्षा की कमी - सूखे का सबसे प्रमुख कारण बारिश का कम होना है, जब बारिश सामान्य से कम होती है तो सूखा पड़ता है। तब मिट्टी की नमी घटने लगती है और जल स्रोत सूखने लगते है।
जलवायु परिवर्तन - इस समय विश्व स्तर पर तापमान बढ़ने से वर्षा का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। हीटवेव और बढ़ता तापमान मिट्टी से नमी को तेजी से खत्म कर देते हैं।
एल नीनो प्रभाव - प्रशांत महासागर में होने वाला एल नीनो प्रभाव दुनिया के कई देशों में मानसून को प्रभावित करता है। भारत में एल नीनो के दौरान सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।
वनों की कटाई - पेड़ों की कटाई से पर्यावरण का जल चक्र प्रभावित होता है। ये जंगल और मिट्टी की नमी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। वनों की कमी से भूमि शुष्क होने लगती है और सूखे की संभावना बढ़ जाती है।
भूजल दोहन - भूजल का लगातार दोहन किया जा रहा है। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, जिससे सूखे के दौरान जल संकट और गंभीर हो जाता है।
जल संसाधनों का खराब प्रबंधन - बारिश के पानी का पर्याप्त संरक्षण नहीं होने, तालाबों और झीलों के खत्म होने तथा जल की बर्बादी के कारण कई क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता घट रही है।
बढ़ती आबादी और शहरीकरण - जनसंख्या वृद्धि और तेजी से बढ़ते शहरों के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। इससे उपलब्ध जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और सूखे का खतरा अधिक हो जाता है।
मिट्टी का क्षरण और मरुस्थलीकरण - अत्यधिक खेती, खनन और भूमि क्षरण के कारण मिट्टी की जल धारण क्षमता कम हो जाती है। इससे भूमि जल्दी सूखती है और कृषि सूखे की स्थिति पैदा होती है।
National Drought Mitigation Center के अनुसार सूखा जब पड़ता है तो हमारे सामने एक गंभीर स्थिति उत्पन्न होती है और इसका सीधा प्रभाव मानवीय जीवन पर पड़ता है, जो निम्न प्रकार है -
आर्थिक प्रभाव - इसमें कई बातें शामिल है, जिनमे सूखे के कारण फसलें नष्ट होने पर किसानों को नुकसान हो सकता है। किसान के पास पानी की आपूर्ति कम है, तो किसान को सिंचाई के लिए पैसा खर्च करना पड़ सकता है, कुएं खोदने पड़ सकते हैं। जब जंगल की आग से पेड़ों के जंगल नष्ट हो जाते हैं, तो लकड़ी उद्योग में काम करने वाले लोग प्रभावित हो सकते हैं। नावों और मछली पकड़ने के उपकरणों की बिक्री करने वाले व्यवसाय सूखे के कारण झीलों और अन्य जल स्रोतों के सूख जाने के कारण अपने कुछ सामान बेचने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। लोगों को खाने-पीने की चीजों के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पर्यावरणीय प्रभाव - इसके पर्यावरणीय प्रभाव में मछलियों और वन्यजीवों के आवासों का नुकसान या विनाश हो सकता है। जंगली जानवरों के लिए भोजन और पीने के पानी की कमी होना। जल की कमी के कारण वन्यजीवों में बीमारियों का बढ़ना। जलाशयों, झीलों और आर्द्रभूमियों के जलस्तर में गिरावट होना। सूखे के कारण जंगलों में आग और मिट्टी का कटाव बढ़ना आदि शामिल है।
सामाजिक प्रभाव - सूखे के सामाजिक प्रभाव में पानी की कमी और आर्थिक नुकसान के कारण लोगों में तनाव, चिंता और अवसाद बढ़ना। खराब जल गुणवत्ता और धूल के कारण स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ना। जंगल और घासभूमि में आग लगने से जन सुरक्षा को खतरा। आय और रोजगार में कमी के कारण लोगों का पलायन बढ़ना। जल संकट के कारण लोगों की जीवनशैली और दैनिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ना शामिल है।
सूखे की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए केवल आपदा आने के बाद राहत कार्य करना पर्याप्त नहीं है। संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन (UNCCD) के अनुसार, सूखा प्रबंधन को संकट आधारित प्रतिक्रिया से आगे बढ़ाकर पूर्व तैयारी और जोखिम प्रबंधन आधारित बनाना आवश्यक है।
प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली - सूखे की स्थिति का समय रहते पता लगाने के लिए मौसम पूर्वानुमान, सैटेलाइट डेटा और जल निगरानी प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इससे सरकार और समुदाय पहले से तैयारी कर सकते हैं और नुकसान कम किया जा सकता है।
जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन - बारिश के पानी को संरक्षित करना सूखा प्रबंधन का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। इसके अंतर्गत तालाब और झीलों का पुनर्जीवन, चेक डैम निर्माण, रिचार्ज कुएं, रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसे उपाय शामिल है।
सूखा-रोधी कृषि तकनीक - कम पानी में उगने वाली फसलें, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और मृदा संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देकर कृषि पर सूखे के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
भूजल पुनर्भरण और जल प्रबंधन - भूजल स्तर बनाए रखने के लिए वर्षा जल को जमीन में पुनर्भरित करना आवश्यक है। साथ ही जल उपयोग की निगरानी और जल का संतुलित उपयोग भी जरूरी है।
भूमि और वन संरक्षण - UNCCD के अनुसार स्वस्थ भूमि और वन पारिस्थितिकी तंत्र लंबे समय तक जल संग्रहण में मदद करते है। वनीकरण, आर्द्रभूमि संरक्षण और मिट्टी संरक्षण से सूखे के जोखिम को कम किया जा सकता है।
UNCCD देशों को राष्ट्रीय सूखा प्रबंधन योजना (National Drought Plan) तैयार करने पर जोर देता है, ताकि सूखे के दौरान राहत और पुनर्वास कार्य अधिक प्रभावी ढंग से किए जा सकें।
सूखा एक अत्यंत दयनीय स्थिति है, जिसका असर कृषि, लोगों की आजीविका से लेकर अलग अलग तरह से पड़ता है और यह पूरी तरह आजीविका को नष्ट कर देता है। सूखा पहल के अंतर्गत सूखे से निपटने के लिए निम्न योजनाये अपनाई ज रही है।
सूखा प्रबंधन प्रणालियों की स्थापना, विशेष रूप से राष्ट्रीय सूखा योजनाएँ
सूखे की संवेदनशीलता और जोखिम को कम करने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर मिलकर काम करना
हितधारकों को एक ऐसा टूलबॉक्स प्रदान करना जिसका उपयोग वे लोगों और पारिस्थितिक तंत्र दोनों की सूखा-प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाने के लिए कर सकें।
UNCCD के अनुसार सूखे की बढ़ती चुनौती से निपटारा पाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। ये तकनीकें जल संरक्षण के साथ ही पूर्व चेतावनी और बेहतर जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
पूर्वानुमान - AI और मशीन लर्निंग की मदद से वर्षा, तापमान और मिट्टी की नमी का विश्लेषण कर सूखे की पहले से चेतावनी दी जा सकती है। इससे किसानों और सरकारों को तैयारी का समय मिलता है।
सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग तकनीक - उपग्रहों के माध्यम से मिट्टी की नमी, जलाशयों का स्तर, फसल स्वास्थ्य, वनस्पति स्थिति की निगरानी की जाती है। इससे सूखे की स्थिति का तेजी से आकलन संभव होता है।
स्मार्ट सिंचाई प्रणाली - ड्रिप और सेंसर आधारित सिंचाई तकनीक पानी की बर्बादी कम करती है और फसलों को जरूरत के अनुसार पानी उपलब्ध कराती है।
भूजल मॉनिटरिंग सिस्टम - डिजिटल सेंसर और IoT आधारित तकनीक भूजल स्तर की लगातार निगरानी करने में मदद करती है। इससे जल उपयोग को नियंत्रित किया जा सकता है।
जल पुनर्चक्रण - शहरों में इस्तेमाल किए गए पानी को ट्रीट कर दोबारा उपयोग करने की तकनीक जल संकट कम करने में सहायक बन रही है।
क्लाइमेट रेजिलिएंट फसलें - वैज्ञानिक ऐसी फसल किस्मों का विकास कर रहे हैं जो कम पानी में उग सकें, अधिक तापमान सहन कर सकें, सूखे में भी उत्पादन दे सकें।
ड्रोन और डेटा आधारित कृषि - ड्रोन तकनीक से खेतों की नमी, फसल स्वास्थ्य और जल उपयोग की निगरानी की जा रही है, जिससे जल प्रबंधन अधिक सटीक बन रहा है।
प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना - प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है, जिसे वर्ष 2015 में किसानों के हर खेत को पानी और Per Drop More Crop के उद्देश्य से शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, जल संरक्षण और पानी के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना है।
सिंचाई गणना - यह जल शक्ति मंत्रालय की एक केंद्रीय योजना है, जिसके तहत देश में सिंचाई स्रोतों, जल संरचनाओं और जल निकायों का डेटा एकत्र किया जाता है। Irrigation Census का उद्देश्य जल संसाधनों का सही आकलन कर बेहतर जल प्रबंधन और नीतिगत योजना बनाना है।
नमामि गंगे - भारत सरकार की एक प्रमुख फ्लैगशिप योजना है, जिसे वर्ष 2014 में गंगा नदी के प्रदूषण नियंत्रण, संरक्षण और पुनर्जीवन के उद्देश्य से शुरू किया गया था। इस योजना के तहत सीवेज ट्रीटमेंट, घाट विकास, नदी सफाई, वनीकरण और जनजागरूकता जैसे कार्य किए जाते हैं।
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