भूजल स्तर नीचे जाने के कारण देश के विभिनन शहरों में गर्मी आते ही जल संकट गंभीर रूप ले लेता है।
स्रोत : इंडिया वाटर पोर्टल
देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तापमान बढ़ने के साथ ही शहर के कई इलाकों में जल संकट गंभीर हो गया है। शहर भर में निजी बोरिंग के जरिये भूजल के बेहिसाब दोहन के कारण भूजल स्तर काफी नीचे जा चुका है। नतीजतन तीन चौथाई शहर में लोगों को 200 फीट की गहराई में भी पानी नहीं मिल पा रहा है। उधर, कई इलाकों में जलकल विभाग की टंकियां सूखने के कारण इन मोहल्लों में नल से गंदा पानी आ रहा है। गंदा पानी और सूखे नल लोगों के लिए परेशानियां बढ़ा रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जल संकट के मामले में आलमबाग, हुसैनगंज, से लेकर राजाजीपुरम, जानकीपुरम विस्तार, से लेकर चिनहट तक लोगों को पानी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। पुराने लखनऊ के ठाकुरगंज, चौक जैसे इलाकों में भी हालात तकरीबन एक जैसे हैं। कहीं नलों ने पानी देना बंद कर दिया है, तो कहीं जर्जर पाइपलाइन पूरी तरह जवाब दे चुकी है। कई जगहों पर गंदा और बदबूदार पानी सप्लाई हो रहा है, जिससे बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है।
लखनऊ में गर्मियां आते ही जलसंकट पैदा हो जाना कोई नई बात नहीं है। यह नज़ारा तकरीबन हर साल देखने को मिलता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर जलकल विभाग पहले से तैयारी क्यों नहीं करता? सर्दियों में जब जलापूर्ति नेटवर्क की मरम्मत और नए कामों के लिए पर्याप्त समय रहता, तब कोई ठोस काम क्यों नहीं होता। जब संकट सिर पर आ गया है, तो अफसर फाइलों और प्रस्तावों में उलझे नजर आने लगते हैं। मिसाल के तौर पर जलकल के महाप्रबंधक कुलदीप सिंह ने 18 अप्रैल को जल निगम को पत्र लिखकर काम शुरू करने की बात कही है। लेकिन, सवाल उठता है कि संकट गहराने के बाद किया जा रहा यह पत्राचार क्या लोगों को पर्याप्त पानी मुहैया करा पाएगा?
राजाजीपुरम के ए-ब्लॉक में राइजिंग मेन की पाइपिंग, वाल्व मरम्मत और जलाशय के जीर्णोद्धार के लिए 61.81 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा गया है। यह रकम 15वें वित्त आयोग की बची राशि से खर्च होनी है। यानी राशि पहले से उपलब्ध होने के बावजूद काम समय पर नहीं हुआ। इसी तरह अलीगंज के सेक्टर-बी में स्थित जलाशय के पुनर्निर्माण के लिए 67.92 लाख रुपये की योजना भी अटकी हुई है। इसके अलावा शहर के अलग-अलग इलाकों में पाइपलाइन बदलने, नई लाइन बिछाने और नलकूपों की मरम्मत के लिए 2 करोड़ रुपये से ज्यादा की योजनाएं तैयार हैं, जिनपर काम होना बाकी है।
मानसरोवर और ट्रांसपोर्ट नगर जैसे इलाकों में भी अब राइजिंग मेन और पानी की टंकियों के लिए प्रस्ताव तैयार किए गए हैं। यहां के लिए 11.68 करोड़ रुपये का बजट एलडीए से मांगा गया है। राइजिंग मेन (Rising Main) या पंपिंग मेन एक ऐसी पाइपलाइन होती है, जो पानी को नीचे के स्तर से ऊपर के स्तर पर पंप के दबाव के माध्यम से ले जाती है। यानी यह पानी को जमीन के नीचे से, या किसी जल स्रोत (जैसे नदी/कुआं) से, ऊंचाई पर स्थित स्टोरेज टैंक (ESR - Elevated Service Reservoir) या वाटर ट्रीटमेंट प्लांट (WTP) तक पहुंचाती है।
इसे पंपिंग मेन (Pumping Main) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें पानी गुरुत्वाकर्षण (Gravity) से नहीं, बल्कि पंप की ताकत से प्रवाहित होता है। यह उन जगहों पर बहुत जरूरी है जहां पानी को ऊंचाई वाले इलाकों या किसी ऊंची इमारत की टंकी तक पहुंचाना हो।
पिछले एक दशक में लखनऊ में भूजल स्तर काफी तेजी से नीचे खिसकता गया है। इसके चलते आज शहर के कई हिस्सों में पानी 180 से 200 फीट की गहराई पर ही मिल रहा है। कुछ इलाकों में तो इससे भी नीचे जा चुका है। महानगर और जेल रोड जैसे पुराने और घनी आबादी वाले इलाकों में भूजल स्तर ज़मीन से 141 से 148 फीट नीचे दर्ज किया गया है। वहीं फैजुल्लागंज और इंदिरा नगर के कुछ हिस्सों में यह 115 से 138 फीट के बीच है।
माधोपुर में भूजल स्तर 100 फीट से गिरकर 110 फीट तक पहुंच चुका है। पुराने इलाकों अलीगंज, चौक और अमीनाबाद में पानी अब लगभग 160 फीट की गहराई पर मिल रहा है। इसके उलट, अपेक्षाकृत नए इलाकों की स्थिति थोड़ी बेहतर है। गोमती नगर में भूजल स्तर 100 से 115 फीट के बीच है, जबकि गोमती नगर एक्सटेंशन और वृंदावन योजना जैसे क्षेत्रों में यह 50 से 65 फीट के बीच दर्ज किया गया है। यह अंतर सिर्फ भौगोलिक नहीं है; यह शहरीकरण के पैटर्न और कंक्रीट के फैलाव की कहानी भी बताता है।
पिछले एक दशक में लखनऊ और यूपी के दूसरे बड़े शहरों का शहरी क्षेत्र 20 से 30 फीसदी तक बढ़ा है। नई कॉलोनियां, सड़कें, कॉम्प्लेक्स- इन सबने जमीन को कंक्रीट से ढक दिया है। जो इलाका जितना पुराना और कंक्रीट से ढका हुआ है, वहां भूजल उतना ही नीचे सरक गया है। लखनऊ के पुराने इलाकों में खुली ज़मीन लगभग खत्म हो चुकी है। बारिश का पानी जमीन में रिसने के बजाय सीधे नालियों में बह जाता है, जिससे एक्विफर तक पानी पहुंच ही नहीं पाता। नतीजतन भूजल रिजार्च न हो पाने के कारण जल स्तर घटता जा रहा है।
भूजल स्तर में गिरावट का एक बड़ा कारण अनियंत्रित निजी बोरवेल भी हैं। शहर में बोरवेल की संख्या और उनकी गहराई पर रोकटोक के लिए कोई ठोस निगरानी का सिस्टम नहीं है। हर व्यक्ति यह देखे बिना अपनी जरूरत के हिसाब से पानी निकाल रहा है कि इससे सामूहिक रूप से कितना नुकसान हो रहा है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार लखनऊ में भूजल दोहन 66 फीसदी से अधिक हो चुका है, जो “सेमी-क्रिटिकल” सीमा के बेहद करीब है। इसका मतलब है कि शहर जितना पानी निकाल रहा है, वह प्राकृतिक रूप से उतना वापस नहीं भर पा रहा।
मलीहाबाद जैसे आम की बागवानी वाले इलाकों में तो यह स्तर 70 फीसदी के पार जा चुका है, जो चेतावनी की घंटी है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर अथॉरिटी (CGWA) की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि हाउसिंग, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और इंडस्ट्रीज़ द्वारा बड़े पैमाने पर अवैध रूप से भूजल निकाला जा रहा है। नियम केवल कागज़ पर मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन बेहद लचर है।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ( NGT) ने इस रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए साफ कहा कि कई राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है और पर्यावरण मुआवज़े के नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा। निजी बोरिंग पर कार्रवाई के नाम पर पूरे उत्तर प्रदेश में केवल 111 बोरवेल सील किए गए हैं और 5.57 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है। ज़ाहिर है कि यह कार्रवाई जल संकट के मुकाबले बेहद अपर्याप्त और दिखावटी सी है।
लखनऊ के एक बड़े इलाके को जलापूर्ति के स्रोत कठौता झील को पानी देने वाली शारदा सहायक नहर रख-रखाव संबंधी कामों के लिए 16 मई की आधी रात से 28 दिन के लिए बंद कर दी जाएगी। इससे इंदिरा नगर और गोमती नगर सहित आसपास के इलाकों की करीब पांच लाख की आबादी को पीने के पानी की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। जब तक नहर बंद रहेगी तब तक कठौता झील में पहले से जमा पानी से ही इंदिरा नगर और गोमती नगर को पानी की आपूर्ति की जाएगी।
इसके अलावा इस दौरान पानी की किल्लत से निपटने के लिए जलकल विभाग नलकूप चलाएगा। जरूरत पड़ने पर सप्लाई में कटौती भी जाएगी। झील में जमा पानी से करीब एक महीने तक ही काम चलाया जा सकता है, वह भी तब जब आपूर्ति में कटौती की जाए। हालांकि जलकल विभाग का कहना है कि झील करीब 15 फीट गहरी है। इसमें जमा पानी से इंदिरानगर और गोमतीनगर को 28 दिन तक आपूर्ति की जा सकती है।
इंदिरानगर और गोमतीनगर को जलापूर्ति करने वाला तीसरा जलकल पूरी तरह शारदा सहायक नहर से मिलने वाले पानी पर निर्भर है। इसके पानी को जलकल की कठौता झील में लाया जाता है। सामान्य तौर पर जब नहर चालू होती है, तब तीसरे जलकल से इंदिरानगर और गोमतीनगर को सुबह-शाम मिलाकर 14 से 16 घंटे पानी की आपूर्ति टंकियों (ओवर हेड टैंक) और भूमिगत जलाशयों को भरने के लिए की जाती है।
लखनऊ की स्थिति देश में गहराते जल संकट से अलग नहीं है। भूजल स्तर की स्थिति की इस गंभीरता को देखते हुए NGT ने हाल ही में एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसमें नेशनल जियोफिज़िकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NGRI), जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (GSI), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की और पर्यावरण मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हैं। इस समिति को तीन महीने में रिपोर्ट देकर समाधान सुझाने को कहा गया है। देखना है कि इस कवायद से स्थिति में क्या और कितना फर्क आता है।
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