CWC की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 166 प्रमुख जलाशयों के पानी में 30 अप्रैल से 14 मई के बीच महज दो सप्ताह में दर्ज़ हुई है 7.85 BCM की भारी कमी।

 

स्रोत : विकी कॉमंस

पेयजल

CWC की रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी : पानी नहीं बचाया तो GDP में आएगी 6% तक की गिरावट

30 अप्रैल से 14 मई 2026 के बीच महज दो सप्ताह में देश के 166 प्रमुख जलाशयों के पानी में दर्ज़ हुई 7.85 BCM की भारी कमी। इतने पानी से पूरी हो सकती हैं करोड़ों लोगों की पेयजल और सिंचाई संबंधी जरूरतें।

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय
  • भारत के लिए संकट और भी गहरा, क्योंकि यहां विश्व की 18% आबादी रहती है, जबकि मीठे पानी का भंडार केवल 4% है। 

  • तेजी से सूखते जलाशय देश की जल सुरक्षा के लिए बन रहे हैं बढ़ता खतरा

इस बार मानसून आने में देरी के बीच देश में गर्मी अपने चरम पर पहुंची चुकी है। इसी के साथ देश के जलाशयों में पानी तेजी से घटने की बात भी केंद्रीय जल आयोग (CWC) के ताजा जलाशय बुलेटिन में सामने आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार 30 अप्रैल से 14 मई के बीच देश के 166 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी 71.082 अरब घन मीटर (BCM) से घटकर 63.232 BCM रह गया। यानी में देश के जल भंडार में महज दो सप्ताह 7.85 BCM की कमी दर्ज हुई। यह कोई साधारण बात नहीं, क्‍योंकि जल की यह मात्रा इतनी बड़ी है कि इससे करोड़ों लोगों की पेयजल और सिंचाई संबंधी जरूरतें पूरी की जा सकती थीं।

गंभीर बात यह है के देशभर के जलाशयों में तेजी से घटता यह पानी केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह उस बड़े संकट की आहट है जिसकी चेतावनी नीति आयोग की Composite Water Management Index (CWMI) रिपोर्ट कई साल पहले 2019 में ही दी जा चुकी चुकी है। रिपोर्ट साफ तौर पर कहती है कि यदि भारत ने अपने जल संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में सुधार नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से लगभग दोगुनी हो सकती है और इसका काफी गंभीर असर देश की अर्थव्‍यवस्‍था की विकास दर यानी सकल घरेलू उत्‍पाद (GDP) पर भी पड़ेगा। आकलन के मुताबिक पानी की कमी के कारण भारत की जीडीपी में लगभग 6% तक की गिरावट आ सकती है।

हर साल घट रही है प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घट रही है। वर्ष 1951 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5,177 घन मीटर थी, जो अब घटकर लगभग 1,500 घन मीटर के आसपास पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह और कम होगी। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, यदि किसी देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,700 घन मीटर से कम हो जाए, तो उसे जल-तनाव की श्रेणी में माना जाता है। भारत इस सीमा से नीचे पहुंच चुका है। यह स्थिति बताती है कि यदि जल संसाधनों का संरक्षण नहीं किया गया, तो देश के कई हिस्सों में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

नदी बेसिनों में घटता पानी, बढ़ा रहा संकट

भारत की जल सुरक्षा पर बढ़ते खतरे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के कई प्रमुख नदी बेसिनों में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घट रही है। नीति आयोग की CWMI रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती आबादी और पानी की मांग के कारण गंगा, साबरमती, माही, पेन्नार और ताप्ती जैसे कई नदी बेसिन जल तनाव (Water Stress) की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। कुछ छोटे नदी बेसिन तो पहले ही जल-अभाव (Water Scarcity) की श्रेणी में पहुंच चुके हैं।

CWMI रिपोर्ट ने केंद्रीय जल आयोग (Water and Related Statistics) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि देश के 12 नदी बेसिनों में रहने वाले लगभग 82 करोड़ लोगों के लिए प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,000 घन मीटर प्रति वर्ष या उससे कम के स्तर पर पहुंच चुकी है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार जल-अभाव (Water Scarcity) की स्थिति माना जाता है। 

देश की सबसे बड़ी आबादी को सहारा देने वाले गंगा बेसिन में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगभग 1,545 घन मीटर रह गई है, जो जल-तनाव (Water Stress) की सीमा से नीचे है और लगातार घट रही है। वहीं यमुना उप-बेसिन में बढ़ती आबादी, शहरीकरण और प्रदूषण के कारण जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव बना हुआ है और इसकी प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता भी तेजी से घट रही है। सबसे खराब स्थिति पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कुछ बेसिनों में दिखाई देती है। साबरमती बेसिन में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 240 घन मीटर, पेन्नार बेसिन में करीब 270 घन मीटर, माही बेसिन में लगभग 310 घन मीटर और कावेरी बेसिन में करीब 440 घन मीटर रह गई है। वहीं ताप्ती बेसिन में यह आंकड़ा लगभग 490 घन मीटर और कृष्णा बेसिन में करीब 600 घन मीटर के आसपास है। ये सभी आंकड़े गंभीर जल-अभाव की स्थिति को दर्शाते हैं। देश की प्रमुख नदी बेसिनों में पानी की स्थिति इस प्रकार है- 

नदी बेसिनप्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता (घन मीटर)स्थिति
साबरमती240गंभीर जल-अभाव
पेन्नार270गंभीर जल-अभाव
माही310गंभीर जल-अभाव
कावेरी440गंभीर जल-अभाव
ताप्ती490गंभीर जल-अभाव
कृष्णा600जल-अभाव
लूणी700जल-अभाव
सुवर्णरेखा900जल-अभाव की सीमा
गंगा1545जल-तनाव
यमुना*अत्यधिक दबावग्रस्त उप-बेसिन

कई राज्यों में हर साल एक मीटर घट रहा भूजल स्‍तर

CWMI रिपोर्ट बताती है कि भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और देश की लगभग 60 % सिंचाई तथा 80 % ग्रामीण पेयजल आपूर्ति भूजल पर निर्भर है। देश के 6,762 से अधिक आकलित भूजल इकाइयों में से 730 यानी 10.8% 'अतिदोहित' श्रेणी में हैं। जबकि 1,500 से ज्यादा ब्लॉक 'गंभीर' या 'अर्ध-गंभीर' श्रेणी में पहुंच चुकी हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भूजल स्तर हर वर्ष एक मीटर या उससे अधिक की दर से नीचे जा रहा है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि भूजल दोहन की मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो कई क्षेत्रों में पेयजल और कृषि दोनों पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

भारत के लिए यह काफी चिंता का विषय है, क्‍योंकि भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और यहां भूजल दोहन का राष्‍ट्रीय औसत 60.63 % है। देश की लगभग 60.6% सिंचाई तथा 80% ग्रामीण पेयजल आपूर्ति भूजल पर निर्भर है। इस कारण देश के अनेक हिस्सों में भूजल का दोहन उसकी पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक हो चुका है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में भूजल दोहन 100% से अधिक है। यानी हर साल जितना भूजल रिचार्ज होता है उससे ज्‍़यादा निकाल लिया जाता है। दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के कई हिस्सों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में हर वर्ष जलस्तर एक मीटर या उससे अधिक की दर से गिर रहा है। खेती में बाढ़ सिंचाई पद्धति, पानी की अधिक खपत वाली फसलें, बढ़ते शहरीकरण और अनियंत्रित बोरवेल इस संकट को और गहरा बना रहे हैं।

जल जीवन मिशन के जनवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक 15.69 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 81.02% परिवारों तक नल से जल पहुंच चुका है। 2019 में यह संख्‍या 3.23 करोड़ थी
CWC की रिपोर्ट

आखिर GDP पर क्यों पड़ेगा असर?

पानी केवल पीने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत है। भारत की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है और कृषि पूरी तरह पानी पर टिकी हुई है। यदि जल संकट बढ़ता है, तो सिंचाई प्रभावित होगी, फसल उत्पादन घटेगा और खाद्य महंगाई बढ़ेगी।

इसी तरह बिजली उत्पादन, इस्पात, कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण, दवा उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र को भी बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जल संकट इन क्षेत्रों की उत्पादन क्षमता को प्रभावित करेगा, निवेश की लागत बढ़ाएगा और रोजगार के अवसरों पर भी असर डालेगा। यही कारण है कि नीति आयोग ने पानी की कमी को केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक संकट के रूप में भी देखा है।

60 करोड़ लोग पहले से झेल रहे हैं जल संकट CWMI रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 60 करोड़ लोग उच्च या अत्यधिक जल तनाव की स्थिति में रह रहे हैं। इसका अर्थ है कि देश की लगभग आधी आबादी किसी न किसी रूप में पानी की कमी का सामना कर रही है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सुरक्षित पेयजल की कमी और दूषित जल के कारण हर साल करीब दो लाख लोगों की असमय मृत्यु हो जाती है। यह आंकड़े केवल पर्यावरणीय संकट की कहानी नहीं कहते, बल्कि यह स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक विकास पर पड़ने वाले गहरे प्रभाव की ओर भी इशारा करते हैं। जल संकट का असर सबसे पहले गरीब और ग्रामीण आबादी पर पड़ता है, लेकिन लंबे समय में इसका प्रभाव पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है।

जल संकट के बीच छोटे जलस्रोत और पोखर ही लोगों का सहारा हैं। 

बिजली उत्‍पादन और उद्योगों के लिए भी खतरा

देश के प्रमुख जलाशय केवल सिंचाई ही नहीं, बल्कि पेयजल, बिजली उत्पादन और औद्योगिक उपयोग के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन जलाशयों में तेजी से घटता जल भंडारण यह संकेत देता है कि मानसून आने से पहले कई राज्यों में पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 166 प्रमुख जलाशयों की कुल भंडारण क्षमता लगभग 180.852 BCM है, जो भारत की जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ माने जाते हैं। इनमें से 37 जलाशय जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े हैं, जबकि अधिकांश बड़े बांध सिंचाई और शहरी पेयजल आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के अनुसार, देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में जलविद्युत की हिस्सेदारी करीब 10-11% है और इसका बड़ा हिस्सा इन्हीं जलाशयों पर निर्भर करता है। ऐसे में जलाशयों में तेजी से घटता जल भंडारण केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन, औद्योगिक गतिविधियों और शहरों की जलापूर्ति के लिए भी चिंता का विषय बन जाता है। कई ताप विद्युत संयंत्र भी शीतलन (कूलिंग) के लिए बांधों और नदियों के पानी पर निर्भर हैं, इसलिए जल उपलब्धता में कमी का असर ऊर्जा क्षेत्र तक पहुंच सकता है। 

गर्मी के महीनों में जलाशयों का स्तर घटने से सिंचाई परियोजनाएं प्रभावित होती हैं, शहरों में पानी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है और कई बार बिजली उत्पादन भी कम करना पड़ता है। यदि कमजोर मानसून की स्थिति बनती है, तो यह संकट और गंभीर हो सकता है।

दुनिया की 18% आबादी, पीने योग्‍य पानी केवल 4%

भारत की स्थिति इसलिए और भी चिंताजनक है, क्योंकि यहां दुनिया की करीब 18% आबादी निवास करती है, जबकि देश के पास विश्व के मीठे पानी का केवल 4% हिस्सा है। यही असंतुलन भारत को दुनिया के सबसे अधिक जल-तनाव वाले देशों में शामिल करता है।

तेजी से बढ़ती आबादी, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और खेती में बढ़ती पानी की मांग ने देश के जल संसाधनों पर भारी दबाव डाल दिया है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता, लंबे सूखे और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं जल प्रबंधन को और कठिन बना रही हैं। नतीजा यह है कि कई क्षेत्रों में भूजल तेजी से खत्म हो रहा है और जलाशयों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

दूषित जल के कारण भारत में हर वर्ष 3200 लोगों की मृत्‍यु होती है। इस चुनौती से निपटने के लिए 2019 में जल जीवन मिशन शुरू किया गया। मिशन की अवधि 2028 तक बढ़ा दी गई है।
WHO की रिपोर्ट

सामूहिक प्रयास से स्‍थानीय नदियों, तालाबों, बावडि़यों की साफ सफाई से देश के कई इलाकों में पानी की समस्‍या खत्‍म होने के उदाहरण देखने को मिले हैं।

सामूहिक प्रयास से पानी बचाने का रास्ता भी मौजूद

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का जल संकट केवल संसाधनों की कमी का नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की चुनौती भी है। देश में हर वर्ष औसतन लगभग 4,000 अरब घन मीटर वर्षा और हिमपात से पानी उपलब्ध होता है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा बिना उपयोग नदियों के जरिए समुद्र में चला जाता है। ऐसे में वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग), पारंपरिक जल स्रोतों जैसे तालाब, कुएं, बावड़ियों और झीलों का पुनर्जीवन तथा भूजल पुनर्भरण इस संकट से निपटने के सबसे प्रभावी उपाय माने जाते हैं। कृषि क्षेत्र, जो देश के कुल मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत उपयोग करता है, वहां ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना भी जरूरी है। इसके साथ ही पानी की अधिक खपत वाली फसलों के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल विविधीकरण अपनाने से जल दबाव कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार, उद्योग और समाज मिलकर जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप दें, तो देश के सामने खड़े जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

निष्‍कर्ष : सरकार नहीं, समाज को भी बदलनी होगी सोच

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने पानी की समस्या संसाधनों की कमी से ज्यादा प्रबंधन की समस्या है। देश में हर साल पर्याप्त वर्षा होती है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा बिना उपयोग समुद्र में चला जाता है। यदि वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण, पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण और पानी के दक्ष उपयोग पर गंभीरता से काम किया जाए, तो जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

नीति आयोग की CWMI रिपोर्ट और जलाशयों के ताजा आंकड़े एक स्पष्ट संदेश देते हैं। यदि आज पानी बचाने और उसके बेहतर प्रबंधन के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में भारत को केवल पेयजल संकट ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने, कृषि उत्पादन घटने और करोड़ों लोगों की आजीविका पर खतरे का सामना भी करना पड़ सकता है। पानी का संकट अब भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है।

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