असम की बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित रूप से बाहर निकालते भारतीय सेना के जवान। 

 

फोटो :  ADG PI - INDIAN ARMY

आपदा

असम में बार-बार क्‍यों आती है विनाशकारी बाढ़ : कुसूर कुदरत का या इंसानी गतिविधियां जिम्‍मेवार?

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

असम में आई बाढ़ के चलते हुई मौतों का आंकड़ा सौ से ऊपर का बताया जा रहा है। हालांकि राज्‍य के आधिकारिक बुलेटिन में यह 78 बताई गई है। विस्‍थापितों की संख्‍या 6 लाख के पार हो चुकी है। बाढ़ से हुए आर्थिक नुकसान का अभी सटीक आकलन नहीं किया जा सकता है, पर यह बात तय है कि बाढ़ ने राज्‍य की कृषि प्रधान अर्थव्‍यवस्‍था को काफी बुरी तरह प्रभावित किया है। 

ऐसे में कुछ अहम सवाल यह उठते हैं - 

  • असम में तकरीबन हर साल जान-माल का भारी नुकसान करने वाली इस विनाशकारी बाढ़ के कारण क्‍या हैं? 

  • इसके लिए कुदरत दोषी है या मनुष्‍य? 

  • दशकों से तकरीबन हर साल व्‍यापक स्‍तर पर बाढ़ आने के बावजूद अबतक इसके नियंत्रण के लिए क्‍या उपाय किए गए हैं? ये उपाय कारगर क्‍यों नहीं हो पा रहे हैं? 

  • बाढ़ नियंत्रण के उपायों में कमियां या खामियां कहां-कहां है? इनके असफल होने की वजहें क्‍या हैं? 

  • बाढ़ नियंत्रण को दुरुस्‍त करने के लिए भविष्‍य में क्‍या-क्‍या कदम उठाने की जरूरतें हैं? 

इस लेख में हम इन्‍हीं सवालों के उत्‍तर तलाशने की कोशिश करेंगे। 

वास्‍तव में असम में बाढ़ कोई नई घटना नहीं है। राज्य का का करीब 40 फसदी हिस्‍सा बाढ़ संभावित क्षेत्र में आता है। ब्रह्मपुत्र और बराक जैसी विशाल नदी प्रणालियों ने जहां असम को उपजाऊ मिट्टी, समृद्ध जैव विविधता और कृषि की अपार संभावनाएं दी हैं, वहीं यही नदियां हर वर्ष लाखों लोगों के लिए तबाही का कारण भी बन जाती हैं। हालांकि, यह मान लेना कि असम की बाढ़ केवल प्रकृति की देन है, वास्तविकता को अनदेखा करने जैसा होगा। क्‍योंकि, प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ पिछले कई दशकों की मानव गतिविधियों ने असम में बाढ़ के संकट को और भी गंभीर बना दिया है। यही वजह है कि अब पहले की तुलना में बाढ़ ज्‍यादा विनाशकारी होने लगी है और अधिक बार आने लगी है। 

असम में बाढ़ के प्रमुख कारण

असम में आने वाली बाढ़ किसी एक वजह का नतीजा नहीं है। इसके पीछे प्राकृतिक परिस्थितियों, मानवीय हस्तक्षेप और कुछ प्रशासनिक व नीतिगत कमियों जैसे जटिल कारण हैं। यही वजह है कि हर साल मानसून के दौरान बाढ़ का स्वरूप और अधिक विनाशकारी होता जा रहा है। इन कारणों को अलग-अलग समझे बिना बाढ़ का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

प्राकृतिक कारण

असम की भौगोलिक स्थिति और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली बाढ़ की सबसे बड़ी प्राकृतिक वजह हैं। इसके अलावा हिमालयी क्षेत्र का भूगोल और मानसूनी वर्षा भी हर वर्ष बाढ़ की तीव्रता को प्रभावित करते हैं।

  • ब्रह्मपुत्र दुनिया की सबसे अधिक गाद (Sediment) ढोने वाली नदियों में शामिल है। यह गाद ही इसकी बाढ़ की सबसे बड़ी वजह है।

  • असम के मैदानों में नदी का ढाल कम होने से गाद नदी तल में जमा होती रहती है।

  • गाद के जमाव से नदी का तल ऊंचा होने और प्रवाह बाधित होने के साथ ही उसकी जल धारण क्षमता भी घटती जाती है।

  • हिमालय से हर साल भारी मात्रा में मिट्टी और चट्टानें नदी में बहकर आती हैं, जो नदी का मार्ग अवरुद्ध करती या उसका रास्‍ता बदल देती हैं।

  • ब्रह्मपुत्र एक बहुधाराओं (Braided River) वाली नदी है, जो अक्सर अपना रास्ता बदलती रहती है।

  • अरुणाचल प्रदेश, भूटान और पूर्वोत्तर की सैकड़ों सहायक नदियां मानसून में एक साथ ब्रह्मपुत्र में पानी छोड़ती हैं।

  • दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अत्यधिक वर्षा से नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है।

  • जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अत्यधिक वर्षा (Extreme Rainfall) की घटनाएं बढ़ रही हैं।

  • भूस्खलन के कारण नदियों में अचानक बड़ी मात्रा में मलबा और पानी पहुंच जाता है।

मानवीय कारण

प्राकृतिक बाढ़ को विनाशकारी आपदा में बदलने में मानव गतिविधियों की भी बड़ी भूमिका मानी जाती है। पिछले कुछ दशकों में अनियोजित विकास, भूमि उपयोग में बदलाव और पर्यावरणीय क्षरण ने बाढ़ के खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है।

  • जलग्रहण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई।

  • शहरीकरण और कृषि के बढ़ते दायरे के कारण बाढ़ मैदानों (Flood Plains) पर चौतरफा अनियंत्रित अतिक्रमण।

  • आर्द्रभूमियों (Wetlands) और प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों का सिकुड़ना।

  • गुवाहाटी समेत कई शहरों में अनियोजित शहरीकरण।

  • नालों और प्राकृतिक ड्रेनेज मार्गों पर निर्माण।

  • पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और अन्य निर्माण कार्यों से मिट्टी का कटाव बढ़ना।

  • अवैज्ञानिक खनन और भूमि उपयोग परिवर्तन।

  • नदी तटों पर अनियोजित बसावट और कृषि विस्तार।

  • पर्यावरणीय नियमों व प्रतिबंधों को लागू करने में ढिलाई। 

नीतिगत व व्‍यवस्‍थागत कारण

असम में बाढ़ की कुछ ऐसी वजहें भी हैं जो सीधे प्राकृतिक या मानवीय कारणों में नहीं आतीं। यह हर साल बाढ़ से होने वाले नुकसान को बढ़ा देती हैं। इनमें बाढ़ प्रबंधन की कमियां, पुराना बुनियादी ढांचा और नीतिगत चुनौतियां प्रमुख हैं।

  • कई तटबंध दशकों पुराने हो चुके हैं और समय पर उनकी मरम्मत नहीं हो पाती।

  • हर वर्ष अनेक स्थानों पर तटबंध टूटने से अचानक बड़े पैमाने पर जलभराव होता है।

  • नदी में बढ़ती गाद निकालने (Desiltation) की समुचित व्यवस्था नहीं है।

  • बाढ़ नियंत्रण योजनाओं में नदी घाटी (River Basin) आधारित समग्र दृष्टिकोण का अभाव।

  • विभिन्न राज्यों और देशों के बीच नदी प्रबंधन में बेहतर समन्वय की आवश्यकता।

  • कई क्षेत्रों में बाढ़ पूर्वानुमान और समय पर चेतावनी प्रणाली अभी भी पर्याप्त प्रभावी नहीं है।

  • राहत और पुनर्वास पर अपेक्षाकृत अधिक, जबकि दीर्घकालिक रोकथाम पर कम निवेश।

  • नदी कटाव और बाढ़ को अलग-अलग समस्याओं की तरह देखने के कारण समेकित समाधान नहीं बन पाते।

कई इलाकों में बाढ़ का पानी घरों में घुस गया है, जहां से भारतीय सेना बचाव अभियान चला कर लोगों को निकाल रही है। 

ब्रह्मपुत्र का उग्र स्वभाव और गाद की समस्या सबसे बड़ी वजह

असम की बाढ़ को समझने के लिए सबसे पहले ब्रह्मपुत्र नदी के स्वभाव को समझना जरूरी है। तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश होते हुए असम में प्रवेश करने वाली ब्रह्मपुत्र दुनिया की सबसे अधिक तलछट (Sediment) ढोने वाली नदियों में गिनी जाती है।

हिमालय दुनिया के सबसे युवा पर्वतों में है। यहां लगातार भूस्खलन और चट्टानों का कटाव होता रहता है। इससे भारी मात्रा में मिट्टी और पत्थर नदी में आ जाते हैं। असम के मैदानी क्षेत्रों में पहुंचते-पहुंचते नदी का ढाल अचानक कम हो जाता है। नतीजतन नदी अपने साथ लाई तलछट को यहीं जमा करने लगती है। इससे नदी का तल लगातार ऊपर उठता जाता है और उसकी जल धारण क्षमता कम होती जाती है। थोड़ी अधिक बारिश होते ही नदी किनारों से बाहर निकलकर आसपास के क्षेत्रों में फैल जाती है।

इसके अलावा ब्रह्मपुत्र का चौड़ा, बहुधाराओं (Braided Channel) वाला स्वरूप भी इसे अत्यधिक अस्थिर बनाता है। नदी बार-बार अपना रास्ता बदलती है और नए क्षेत्रों में कटाव शुरू कर देती है। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र में बाढ़ की सबसे बड़ी वजहों में से एक है नदी में लगातार बढ़ती गाद। हर वर्ष करोड़ों टन तलछट नदी में आती है। नदी का तल ऊंचा होता जाता है और पानी की वहन क्षमता घटती जाती है। इससे नदी आसानी से किनारों के ऊपर बहने लगती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तटबंध बनाना पर्याप्त समाधान नहीं है। जब तक नदी में आने वाली तलछट के वैज्ञानिक प्रबंधन, कैचमेंट संरक्षण और नदी विज्ञान (River Morphology) के आधार पर दीर्घकालिक योजना नहीं बनाई जाएगी, तब तक समस्या बनी रहेगी।

हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी तक का भूगोल भी जिम्मेदार

असम का भौगोलिक स्वरूप भी बाढ़ को बढ़ाने वाला प्रमुख कारक है। राज्य चारों ओर से पर्वतीय क्षेत्रों से घिरा हुआ है। अरुणाचल प्रदेश, भूटान, नागालैंड, मेघालय और मिजोरम से निकलने वाली सैकड़ों छोटी-बड़ी नदियां मानसून के दौरान एक साथ ब्रह्मपुत्र में आकर मिलती हैं। यदि इन सभी नदी घाटियों में एक साथ तेज वर्षा हो जाए तो कुछ ही दिनों में ब्रह्मपुत्र में जलस्तर कई मीटर तक बढ़ जाता है। यही कारण है कि असम में बाढ़ अक्सर बहुत तेजी से आती है और लोगों को संभलने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।

असम की प्रमुख नदियां और बाढ़ में उनकी भूमिका

लगभग हर साल आने वाली बाढ़ में असम की प्रमुख नदियों की भी अहम भूमिका है। दरअसल इन नदियों की प्रकृति ऐसी है कि यहां बाढ़ आना सामान्य सी बात है।

नदीकुल लंबाई (किमी)असम में लंबाई (किमी, लगभग)बाढ़ में भूमिका
ब्रह्मपुत्र2900916असम की अधिकांश बड़ी बाढ़ का मुख्य कारण; अधिकांश सहायक नदियां इसमें मिलती हैं।
बराक900564दक्षिण असम (बराक घाटी) में बाढ़ का प्रमुख कारण।
सुबनसिरी442190लखीमपुर क्षेत्र में बाढ़ और कटाव बढ़ाती है।
मानस376104बक्सा, बारपेटा आदि में बाढ़।
धानसिरी352230गोलाघाट और नगांव में जलभराव।
जिया-भराली247120सोनितपुर क्षेत्र में बाढ़ और कटाव।
बेकी190160निचले असम में बाढ़।
पगलादिया19797नलबाड़ी और बक्सा में बार-बार बाढ़।
कोपिली290200नगांव और मोरीगांव में बाढ़।
बुरी दिहिंग380320ऊपरी असम में बाढ़।

क्या केवल भारी बारिश ही जिम्मेदार है?

भारी वर्षा महत्वपूर्ण कारण जरूर है, लेकिन इसे बाढ़ का अकेला या सबसे बड़ा कारण नहीं कहा जा सकता। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान असम और इसके ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है। इसके साथ ही अरुणाचल प्रदेश और पूर्वी हिमालय में होने वाली बारिश भी कुछ घंटों या दिनों बाद असम पहुंच जाती है। यदि स्थानीय वर्षा और ऊपरी क्षेत्रों से आने वाला पानी एक साथ मिल जाए तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही बाढ़

असम में बाढ़ की विनाशलीला बढ़ते जाने की एक अहम वजह हाल के वर्षों में पूर्वोत्‍तर में हुआ जलवायु परिवर्तन भी है। इसके कारण कम समय में अत्यधिक वर्षा (Extreme Rainfall Events) की घटनाएं बढ़ी हैं। इससे अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Flood) और सामान्य नदीय बाढ़ दोनों अधिक खतरनाक होती जा रही हैं। पूर्वोत्तर भारत में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ने, ग्लेशियरों में बदलाव, असामान्य मानसून, बादल फटने जैसी घटनाएं और मौसम की अनिश्चितता भविष्य में बाढ़ के जोखिम में बढ़ोतरी होती दिख रही है। इसलिए अब केवल पारंपरिक बाढ़ नियंत्रण उपाय पर्याप्त नहीं रह गए हैं, जब‍तक कि जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के उपाय नहीं किए जाते। 

बाढ़ की चपेट में आए इलाकों में शिविर लगा कर बाढ़ पीडि़तों को दवाएं बांटी जा रही हैं। ताकि इन इलाकों में कोई बड़ी बीमारी न फैलने पाए। 

क्या इंसानों ने प्राकृतिक बाढ़ को आपदा में बदल दिया?

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। वास्‍तव में प्राकृतिक बाढ़ को पूरी तरह रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन उसे विनाशकारी आपदा बनने से जरूर रोका जा सकता है। दुर्भाग्य से असम में कई मानवीय गतिविधियों ने बाढ़ के खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है।

सबसे पहले बड़े पैमाने पर वनों की कटाई ने समस्या को गंभीर बनाया। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में जंगल कम होने से वर्षा का पानी सीधे नदियों में पहुंचता है। इससे बाढ़ का प्रवाह अचानक बढ़ जाता है।

दूसरी बड़ी समस्या अनियोजित शहरीकरण है। गुवाहाटी सहित कई शहरों में प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर निर्माण हो गया है। नालों और आर्द्रभूमियों के खत्म होने से वर्षा का पानी निकल नहीं पाता और सामान्य बारिश भी जलभराव में बदल जाती है।

तीसरी समस्या नदियों के बाढ़ मैदानों पर लगातार बढ़ता अतिक्रमण है। पहले जहां अतिरिक्त पानी फैलकर अपना दबाव कम कर देता था, वहां अब गांव, सड़कें और इमारतें बन चुकी हैं। परिणामस्वरूप बाढ़ का पानी सीधे आबादी को प्रभावित करता है।

तटबंधों पर दशकों से भरोसा, लेकिन नतीजे क्यों नहीं मिले?

असम में बाढ़ नियंत्रण का सबसे प्रमुख साधन तटबंध रहे हैं। बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए बीते दशकों में भारी-भरकम खर्च से राज्य में हजारों किलोमीटर लंबे तटबंध बनाए गए हैं। लेकिन, समस्या यह है कि इनमें से अनेक तटबंध कई दशक पुराने हो चुके हैं और बाढ़ को रोकने की दृष्टि से अब इनकी ऊंचाई कम पड़ने लगी है। लगातार कटाव, रखरखाव की कमी, गाद जमने और अत्यधिक दबाव के कारण हर वर्ष कहीं न कहीं तटबंध टूट जाते हैं। एक बार तटबंध टूटने पर पानी अत्यधिक वेग से गांवों में प्रवेश करता है और नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों पर अत्‍यधिक निर्भरता ने नदी के प्राकृतिक फैलाव को सीमित कर दिया है। इससे नदी के भीतर जलस्तर और दबाव दोनों बढ़ जाते हैं। 

असम में बाढ़ नियंत्रण के सरकारी उपाय

परियोजना / उपायसंबंधित क्षेत्रवर्तमान स्थितिसंक्षिप्त विवरण
तटबंध (Embankment) निर्माण एवं सुदृढ़ीकरणब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियांजारीअसम में बाढ़ नियंत्रण का सबसे प्रमुख उपाय। हजारों किमी तटबंध बनाए गए हैं, लेकिन हर वर्ष कई स्थानों पर इनके टूटने या क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं सामने आती हैं।
नदी कटावरोधी कार्य (Anti-Erosion Works)धेमाजी, लखीमपुर, माजुली, बारपेटा, धुबरी आदिजारीनदी कटाव रोकने के लिए जियोबैग, रिवेटमेंट, बोल्डर पिचिंग और स्पर जैसी संरचनाएं बनाई जाती हैं। कई स्थानों पर इनसे राहत मिली है, लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
ब्रह्मपुत्र बोर्ड की परियोजनाएंअसम एवं पूर्वोत्तरआंशिक रूप से लागूब्रह्मपुत्र बेसिन में दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन, नदी प्रशिक्षण और बहुउद्देशीय योजनाओं की रूपरेखा तैयार की गई है, लेकिन कई परियोजनाएं अभी विभिन्न चरणों में हैं।
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की बाढ़ पूर्वानुमान प्रणालीराज्य के प्रमुख नदी बेसिनसक्रियप्रमुख नदियों के जलस्तर की निगरानी कर समय-समय पर बाढ़ पूर्वानुमान और चेतावनी जारी की जाती है।
समेकित नदी घाटी प्रबंधन (Integrated River Basin Management)ब्रह्मपुत्र बेसिनक्रमिक/नीतिगत स्तर परपूरे नदी तंत्र, जलग्रहण क्षेत्र, गाद प्रबंधन और बाढ़ मैदानों को साथ लेकर दीर्घकालिक समाधान विकसित करने की अवधारणा पर कार्य किया जा रहा है।
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) की पूर्व चेतावनी प्रणालीबाढ़ प्रभावित जिलेसक्रियबाढ़ संभावित क्षेत्रों में समय रहते अलर्ट, राहत एवं बचाव कार्यों का समन्वय तथा समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन।

काजीरंगा पार्क और वन्यजीवों पर भी पड़ता है असर

बाढ़ का प्रभाव केवल इंसानों तक सीमित नहीं रहता। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान सहित कई संरक्षित क्षेत्रों में बाढ़ आने से गैंडे, हाथी, हिरण और अन्य वन्यजीव सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करते हैं। इस दौरान सड़क दुर्घटनाओं, शिकार और अन्य खतरों का जोखिम बढ़ जाता है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि सामान्य स्तर की वार्षिक बाढ़ काजीरंगा जैसे पारिस्थितिक तंत्र के लिए लाभकारी भी होती है क्योंकि इससे घास के मैदानों का नवीनीकरण होता है और जैव विविधता बनी रहती है। समस्या तब होती है जब बाढ़ अत्यधिक लंबी, गहरी और विनाशकारी बन जाती है।

आगे का रास्ता : क्या-क्या कदम जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि असम में बाढ़ को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, क्योंकि यह ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली और राज्य के भूगोल का स्वाभाविक हिस्सा है। इसलिए अब लक्ष्य बाढ़ को रोकने की बजाय उससे होने वाले नुकसान को कम करना होना चाहिए। इसके लिए केवल तटबंध बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि नदी, जंगल, जलग्रहण क्षेत्र, आर्द्रभूमियों और बाढ़ मैदानों को एक इकाई मानकर दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी।

  • नदी घाटी आधारित समेकित प्रबंधन (Integrated River Basin Management) : पूरी ब्रह्मपुत्र घाटी को एक इकाई मानकर योजना बनाई जाए, ताकि विभिन्न राज्यों और देशों से आने वाले पानी, तलछट और नदी प्रवाह का समन्वित प्रबंधन हो सके।

  • ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वनीकरण : अरुणाचल प्रदेश और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में वन क्षेत्र बढ़ाने से मिट्टी का कटाव कम होगा और बारिश का पानी धीरे-धीरे नदियों तक पहुंचेगा।

  • तलछट (Sediment) प्रबंधन की वैज्ञानिक व्यवस्था : ब्रह्मपुत्र में हर वर्ष जमा होने वाली गाद का नियमित अध्ययन, निगरानी और जहां आवश्यक हो वहां वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए।

  • आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्रों का संरक्षण : वेटलैंड और बाढ़ मैदान अतिरिक्त पानी को प्राकृतिक रूप से समाहित करते हैं। इनके अतिक्रमण और अवैज्ञानिक उपयोग पर प्रभावी रोक लगानी होगी।

  • बाढ़ मैदानों में अनियंत्रित निर्माण पर सख्ती : नदी के प्राकृतिक फैलाव वाले क्षेत्रों में आवासीय, व्यावसायिक और अन्य स्थायी निर्माण को वैज्ञानिक मानकों के आधार पर नियंत्रित किया जाए।

  • तटबंधों का नियमित वैज्ञानिक ऑडिट : पुराने तटबंधों की समय-समय पर जांच, मरम्मत और सुदृढ़ीकरण किया जाए, ताकि मानसून के दौरान उनके टूटने का खतरा कम हो।

  • आधुनिक बाढ़ पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली : सैटेलाइट, रियल-टाइम जलस्तर निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित पूर्वानुमान प्रणाली को गांव स्तर तक पहुंचाया जाए, जिससे समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

  • समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन को मजबूत बनाना : स्थानीय लोगों, स्वयंसेवी संगठनों और पंचायतों को नियमित प्रशिक्षण देकर राहत, बचाव और पुनर्वास की क्षमता बढ़ाई जाए।

  • नदी कटाव और बाढ़ का एकीकृत समाधान : बाढ़ और नदी कटाव को अलग-अलग समस्याओं की बजाय एक-दूसरे से जुड़ी चुनौती मानकर योजनाएं बनाई जाएं, क्योंकि दोनों का मूल कारण नदी की बदलती प्रवाह प्रणाली है।

  • 'लिविंग विद फ्लड्स' (Living with Floods) की नीति अपनाना : नीदरलैंड्स, बांग्लादेश और जापान जैसे देशों की तरह ऐसी रणनीति विकसित की जाए, जिसमें बाढ़ को पूरी तरह रोकने के बजाय उसके साथ सुरक्षित सह-अस्तित्व स्थापित करते हुए जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जाए।

कारणों की जड़ में गए बिना समाधान नहीं

असम की बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव हस्तक्षेप के जटिल संबंधों का परिणाम है। हिमालयी भूगोल, भारी मानसूनी वर्षा और ब्रह्मपुत्र का स्वाभाविक स्वरूप इस समस्या की बुनियाद हैं, लेकिन अनियोजित विकास, वनों की कटाई, बाढ़ मैदानों पर अतिक्रमण, बढ़ती तलछट और कमजोर नदी प्रबंधन ने इसे कहीं अधिक विनाशकारी बना दिया है। यदि आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नदी-केंद्रित योजना और दीर्घकालिक नीतियों को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो असम हर मानसून में इसी तरह जान-माल के नुकसान की भारी कीमत चुकाता रहेगा।

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