भारत सहित दुनिया भर में गन्‍ने, मक्‍के जैसे जैविक पदा‍र्थों से बड़े पैमाने पर बायो प्‍लास्टिक बनाने की ओर तेजी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं। 

 

फोटो: विकी कॉमंस

पर्यावरण

यूपी के लखीमपुर में लगेगा दुनिया का पहला इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्‍लांट, 308 पहियों के ट्रक पर आया रिएक्टर

कई बाधाओं और भारी मशक्‍कत के बाद आखिरकार 308 पहियों वाला ट्रक 200 टन वजनी बेल्जियम का 'साइक्लाइजेशन रिएक्टर' लखीमपुर के कुंभी पहुंचा

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

प्‍लास्टिक पिछले कई दशकों से हमारे पर्यावरण की सबसे बड़ी और जटिल समस्‍याओं में बना हुआ है। भारत सहित दुनियाभर में इसके प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल विकल्‍प खोजने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं। इन खोजों में मक्‍के, गन्‍ने व अन्‍य फाइबरयुक्‍त वनस्‍पतियों से बायोप्‍लास्टिक बनाने का एक प्रभावी उपाय प्‍लास्टिक के इको फ्रेंडली विकल्‍प के रूप में सामने आया है। अब इसे प्रयोगशालाओं से निकाल कर बड़े स्‍तर पर उत्‍पादन की तैयारी चल रही है। 

गन्‍ने से बायो प्‍लास्टिक बनाने का एक बड़ा प्‍लांट उत्‍तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में जल्‍द ही शुरू होने जा रहा है। धार्मिक स्‍थल के रूप में प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ के नजदीक कुंभी गांव के पास इसका संयंत्र लगाया जा रहा है। करीब 135 एकड़ में बन रहे प्लांट के चालू होने से इको फ्रेंडली बायोप्‍लास्टिक का उत्‍पादन करके पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलने के साथ ही बड़ी संख्‍या में स्‍थानीय लोगों को एक स्‍थायी रोजगार मिलने की भी उम्‍मीद है। 

308 पहियों वाला ट्रक मशीन लेकर लखीमपुर पहुंचा 

हाल के दिनों में 308 पहियों वाला एक विशालकाय ट्रक देशभर के सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना रहा। यह ट्रक देश के पहले बायोप्लास्टिक प्‍लांट के लिए बेल्जियम से आयातित 200 टन वजनी साइक्लाइजेशन रिएक्टर मशीन को ओडिशा के पारादीप बंदरगाह से ढोकर लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी पहुंचाने जा रहा था। कई महीनों के मशक्‍कत भरे सफर के बाद आखिकार 22 अक्‍टूबर को सकुशल अपने मुकाम पर पहुंच गया। इस ट्रक के वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुए थे। ट्रक जंक्‍शन नाम की फेसबुक प्रोफाइल सहित कई प्‍लेटफॉर्म्‍स पर इसके वीडियो देखने को मिले।

इस मशीन को कारखाने में लगाने के बाद जल्‍द ही इससे गन्ने से पर्यावरण-अनुकूल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का उत्पादन शुरू किया जाएगा। रिएक्‍टर के पहुंचने के साथ ही लगभग 3080 करोड़ रुपये की लागत से लगाए जा रहे भारत के पहले इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट के काम में तेजी आ गई है। एक मीडिया रिपोर्ट में संयंत्र के जीएम डॉ. सुनील कुमार यादव के हवाले से बताया गया है कि इस प्लांट में गन्ने और चीनी से बायोप्लास्टिक बनाया जाएगा। यह दुनिया का ऐसा पहला एकीकृत प्लांट होगा जहां एक ही छत के नीचे बायोप्लास्टिक उत्‍पादन की सभी प्रक्रियाएं पूरी होंगी। यह प्‍लांट हर साल लगभग 80,000 टन पीएलए का उत्पादन करेगा। खास बात यह है कि इस प्‍लांट में गन्‍ने से बायोप्‍लास्टिक बनाने के लिए सारा कच्चा माल भी स्‍थानीय स्‍तर पर मिलेगा, क्‍योंकि हिमालय के तराई क्षेत्र में स्थित लखीमपुर में गन्‍ने की खेती काफी बड़े पैमाने पर की जाती है।

गन्ने से कैसे बनता है बायो प्लास्टिक?

गन्ने से बायो प्लास्टिक बनाने के लिए सबसे पहले चीनी या शीरे से लैक्टिक एसिड (Lactic acid) तैयार किया जाता है। इसके बाद लैक्टिक एसिड में उत्‍प्रेरक (Catalyst) डालकर जैव-रासायनिक प्रतिक्रिया (Biochemical reaction) कराई जाती है। इससे पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए (Polylactic acid PLA) बनता है, जो पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल (Biodegradable) होता है। यानी यह प्राकृतिक रूप से अपघटित हो जाता है। यही खूबी इसे साधारण प्‍लास्टिक से अलग बनाती है, जोकि सैकड़ों साल तक नष्‍ट नहीं होता। इस प्रक्रिया से बने बायो प्लास्टिक से उत्पाद और पैलेट्स से कपड़े, धागे, कटलरी और पॉलिथीन जैसी कई चीजें बनाई जा सकेंगी, जो बायोडिग्रेडेबल होने के कारण पर्यावरण अनुकूल यानी इको फ्रेंडली (Eco-friendly) होंगी। गन्‍ने से बायो प्लास्टिक के उत्‍पादन की प्रक्रिया को संक्षेप में चरणबद्ध तरीके से कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है -

1. गन्ने से रस या शीरा प्राप्त करना: सबसे पहले गन्ने से रस निकाला जाता है। चीनी बनाने की प्रक्रिया में निकलने वाले शीरे का भी कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

2. लैक्टिक एसिड बनाना: गन्ने के रस या शीरे में मौजूद शर्करा का सूक्ष्म जीवों की मदद से किण्‍वन (fermentation) किया जाता है। इस प्रक्रिया में लैक्टिक एसिड बनता है, जिसे आगे इस्तेमाल करने के लिए शुद्ध किया जाता है।

3. पीएलए का निर्माण: लैक्टिक एसिड को पहले लैक्टाइड नामक मध्यवर्ती पदार्थ में बदला जा सकता है। इसके बाद उत्प्रेरक की मदद से बहुलकीकरण (Polymerization) किया जाता है। इससे लंबी आणविक शृंखलाओं वाला पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए बनता है।

4. उत्पाद तैयार करना: पीएलए को छोटे दानों या पैलेट्स में बदलकर विभिन्न उत्पाद बनाए जाते हैं। पीएलए के अपघटन के लिए औद्योगिक कंपोस्टिंग जैसी नियंत्रित परिस्थितियों की जरूरत होती है। इसलिए हर पीएलए उत्पाद को सामान्य मिट्टी या खुले वातावरण में आसानी से नष्ट होने वाला नहीं मानना चाहिए।

गन्‍ने से बायो प्‍लास्टिक बनाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। 

पर्यावरण के लिए कैसे बेहतर विकल्प है बायो प्लास्टिक?

पारंपरिक प्लास्टिक का अधिकांश हिस्सा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों (Fossil fuels) से बनाया जाता है। इसके उत्पादन में इन सीमित प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल होता है। वहीं, गन्ने जैसे नवीकरणीय जैविक स्रोतों से बनने वाली बायो प्लास्टिक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने का विकल्प उपलब्ध कराती है। इसके अलावा, पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) जैसी कुछ बायो प्लास्टिक को उपयुक्त औद्योगिक कंपोस्टिंग परिस्थितियों में सूक्ष्मजीवों की मदद से अपघटित किया जा सकता है। इससे सही तरीके से प्रबंधन किए जाने पर प्लास्टिक कचरे का बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, बायो प्लास्टिक को पूरी तरह से पर्यावरण अनुकूल और प्रत्‍यक्ष रूप से बायो डिग्रेडेबल मानना सही नहीं होगा। इसका पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि इसे बनाने में कितनी ऊर्जा और पानी खर्च हुआ, कच्चा माल कहां से आया और इस्तेमाल के बाद इसका निपटान कैसे किया गया। पीएलए सामान्य मिट्टी, नदियों या समुद्र में तेजी से अपघटित नहीं होता। इसलिए इसके लाभ हासिल करने के लिए उचित कचरा प्रबंधन जरूरी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि बायो-आधारित, बायोडिग्रेडेबल और कंपोस्टेबल प्लास्टिक तीन अलग-अलग विशेषताएं हैं। किसी पदार्थ का पौधों से बनना यह सुनिश्चित नहीं करता कि वह प्राकृतिक वातावरण में आसानी से नष्ट भी हो जाएगा। इसलिए उसके कच्चे माल के साथ-साथ उसकी रासायनिक संरचना, उपयोग और निपटान की व्यवस्था को भी देखना जरूरी है। हालांकि, इन सीमाओं के बावजूद बायो प्लास्टिक साधारण प्लास्टिक की तुलना में काफी पर्यावरण अनुकूल विकल्‍प है। 

बायो प्लास्टिक के प्रमुख पर्यावरणीय लाभ इस प्रकार हैं :

  • जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता में कमी: गन्ने जैसे नवीकरणीय स्रोतों से कच्चा माल मिलने पर पेट्रोलियम आधारित संसाधनों की जरूरत घट सकती है।

  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी की संभावना: पारंपरिक प्लास्टिक की तुलना में कुछ बायो प्लास्टिक का जीवनचक्र कार्बन उत्सर्जन कम हो सकता है।

  • कचरा प्रबंधन में मदद: औद्योगिक कंपोस्टिंग के अनुकूल उत्पादों को सही व्यवस्था मिलने पर जैविक कचरे के साथ संसाधित किया जा सकता है।

  • कृषि उपोत्पादों का उपयोग: शीरे जैसे उपोत्पादों का इस्तेमाल कर संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।

  • सतत अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: उपयुक्त उत्पादन और निपटान व्यवस्था के साथ बायो प्लास्टिक संसाधनों के अधिक टिकाऊ इस्तेमाल में योगदान दे सकती है।

गन्ने के अलावा इन चीजों से भी बन रहा है बायो प्लास्टिक

बायो प्लास्टिक बनाने के लिए गन्ना ही एकमात्र कच्चा माल नहीं है। दुनिया भर में मक्का, कसावा, आलू, वनस्पति तेल, कृषि अपशिष्ट और सूक्ष्मजीवों तक का इस्तेमाल करके अलग-अलग प्रकार के बायो प्लास्टिक विकसित किए जा रहे हैं। कुछ कच्चे माल से सीधे प्राकृतिक पॉलिमर प्राप्त होते हैं, जबकि कुछ से शर्करा निकालकर किण्वन और रासायनिक प्रक्रियाओं के जरिए प्लास्टिक बनाया जाता है। इनके प्रमुख स्रोत इस प्रकार हैं।

1. मक्का (Corn)

मक्के के स्टार्च से लैक्टिक एसिड तैयार करके पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) बनाया जाता है। इससे खाद्य पैकेजिंग, कप, ट्रे और रेशे जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं। इसके लिए इस्तेमाल होने वाला स्टार्च खाद्य फसल से आता है, इसलिए भूमि और खाद्य संसाधनों पर प्रभाव का आकलन जरूरी है।

2. कसावा और आलू

इनकी जड़ों से प्राप्त स्टार्च का इस्तेमाल स्टार्च आधारित बायो प्लास्टिक बनाने में होता है। इसमें दूसरे जैविक पदार्थ मिलाकर लचीली फिल्म, थैली और पैकेजिंग सामग्री तैयार की जा सकती है। हालांकि, नमी के प्रति संवेदनशीलता और मजबूती इसकी प्रमुख तकनीकी चुनौतियां हैं।

3. धान का पुआल, गेहूं का भूसा और बगास

कृषि अवशेषों में मौजूद सेल्यूलोज और हेमीसेल्यूलोज से शर्करा या अन्य उपयोगी जैविक घटक प्राप्त किए जा सकते हैं। इन्हें आगे संसाधित करके जैव-आधारित पॉलिमर बनाया जा सकता है। इससे फसल अवशेषों का उपयोग बढ़ सकता है और कुछ परिस्थितियों में अपशिष्ट जलाने की जरूरत घटाने में मदद मिल सकती है।

4. सूक्ष्मजीव और बैक्टीरिया

कुछ बैक्टीरिया अपने भीतर पॉलीहाइड्रॉक्सीअल्कानोएट (पीएचए) नामक पॉलिमर जमा करते हैं। नियंत्रित परिस्थितियों में इन्हें प्राप्त करके पैकेजिंग, कृषि और कुछ चिकित्सा उत्पादों में इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ पीएचए प्रकार जैविक परिस्थितियों में अपघटित हो सकते हैं, लेकिन इसकी गति और सीमा पर्यावरण पर निर्भर करती है।

5. वनस्पति तेल

सोयाबीन, अरंडी और अन्य वनस्पति तेलों में मौजूद फैटी एसिड से रासायनिक प्रक्रियाओं के जरिए जैव-आधारित पॉलिमर बनाए जा सकते हैं। इनका उपयोग कोटिंग, फोम, रेजिन और कुछ टिकाऊ प्लास्टिक उत्पादों में होता है। हालांकि, वनस्पति तेल से बना हर पॉलिमर बायोडिग्रेडेबल नहीं होता।

6. समुद्री शैवाल और एल्गी

समुद्री शैवाल से एल्जिनेट और दूसरे जैविक पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं, जिनसे फिल्म, जेल और पैकेजिंग सामग्री विकसित की जा सकती है। कुछ प्रकार के शैवाल से तेल या शर्करा लेकर पॉलिमर बनाने पर भी अनुसंधान हो रहा है। इसका लाभ यह है कि कुछ शैवाल आधारित प्रक्रियाओं में कृषि भूमि की जरूरत कम हो सकती है।

7. लकड़ी का बुरादा और वन-आधारित अवशेष

लकड़ी के अवशेषों से सेल्यूलोज, लिग्निन और अन्य घटक प्राप्त करके जैव-आधारित प्लास्टिक, मिश्रित सामग्री और पैकेजिंग के विकल्प विकसित किए जाते हैं। इन तकनीकों में अपशिष्ट से बायो प्‍लास्टिक बनाया जाना महत्वपूर्ण है। हालांकि उत्‍पादन की प्रक्रिया में रासायनिक प्रसंस्करण और ऊर्जा की खपत भी इसके पर्यावरणीय प्रभाव को तय करती है।

बायो प्‍लास्टिक बनाने की प्रक्रिया के विभिन्‍न चरण।

दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है बायो प्लास्टिक का क्षेत्र

प्लास्टिक प्रदूषण पर अंकुश लगाने और पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक के विकल्प विकसित करने के लिए भारत समेत दुनिया के कई देशों में बायो प्लास्टिक के उत्पादन, अनुसंधान और औद्योगिक इस्तेमाल पर काम चल रहा है। अब इसका दायरा केवल गन्ने से बनने वाले पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक सूक्ष्मजीवों से बनने वाले पॉलीहाइड्रॉक्सीअल्कानोएट (पीएचए), कृषि अपशिष्ट से तैयार होने वाले बायोपॉलिमर और ऐसे पदार्थ विकसित कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल पैकेजिंग, कपड़ा, वाहन उद्योग और कृषि में किया जा सके। European Bioplastics की 2025 की बाजार रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में जैव-आधारित प्लास्टिक की उत्पादन क्षमता 2025 के 23.1 लाख टन से बढ़कर 2030 तक करीब 46.9 लाख टन होने का अनुमान है। हालांकि, यह क्षमता वैश्विक प्लास्टिक उत्पादन का अभी लगभग 0.5 प्रतिशत ही है। भारत में भी सरकारी नीतियों, चीनी उद्योग और जैव-प्रौद्योगिकी कंपनियों के जरिए इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा रहा है।

बायो प्लास्टिक उत्‍पादन में भारत के बढ़ते कदम

भारत में इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण विकास उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में हो रहा है। बलरामपुर चीनी मिल गन्ने से पीएलए बनाने के लिए कुंभी में बड़े औद्योगिक संयंत्र की तैयारी कर रही है। इसकी प्रस्तावित वार्षिक उत्पादन क्षमता करीब 80,000 टन है। सितंबर 2026 में केंद्र सरकार ने इसी पहल के तहत पीएलए और उसके सह-बहुलकों के अनुसंधान एवं विकास के लिए 75 करोड़ रुपये की सहायता से 100 टन सालाना क्षमता वाली पायलट सुविधा की घोषणा की।

इसके अलावा, महाराष्ट्र सरकार ने 2026 में अपनी पहली बायो प्लास्टिक नीति पेश की है। इसका उद्देश्य निवेश आकर्षित करना, घरेलू उत्पादन बढ़ाना और प्लास्टिक के वैकल्पिक पदार्थों के उद्योग को प्रोत्साहित करना है। हाल ही में लोकसभा में एक प्रश्‍न के उत्‍तर में केंद्र सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक बायोई3 (BioE3) नीति के तहत भी पीएलए, पीएचए और नैनोसेल्यूलोज जैसे जैव-आधारित पदार्थों के विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है।

दुनिया भर में किन तकनीकों पर हो रहा है काम?

दुनिया भर में वैज्ञानिक और कंपनियां बायो प्लास्टिक को अधिक किफायती, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए कई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। कोशिश केवल पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक की जगह जैविक स्रोतों से बने पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे विकल्प विकसित करना भी है जो कम संसाधनों में तैयार हों और इस्तेमाल के बाद उनका बेहतर प्रबंधन किया जा सके। इसके लिए गन्ने और मक्का जैसी फसलों से मिलने वाली शर्करा के अलावा कृषि अपशिष्ट, लकड़ी के अवशेष और सूक्ष्मजीवों का भी उपयोग किया जा रहा है। इन अनुसंधानों में मुख्य रूप से निम्नलिखित तकनीकों पर ध्यान दिया जा रहा है। 

  • पीएलए का औद्योगिक उत्पादन: अमेरिका, थाईलैंड और यूरोप की कंपनियां पैकेजिंग, रेशे और उपभोक्ता उत्पादों के लिए पीएलए तकनीक विकसित और इस्तेमाल कर रही हैं।

  • पीएचए का विकास: सूक्ष्मजीवों की मदद से बनने वाले इस बहुलक पर काम हो रहा है, ताकि विशेष परिस्थितियों में अपघटित होने वाले प्लास्टिक के विकल्प उपलब्ध कराए जा सकें।

  • कृषि अपशिष्ट का उपयोग: फसल अवशेष, लकड़ी और अन्य जैविक उपोत्पादों से उपयोगी बहुलक (Polymer) बनाने के प्रयास जारी हैं।

बायो प्लास्टिक की राह में हैं कई बड़ी चुनौतियां

प्लास्टिक प्रदूषण कम करने में बायो प्लास्टिक से उम्मीदें जरूर हैं, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की राह अब भी कई चुनौतियों से भरी हुई है। 

पहली और सबसे बड़ी समस्या इसकी महंगी उत्पादन लागत है। पारंपरिक प्लास्टिक के लिए पहले से स्थापित औद्योगिक ढांचा और व्यापक आपूर्ति व्यवस्था मौजूद है, जबकि कई बायो प्लास्टिक के उत्पादन में कच्चे माल, प्रसंस्करण और तकनीक पर अधिक खर्च आता है। 

दूसरी चुनौती कच्चे माल की उपलब्धता की है। गन्ने, मक्का और अन्य फसलों से बायो प्लास्टिक बनाने के लिए जमीन, पानी और ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। यदि इनके उत्पादन के लिए खेती का विस्तार किया जाता है, तो खाद्य उत्पादन, भूमि उपयोग और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।

तीसरी चुनौती यह है कि सभी बायो प्लास्टिक प्राकृतिक वातावरण में आसानी से अपघटित नहीं होते। पीएलए जैसे पदार्थों को तेजी से अपघटित करने के लिए अक्सर औद्योगिक कंपोस्टिंग की नियंत्रित परिस्थितियां जरूरी होती हैं। भारत में ऐसी सुविधाओं की उपलब्धता और कचरे की छंटाई भी महत्वपूर्ण सवाल हैं।

बायो प्लास्टिक के विस्तार में प्रमुख चुनौतियां इस प्रकार हैं :

  • अधिक लागत: उत्पादन तकनीक और प्रसंस्करण की लागत के कारण कुछ बायो प्लास्टिक पारंपरिक प्लास्टिक से महंगे पड़ते हैं।

  • पानी और जमीन की जरूरत: फसलों से कच्चा माल तैयार करने पर कृषि संसाधनों की मांग बढ़ सकती है।

  • अपघटन की सीमाएं: बायो-आधारित होने का अर्थ यह नहीं है कि प्लास्टिक हर परिस्थिति में बायोडिग्रेडेबल भी होगा।

  • कचरा प्रबंधन: कंपोस्टिंग और अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक की छंटाई के लिए उपयुक्त बुनियादी ढांचा जरूरी है।

  • रीसाइक्लिंग में कठिनाई: पारंपरिक प्लास्टिक के साथ बायो प्लास्टिक मिल जाने पर पुनर्चक्रण की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

  • पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन: उत्पादन से लेकर निपटान तक पानी की खपत, ऊर्जा और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का जीवनचक्र आकलन जरूरी है।

इसलिए बायो प्लास्टिक को पारंपरिक प्लास्टिक का स्वतः पर्यावरण अनुकूल विकल्प मानने के बजाय, उसके कच्चे माल, उपयोग और निपटान की पूरी प्रक्रिया के आधार पर परखना जरूरी है।

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