फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स
अमरकंटक और डिंडोरी में साल बोरर से प्रभावित 1.56 लाख से अधिक साल के पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई है।
इतने बड़े पैमाने पर पेड़ हटने का असर केवल जंगल तक सीमित नहीं रह सकता; मिट्टी की नमी, सतही बहाव और छोटी जलधाराएं प्राभवित होंगी।
सबसे अहम सवाल यह है कि कटाई से भूजल पुनर्भरण, मिट्टी के कटाव या जलधाराओं के प्रवाह पर कितना असर पड़ेगा।
मध्य प्रदेश के डिंडोरी और अमरकंटक क्षेत्र में साल बोरर से प्रभावित 1,56,319 साल के पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है। इसका उद्देश्य संक्रमित पेड़ों से कीट का फैलाव रोकना है। लेकिन अमरकंटक जैसे महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर पेड़ हटने का असर केवल जंगल तक सीमित नहीं रहेगा।
इसका संबंध मिट्टी और पानी से भी है। पेड़ हटने के बाद बारिश का कितना पानी जमीन में जाएगा, कितना सतह पर बहेगा और छोटी जलधाराओं पर इसका क्या असर पड़ेगा? इन सवालों को समझने के लिए स्थानीय स्तर पर कटाई से पहले और बाद के आंकड़ों की तुलना जरूरी होगी।
अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व 3,835.51 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहां नर्मदा, सोन और जोहिला जैसी नदियों के साथ कई मौसमी और स्थायी जलधाराएं हैं। क्षेत्र का बड़ा हिस्सा नम पर्णपाती जंगलों से ढका है। यही वजह है कि यहां जंगल में होने वाले बड़े बदलाव को पानी और मिट्टी से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
जंगल में पेड़-पौधों की बनावट और घनत्व से यह भी तय होता है कि बारिश का पानी जमीन तक कैसे पहुंचेगा, कितना पानी मिट्टी में समाएगा और कितना सतह पर बहेगा। इसमें पेड़ों की छतरी से लेकर जमीन पर गिरी पत्तियों, जड़ों और मिट्टी तक, सबकी भूमिका होती है।
साल जंगल पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने के साथ बारिश के पानी के जंगल से गुजरने के तरीके में भी बदलाव आया। यह अध्ययन अमरकंटक में नहीं हुआ था। इसलिए इसके आंकड़ों को यहां सीधे नहीं लगाया जा सकता। फिर भी इस अध्ययन से इतना संकेत जरूर मिलता है कि साल जंगल की स्थिति बदलने पर बारिश के पानी का बहाव भी बदल सकता है।
अध्ययन में अपेक्षाकृत कम प्रभावित साल जंगल में बारिश का औसतन 57.8 प्रतिशत पानी पेड़ों की छतरी से गुजरकर जमीन तक पहुंचा, जबकि अधिक प्रभावित जंगल में यह आंकड़ा 65.2 प्रतिशत था। वहीं तनों से नीचे आने वाले पानी का हिस्सा अपेक्षाकृत कम प्रभावित जंगल में 3.7 प्रतिशत और प्रभावित जंगल में 1.7 प्रतिशत था।
अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व 3,835.51 वर्ग किलोमीटर में फैला है।
लेकिन जमीन तक अधिक पानी पहुंचने का यह मतलब नहीं है कि भूजल भी उसी अनुपात में बढ़ेगा। यह मिट्टी, ढलान, वनस्पति और सतही बहाव जैसी स्थानीय स्थितियों पर भी निर्भर करता है।
अमरकंटक में तस्वीर क्या होगी, यह वहां की मिट्टी, ढलान, जंगल की स्थिति और पेड़ों को काटने के तरीके पर निर्भर करेगा। इसलिए अभी किसी तय नतीजे पर पहुंचना ठीक नहीं होगा। इसके लिए कटाई से पहले और बाद के आंकड़ों की तुलना करनी होगी।
2025 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक अध्ययन में अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व के घने और अपेक्षाकृत खुले साल जंगलों की मिट्टी की तुलना की गई। घने जंगल की मिट्टी में 41.5 प्रतिशत अधिक नमी और 28.6 प्रतिशत अधिक जैविक कार्बन पाया गया। खुले जंगल की मिट्टी का घनत्व भी अधिक था।
यह अध्ययन मौजूदा कटाई के बाद होने वाले बदलाव का अनुमान नहीं देता। लेकिन घने और खुले साल जंगलों की मिट्टी में मिला यह अंतर बताता है कि कटाई के बाद मिट्टी की नमी, जैविक कार्बन और उसके घनत्व में आने वाले बदलावों को दर्ज करना उपयोगी होगा।
पेड़ों की कटाई का असर केवल छतरी हटने तक सीमित नहीं होगा। असर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि लकड़ी निकालने के लिए किस तरह की मशीनें इस्तेमाल होती हैं, जंगल के भीतर कितने रास्ते बनते हैं और कितनी जमीन खुली रह जाती है। वन कटाई में भारी मशीनों के इस्तेमाल पर हुए अध्ययनों की एक समीक्षा बताती है कि मशीनों के दबाव से मिट्टी सख्त हो सकती है। इससे पानी का जमीन में समाना कम और सतह पर बहना बढ़ सकता है। इसके साथ मिट्टी के कटाव का खतरा भी बढ़ सकता है।
पेड़ हटने के बाद जंगल की छतरी कम होती है। लेकिन इसका अर्थ अपने आप यह नहीं है कि सारा पानी तेजी से सतह पर बहने लगेगा। अगर वहां घास, झाड़ियां और दूसरी वनस्पतियां बनी रहती हैं, तो वे पानी की गति को कम कर सकती हैं।
ढलान वाले क्षेत्रों में सतही बहाव बढ़ने पर उसके साथ मिट्टी भी बह सकती है और छोटी जलधाराओं में गाद जमा हो सकती है। हालांकि अभी उपलब्ध अध्ययनों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि मौजूदा कटाई के बाद अमरकंटक में गाद या मिट्टी का बहाव कितना बढ़ेगा। इसके लिए स्थानीय स्तर पर कटाई से पहले और बाद के आंकड़े जरूरी होंगे।
पेड़ों की कटाई के बाद पौधरोपण सबसे सीधा समाधान दिखाई देता है, लेकिन जंगल की बहाली केवल नए पौधे लगाने तक सीमित नहीं है। नए पौधे भले कुछ वर्षों में पेड़ बन जाएं, लेकिन एक विकसित जंगल बनने में लंबा समय लगता है। पेड़ों की छतरी और जड़ों के साथ जमीन पर पत्तियों की परत और मिट्टी भी धीरे-धीरे विकसित होती है। इसलिए बहाली की सफलता केवल लगाए गए और जीवित बचे पौधों की संख्या से नहीं मापी जा सकती।
वन कटाई में भारी मशीनों के इस्तेमाल पर हुए अध्ययनों की एक समीक्षा बताती है कि मशीनों के दबाव से मिट्टी सख्त हो सकती है। इससे पानी का जमीन में समाना कम और सतह पर बहना बढ़ सकता है। इसके साथ मिट्टी के कटाव का खतरा भी बढ़ सकता है।
साल जैसे स्थानीय वृक्षों वाले जंगलों में प्राकृतिक पुनर्जनन भी महत्वपूर्ण हो सकता है। जंगल में मौजूद बीज और छोटे पौधे अनुकूल परिस्थितियों में नई वनस्पति विकसित कर सकते हैं। अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व में हुए एक अध्ययन में भी छोटे और विकसित होते पौधों की संख्या के आधार पर अलग-अलग घनत्व वाले साल जंगलों में प्राकृतिक पुनर्जनन की स्थिति का अध्ययन किया गया।
जहां जंगल के अपने आप लौटने की गुंजाइश कम हो या कटाई से मिट्टी ज्यादा प्रभावित हुई हो, वहां पौधरोपण और मिट्टी को सुधारने जैसे अतिरिक्त उपायों की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए बहाली का एक ही तरीका पूरे क्षेत्र पर लागू करने के बजाय वहां की मिट्टी, वनस्पति और जंगल के अपने आप लौटने की क्षमता को ध्यान में रखना बेहतर होगा।
कटाई के असर को समझने के लिए कुछ चुने हुए स्थानों पर कटाई से पहले और बाद के आंकड़ों की तुलना जरूरी होगी। इसके लिए नियमित रूप से देखा जा सकता है कि मिट्टी में कितनी नमी है, बारिश का कितना पानी जमीन में समा रहा है, कितना सतह पर बह रहा है और छोटी जलधाराओं में पानी कितने समय तक बना रहता है।
अमरकंटक में इस तरह की वैज्ञानिक निगरानी पहले भी की जा चुकी है। अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व में वैज्ञानिक निगरानी के लिए पहले सात अध्ययन भूखंड बनाए गए थे। TFRI की रिपोर्ट के मुताबिक कोर और बफर क्षेत्रों में इन भूखंडों पर मिट्टी के पोषक तत्व, मिट्टी की नमी, पेड़ों और झाड़ियों तथा प्राकृतिक पुनर्जनन का अध्ययन किया गया था।
कटाई वाले इलाके में आए बदलाव को समझने के लिए उसकी तुलना पास के ऐसे साल जंगल से की जा सकती है, जहां बड़े पैमाने पर पेड़ नहीं काटे गए हों। बारिश की कुल मात्रा के साथ यह दर्ज करना भी जरूरी होगा कि बारिश कितनी तेज हुई और कितनी देर तक चली, क्योंकि इससे सतही बहाव बदल सकता है।
समय के साथ इन आंकड़ों से यह समझने में मदद मिलेगी कि मिट्टी की नमी और सतही बहाव में क्या बदलाव आया और छोटी जलधाराओं में पानी पहले की तरह बना रहा या नहीं।
वैज्ञानिक निगरानी के साथ स्थानीय समुदाय भी कुओं, झरनों और छोटी जलधाराओं में होने वाले मौसमी बदलाव दर्ज करने में मदद कर सकते हैं। मसलन, कुछ कुओं का जलस्तर नियमित रूप से दर्ज किया जा सकता है। यह भी लिखा जा सकता है कि छोटी धाराओं में पानी कब आया, वे कब सूखीं और बारिश के बाद मिट्टी का बहाव कहां दिखाई दिया।
यह वैज्ञानिक माप का विकल्प नहीं होगा, लेकिन यह पहचानने में मदद कर सकता है कि बदलाव कहां और कब दिखाई देने लगे। हालांकि अलग-अलग जगहों से मिली जानकारी की तुलना तभी हो सकेगी, जब उसे दर्ज करने का तरीका एक जैसा हो। इसके लिए स्थानीय लोगों को सरल प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
TFRI की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व के उद्देश्यों में स्थानीय समुदायों, वैज्ञानिकों और प्रबंधन संस्थाओं के बीच जानकारी साझा करना भी शामिल है। TFRI इस रिजर्व के लिए मुख्य संस्थान है। इसकी जिम्मेदारियों में शोध और आंकड़े जुटाने के साथ इनसे मिली जानकारी को रिजर्व के प्रबंधन तक पहुंचाना भी शामिल है।
अमरकंटक के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र की अधिसूचना में भी उजड़े क्षेत्रों की बहाली, जल निकायों के संरक्षण, जलग्रहण प्रबंधन तथा भूजल और मिट्टी की नमी के संरक्षण के प्रावधान हैं। यानी कटाई के बाद मिट्टी और पानी में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए पहले से मौजूद इस व्यवस्था का सहारा लिया जा सकता है।
अगर ये आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं, तो स्थानीय लोग और स्वतंत्र शोधकर्ता भी देख सकेंगे कि समय के साथ जंगल, मिट्टी और पानी में क्या बदल रहा है।
अमरकंटक में पेड़ों की कटाई शुरू होने के साथ असली परीक्षा इस बात की होगी कि उसके बाद जंगल, मिट्टी और पानी में आने वाले बदलावों को कितनी गंभीरता से दर्ज किया जाता है।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस कटाई से भूजल पुनर्भरण घटेगा, जलधाराओं का प्रवाह कम होगा या मिट्टी का कटाव बढ़ेगा। इन आशंकाओं की असल तस्वीर स्थानीय आंकड़े ही सामने ला सकेंगे।
इसलिए आने वाले वर्षों में हिसाब केवल लगाए गए और बचे हुए पेड़ों का नहीं होना चाहिए। यह भी दर्ज होना चाहिए कि मिट्टी में नमी कितनी बची, बारिश का पानी जमीन में किस तरह समाया और आसपास की छोटी जलधाराओं में पानी की स्थिति कैसे बदली। तभी पता चलेगा कि कटाई के बाद बहाली का असर केवल पेड़ों की संख्या में दिखा है या मिट्टी और पानी की स्थिति में भी सुधार आया है।
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